सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 214, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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तत्त्वप्रदीपिकायामपि मायाशबलिते सगुणे परमेश्वरे 'केवलो निर्गुणः' इति विशेषणानुपपत्तेः सर्वप्रत्यग्भूतं विशुद्धं ब्रह्म जीवाभेदेन साक्षीति प्रतिपद्यते इत्युदितम् ।
ईशस्य रूपभेदोऽसौ कारणत्वादिवर्जितः ।
जीवान्तरङ्गः कौमुद्यां प्राज्ञाख्यः परिकीर्तितः ॥९४॥
कारणत्व आदि धर्मोंसे रहित ईश्वरका स्वरूपविशेष, जीवका अत्यन्त अन्तरङ्ग, प्राज्ञ नामका साक्षी है, ऐसा कौमुदीमें प्रतिपादन किया गया है ॥ ९४ ॥
कौमुद्यान्तु—
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च । इति
तत्त्वप्रदीपिकामें कहा गया है कि सम्पूर्ण अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित चैतन्यात्मक जीवोंके अधिष्ठानरूपसे अत्यन्त अन्तरङ्ग स्वरूपभूत, जीवत्व, ईश्वरत्व आदि धर्मोंसे रहित और तत्-तत् जीवोंका अधिष्ठान होनेसे उन-उन जीवोंके साथ (ब्रह्मका) तादात्म्य होनेके कारण प्रत्येक शरीरमें भेदको प्राप्त हुआ ब्रह्म ही साक्षी है, ऐसा ज्ञात होता है, क्योंकि मायोपहित सगुण परमेश्वरमें 'केवलो निर्गुणश्च' (शुद्ध और गुणरहित) इत्यादि विशेषणकी उपपत्ति नहीं हो सकती है। [तात्पर्य यह है कि पूर्वके ग्रन्थमें जीव और ईश्वरसे विलक्षण साक्षी है, ऐसा कहा गया है, क्योंकि यद्यपि उसका जीवकोटिमें अन्तर्भाव किया जाय, तो वह उदासीन नहीं होगा और ईश्वरमें अन्तर्भाव किया जाय तो भी उदासीन नहीं होगा, क्योंकि ईश्वर जगत् आदिके करनेमें व्यापृत है, अतः वह उदासीन नहीं हो सकता, इससे इन दोनोंसे उसे पृथक् मानना चाहिए, इसमें तत्त्वप्रदीपिकाकार चित्सुखाचार्यकी भी सम्मति है, क्योंकि उन्होंने भी जीव और ईश्वरसे रहित शुद्ध चिदात्माको ही साक्षी माना है]।
कौमुदीमें तो कहा है कि—
'एको देवः०' (परमात्मा एक है, सब भूतोंमें गूढ है, आकाशके समान व्यापी है, ब्रह्मसे लेकर स्तम्बपर्यन्त सब भूतोंका अन्तरात्मा है, जीवकृत-कर्मोंका साक्षी है, सब भूतोंका अधिष्ठान है, जीवोंका भी साक्षी है, बोद्धा, शुद्ध और निर्गुण है) इस देवत्व आदिकी प्रतिपादक श्रुतिसे परमेश्वरका ही