भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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१७०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

वृत्तिश्चिरस्थितैकैव स्याद्धारावाहिकस्थले ।
भिन्ना वा वृत्तयः सन्तु स्थूलकालार्थगोचराः ॥ ८५ ॥
उपास्तिवदमानानि सन्तु वाऽनाद्यवृत्तयः ।
गृहीतग्रहणात् सूक्ष्मकालस्याऽतीन्द्रियत्वतः ॥ ८६ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि प्रथम ज्ञानसे घट आदिका अज्ञान नष्ट होता है और द्वितीयादि ज्ञानसे तत्-तत् कालसे विशिष्ट अज्ञान नष्ट होता है। और धारावाहिक ज्ञानस्थलमें एक ही दीर्घकालावस्थायी वृत्ति है अथवा स्थूल कालको विषय करनेवाली भिन्न भिन्न ही वृत्तियाँ हों अथवा उपासनाके समान द्वितीयादि वृत्तियाँ अप्रमाण हों, क्योंकि वे अवगत अर्थका ही ग्रहण करती हैं और सूक्ष्म काल तो अतीन्द्रिय है, अतः उसका ग्रहण नहीं करती हैं ॥ ८४ ॥ ८५ ॥ ८६ ॥

केचित्तु प्रथमज्ञाननिवर्त्यमेवाऽज्ञानं स्वरूपावारकम् । द्वितीयादिज्ञाननिवर्त्यानि तु देशकालादिविशेषणान्तरविशिष्टविषयाणि । अत एव सत्तानिश्चयरूपे अज्ञाननिवर्तके चैत्रदर्शने सकृज्जाते 'चैत्रं न जानामि' इति स्वरूपावरणं नाऽनुभूयते, किन्तु 'इदानीं स कुत्रेति न जानामि' इत्यादिरूपेण विशिष्टावरणमेव । विस्मरणशालिनः क्वचित् सकृत् दृष्टेऽपि 'न जानामि' इति स्वरूपावरणं दृश्यते चेत्, तत्र तथाऽस्तु । अन्यत्र सकृद्दृष्टे विशिष्टविषयाण्येवाऽज्ञानानि ज्ञानानि च ।

कोई लोग कहते हैं कि प्रथम ज्ञानसे निवृत्त होनेवाला अज्ञान ही स्वरूपको आवृत करनेवाला है। और धारास्थलमें द्वितीयादि ज्ञानसे देश, काल आदि अन्य विशेषणोंसे विशिष्टविषयक अज्ञान निवृत्त होते हैं। इसीलिए अज्ञाननिवृत्ति करनेमें समर्थ सत्तानिश्चयरूप चैत्रदर्शनके एक बार होनेपर भी—'चैत्रको नहीं जानता हूँ' इस प्रकार स्वरूपावरणका अनुभव नहीं होता है, किन्तु 'इस समय वह कहाँ है, यह मैं नहीं जानता हूँ' इस प्रकार विशिष्टका ही आवरण अनुभूत होता है। कहींपर विस्मरणशील पुरुषको एक बार देखनेपर भी 'नहीं जानता हूँ' इस प्रकार स्वरूपके आवरणका अनुभव होता है, यदि ऐसी शङ्का करें, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसे स्थलमें, अर्थात् जहाँ फिर भी स्वरूपके आवरणका अनुभव होता है, द्वितीय आदि ज्ञान भी स्वरूपके आवारक अज्ञानका ही नाश करते हैं और अन्यत्र—विस्मरणाभावस्थलमें विषयके एक बार दृष्ट होनेपर अज्ञान और ज्ञान विशिष्टविषयक ही

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