भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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साक्षीका स्वरूप-विचार ] भाषानुवादसहित १८५


देवत्वादिश्रुतेः परमेश्वरस्यैव रूपभेदः कश्चिज्जीवप्रवृत्तिनिवृत्त्योरनुमन्ता स्वयमुदासीनः साक्षी नाम। स च कारणत्वादिधर्मानास्पदत्वाद् अपरोक्षो जीवगतमज्ञानाद्यवभासयंश्च जीवस्याऽन्तरङ्गः। सुषुप्त्यादौ च कार्यकारणो-परमे जीवगताज्ञानमात्रस्य व्यञ्जकः प्राज्ञशब्दितः।

'तद्यथा प्रियया स्त्रिया सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरमेव-मेवाऽयं पुरुषः प्राज्ञेनात्मना सम्परिष्वक्तो न बाह्यं किंचन वेद नान्तरम्' 'प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढ उत्सर्जन्याति' इति श्रुतिवाक्याभ्यां सुषुप्त्युत्क्रा-न्त्यवस्थयोर्जीवभेदेन प्रतिपादितः परमेश्वर इति सुषुप्त्युत्क्रान्त्यधिकरण—


कोई स्वरूपविशेष साक्षी है, जो जीवकी प्रवृत्ति और निवृत्तिका सर्वदा जानने-वाला और स्वतः उदासीन है। ईश्वरका स्वरूपविशेष होनेपर भी वह कारणत्व आदि धर्मोंके न रहनेसे अपरोक्ष है और जीवगत अज्ञान आदिका अवभासक होनेसे जीवका अत्यन्त अन्तरङ्ग भी है। सुषुप्ति आदिमें अन्तःकरण और अन्तःकरणकी वृत्तिका उपशम होनेसे जीवगत अज्ञान मात्रका ही व्यञ्जक है, अतः प्राज्ञशब्दसे भी साक्षी कहा जाता है। [ तात्पर्य यह है कि यदि ईश्वरका स्वरूप साक्षी है, तो उसका प्रत्यक्ष जीवको नहीं होना चाहिये, क्योंकि ईश्वरके सर्वज्ञत्व आदि धर्म जीवके प्रति प्रत्यक्षयोग्य नहीं हैं। साक्षीका अपरोक्षावभास नहीं होता है, यह भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि साक्षी अन्तःकरण, अज्ञान आदिका अनुभवरूप है, इसपर कौमुदीकारने कहा कि यद्यपि साक्षी ईश्वरका ही स्वरूपविशेष है, तथापि उसमें जीवके प्रत्यक्षके अयोग्य सर्वज्ञत्व, कारणत्व आदि धर्मोंके न रहनेसे उसके अपरोक्ष अवभासमें कोई विरोध नहीं है; ]।

'तद्यथा०' (जैसे प्रिय अङ्गनासे आलिङ्गित पुरुष बाह्य-मार्ग आदिके वृत्तान्तको और आन्तर—गृहकृत्यको नहीं जानता है, वैसे ही सुषुप्तिमें उपाधिके विलयसे परमात्माके साथ एकीभावको प्राप्त हुआ जीव बाह्य जगत्रूप प्रपञ्चको और आन्तर स्वप्न-प्रपञ्चको नहीं जानता है), 'प्राज्ञेन०' (प्राज्ञ आत्मासे अधिष्ठित जीव वेदनासे शब्द करता हुआ शरीरसे बाहर निकलता है) इन दो श्रुतिवाक्योंसे 'सुषुप्ति और उत्क्रान्ति (अन्यत्र गमन) में जीवसे पृथक् परमेश्वरका प्रतिपादन किया है, इस प्रकारका जो * सुषुप्त्युत्क्रान्तिके अधिकरणमें


* इस अधिकरणका सूत्र है—'सुषुप्त्युत्क्रान्त्योर्भेदेन'। सुषुप्ति और उत्क्रान्तिमें जीवसे भिन्न
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