भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 206
१७६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अन्ये तु—नयनपटलवत् पुरुषाश्रितमेवाऽज्ञानं विषयावरणम् । न तदतिरेकेण विषयगताज्ञाने प्रमाणमस्ति । न च पुरुषाश्रितस्य विषयगतविक्षेपपरिणामित्वं न सम्भवति । तत्संभवे वा दूरस्थवृक्षपरिमाणे परोक्षज्ञानादज्ञाननिवृत्तौ विपरीतपरिमाणविक्षेपो न सम्भवतीति वाच्यम्, वाचस्पतिमते सर्वस्य प्रपञ्चस्य जीवाश्रिताज्ञानविषयीकृतब्रह्मविवर्तत्वेन तद्वच्छुक्तिरजतादेः पुरुषाश्रिताज्ञानविषयीकृतब्रह्मविवर्तत्वोपपत्तेः । परोक्षवृत्त्या एकावस्थानिवृत्तावपि अवस्थान्तरेण विपरीतपरिमाणविक्षेपोपपत्तेश्चेत्याहुः ।

कुछ लोग कहते हैं कि जैसे नेत्रमें रहनेवाले पटल (काचादि दोष) विषयको आवृत करते हैं, वैसे ही पुरुषगत अज्ञान ही विषयको आवृत करता है, इससे भिन्न विषयगत अज्ञानमें प्रमाण नहीं है । परन्तु यदि 'एक ही पुरुषगत अज्ञान माना जाय, तो वह विषयगत विक्षेपका परिणामी—उपादान—नहीं होगा । यथा कथंचित् पुरुषगत अज्ञानके विषयगत विक्षेपके उपादान होनेपर भी दूर देशवर्ती वृक्षके परिमाणमें आप्त (सच्चे) पुरुषके उपदेशसे जन्य ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर विपरीत परिमाणरूप विक्षेपकी उत्पत्ति नहीं होगी' इस प्रकारकी शङ्का नहीं करनी चाहिए, क्योंकि * वाचस्पतिमिश्रके मतमें सम्पूर्ण प्रपञ्च जीवमें रहनेवाली अविद्याके विषय ब्रह्मका विवर्त है, अतः पुरुषगत अज्ञानके विषय ब्रह्मके शुक्ति-रजत आदि विवर्त हो सकते हैं । † परोक्ष वृत्तिसे एक अवस्था (आवरण) की निवृत्ति होनेपर भी विक्षेपरूप अन्य अवस्थासे विपरीत परिमाणरूप विक्षेपकी उपपत्ति हो सकती है ।


* तात्पर्य यह है कि यदि शुक्ति-रजत आदि अज्ञानके परिणाम माने जायँ, तो अज्ञानको अवश्य विषयचैतन्यगत मानना चाहिए । और वे अज्ञानके परिणाम न माने जायँ, तो अज्ञानको विषयचैतन्यगत माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है । दार्ष्टान्तिकमें अर्थात् 'पुरुषाश्रित' इत्यादिमें ब्रह्मपद शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्यरूप अर्थमें प्रयुक्त है, पूर्ण ब्रह्मरूप अर्थमें प्रयुक्त नहीं है । क्योंकि अवच्छिन्न चैतन्य ही शुक्तिरजत आदिका अधिष्ठान है ।

† जैसे परोक्षज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति अनुभूत होती है, वैसे ही दूरस्थवृक्षस्थलमें परोक्षज्ञान होनेपर भी विपरीत परिमाणकी उत्पत्ति भी अनुभूत होती है, अतः दो अनुभवोंके आधारपर पुरुषवृत्ति अज्ञानका एक देश परोक्षज्ञानसे निवृत्त होता है और अन्य देश अनुवृत्त होता है, ऐसी कल्पनाकी जाती है, दो प्रकारका अज्ञान है, ऐसी कल्पना नहींकी जाती, क्योंकि ऐसा माननेमें गौरव है । वस्तुतस्तु परोक्षज्ञानको अज्ञानका