सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १६९
कारीरीफले वृष्टावासन्नसमयस्येवाऽज्ञानविषये घटादौ तत्कालस्योपलक्षणतया विषयकोटावननुप्रवेशेन सूक्ष्मतत्कालभेदाविषयैर्धारावाहिकद्वितीयादिज्ञानैरज्ञानानां निवृत्तावपि न काचिदनुपपत्तिरिति ।
केचिदाहुर्घटाज्ञानमाद्यज्ञानेन हन्यते ।
द्वितीयाद्यैस्तु कालादिविशिष्टाज्ञानबाधनम् ॥ ८४ ॥
अवभासमें कोई अनुपपत्ति नहीं है । जैसे कारीरीके फलभूत वृष्टिमें आसन्न समयके (कारीरीनामक इष्टिसमाप्तिके उत्तरक्षणके) उपलक्षण होनेसे विषयकोटिमें प्रवेश नहीं है, वैसे ही अज्ञानके विषयीभूत घट आदिमें भी तत्-तत् कालके उपलक्षण होनेसे विषयकोटिमें प्रवेश नहीं है । इससे सूक्ष्म कालविशेषको विषय न करनेवाले धारावाहिक द्वितीय आदि ज्ञानोंसे अज्ञानोंकी निवृत्ति होनेमें कोई आपत्ति नहीं है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि कोई लोग शङ्का करते हैं—तत्-तत् अज्ञान तत्-तत् कालविशेषविशिष्ट विषयका ही आवरण करते हैं । इस प्रकार काल-विशेषका आवरणीय विषयकोटिमें विशेषणरूपसे प्रवेश न कर उपलक्षणरूपसे उसका क्यों प्रवेश करते हैं ? इसपर उत्तर है कि यदि उसका विशेषणरूपसे प्रवेश किया जायगा, तो धारावाहिक ज्ञानस्थलमें द्वितीयादि ज्ञान अज्ञानके निवर्तक नहीं होंगे, क्योंकि तत्-तत् सूक्ष्मकालके अप्रत्यक्ष होनेसे तत्-तत् काल-वैशिष्ट्यका विषयमें अवभास न होनेके कारण तत्-तत् कालविशिष्टविषयकत्वका भी ज्ञानमें भान नहीं होगा, और असमानविषयक ज्ञान अज्ञानका विरोधी नहीं होता है । अतः उपलक्षणरूपसे ही उन उन कालोंका प्रवेश है, विशेषण-रूपसे प्रवेश नहीं है, इसमें दृष्टान्त है कारीरीफल—वृष्टि । अर्थात् ‘वृष्टिकामः कारीर्या यजेत’ (वृष्टिका अभिलाषी कारीरी याग करे) यह वृष्टिरूप फल कारीरी नामके यागके उत्तर क्षणमें ही होना चाहिए, अन्य कालमें नहीं; क्योंकि उस कालमें सूखते हुए धानोंका जीवन कालान्तरीय वृष्टिसे सुरक्षित नहीं होगा, परन्तु वह समीपवर्ती इष्टिका उत्तर काल वृष्टिरूप फलमें विशेषणरूपसे विवक्षित नहीं है, कारण कि इष्टिके विना भी समयविशेषमें वृष्टि होती ही है, किन्तु इतर समयकी व्यावृत्ति करनेके लिए वृष्टिरूप--कारीरी नामक यागके फलमें जैसे आसन्नसमयका उपलक्षणरूपसे प्रवेश है, वैसे ही प्रकृतमें भी तत्-तत् कालका विशेषणरूपसे प्रवेश है, यह भाव है ] ।
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| १७० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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वृत्तिश्चिरस्थितैकैव स्याद्धारावाहिकस्थले ।
भिन्ना वा वृत्तयः सन्तु स्थूलकालार्थगोचराः ॥ ८५ ॥
उपास्तिवदमानानि सन्तु वाऽनाद्यवृत्तयः ।
गृहीतग्रहणात् सूक्ष्मकालस्याऽतीन्द्रियत्वतः ॥ ८६ ॥
कुछ लोग कहते हैं कि प्रथम ज्ञानसे घट आदिका अज्ञान नष्ट होता है और द्वितीयादि ज्ञानसे तत्-तत् कालसे विशिष्ट अज्ञान नष्ट होता है। और धारावाहिक ज्ञानस्थलमें एक ही दीर्घकालावस्थायी वृत्ति है अथवा स्थूल कालको विषय करनेवाली भिन्न भिन्न ही वृत्तियाँ हों अथवा उपासनाके समान द्वितीयादि वृत्तियाँ अप्रमाण हों, क्योंकि वे अवगत अर्थका ही ग्रहण करती हैं और सूक्ष्म काल तो अतीन्द्रिय है, अतः उसका ग्रहण नहीं करती हैं ॥ ८४ ॥ ८५ ॥ ८६ ॥
केचित्तु प्रथमज्ञाननिवर्त्यमेवाऽज्ञानं स्वरूपावारकम् । द्वितीयादिज्ञाननिवर्त्यानि तु देशकालादिविशेषणान्तरविशिष्टविषयाणि । अत एव सत्तानिश्चयरूपे अज्ञाननिवर्तके चैत्रदर्शने सकृज्जाते 'चैत्रं न जानामि' इति स्वरूपावरणं नाऽनुभूयते, किन्तु 'इदानीं स कुत्रेति न जानामि' इत्यादिरूपेण विशिष्टावरणमेव । विस्मरणशालिनः क्वचित् सकृत् दृष्टेऽपि 'न जानामि' इति स्वरूपावरणं दृश्यते चेत्, तत्र तथाऽस्तु । अन्यत्र सकृद्दृष्टे विशिष्टविषयाण्येवाऽज्ञानानि ज्ञानानि च ।
कोई लोग कहते हैं कि प्रथम ज्ञानसे निवृत्त होनेवाला अज्ञान ही स्वरूपको आवृत करनेवाला है। और धारास्थलमें द्वितीयादि ज्ञानसे देश, काल आदि अन्य विशेषणोंसे विशिष्टविषयक अज्ञान निवृत्त होते हैं। इसीलिए अज्ञाननिवृत्ति करनेमें समर्थ सत्तानिश्चयरूप चैत्रदर्शनके एक बार होनेपर भी—'चैत्रको नहीं जानता हूँ' इस प्रकार स्वरूपावरणका अनुभव नहीं होता है, किन्तु 'इस समय वह कहाँ है, यह मैं नहीं जानता हूँ' इस प्रकार विशिष्टका ही आवरण अनुभूत होता है। कहींपर विस्मरणशील पुरुषको एक बार देखनेपर भी 'नहीं जानता हूँ' इस प्रकार स्वरूपके आवरणका अनुभव होता है, यदि ऐसी शङ्का करें, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसे स्थलमें, अर्थात् जहाँ फिर भी स्वरूपके आवरणका अनुभव होता है, द्वितीय आदि ज्ञान भी स्वरूपके आवारक अज्ञानका ही नाश करते हैं और अन्यत्र—विस्मरणाभावस्थलमें विषयके एक बार दृष्ट होनेपर अज्ञान और ज्ञान विशिष्टविषयक ही
आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहितं १७१
न चैवं सति धारावाहिकद्वितीयादिज्ञानानामज्ञाननिवर्तकत्वं न स्यात्, स्थूलकालविशिष्टाज्ञानस्य प्रथमज्ञानेनैव निवृत्तेः। पूर्वापरज्ञानव्यावृत्तसूक्ष्मकालविशिष्टाज्ञानस्य तदविषयैर्द्वितीयादिज्ञानैर्निवृत्त्ययोगादिति वाच्यम्, धारावहनस्थले प्रथमोत्पन्नाया एव वृत्तेस्तावत्कालावस्थायित्वसम्भवेन वृत्तिभेदानभ्युपगमात्। तदभ्युपगमेऽपि बहुकालावस्थायिपञ्चषवृत्तिरूपत्वसम्भवेन परस्परव्यावृत्तस्थूलकालादिविशेषणभेदविषयत्वोपपत्तेः। प्रतिक्षणोद्यदनेकवृत्तिसन्तानरूपत्वाभ्युपगमेऽपि द्वितीयादिवृत्तीनामधिगतार्थमात्रविषयतया प्रामाण्याभावेनाऽऽवरणानिवर्तकत्वेऽप्यहानेश्च। नहि विषया-
हैं। अर्थात् धारावाहिक ज्ञानस्थलमें द्वितीय आदि ज्ञान विशिष्टविषयक हैं और अज्ञान भी विशिष्टविषयक हैं, अतः समानविषयक होनेसे उनका परस्पर निवर्त्यनिवर्तकभाव हो सकता है, यह भाव है।
