भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १६९

कारीरीफले वृष्टावासन्नसमयस्येवाऽज्ञानविषये घटादौ तत्कालस्योपलक्षणतया विषयकोटावननुप्रवेशेन सूक्ष्मतत्कालभेदाविषयैर्धारावाहिकद्वितीयादिज्ञानैरज्ञानानां निवृत्तावपि न काचिदनुपपत्तिरिति ।

केचिदाहुर्घटाज्ञानमाद्यज्ञानेन हन्यते ।
द्वितीयाद्यैस्तु कालादिविशिष्टाज्ञानबाधनम् ॥ ८४ ॥

अवभासमें कोई अनुपपत्ति नहीं है । जैसे कारीरीके फलभूत वृष्टिमें आसन्न समयके (कारीरीनामक इष्टिसमाप्तिके उत्तरक्षणके) उपलक्षण होनेसे विषयकोटिमें प्रवेश नहीं है, वैसे ही अज्ञानके विषयीभूत घट आदिमें भी तत्-तत् कालके उपलक्षण होनेसे विषयकोटिमें प्रवेश नहीं है । इससे सूक्ष्म कालविशेषको विषय न करनेवाले धारावाहिक द्वितीय आदि ज्ञानोंसे अज्ञानोंकी निवृत्ति होनेमें कोई आपत्ति नहीं है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि कोई लोग शङ्का करते हैं—तत्-तत् अज्ञान तत्-तत् कालविशेषविशिष्ट विषयका ही आवरण करते हैं । इस प्रकार काल-विशेषका आवरणीय विषयकोटिमें विशेषणरूपसे प्रवेश न कर उपलक्षणरूपसे उसका क्यों प्रवेश करते हैं ? इसपर उत्तर है कि यदि उसका विशेषणरूपसे प्रवेश किया जायगा, तो धारावाहिक ज्ञानस्थलमें द्वितीयादि ज्ञान अज्ञानके निवर्तक नहीं होंगे, क्योंकि तत्-तत् सूक्ष्मकालके अप्रत्यक्ष होनेसे तत्-तत् काल-वैशिष्ट्यका विषयमें अवभास न होनेके कारण तत्-तत् कालविशिष्टविषयकत्वका भी ज्ञानमें भान नहीं होगा, और असमानविषयक ज्ञान अज्ञानका विरोधी नहीं होता है । अतः उपलक्षणरूपसे ही उन उन कालोंका प्रवेश है, विशेषण-रूपसे प्रवेश नहीं है, इसमें दृष्टान्त है कारीरीफल—वृष्टि । अर्थात् ‘वृष्टिकामः कारीर्या यजेत’ (वृष्टिका अभिलाषी कारीरी याग करे) यह वृष्टिरूप फल कारीरी नामके यागके उत्तर क्षणमें ही होना चाहिए, अन्य कालमें नहीं; क्योंकि उस कालमें सूखते हुए धानोंका जीवन कालान्तरीय वृष्टिसे सुरक्षित नहीं होगा, परन्तु वह समीपवर्ती इष्टिका उत्तर काल वृष्टिरूप फलमें विशेषणरूपसे विवक्षित नहीं है, कारण कि इष्टिके विना भी समयविशेषमें वृष्टि होती ही है, किन्तु इतर समयकी व्यावृत्ति करनेके लिए वृष्टिरूप--कारीरी नामक यागके फलमें जैसे आसन्नसमयका उपलक्षणरूपसे प्रवेश है, वैसे ही प्रकृतमें भी तत्-तत् कालका विशेषणरूपसे प्रवेश है, यह भाव है ] ।

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