सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 207, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंआरणाभिगव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १७७
विषयस्थं परे मोहं मूलाज्ञानांशरूपकम् ।
अंशांशिनोरभेदाच्च साक्षिणा तस्य सङ्गतिम् ॥ ९० ॥
विषयमें रहनेवाला अज्ञान मूलाज्ञानका अंशरूप है, और उसीका साक्षीके साथ सम्बन्ध होता है, क्योंकि अंश और अंशीका अभेद होता है, ऐसा भी कोई लोग कहते हैं ॥ ९० ॥
अपरे तु—शुक्तिरजतादिपरिणामोपपत्त्याञ्जस्याद् विषयावगुण्ठनपटवत् विषयगतमेवाऽज्ञानं तदावरणम् । न च तथा सति अज्ञानस्य साक्ष्यसंसर्गेण ततः प्रकाशानुपपत्तिः, परोक्षवृत्तिनिवर्त्यत्वासम्भवश्च दोष इति वाच्यम्, अवस्थारूपाज्ञानस्य साक्ष्यसंसर्गेऽपि तत्संसृष्टमूलाज्ञानस्यैव 'शुक्तिमहं न
कुछ लोग कहते हैं कि शुक्तिरजत आदि परिणामकी उपपत्तिका सामञ्जस्य हो, इसलिए विषयको आवृत्त करके रहनेवाले पटके समान विषयगत ही अज्ञान विषयका आवरण करता है ‡। विषयावरक अज्ञानके विषयगत होनेपर साक्षीके साथ अज्ञानका सम्बन्ध न होनेसे साक्षीसे अज्ञानका प्रकाश नहीं होगा और परोक्ष वृत्तिका विषयदेशमें गमन न होनेसे उससे उसकी निवृत्ति भी नहीं होगी ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अवस्थारूप अज्ञानका साक्षीके साथ सम्बन्ध भले ही न हो, परन्तु 'शुक्तिको मैं नहीं जानता हूँ'
निवर्तक माना जाय, तो भी प्रतिबन्धकरहित परोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तक होता है, ऐसा ही स्वीकार करना चाहिए । प्रकृतमें भ्रमके अनुरोधसे दूरत्व आदि दोषोंसे प्रतिवद्ध होनेके कारण आप्तवाक्यजन्य भी ज्ञान पुरुषगत अज्ञानका निवर्तक नहीं है, अतः विपरीत परिमाणकी उपपत्ति और अनुपपत्तिकी शङ्का नहीं है, यह भाव है।
‡ पूर्वमें अप्रतिबद्ध ज्ञानमात्र अज्ञानका निवर्तक है, इस नियमके अनुसार अव्यभिचारके लिए परोक्षज्ञान अज्ञानका निवर्तक है, ऐसा प्रतिपादन किया गया है। अब 'अपरे तु' ग्रन्थसे 'अप्रतिबद्ध अपरोक्षज्ञान ही अज्ञानका निवर्तक है, इस नियमका अङ्गीकार करके परोक्षज्ञानमें व्यभिचारशङ्काका निरास करते हैं। तात्पर्य यह है कि लोकमें घट आदि मृत्तिकाके परिणामी देखे जाते हैं, इसी प्रकार शुक्तिरजत आदि भी किसीके परिणाम हैं, ऐसा मानना चाहिए। उनका परमाण्वन्वय और व्यतिरेकसे अज्ञान ही सिद्ध होता है, क्योंकि प्रातिभासिक शुक्तिरजतके प्रति शुक्ति आदि उपादान नहीं हो सकते हैं, जैसे शुक्तिद्वारा विषयचैतन्यगत अज्ञान रजत आदि विक्षेपके प्रति उपादान सिद्ध हो सकता है, वैसे पुरुषवृत्ति अज्ञान नहीं हो सकता है, इसलिए विषयगत अज्ञान ही अवस्थारूप है। यद्यपि पुरुषगत अज्ञान प्रभान्यायसे रजत आदिके प्रति उपादान हो सकता है, तथापि यह युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे मूलाज्ञानमें क्रिया नहीं होती है, वैसे ही अवस्थारूप अज्ञानमें भी क्रिया नहीं होती, अतः प्रभान्यायका प्रसङ्ग नहीं हो सकता है।
२३