द्वितीयादि ज्ञानके और इनसे निवर्त्य अज्ञानके स्वभावतः विशिष्टविषयक होनेपर धारावाहिक द्वितीय आदि ज्ञान अज्ञानके निवर्तक नहीं होंगे, क्योंकि स्थूलकालविशिष्ट अज्ञानकी प्रथमज्ञानसे ही निवृत्ति हो जाती है, अतः ज्ञानके पूर्वापर कालसे व्यावृत्त जो सूक्ष्म काल—क्षण है उससे विशिष्ट विषयको आवृत्त करनेवाले अज्ञानका, सूक्ष्मकालविशिष्ट विषयका अवगाहन न करनेवाले द्वितीयादि ज्ञानसे, निरास नहीं होगा, ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि धारावाहिक स्थलमें (अर्थात् जहाँ यह घट है, यह घट है, इत्यादिरूपसे ज्ञानकी धारा चलती हो, वहाँ) प्रथम कालमें उत्पन्न वृत्तिकी ही धारावाहिक कालपर्यन्त स्थिति मानते हैं, इससे वृत्तिका भेद ही नहीं माना जाता है। यदि वृत्तिका भेद माना जाय, तो भी धाराकी दीर्घकालपर्यन्त रहनेवाली पाँच छः वृत्तियोंका सम्भव होनेसे परस्पर व्यावृत्त स्थूलकाल आदि विशेषण-विशेष विषयत्वकी उपपत्ति हो सकती है। यदि ज्ञानधाराको—प्रतिक्षणमें उत्पन्न होनेवाली वृत्तियोंका प्रवाह—माने तो भी प्रथमवृत्तिसे उत्तरकालीन वृत्तियोंमें, केवल अधिगतार्थविषयकत्व होनेसे, प्रामाण्य न होनेके कारण* आवरणके
* शङ्काका तात्पर्य यह है कि पूर्व ग्रन्थमें धारावाहिक ज्ञानमें एक ही वृत्ति मानी गई है, उसके अनन्तर 'तदभ्युपगमेऽपि' इत्यादिसे धारा एकवृत्तिरूप नहीं मानी गई है किन्तु अनेक वृत्तिरूप मानी गई है, क्योंकि भाष्य आदिमें धारावाहिक ज्ञान अनेक वृत्तिरूप ही माना गया है।
| १७२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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बाधमात्रं प्रामाण्यम् । प्रागवगतानवगतयोः पर्वततद्वृत्तिपावकयोरनुमिति-विषययोरबाधस्याऽविशेषेण उभयत्राऽप्यनुमितेः प्रामाण्यप्रसङ्गात् । न चेष्टापत्तिः । 'वह्नाव् अनुमितिः प्रमाणम्' इतिवत् 'पर्वतेऽप्यनुमितिः प्रमाणम्' इति व्यवहारादर्शनात् ।
विवरणे साक्षिसिद्धस्याऽज्ञानस्याऽभावव्यावृत्तिप्रत्यायनार्थानुमानादिवि-
(अज्ञानके) अनिवर्तक होनेपर भी 'ज्ञान अज्ञानका निवर्तक है' इस नियमका भङ्ग नहीं हो सकता है, क्योंकि केवल विषयका अबाध प्रामाण्य नहीं है अर्थात् जिस ज्ञानके विषयका बाध न हो वही प्रमाण है, ऐसा प्रामाण्यका लक्षण नहीं है, कारण कि उसके प्रामाण्यलक्षण होनेपर 'पर्वतो वह्निमान्' ( पर्वतमें वह्नि है ) इत्यादि अनुमितिके विषयीभूत पर्वत और उसमें रहनेवाली वह्निका, जो क्रमशः अनुमितिके पूर्वमें ज्ञात और अज्ञात हैं, सामान्यरूपसे बाध नहीं है, अतः पर्वतांश और वह्न्यंशमें अनुमितिके प्रामाण्यकी प्रसक्ति होगी, और इसे इष्टापत्ति नहीं मान सकते हैं, कारण कि लोकमें जैसे 'वह्निमें अनुमिति प्रमाण है', यह व्यवहार देखा जाता है, वैसे 'पर्वतमें भी अनुमिति प्रमाण है', यह व्यवहार नहीं देखा जाता ।
और पराभिमत अभावरूप अज्ञानकी व्यावृत्तिका बोध करानेके लिए प्रयुक्त अनुमान आदिका—यद्यपि साक्षी द्वारा सिद्ध अज्ञान—विषय
वे वृत्तियाँ न्यायमतके समान प्रतिक्षणावस्थायिनी नहीं मानी गई हैं, प्रत्युत पांच छः क्षणावस्थायिनी मानी गई हैं, इसके बाद 'प्रतिक्षणे०' इत्यादि ग्रन्थसे न्यायमतका स्वीकार करके प्रतिक्षणावस्थायिनी वृत्तियोंका अभ्युपगम कर ज्ञानधाराकी उपपत्ति की है। इस मतमें यह शङ्का होती है कि प्रथम क्षणमें उत्पन्न वृत्तिसे ही अज्ञानका नाश होनेपर अनन्तर कालमें उत्पन्न हुई क्षणिक वृत्तियोंसे किस अज्ञानका नाश होगा ? यदि उत्तरकालीन वृत्त्यात्मक ज्ञान अज्ञानकी निवृत्ति नहीं करेगा, तो 'ज्ञान अज्ञानका निवर्तक है' इस नियमका व्यभिचार होगा। इसपर उत्तर देते हैं कि ठीक है—ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होती है, परन्तु वही ज्ञान अज्ञानका निवर्तक है, जो प्रमाण हो । और प्रमाण ज्ञान उसे कहते हैं जो अनधिगत और अबाधित विषयका अवगाहन करता हो, द्वितीयकालीन वृत्तिज्ञान अबाधितार्थविषयक है, परन्तु अनधिगतार्थविषयक नहीं है, क्योंकि वह स्मृतिके समान अधिगत विषयका ही अवगाहन करता है, पर्वतांशमें वह्न्यनुमितिका प्रामाण्य न हो, इसलिए केवल अबाधितार्थविषयकत्व—प्रामाण्य नहीं कह सकते हैं, अतः द्वितीयकालिक वृत्तियोंके प्रमाण न होनेसे उनके अज्ञाननिवर्तक न होनेपर भी कोई हानि नहीं है ।
[आवरणाभिभव-स्वरूपविचार] भाषानुवादसहित १७३
पयत्वेऽपि प्रमाणवेद्यत्वोक्तेश्च । तस्मात् द्वितीयादिवृत्तीनां प्रामाण्याभावात् उपासनादिवृत्तीनामिवाज्ञानानिवर्तकत्वेऽपि न हानिः । प्रमाणवृत्तीनामेव तन्निवर्तकत्वाभ्युपगमात् ।
है, तथापि वह विवरणमें प्रमाणवेद्य वह (प्रमितिका अविषय) कहा गया है ।
तात्पर्य यह है कि विवरणकारको भी प्रमाका लक्षण अनधिगतत्व-घटित ही अभिप्रेत है, अर्थात् अनधिगताबाधितार्थविषयक ज्ञानत्वरूप प्रमात्व अभिप्रेत है । इसलिए उन्होंने अज्ञानके अनुमितिविषय होनेपर भी उसे प्रमितिका विषय नहीं माना, क्योंकि 'अज्ञोऽहम्' (मैं अज्ञ हूँ) इस अनुभव-रूप साक्षीसे ही अज्ञानकी सिद्धि हुई है, अतः अनुमिति आदिके ज्ञातार्थ-विषयक होनेसे उक्त अज्ञातत्वघटित प्रमात्व अनुमिति आदिमें नहीं है, अतः प्रमात्मकवृत्तित्वेन अज्ञानमें नहीं आया, क्योंकि अज्ञानांशमें पर्वताद्यंशके समान अनुमिति अप्रमाण है । इसी अभिप्रायसे प्रमाणवेद्यत्वका विवरणमें कथन है । साक्षिरूपज्ञानका अज्ञान विषय है, अतः वह प्रमाणवेद्य है, ऐसा भी नहीं कह सकते, क्योंकि साक्षिरूप ज्ञान तभी प्रमाणज्ञान हो सकता है, जब कि वह किसी प्रमाणकरणसे उत्पन्न हो, परन्तु वह तो नित्य है, अतः साक्षिज्ञान प्रमा या अप्रमाकी कोटिमें प्रविष्ट नहीं होता । इसी प्रकार अन्य मतावलम्बीयोंने भी ईश्वरज्ञानको प्रमात्व और अप्रमात्वसे रहित ही माना है । अथवा साक्षीसे अतिरिक्त प्रमाणज्ञानसे अवेद्यत्व भी प्रमाणवेद्यत्वका अर्थ हो सकता है, इसलिए अज्ञातत्वघटित ही प्रमाणका लक्षण मानना होगा, ] इससे अर्थात् अज्ञातत्वघटित प्रमालक्षणके न रहनेसे धारावाहिक ज्ञानकी द्वितीयकालिक वृत्तियोंके प्रामाण्य न होनेके कारण उपासनादि वृत्तियोंके समान * उनके अज्ञानके निवर्तक न होनेपर भी कोई दोष नहीं है, क्योंकि प्रमाणवृत्तियाँ ही अज्ञानकी निवर्तक होती हैं, ऐसा स्वीकार किया गया है ।
* यह भाव है—उपासनाका जो वृत्ति है, वह ज्ञानरूप नहीं है, क्योंकि वह किसी ज्ञानके करणसे उत्पन्न नहीं होती, और मन तो ज्ञानका करण नहीं है, इसका विचार आगे किया जायगा । इसलिए उपासनावृत्ति गमन आदिके समान क्रियारूप है, क्योंकि वह पुरुष-कृतिसाध्य है, अतः वह अपने उपास्यके आवारक अज्ञानका निवारण नहीं करती है । इसी प्रकार इच्छा आदि भी अपने विषयके अज्ञानका निवारण नहीं करते हैं । इसी प्रकार द्वितीयादि वृत्तियाँ अज्ञानका निवारण नहीं करती हैं, क्योंकि वे भी अधिगतार्थविषयक हैं, अतः स्मृतिके समान अप्रमाणरूप हैं ।
१७४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
ननु नाज्ञानविच्छित्तिः परोक्षज्ञानतस्ततः ।
भ्रान्तिजिज्ञासयोर्दृष्टेरत्र केचित् समादधुः ॥ ८७ ॥
