भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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१७८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद

जानामि' इति प्रकाशोपपत्तेः । शुक्त्यादेरपि मूलाज्ञानविषयचैतन्याभि- न्नतया तद्विषयत्वानुभवाविरोधात् ।

विवरणादिषु मूलाज्ञानसाधनप्रसङ्गे एव 'इदमहं न जानामि' इति प्रत्यक्षप्रमाणोपदर्शनाच्च । 'अहमज्ञः' इति सामान्यतोऽज्ञानानुभव एव मूला- ज्ञानविषयः । 'शुक्तिमहं न जानामि' इत्यादिविषयविशेषालिङ्गिताज्ञानानु- भवस्त्ववस्थाऽज्ञानविषय इति विशेषाभ्युपगमेऽप्यवस्थाऽवस्थावतोर्भेदेन मूलाज्ञानस्य साक्षिसंसर्गाद्वा साक्षिविषयचैतन्ययोः वास्तवैक्याद्वा विषयगत- स्याऽप्यवस्थाऽज्ञानस्य साक्षिविषयत्वोपपत्तेः । परोक्षज्ञानस्याऽज्ञानानिवर्त-


इत्यादि अनुभवसे साक्षिसंसृष्टमूलाज्ञानका ही प्रकाश होता है । शुक्ति आदिका भी मूलाज्ञानके विषयीभूत चैतन्यके साथ अभेद होनेसे शुक्त्यादिविषयत्वके अनुभवमें विरोध नहीं है ।

और विवरण आदि ग्रन्थोंमें मूलाज्ञानके साधनके प्रसङ्गमें ही 'इदमहं न जानामि' ( इसे मैं नहीं जानता हूँ ) इस प्रकार प्रत्यक्ष प्रमाणका उपन्यास भी किया है । * 'मैं अज्ञ हूँ' इस प्रकार सामान्यतः अज्ञानका अनुभव ही मूलाज्ञानका अवगाहन करता है । 'शुक्तिको मैं नहीं जानता हूँ' इत्यादि जो किसी विषयविशेषसे युक्त अज्ञानका अनुभव होता है, वह तो अवस्थारूप अज्ञानका अवगाहन करता है, इस प्रकार विशेषका यदि स्वीकार किया जाय, तो भी अवस्था और अवस्थावान्‌का तादात्म्य होनेके कारण मूलाज्ञानका साक्षीके साथ साक्षात् सम्बन्ध होनेसे अथवा साक्षिचैतन्य और विषयचैतन्यका वस्तुतः ऐक्य होनेसे विषयगत अज्ञानमें भी साक्षात् साक्षीके विषयत्वकी उपपत्ति हो सकती है । यद्यपि परोक्ष-


* 'अहमज्ञः' यही अनुभव सामान्य मूलाज्ञानका साधक है और 'शुक्तिं न जानामि' (मैं शुक्ति नहीं जानता हूँ ) इत्यादि अनुभव अवस्थारूप अज्ञानका ही साधक है, विवरणकारने 'शुक्तिं न जानामि' इत्यादि प्रतीति मूलाज्ञानके साधक प्रकरणमें कही है, अतः वह मूलाज्ञानका साधन करती है अवस्थारूप अज्ञानका साधन नहीं करती, यह नहीं कह सकते, क्योंकि शुक्तिरजत आदि परिणामकी उपपत्तिका लिए अवस्थारूप अज्ञानकी सिद्धिकी अपेक्षा होनेसे मूलाज्ञानके साधनप्रकरणमें भी उसका प्रसङ्ग है । इससे 'शुक्तिं न जानामि' इत्यादि अनुभवोंके मूलाज्ञानविषयत्वमें प्रमाण न होनेसे विषयगत अवस्थारूप अज्ञानकी सिद्धि होगी, इस परिस्थितिमें उसका साक्षीके साथ सम्बन्ध न होनेसे उसका अनुभव नहीं हो सकता, इस आशयवाली शङ्काका अनुवाद करते हैं; 'अहमज्ञः' इत्यादि ग्रन्थसे ।

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