सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 209, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंआवरणाभिभव-स्वरूपविचारं] भाषानुवादसहितं १७९
कत्वेऽपि ततस्तन्निवृत्त्यनुभवस्य सत्तानिश्चयरूपपरोक्षवृत्तिप्रतिबन्धकप्रयुक्ता-
ननुभवनिबन्धनभ्रान्तित्वोपपत्तेः अपरोक्षज्ञानस्यैवाऽज्ञाननिवर्तकत्वनियमा-
भ्युपगमादित्याहुः ।
सुखादिगोचरा वृत्तिर्ननु नाऽज्ञानघातिनी ।
मैवम्, मोहसुखादीनां साक्षिवेद्यत्वनिर्णयात् ॥९१॥
मुख आदिको विषय करनेवाली वृत्ति अज्ञानकी निवृत्ति नहीं करती इस प्रकार
शङ्का नहीं कर सकते, क्योंकि अज्ञान, सुख आदिमें केवल साक्षीवेद्यत्वका ही
निर्णय किया गया है, अतः वृत्तिरूप अपरोक्ष ज्ञान अवश्य अज्ञानका निवारण
करता है ॥ ९१ ॥
ननु नाऽयमपि नियमः, अविद्याऽहङ्कारसुखदुःखादितद्धर्मप्रत्यक्षस्याऽ-
ज्ञाननिवर्तकत्वानभ्युपगमादिति चेत्, न; अविद्यादिप्रत्यक्षस्य साक्षि-
रूपत्वेन वृत्तिरूपापरोक्षज्ञानस्याऽऽवरणनिवर्तकत्वनियमानपायात् ॥१३॥
कः साक्षी ? तत्र कूटस्थदीपे कूटस्थचित् स्वयम् ।
स्वाध्यस्तदेहयुग्मादेः साक्षीति प्रतिपादितः ॥९२॥
साक्षी कौन है ? इस प्रश्नके उत्तरमें कूटस्थदीपमें प्रतिपादन किया गया है कि
स्थूल और सूक्ष्म शरीरका अधिष्ठानभूत कूटस्थचैतन्य ही स्वयं साक्षी है ॥ ९२ ॥
ज्ञान अज्ञानका निवर्तक नहीं है, तथापि परोक्षज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्तिका जो
अनुभव होता है, वह, सत्तानिश्चयरूप परोक्ष वृत्ति जो प्रतिबन्धक है उससे
प्रयुक्त अज्ञानका अनुभव न होनेसे, भ्रान्तिमात्र है, अतः अपरोक्ष ज्ञान ही
अज्ञानका निवर्तक है, ऐसा नियम ही स्वीकार किया गया है ।
कोई लोग शङ्का करते हैं कि अविद्या, अहङ्कार, सुख, दुःख आदि
अहङ्कारके धर्मोंका प्रत्यक्ष अज्ञानका निवर्तक नहीं माना गया है, अतः अप्रति-
बद्ध अपरोक्षज्ञानमात्र अज्ञानका निवर्तक है, यह नियम भी नहीं बन सकता है,
परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि वृत्तिरूप अपरोक्षज्ञान अज्ञानावरणका निवर्तक
है, ऐसा नियम है और अविद्या आदिका प्रत्यक्ष साक्षिरूप है, अतः उक्त
नियममें कोई व्याघात नहीं है ॥ १३ ॥