परोक्ष ज्ञानसे अज्ञानका विनाश नहीं होता है, क्योंकि परोक्ष ज्ञानके बाद भ्रान्ति और जिज्ञासा होती है, इस शङ्काका कोई लोग निम्नलिखितरूपसे समाधान करते हैं ॥ ८७ ॥
ननु नाऽयमपि नियमः, परोक्षवृत्तेरनिर्गमेनाऽज्ञानानिवर्तकत्वादिति चेत् ।
द्विविधं विषयाज्ञानं साक्षिविक्षेपसङ्गतेः ।
अर्थगं पौरुषं चेति परोक्षात् पौरुषक्षयः ॥ ८८ ॥
साक्षीके और विक्षेपके सम्बन्धसे विषयका आवारक अज्ञान दो प्रकारका है—एक विषयमें रहनेवाला और दूसरा पुरुषमें रहनेवाला, इसलिए परोक्षज्ञानसे पुरुषमें रहनेवाला अज्ञान विनष्ट होता है ॥ ८८ ॥
अत्र केचिदाहुः—द्विविधं विषयावरकमज्ञानम् । एकं विषयाश्रितं रज्ज्वादिविक्षेपोपादानभूतं कार्यकल्प्यम् । अन्यत् पुरुषाश्रितम् 'इदमहं न जानामि' इत्यनुभूयमानम् । पुरुषाश्रितस्य विषयसंभिन्नविक्षेपोपादानत्वासम्भवेन, विषयाश्रितस्य 'इदमहं न जानामि' इति साक्षिरूपप्रकाशसंसर्गायोगेन द्विविधस्याऽप्यावश्यकत्वात् । एवं च परोक्षस्थले वृत्तेर्निर्गमनाभावाद्
अब फिर शङ्का करते हैं कि यह भी नियम नहीं है कि प्रत्येक प्रमा अज्ञानकी निवृत्ति करती है, क्योंकि परोक्ष वृत्तिका निर्गम नहीं होता है, अतः वह परोक्षवृत्तिरूप प्रमा अज्ञानकी निवर्तक नहीं हो सकती । [ और है तो वह प्रमा अतः 'प्रमामात्रमज्ञाननिवर्तकम्' इस नियममें व्यभिचार है, यह भाव है ] ।
इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं—विषयको आवरण करनेवाले अज्ञान दो प्रकारके होते हैं—एक तो विषयमें रहनेवाला रज्जु आदिके विक्षेपका ( सर्प आदिरूप विवर्तका ) उपादानकारणभूत कार्य द्वारा कल्पित अज्ञान और दूसरा 'मैं इसे नहीं जानता हूँ' इस प्रकारसे अनुभूयमान पुरुषमें रहनेवाला अज्ञान । जो पुरुषमें रहनेवाला अज्ञान है, वह अधिष्ठानभूत रज्जु आदि विषयके साथ तादात्म्यापन्न सर्पादि विक्षेपका उपादान नहीं हो सकता और जो विषयमें रहनेवाला अज्ञान है उसका 'मैं इसे नहीं जानता हूँ' इस प्रकारके साक्षीरूप प्रकाशके साथ सम्बन्ध नहीं है, इसलिए अज्ञानके दो भेद मानने
आवरणविभवस्वरूप-विचार] भाषानुवादसहित १७५
दूरस्थवृक्षे आप्तवाक्यात् परिमाणविशेषावगमेऽपि तद्विपरीतपरिमाणविक्षेप- दर्शनाच्च विषयगताज्ञानानिवृत्तावपि पुरुषगताज्ञाननिवृत्तिरस्त्येव। 'शास्त्रार्थं न जानामि' इत्यनुभूताज्ञानस्य तदुपदेशानन्तरं निवृत्त्यनुभवात्। अत एव 'अनुमेयादौ सुषुप्तिव्यावृत्तिः' इति विवरणस्य तद्विषयाज्ञाननिवृत्तिरर्थ इत्युक्तं तत्त्वदीपने इति।
अन्ये पौरुषमज्ञानमाहुः शक्तिद्वयाश्रयम्। परोक्षज्ञानतस्तत्राऽऽवरणांशपरिक्षयम् ॥ ८९ ॥
कोई लोग कहते हैं कि पुरुषवृत्ति एक ही अज्ञान आवरण और विक्षेप रूप दो शक्तियोंसे युक्त है, उनमें से परोक्षज्ञानसे आवरणांशका विनाश होता है ॥ ८९ ॥
अत्यन्त आवश्यक हैं। दो प्रकारके अज्ञान होनेपर और परोक्षस्थलमें वृत्तिका निर्गम न होनेसे दूर देशमें स्थित वृक्षमें शिष्टके * वाक्यसे परिमाणविशेषका अवगम होनेपर भी उस परिमाणसे विपरीत परिमाणरूप (अल्पपरिमाणरूप) विक्षेप देखा जाता है, अतः विषयगत अज्ञानकी निवृत्ति न होनेपर भी पुरुषगत अज्ञानकी निवृत्ति होती ही है। क्योंकि 'मैं शास्त्रार्थको † (शास्त्रोक्त अर्थको) नहीं जानता हूँ' इस प्रकार अनुभूत शास्त्रार्थके अज्ञानकी शास्त्रके अर्थके उपदेशके अनन्तर निवृत्ति होती है, ऐसा अनुभव होता है। इसीसे 'अनुमेयादौ सुषुप्तिव्यावृत्तिः' इस विवरणका तत्त्वदीपनमें यह अर्थ कहा है कि अनुमेय आदि विषयमें अनुमिति आदि परोक्ष ज्ञानसे (पुरुषगत) अज्ञानकी निवृत्ति होती है।
* भाव यह है कि किसी शिष्ट पुरुषने कहा कि दूरस्थ वृक्ष छोटा नहीं है, किन्तु समीपके वृक्षके समान बड़ा है, इस वाक्यसे जो ज्ञान होगा, वह परोक्ष होगा। उससे यदि विषयगत अज्ञानकी निवृत्ति मानी जाय, तो विपरीत परिमाणकी जो दूरस्थ वृक्षमें उपलब्धि होती है, वह नहीं होगी, अतः उससे पुरुषगत अज्ञान ही निवृत्त होता है।
† इसका यह भाव है—'मैं शास्त्रके अर्थको नहीं जानता हूँ' इस वाक्यसे अनुभूत अज्ञानकी शास्त्रार्थके उपदेशके अनन्तर 'शास्त्रार्थका अज्ञान अब निवृत्त हुआ' इस प्रकार अज्ञान निवृत्तिका अनुभव होता है। शास्त्रका अर्थ दो प्रकारका है—धर्मरूप और ब्रह्मरूप। धर्मरूप जो शास्त्रका अर्थ है उसमें उपदेशजन्य ज्ञान परोक्ष ही है, अपरोक्ष नहीं है, इसलिए धर्मरूप विषयमें रहनेवाले अज्ञानकी निवृत्तिका प्रसङ्ग नहीं है। अतः वहां पुरुषगत अज्ञानकी निवृत्ति होती है, यह कहना होगा। उपदेशजन्य ब्रह्मरूप अर्थमें भी परोक्षज्ञान होता है अन्यथा मनन आदिके विधानकी असङ्गति होगी, वह भी पुरुषगत अज्ञानकी ही निवृत्ति करेगा। अतः परोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तन नहीं करता है, यह कहना असङ्गत है।
| १७६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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अन्ये तु—नयनपटलवत् पुरुषाश्रितमेवाऽज्ञानं विषयावरणम् । न तदतिरेकेण विषयगताज्ञाने प्रमाणमस्ति । न च पुरुषाश्रितस्य विषयगतविक्षेपपरिणामित्वं न सम्भवति । तत्संभवे वा दूरस्थवृक्षपरिमाणे परोक्षज्ञानादज्ञाननिवृत्तौ विपरीतपरिमाणविक्षेपो न सम्भवतीति वाच्यम्, वाचस्पतिमते सर्वस्य प्रपञ्चस्य जीवाश्रिताज्ञानविषयीकृतब्रह्मविवर्तत्वेन तद्वच्छुक्तिरजतादेः पुरुषाश्रिताज्ञानविषयीकृतब्रह्मविवर्तत्वोपपत्तेः । परोक्षवृत्त्या एकावस्थानिवृत्तावपि अवस्थान्तरेण विपरीतपरिमाणविक्षेपोपपत्तेश्चेत्याहुः ।
कुछ लोग कहते हैं कि जैसे नेत्रमें रहनेवाले पटल (काचादि दोष) विषयको आवृत करते हैं, वैसे ही पुरुषगत अज्ञान ही विषयको आवृत करता है, इससे भिन्न विषयगत अज्ञानमें प्रमाण नहीं है । परन्तु यदि 'एक ही पुरुषगत अज्ञान माना जाय, तो वह विषयगत विक्षेपका परिणामी—उपादान—नहीं होगा । यथा कथंचित् पुरुषगत अज्ञानके विषयगत विक्षेपके उपादान होनेपर भी दूर देशवर्ती वृक्षके परिमाणमें आप्त (सच्चे) पुरुषके उपदेशसे जन्य ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर विपरीत परिमाणरूप विक्षेपकी उत्पत्ति नहीं होगी' इस प्रकारकी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि * वाचस्पतिमिश्रके मतमें सम्पूर्ण प्रपञ्च जीवमें रहनेवाली अविद्याके विषय ब्रह्मका विवर्त है, अतः पुरुषगत अज्ञानके विषय ब्रह्मके शुक्ति-रजत आदि विवर्त हो सकते हैं । † परोक्ष वृत्तिसे एक अवस्था (आवरण) की निवृत्ति होनेपर भी विक्षेपरूप अन्य अवस्थासे विपरीत परिमाणरूप विक्षेपकी उपपत्ति हो सकती है ।
* तात्पर्य यह है कि यदि शुक्ति-रजत आदि अज्ञानके परिणाम माने जायँ, तो अज्ञानको अवश्य विषयचैतन्यगत मानना चाहिए । और वे अज्ञानके परिणाम न माने जायँ, तो अज्ञानको विषयचैतन्यगत माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है । दार्ष्टान्तिकमें अर्थात् 'पुरुषाश्रित' इत्यादिमें ब्रह्मपद शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्यरूप अर्थमें प्रयुक्त है, पूर्ण ब्रह्मरूप अर्थमें प्रयुक्त नहीं है । क्योंकि अवच्छिन्न चैतन्य ही शुक्तिरजत आदिका अधिष्ठान है ।
† जैसे परोक्षज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति अनुभूत होती है, वैसे ही दूरस्थवृक्षस्थलमें परोक्षज्ञान होनेपर भी विपरीत परिमाणकी उत्पत्ति भी अनुभूत होती है, अतः दो अनुभवोंके आधारपर पुरुषवृत्ति अज्ञानका एक देश परोक्षज्ञानसे निवृत्त होता है और अन्य देश अनुवृत्त होता है, ऐसी कल्पनाकी जाती है, दो प्रकारका अज्ञान है, ऐसी कल्पना नहींकी जाती, क्योंकि ऐसा माननेमें गौरव है । वस्तुतस्तु परोक्षज्ञानको अज्ञानका
आरणाभिगव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १७७
विषयस्थं परे मोहं मूलाज्ञानांशरूपकम् ।
अंशांशिनोरभेदाच्च साक्षिणा तस्य सङ्गतिम् ॥ ९० ॥
विषयमें रहनेवाला अज्ञान मूलाज्ञानका अंशरूप है, और उसीका साक्षीके साथ सम्बन्ध होता है, क्योंकि अंश और अंशीका अभेद होता है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं ॥ ९० ॥
अपरे तु—शुक्तिरजतादिपरिणामोपपत्त्याञ्जस्याद् विषयावगुण्ठनपटवत् विषयगतमेवाऽज्ञानं तदावरणम् । न च तथा सति अज्ञानस्य साक्ष्यसंसर्गेण ततः प्रकाशानुपपत्तिः, परोक्षवृत्तिनिवर्त्यत्वासम्भवश्च दोष इति वाच्यम्, अवस्थारूपाज्ञानस्य साक्ष्यसंसर्गेऽपि तत्संसृष्टमूलाज्ञानस्यैव 'शुक्तिमहं न
कुछ लोग कहते हैं कि शुक्तिरजत आदि परिणामकी उपपत्तिका सामञ्जस्य हो, इसलिए विषयको आवृत्त करके रहनेवाले पटके समान विषयगत ही अज्ञान विषयका आवरण करता है ‡। विषयावरक अज्ञानके विषयगत होनेपर साक्षीके साथ अज्ञानका सम्बन्ध न होनेसे साक्षीसे अज्ञानका प्रकाश नहीं होगा और परोक्ष वृत्तिका विषयदेशमें गमन न होनेसे उससे उसकी निवृत्ति भी नहीं होगी ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अवस्थारूप अज्ञानका साक्षीके साथ सम्बन्ध भले ही न हो, परन्तु 'शुक्तिको मैं नहीं जानता हूँ'
निवर्तक माना जाय, तो भी प्रतिबन्धकरहित परोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तक होता है, ऐसा ही स्वीकार करना चाहिए । प्रकृतमें भ्रमके अनुरोधसे दूरत्व आदि दोषोंसे प्रतिवद्ध होनेके कारण आप्तवाक्यजन्य भी ज्ञान पुरुषगत अज्ञानका निवर्तक नहीं है, अतः विपरीत परिमाणकी उपपत्ति और अनुपपत्तिकी शङ्का नहीं है, यह भाव है।
‡ पूर्वमें अप्रतिबद्ध ज्ञानमात्र अज्ञानका निवर्तक है, इस नियमके अनुसार अव्यभिचारके लिए परोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तक है, ऐसा प्रतिपादन किया गया है। अब 'अपरे तु' ग्रन्थसे 'अप्रतिबद्ध अपरोक्षज्ञान ही अज्ञानका निवर्तक है, इस नियमका अङ्गीकार करके परोक्षज्ञानमें व्यभिचारशङ्काका निरास करते हैं। तात्पर्य यह है कि लोकमें घट आदि मृत्तिकाके परिणामी देखे जाते हैं, इसी प्रकार शुक्तिरजत आदि भी किसीके परिणाम हैं, ऐसा मानना चाहिए। उनका परमाण्वन्वय और व्यतिरेकसे अज्ञान ही सिद्ध होता है, क्योंकि प्रातिभासिक शुक्तिरजतके प्रति शुक्ति आदि उपादान नहीं हो सकते हैं, जैसे शुक्तिद्वारा विषयचैतन्यगत अज्ञान रजत आदि विक्षेपके प्रति उपादान सिद्ध हो सकता है, वैसे पुरुषवृत्ति अज्ञान नहीं हो सकता है, इसलिए विषयगत अज्ञान ही अवस्थारूप है। यद्यपि पुरुषगत अज्ञान प्रभान्यायसे रजत आदिके प्रति उपादान हो सकता है, तथापि यह युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे मूलाज्ञानमें क्रिया नहीं होती है, वैसे ही अवस्थारूप अज्ञानमें भी क्रिया नहीं होती, अतः प्रभान्यायका प्रसङ्ग नहीं हो सकता है।
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१७८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
जानामि' इति प्रकाशोपपत्तेः । शुक्त्यादेरपि मूलाज्ञानविषयचैतन्याभि- न्नतया तद्विषयत्वानुभवाविरोधात् ।
विवरणादिषु मूलाज्ञानसाधनप्रसङ्गे एव 'इदमहं न जानामि' इति प्रत्यक्षप्रमाणोपदर्शनाच्च । 'अहमज्ञः' इति सामान्यतोऽज्ञानानुभव एव मूला- ज्ञानविषयः । 'शुक्तिमहं न जानामि' इत्यादिविषयविशेषालिङ्गिताज्ञानानु- भवस्त्ववस्थाऽज्ञानविषय इति विशेषाभ्युपगमेऽप्यवस्थाऽवस्थावतोर्भेदेन मूलाज्ञानस्य साक्षिसंसर्गाद्वा साक्षिविषयचैतन्ययोः वास्तवैक्याद्वा विषयगत- स्याऽप्यवस्थाऽज्ञानस्य साक्षिविषयत्वोपपत्तेः । परोक्षज्ञानस्याऽज्ञानानिवर्त-
इत्यादि अनुभवसे साक्षिसंसृष्टमूलाज्ञानका ही प्रकाश होता है । शुक्ति आदिका भी मूलाज्ञानके विषयीभूत चैतन्यके साथ अभेद होनेसे शुक्त्यादिविषयत्वके अनुभवमें विरोध नहीं है ।
और विवरण आदि ग्रन्थोंमें मूलाज्ञानके साधनके प्रसङ्गमें ही 'इदमहं न जानामि' ( इसे मैं नहीं जानता हूँ ) इस प्रकार प्रत्यक्ष प्रमाणका उपन्यास भी किया है । * 'मैं अज्ञ हूँ' इस प्रकार सामान्यतः अज्ञानका अनुभव ही मूलाज्ञानका अवगाहन करता है । 'शुक्तिको मैं नहीं जानता हूँ' इत्यादि जो किसी विषयविशेषसे युक्त अज्ञानका अनुभव होता है, वह तो अवस्थारूप अज्ञानका अवगाहन करता है, इस प्रकार विशेषका यदि स्वीकार किया जाय, तो भी अवस्था और अवस्थावान्का तादात्म्य होनेके कारण मूलाज्ञानका साक्षीके साथ साक्षात् सम्बन्ध होनेसे अथवा साक्षिचैतन्य और विषयचैतन्यका वस्तुतः ऐक्य होनेसे विषयगत अज्ञानमें भी साक्षात् साक्षीके विषयत्वकी उपपत्ति हो सकती है । यद्यपि परोक्ष-
* 'अहमज्ञः' यही अनुभव सामान्य मूलाज्ञानका साधक है और 'शुक्तिं न जानामि' (मैं शुक्ति नहीं जानता हूँ ) इत्यादि अनुभव अवस्थारूप अज्ञानका ही साधक है, विवरणकारने 'शुक्तिं न जानामि' इत्यादि प्रतीति मूलाज्ञानके साधक प्रकरणमें कही है, अतः वह मूलाज्ञानका साधन करती है अवस्थारूप अज्ञानका साधन नहीं करती, यह नहीं कह सकते, क्योंकि शुक्तिरजत आदि परिणामकी उपपत्तिका लिए अवस्थारूप अज्ञानकी सिद्धिकी अपेक्षा होनेसे मूलाज्ञानके साधनप्रकरणमें भी उसका प्रसङ्ग है । इससे 'शुक्तिं न जानामि' इत्यादि अनुभवोंके मूलाज्ञानविषयत्वमें प्रमाण न होनेसे विषयगत अवस्थारूप अज्ञानकी सिद्धि होगी, इस परिस्थितिमें उसका साक्षीके साथ सम्बन्ध न होनेसे उसका अनुभव नहीं हो सकता, इस आशयवाली शङ्काका अनुवाद करते हैं; 'अहमज्ञः' इत्यादि ग्रन्थसे ।
आवरणाभिभव-स्वरूपविचारं] भाषानुवादसहितं १७९
कत्वेऽपि ततस्तन्निवृत्त्यनुभवस्य सत्तानिश्चयरूपपरोक्षवृत्तिप्रतिबन्धकप्रयुक्ता-
ननुभवनिबन्धनभ्रान्तित्वोपपत्तेः अपरोक्षज्ञानस्यैवाऽज्ञाननिवर्तकत्वनियमा-
भ्युपगमादित्याहुः ।
सुखादिगोचरा वृत्तिर्ननु नाऽज्ञानघातिनी ।
मैवम्, मोहसुखादीनां साक्षिवेद्यत्वनिर्णयात् ॥९१॥
मुख आदिको विषय करनेवाली वृत्ति अज्ञानकी निवृत्ति नहीं करती इस प्रकार
शङ्का नहीं कर सकते, क्योंकि अज्ञान, सुख आदिमें केवल साक्षीवेद्यत्वका ही
निर्णय किया गया है, अतः वृत्तिरूप अपरोक्ष ज्ञान अवश्य अज्ञानका निवारण
करता है ॥ ९१ ॥
ननु नाऽयमपि नियमः, अविद्याऽहङ्कारसुखदुःखादितद्धर्मप्रत्यक्षस्याऽ-
ज्ञाननिवर्तकत्वानभ्युपगमादिति चेत्, न; अविद्यादिप्रत्यक्षस्य साक्षि-
रूपत्वेन वृत्तिरूपापरोक्षज्ञानस्याऽऽवरणनिवर्तकत्वनियमानपायात् ॥१३॥
कः साक्षी ? तत्र कूटस्थदीपे कूटस्थचित् स्वयम् ।
स्वाध्यस्तदेहयुग्मादेः साक्षीति प्रतिपादितः ॥९२॥
साक्षी कौन है ? इस प्रश्नके उत्तरमें कूटस्थदीपमें प्रतिपादन किया गया है कि
स्थूल और सूक्ष्म शरीरका अधिष्ठानभूत कूटस्थचैतन्य ही स्वयं साक्षी है ॥ ९२ ॥
ज्ञान अज्ञानका निवर्तक नहीं है, तथापि परोक्षज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्तिका जो
अनुभव होता है, वह, सत्तानिश्चयरूप परोक्ष वृत्ति जो प्रतिबन्धक है उससे
प्रयुक्त अज्ञानका अनुभव न होनेसे, भ्रान्तिमात्र है, अतः अपरोक्ष ज्ञान ही
अज्ञानका निवर्तक है, ऐसा नियम ही स्वीकार किया गया है ।
कोई लोग शङ्का करते हैं कि अविद्या, अहङ्कार, सुख, दुःख आदि
अहङ्कारके धर्मोंका प्रत्यक्ष अज्ञानका निवर्तक नहीं माना गया है, अतः अप्रति-
बद्ध अपरोक्षज्ञानमात्र अज्ञानका निवर्तक है, यह नियम भी नहीं बन सकता है,
परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि वृत्तिरूप अपरोक्षज्ञान अज्ञानावरणका निवर्तक
है, ऐसा नियम है और अविद्या आदिका प्रत्यक्ष साक्षिरूप है, अतः उक्त
नियममें कोई व्याघात नहीं है ॥ १३ ॥
| १८० | सिद्धान्तलेशसंग्रहं | [ प्रथम परिच्छेदं |
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अथ कोऽयं साक्षी जीवातिरेकेण व्यवह्रियते ?
अत्रोक्तं कूटस्थदीपे—देहद्वयाधिष्ठानभूतं कूटस्थचैतन्यं स्वावच्छेदकस्य देहद्वयस्य साक्षादीक्षणान्निर्विकारत्वाच्च साक्षीत्युच्यते । लोकेऽपि ह्यौदासीन्यबोधाभ्यामेव साक्षित्वं प्रसिद्धम् । यद्यपि जीवस्य वृत्तयः सन्ति देहद्वयभासिकाः, तथाऽपि सर्वतः प्रसृतेन स्वावच्छिन्नेन कूटस्थ-
अब शङ्का करते हैं कि जीवभिन्न जो साक्षीका व्यवहार किया जाता है, वह कौन है ? [ तात्पर्य यह है कि सुख आदिके धर्मी अहङ्कार साक्षि-प्रत्यक्षका विषय कहा गया है, इससे यह प्रतीत होता है कि जीवभिन्न कोई साक्षी है, क्योंकि सुख आदिके धर्मी अहङ्कारमें जीवत्वकी ही प्रसिद्धि है । इसलिए जीवभिन्न साक्षीमें कोई प्रमाण न होनेसे उसका स्वीकार अयुक्त है ] ।
इस शङ्काके समाधानमें कूटस्थदीपमें कहा गया है कि स्थूल और सूक्ष्म शरीरका अधिष्ठानभूत कूटस्थ चैतन्य अपने अवच्छेदक उक्त दो शरीरोंका साक्षात् द्रष्टा है और कर्तृत्व आदि विकारोंसे शून्य है, अतः वह* साक्षी कहा जाता है, लोकमें भी औदासीन्य और ज्ञानसे ही साक्षित्व प्रसिद्ध है अर्थात् लोकमें वही साक्षी होता है, जो उदासीन और ज्ञाता होता है । [ इसी प्रकार प्रकृतमें भी साक्षी उदासीन और द्रष्टा ही सिद्ध होता है, यह भाव है ] । यद्यपि दोनों शरीरोंका अवभास करनेवाली जीवकी—अन्तःकरणकी—वृत्तियां हैं, अतः उन्हींसे काम चलेगा, * तथापि सर्वत्र व्यापक देहद्वयावच्छिन्न
* 'साक्षात् द्रष्टरि संज्ञायाम्' इस सूत्रसे द्रष्टा अर्थमें साक्षात्शब्दसे इनि प्रत्यय करके साक्षी शब्द बना है । साक्षीका लक्षण भी बोद्धा होकर जो उदासीन हो अर्थात् 'द्रष्टृत्वे सति उदासीनत्वं साक्षित्वम्' यही होता है । लोकमें दो आदमियोंमें जहाँ झगड़ा होता है, वहाँ साक्षी वही बन सकता है, जो उनके विवादका द्रष्टा हो और स्वयं उदासीन हो । केवल उदासीनत्व भी साक्षीका लक्षण नहीं हो सकता, क्योंकि समीपवर्ती स्तम्भ आदि अनेक उदासीन हैं, अतः उनमें साक्षीका उक्त लक्षण चला जायगा, यदि केवल द्रष्टृत्व साक्षीका लक्षण कहा जाय तो झगड़ा करनेवाला भी द्रष्टा है, लेकिन वह साक्षी नहीं होता है, अतः कथित लक्षण ही युक्त है ।
* शङ्काका तात्पर्य यह है कि जीवसे अतिरिक्त स्थूल और सूक्ष्म शरीरका अवभासक नित्यसाक्षिचैतन्य क्यों माना जाता है ? क्योंकि उक्त देहद्वयका अवभास तो प्रकाशरूप अन्तःकरणकी वृत्तियोंसे भी हो सकता है, इसी भावसे 'यद्यपि' इत्यादिसे शङ्का की गई है, जीव शब्दका अर्थ अन्तःकरण है । इसपर कहते हैं कि साक्षीके विना स्थूल सूक्ष्म शरीरका
साक्षि-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १८१
चैतन्येन ईषत् सदा भास्यमेव देहद्वयं जीवचैतन्यस्वरूपप्रतिबिम्बगर्भादन्तः-करणाद् विच्छिद्य विच्छिद्योद्गच्छद्भिर्वृत्तिज्ञानैर्भास्यते। अन्तरालकाले तु सह वृत्त्यभावैः कूटस्थचैतन्येनैव भास्यते। अत एवाहंकारादीनां सर्वदा प्रकाशसंसर्गात् संशयाद्यगोचरत्वम्। अन्यज्ञानधाराकालीनाऽहंकारस्य 'एतावन्तं कालमिदमहं पश्यन्नेवाऽऽसम्' इत्यनुसन्धानं च। न च कूटस्थप्रकाशिते
कूटस्थ चैतन्य द्वारा साधारणरूपसे सदा भासमान ही उभय—स्थूल और सूक्ष्म—शरीर जीवचैतन्य-रूप प्रतिबिम्बसे युक्त अन्तःकरणसे—विच्छिन्न विच्छिन्न होकर कुछ कालके अनन्तर—निकलनेवाली वृत्तियोंसे स्पष्ट भासते हैं। अन्तरालकालमें अर्थात् कुछ-कुछ समयके व्यवधानसे होनेवाली वृत्तियोंके मध्य कालमें तो वृत्तिध्वंसोंके साथ कूटस्थ चैतन्यसे ही दोनों देह भासते हैं। इसीलिए अहंकार आदिका प्रकाशके साथ सर्वदा सम्बन्ध होनेसे संशय † आदिकी विषयता उनमें नहीं आती है। और अन्य धारावाहिक ज्ञानकालिक ✠ 'अहम्' अर्थका—'इतने समय तक मैं इसे देखता ही रहा' इस प्रकार—स्मरण भी उपपन्न होता है। यदि अहमर्थ और
अवगत नहीं होगा, क्योंकि दीप आदिके समान वृत्तियोंके प्रकाशात्मक होनेपर भी वे स्वतः जड़ हैं, अतः वे स्थूल और सूक्ष्म देहको प्रकाशित करनेमें असमर्थ हैं। अतः साक्षिचैतन्य मानना चाहिए। दूसरी बात यह है कि वृत्तियोंके मध्यकालमें शरीरद्वयका अस्पष्ट भान होता है, और वृत्तियोंके अनन्तर 'मैं स्थूल हूँ' और 'मैं कर्ता हूँ' इत्यादिरूपसे स्पष्ट भान होता है। इसलिए अस्पष्ट भानकी उपपत्तिके लिए वृत्तिज्ञानसे अतिरिक्त साक्षी अवश्य मानना चाहिए। किंच, यदि साक्षी न माना जाय, तो वृत्तिकी उत्पत्ति और वृत्तिका विनाश जो प्रत्यक्षरूपसे भासते हैं, उनका भान नहीं होगा, क्योंकि अपनेसे अपना विनाश और उत्पत्ति नहीं देखी जाती है। इससे भी साक्षिचैतन्य अपेक्षित है।
† तात्पर्य यह है कि जैसे घट आदिमें क्षणिक प्रकाश आदिके सम्बन्धसे संशय आदि नहीं होते, वैसे ही 'मैं हूँ या नहीं' 'मैं जीता हूँ या नहीं' इस प्रकार अहंकार आदिका अस्तित्व-संशय किसीको नहीं होता है और सदा अपरोक्ष भान होता है, इसलिए नित्य प्रकाशके साथ उसका सम्बन्ध है, ऐसा मानना चाहिए, वह प्रकाश साक्षी ही है, यह भाव है।
- जब भगवान् रामचन्द्रकी मूर्त्तिका दीर्घकाल तक ध्यान करते हैं, उस समयमें मूर्ति-विषयक वृत्तियोंकी धारा चलती है, इस धाराके समयमें अहमर्थका और तद्गोचर वृत्तियोंका तत्कालजन्मानुभव न होनेसे तद्विषयक संस्कार नहीं होंगे। इससे उत्तरकालमें अहमर्थका स्मरण नहीं होगा, इसलिए अन्य धाराकालीन अहंकारका साक्षीरूपसे अनुसन्धान होता है, अतः साक्षी मानना चाहिए। यदि धाराकालमें अन्यानुभव माना जाय, तो धाराके विच्छेदका प्रसङ्ग आवेगा, यह भाव है।
| १८२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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कथं जीवस्य व्यवहारस्मृत्यादिकमिति शङ्क्यम्, अन्योऽन्याध्यासेन जीवैकत्वापत्त्या कूटस्थस्य जीवान्तरङ्गत्वत् । न च जीवचैतन्यमेव साक्षी भवतु, किं कूटस्थेनेति वाच्यम्, लौकिकवैदिकव्यवहारकर्तुस्तस्योदासीन-द्रष्टृत्वासम्भवेन 'साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च' इति श्रुत्युक्तसाक्षित्वा-योगात् । 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति' इति कर्मफलभोक्तुर्जीवादुदासीनप्रकाशरूपस्य साक्षिणः पृथगाम्नानाच्चेति ।
उक्तो नाटकदीपेऽसौ नृत्यशालास्थदीपवत् ।
नेशो जीवोऽप्यसौ तत्त्वदीपे ब्रह्मेति वर्णनात् ॥९३॥
नृत्यशालामें विद्यमान दीपके समान साक्षी जीव और ईश्वरसे विलक्षण है, ऐसा नाटकदीपमें कहा गया है और तत्त्वदीपमें भी शुद्ध ब्रह्म ही साक्षी कहा गया है ॥ ९३ ॥
नाटकदीपेऽपि नृत्यशालास्थदीपदृष्टान्तेन साक्षी जीवाद्विविच्य दर्शितः। तथा हि—
वृत्ति आदिका अनुभव साक्षीको ही होता है, तो जीवके व्यवहार और स्मरण क्यों होते हैं, क्योंकि अन्यसे अनुभूत वस्तुका अन्यको स्मरण नहीं हो सकता है ? यह शङ्का यद्यपि हो सकती है, तथापि अयुक्त है, क्योंकि अन्योऽन्य तादात्म्यके अध्याससे कूटस्थके साथ ऐक्य होनेके कारण कूटस्थ जीवका अत्यन्त अन्तरङ्ग है। यदि शङ्का की जाय कि जीवचैतन्य ही साक्षी हो, कूटस्थ चैतन्य-रूप अतिरिक्त साक्षीको माननेकी क्या आवश्यकतां है, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि लौकिकव्यवहार और वैदिकव्यवहारको अविरतरूपसे करनेवाले जीवा-त्मामें औदासीन्य और द्रष्टृत्वके न रहनेसे 'साक्षी०' (बोद्धा, उदासीन और गुणरहित चैतन्य साक्षी है) इस श्रुति द्वारा प्रतिपादित साक्षित्वकी उपपत्ति ही नहीं हो सकती है और 'तयोरन्यः०' (जीव और कूटस्थ चैतन्योंमें से कूटस्थ-भिन्न जीव कर्मफलका भोग करता है और अन्य—कूटस्थ नहीं खाता हुआ बुद्धि आदिके साक्षीरूपसे अपरोक्षतया प्रकाशित होता है।) इस श्रुतिसे कर्म-फलभोक्ता जीवसे पृथक् उदासीन प्रकाशरूप साक्षीका प्रतिपादन भी है।
नाटकदीपमें भी नृत्यशालामें स्थित प्रदीपके दृष्टान्तसे जीवसे अतिरिक्त साक्षी-की सिद्धि की है, जैसे—'नृत्यशालास्थितो दीपः०' (जैसे एकरूपसे स्थित नृत्यशालास्थ दीप स्वामी, सभ्य और नर्तकी आदिको समानरूपसे ही प्रकाशित करता है, प्रभुके (नृत्य करानेवाले अर्थात् नृत्यके अभिमानीके)
साक्षि-स्वरूपविचार ] भाषाऽनुवादसहित १८३
नृत्यशालास्थितो दीपः प्रभुं सभ्यांश्च नर्तकीम् ।
दीपयेदविशेषेण तदभावेऽपि दीप्यते ॥११॥
तथा चिदाभासविशिष्टाऽहंकाररूपं जीवं विषयभोगसाकल्यवैकल्याभिमानप्रयुक्तहर्षविषादवत्त्वात् नृत्याऽभिमानिप्रभुतुल्यम्, तत्परिसरवर्तित्वेऽपि तद्राहित्यात् सभ्यपुरुषतुल्यान् विषयान्, नानाविधविकारवत्त्वान्नर्तकीतुल्यां धियं च दीपयन् सुषुप्त्यादावहंकाराद्यभावेऽपि दीप्यमानः चिदाभासविशिष्टाहंकाररूपजीवभ्रमाधिष्ठानकूटस्थचैतन्यात्मा साक्षीति । एवं जीवाद्विवेचितोऽयं साक्षी न ब्रह्मकोटिरपि, किन्तु अस्पृष्टजीवेश्वरविभागं चैतन्यमित्युक्तं कूटस्थदीपे ।
प्रकाशमें बड़ा रूप, सभ्योंके प्रकाशमें मध्यम स्वरूप और नर्तकी आदिके प्रकाशमें निकृष्ट स्वरूपको धारण नहीं करता और स्वामी आदिके अभावमें भी स्वयं प्रकाशित रहता है, वैसे अहङ्कार प्रभु है, विषय सभ्य हैं और बुद्धि नर्तकी है—इनका साक्षी प्रकाश करता है और इनके अभावमें भी स्वयं प्रकाशित रहता है ) ।
इसी दृष्टान्तके अनुसार चैतन्यके आभाससे युक्त अहङ्काररूप जीव विषयभोगकी समग्रता और असमग्रताके अभिमानसे हर्ष या विषादयुक्त होता है, इसलिए जीव नृत्याभिमानी स्वामीके समान है, यद्यपि जीवके परिसरवर्ती विषय हैं, तथापि स्वामीकी समानताके साधक हर्ष, विषाद आदिके नहीं रहनेसे वे सभ्यपुरुषके समान ही हैं। अनेक प्रकारके विकारोंसे युक्त होनेसे बुद्धि नर्तकीके समान ही है। और जैसे ताल आदि देनेवाले पुरुष नर्तकीका अनुसरण करते हैं, वैसे ही इन्द्रियाँ भी बुद्धिका ही अनुसरण करती हैं, अतः ये ताल आदिधारी पुरुषके तुल्य हैं—इन सभीको प्रकाशित करता हुआ सुषुप्ति आदिमें अहङ्कार आदिके न रहनेपर भी स्वयं प्रकाशित होनेवाला चिदाभासविशिष्ट अहङ्काररूप जीवके भ्रमका अधिष्ठानभूत कूटस्थ चैतन्यरूप आत्मा साक्षी है। इसी प्रकार जीवसे पृथक्रूपसे प्रतिपादित यह साक्षी ब्रह्मकोटिमें भी प्रविष्ट नहीं होता है, किन्तु जीव और ईश्वरके विभागका आश्रय न करता हुआ चैतन्य ही है, ऐसा कूटस्थदीपमें कहा गया है।
| १८४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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तत्त्वप्रदीपिकायामपि मायाशबलिते सगुणे परमेश्वरे 'केवलो निर्गुणः' इति विशेषणानुपपत्तेः सर्वप्रत्यग्भूतं विशुद्धं ब्रह्म जीवाभेदेन साक्षीति प्रतिपद्यते इत्युदितम् ।
ईशस्य रूपभेदोऽसौ कारणत्वादिवर्जितः ।
जीवान्तरङ्गः कौमुद्यां प्राज्ञाख्यः परिकीर्तितः ॥९४॥
कारणत्व आदि धर्मोंसे रहित ईश्वरका स्वरूपविशेष, जीवका अत्यन्त अन्तरङ्ग, प्राज्ञ नामका साक्षी है, ऐसा कौमुदीमें प्रतिपादन किया गया है ॥ ९४ ॥
कौमुद्यान्तु—
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च । इति
तत्त्वप्रदीपिकामें कहा गया है कि सम्पूर्ण अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित चैतन्यात्मक जीवोंके अधिष्ठानरूपसे अत्यन्त अन्तरङ्ग स्वरूपभूत, जीवत्व, ईश्वरत्व आदि धर्मोंसे रहित और तत्-तत् जीवोंका अधिष्ठान होनेसे उन-उन जीवोंके साथ (ब्रह्मका) तादात्म्य होनेके कारण प्रत्येक शरीरमें भेदको प्राप्त हुआ ब्रह्म ही साक्षी है, ऐसा ज्ञात होता है, क्योंकि मायोपहित सगुण परमेश्वरमें 'केवलो निर्गुणश्च' (शुद्ध और गुणरहित) इत्यादि विशेषणकी उपपत्ति नहीं हो सकती है। [तात्पर्य यह है कि पूर्वके ग्रन्थमें जीव और ईश्वरसे विलक्षण साक्षी है, ऐसा कहा गया है, क्योंकि यद्यपि उसका जीवकोटिमें अन्तर्भाव किया जाय, तो वह उदासीन नहीं होगा और ईश्वरमें अन्तर्भाव किया जाय तो भी उदासीन नहीं होगा, क्योंकि ईश्वर जगत् आदिके करनेमें व्यापृत है, अतः वह उदासीन नहीं हो सकता, इससे इन दोनोंसे उसे पृथक् मानना चाहिए, इसमें तत्त्वप्रदीपिकाकार चित्सुखाचार्यकी भी सम्मति है, क्योंकि उन्होंने भी जीव और ईश्वरसे रहित शुद्ध चिदात्माको ही साक्षी माना है]।
कौमुदीमें तो कहा है कि—
'एको देवः०' (परमात्मा एक है, सब भूतोंमें गूढ है, आकाशके समान व्यापी है, ब्रह्मसे लेकर स्तम्बपर्यन्त सब भूतोंका अन्तरात्मा है, जीवकृत-कर्मोंका साक्षी है, सब भूतोंका अधिष्ठान है, जीवोंका भी साक्षी है, बोद्धा, शुद्ध और निर्गुण है) इस देवत्व आदिकी प्रतिपादक श्रुतिसे परमेश्वरका ही
साक्षीका स्वरूप-विचार ] भाषानुवादसहित १८५
देवत्वादिश्रुतेः परमेश्वरस्यैव रूपभेदः कश्चिज्जीवप्रवृत्तिनिवृत्त्योरनुमन्ता स्वयमुदासीनः साक्षी नाम। स च कारणत्वादिधर्मानास्पदत्वाद् अपरोक्षो जीवगतमज्ञानाद्यवभासयंश्च जीवस्याऽन्तरङ्गः। सुषुप्त्यादौ च कार्यकारणो-परमे जीवगताज्ञानमात्रस्य व्यञ्जकः प्राज्ञशब्दितः।
'तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरमेव-मेवाऽयं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम्' 'प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जन्याति' इति श्रुतिवाक्याभ्यां सुषुप्त्युत्क्रा-न्त्यवस्थयोर्जीवभेदेन प्रतिपादितः परमेश्वर इति सुषुप्त्युत्क्रान्त्यधिकरण—
कोई स्वरूपविशेष साक्षी है, जो जीवकी प्रवृत्ति और निवृत्तिका सर्वदा जानने-वाला और स्वतः उदासीन है। ईश्वरका स्वरूपविशेष होनेपर भी वह कारणत्व आदि धर्मोंके न रहनेसे अपरोक्ष है और जीवगत अज्ञान आदिका अवभासक होनेसे जीवका अत्यन्त अन्तरङ्ग भी है। सुषुप्ति आदिमें अन्तःकरण और अन्तःकरणकी वृत्तिका उपशम होनेसे जीवगत अज्ञान मात्रका ही व्यञ्जक है, अतः प्राज्ञशब्दसे भी साक्षी कहा जाता है। [ तात्पर्य यह है कि यदि ईश्वरका स्वरूप साक्षी है, तो उसका प्रत्यक्ष जीवको नहीं होना चाहिये, क्योंकि ईश्वरके सर्वज्ञत्व आदि धर्म जीवके प्रति प्रत्यक्षयोग्य नहीं हैं। साक्षीका अपरोक्षावभास नहीं होता है, यह भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि साक्षी अन्तःकरण, अज्ञान आदिका अनुभवरूप है, इसपर कौमुदीकारने कहा कि यद्यपि साक्षी ईश्वरका ही स्वरूपविशेष है, तथापि उसमें जीवके प्रत्यक्षके अयोग्य सर्वज्ञत्व, कारणत्व आदि धर्मोंके न रहनेसे उसके अपरोक्ष अवभासमें कोई विरोध नहीं है; ]।
'तद्यथा०' (जैसे प्रिय अङ्गनासे आलिङ्गित पुरुष बाह्य-मार्ग आदिके वृत्तान्तको और आन्तर—गृहकृत्यको नहीं जानता है, वैसे ही सुषुप्तिमें उपाधिके विलयसे परमात्माके साथ एकीभावको प्राप्त हुआ जीव बाह्य जगत्रूप प्रपञ्चको और आन्तर स्वप्न-प्रपञ्चको नहीं जानता है), 'प्राज्ञेन०' (प्राज्ञ आत्मासे अधिष्ठित जीव वेदनासे शब्द करता हुआ शरीरसे बाहर निकलता है) इन दो श्रुतिवाक्योंसे 'सुषुप्ति और उत्क्रान्ति (अन्यत्र गमन) में जीवसे पृथक् परमेश्वरका प्रतिपादन किया है, इस प्रकारका जो * सुषुप्त्युत्क्रान्तिके अधिकरणमें
* इस अधिकरणका सूत्र है—'सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन'। सुषुप्ति और उत्क्रान्तिमें जीवसे भिन्न
२४
| १८६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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( उ० मी० अ० १ पा० ३ अधि० १४ सू० ४२ ) निर्णयोऽपि साक्षिपर इत्युपवर्णितम् ।
शुक्तीदमंशवदसौ तत्त्वशुद्धौ च वर्णितः ।
जैसे शुक्तिका 'इदम्' अंश प्रातिभासिकरूपसे रजतकोटिमें प्रविष्ट भासता है, वैसे ही ब्रह्मकोटिमें प्रविष्ट भी साक्षी प्रातिभासिकरूपसे जीवकोटिमें प्रविष्ट भासता है, ऐसा तत्त्वशुद्धिकारका मत है ।
तत्त्वशुद्धावपि यथा 'इदं रजतम्' इति भ्रमस्थले वस्तुतः शुक्तिको-
प्रतिपादित निर्णय है वह भी साक्षिपरक ही है, ऐसा वर्णन ( कौमुदीमें ) किया गया है ।
तत्त्वशुद्धिमें भी—जैसे 'इदं रजतम्' ( यह रजत है ) इस प्रकारके भ्रम-स्थलमें वस्तुतः 'इदम्' अंश शुक्तिकोटिमें यद्यपि अन्तर्भूत है, तो भी प्रतिभास
ईश्वरका प्रतिपादन होनेसे परमेश्वरका ही ग्रहण करना चाहिए, संसारी जीवका नहीं, यह उक्त सूत्रका अक्षरार्थ है । तात्पर्य यह है कि 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः' (आत्मा कौन है ? जो विज्ञानमय है, वह आत्मा है ) इत्यादि अनेक वाक्य बृहदारण्यकके षष्ठ अध्यायमें उपलब्ध होते हैं, वे क्या जीवके कथनमें पर्य्यवसित हैं या ईश्वरके बोधनमें पर्य्यवसन्न हैं ? इस प्रकारके संशयमें पूर्वपक्ष प्राप्त होता है कि वे जीवके अनुवादमें अपना तात्पर्य रखते हैं, क्योंकि 'योऽयं विज्ञानमयः' इत्यादि उपक्रम, उपसंहार आदि संसारी जीवके प्रतिपादनमें ही कटिवद्ध हैं । इसपर सिद्धान्तीका कहना है कि बृहदारण्यकका षष्ठ प्रपाठक जीवका अनुवाद नहीं करता है, परन्तु परमेश्वरका ही बोध करता है, कारण कि 'तद्यथा प्रियया' इत्यादि वाक्य सुषुप्ति और उत्क्रान्तिमें जीवसे भिन्न परमेश्वरका तृतीयाविभक्त्यन्त प्राज्ञशब्दसे प्रतिपादन करते हैं, और ऐसा इसलिए प्रतिपादन किया जाता है कि लोकसिद्ध जीवका ईश्वरके साथ अभेदप्रतिपादन हो । 'स वा एष महानज आत्मा' ( वह व्यापक, नित्य, आत्मा है ) इस प्रकारके वाक्यशेषमें साक्षात् ईश्वरका ही स्वरूप बतलाया गया है, अतः उपक्रम, और उपसंहारके आधारपर बृहदारण्यकीय षष्ठ प्रपाठकस्थ आत्मपरक यावत् श्रुतिवाक्योंमें जीवातिरिक्त ईश्वरका ही जीवानुवादसे तदभिन्नताके लिए प्रतिपादन किया गया है, यह उक्त सुषुप्त्युत्क्रान्त्यधिकरणका निर्णय है । परन्तु इससे उदासीन, ईश्वरस्वरूप साक्षीकी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि इस प्रकरणमें 'एष भूताधिपतिः, एष सर्वेश्वरः' इत्यादि ग्रन्थसे सर्वेश्वरत्व इत्यादि गुणोंका कथन है । इस प्रश्नका उत्तर यह है कि ज्ञेय ब्रह्मके प्रकरणमें सर्वेश्वरत्व आदि गुणोंके प्रतिपादक वाक्य स्तुतिपरक हैं, अतः सर्वेश्वरत्व आदिके प्रतिपादनमें उनका तात्पर्य न होनेसे उदासीन साक्षीकी सिद्धि होती है ।
साक्षीका स्वरूप-विचारं ] भाषानुवादसहित १८७
य्यन्तर्गतोऽपीदमंशः प्रतिभासतो रजतकोटिः, तथा ब्रह्मकोटिरेव साक्षी प्रतिभासतो जीवकोटिरिति जीवस्य सुखादिव्यवहारे तस्योपयोग इत्युक्तत्वाऽयमेव पक्षः समर्थितः ।
अज्ञानोपहितः कैश्चित्—
कोई लोग कहते हैं कि अविद्यारूप उपाधिसे उपहित जीव ही साक्षी है ।
केचित्तु—अविद्योपाधिको जीव एव साक्षाद् द्रष्टृत्वात् साक्षी । लोकेऽपि ह्यकर्तृत्त्वे सति द्रष्टृत्वं साक्षित्वं प्रसिद्धम् । तच्चाऽसङ्गोदासीन-
रूपसे रजतकोटिमें प्रविष्ट है, वैसे ही यद्यपि वस्तुतः ब्रह्मकोटिमें ही साक्षीका अन्तर्भाव है, तथापि प्रतिभाससे जीवकोटिमें प्रविष्ट है, अतः जीवके सुख आदि व्यवहारमें उपयोग है, ऐसा कहकर—इसी कौमुदीकारके मतका समर्थन किया गया है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि यद्यपि 'इदं रजतम्' इस भ्रममें रजतके अभेदरूपसे इदमंशका प्रतिभास होता है, तथापि उसका रजतकोटिमें अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि 'नेदं रजतम्' इस बाधक ज्ञानसे रजतका केवल बाध होता है, इदमंशका नहीं । और शुक्ति-अंशमें भी उसका अन्तर्भाव नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसा माननेसे, जैसे शुक्ति अज्ञात है, वैसे ही 'इदम्' अंशमें भी अज्ञातत्व प्रसक्त हो जायगा, इसलिए यह मानना आवश्यक है कि वस्तुस्थितिमें इदमंश शुक्तिरूप है और प्रातिभासिक-रूपसे रजतसे अभिन्न है । बस, इसी युक्तिके अनुसार साक्षीस्थलमें भी वस्तुतः साक्षी ईश्वरस्वरूप है और 'अहं सुखमनुभवामि' ( मैं सुखका अनुभव करता हूँ ) इत्यादि प्रतिभास होनेसे कल्पित तत्-तत् जीवोंके अधिष्ठानरूप सुख आदि-का अनुभवकर्ता साक्षी जीवसे अभिन्नरूपसा ज्ञात होता है । अतः जीवके सुख-आदिके व्यवहारमें सुख आदिके अनुभवकर्ता साक्षीका उपयोग है, इस प्रकार तत्त्वशुद्धिमें कहकर इसी कौमुदीके पक्षका समर्थन किया गया है ] ।
कुछ लोग कहते हैं कि अविद्यासे उपहित-अविद्याप्रतिबिम्बित-चैतन्यरूप जीव-ही साक्षात् द्रष्टा होनेसे साक्षी है, क्योंकि लोकमें भी यही प्रसिद्धि है—कर्ता न होकर जो द्रष्टा होता है, वही साक्षी कहलाता है, इस प्रकार साक्षीका लक्षण
१८८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
प्रकाशरूपे जीवे एव साक्षात् सम्भवति, जीवस्याऽन्तःकरणतादात्म्यापत्त्या कर्तृत्वाद्यारोपभाक्त्वेऽपि स्वयमुदासीनत्वात् । 'एको देवः' इति मन्त्रस्तु ब्रह्मणो जीवभावाभिप्रायेण साक्षित्वप्रतिपादकः । 'द्वा सुपर्णा' इति मन्त्रः गुहाधिकरणन्यायेन ( उ० मी० अ० १ पा० २ अधि ३ सू० ११)
असङ्ग, उदासीन और प्रकाशरूप जीवमें ही साक्षात् * घट सकता है, कारण कि अन्तःकरणके तादात्म्यसे जीवमें कर्तृत्व आदि धर्मोंका आरोप होता है, तो भी स्वयं उदासीन है । 'एको देवः' यह मन्त्र ब्रह्ममें जीवभावके अभिप्रायसे ही साक्षित्वका प्रतिपादन † करता है । गुहाधिकरणके न्यायसे ‡
* भाव यह है कि जब अविद्याप्रतिविम्बित चैतन्यरूप जीवमें ही साक्षित्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो फिर उससे अतिरिक्त साक्षी माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है । यदि इसपर भी अतिरिक्त साक्षी माननेकी जबरदस्ती की जाय, तो केवल गौरवके सिवा और कुछ हाथ न लगेगा । और जीव वास्तविकमें उदासीन ही है, परन्तु बुद्धितादात्म्यापन्न होनेसे उसमें औपचारिक कर्तृत्व आदि है, वस्तुतः नहीं, अतः उसे साक्षी स्वीकार करनेमें आपत्ति नहीं है ।
† तात्पर्य यह है कि यदि जीव ही पूर्वोक्त रीतिसे साक्षी माना जाय, तो 'एको देवः' इत्यादि मन्त्रके साथ, जो कि जीवातिरिक्त उदासीन साक्षीका प्रतिपादन करता है, अवश्य विरोध होगा । इसपर जीवमें साक्षित्वका प्रतिपादन करनेवाले कहते हैं कि नहीं, विरोध नहीं होगा, क्योंकि यह भी मन्त्र जीवमें ही साक्षित्वका प्रतिपादन करता है, उससे भिन्नमें नहीं । भाव यह है—यह बार बार कहा गया है कि जो साक्षी है वह जीवका अपरोक्ष है, यदि ईश्वरको साक्षी माना जाय, तो वह जीवका अपरोक्ष नहीं होगा, क्योंकि प्रतिबिम्ब और बिम्बरूपसे जीव और ईश्वरका औपाधिक भेद होनेके कारण जीवके प्रति जीवान्तरके समान (अर्थात् जैसे यज्ञदत्तजीव विष्णुमित्रजीवका अपरोक्ष नहीं कर सकता है, वैसे ) ईश्वरका भी अपरोक्ष साक्षात्कार नहीं हो सकेगा, इससे जीवभावापन्न ब्रह्म ही अपरोक्ष होनेसे साक्षी है, यह 'एको देवः' इत्यादि मन्त्रके साक्षीको प्रतिपादन करनेवाले अंशका भाव है ।
‡ यहाँ शङ्का करनेवालेका तात्पर्य यह है कि जैसे 'गुहां प्रविष्टौ' यह मन्त्र जीव और ईश्वर दोनोंका प्रतिपादन करता है, वैसे ही 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्र भी जीव और ईश्वर दोनोंका प्रतिपादन करता है, यह (ब्रह्मसूत्रके) भाष्यमें कहा गया है । इस अवस्थामें 'द्वा सुपर्णा' इस मन्त्रमें 'तयोरन्यः पिप्पलं' यह वाक्य भी जीवपरक ही होगा 'अनश्नन्'--- इत्यादि वाक्य ईश्वरपरक होगा, यह ज्ञात होता है, ऐसी परिस्थितिमें 'जीव साक्षी है' इस पक्षमें 'अनश्नन्नन्यः' इस मन्त्रभागके साथ, जो जीवातिरिक्त साक्षीका प्रतिपादन करता है, विरोध होगा, इस शङ्काके समाधानमें कहते हैं कि 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्र जिस पक्षमें ईश्वर परक और जीवपरक है उस पक्षमें भी कोई विरोध नहीं है, क्योंकि 'एको देवः' इस मन्त्रकी नाईं 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्र भी जीवभावापन्न परमात्माका बोध करता है, ऐसा