सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 216, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| १८६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
|---|
( उ० मी० अ० १ पा० ३ अधि० १४ सू० ४२ ) निर्णयोऽपि साक्षिपर इत्युपवर्णितम् ।
शुक्तीदमंशवदसौ तत्त्वशुद्धौ च वर्णितः ।
जैसे शुक्तिका 'इदम्' अंश प्रातिभासिकरूपसे रजतकोटिमें प्रविष्ट भासता है, वैसे ही ब्रह्मकोटिमें प्रविष्ट भी साक्षी प्रातिभासिकरूपसे जीवकोटिमें प्रविष्ट भासता है, ऐसा तत्त्वशुद्धिकारका मत है ।
तत्त्वशुद्धावपि यथा 'इदं रजतम्' इति भ्रमस्थले वस्तुतः शुक्तिको-
प्रतिपादित निर्णय है वह भी साक्षिपरक ही है, ऐसा वर्णन ( कौमुदीमें ) किया गया है ।
तत्त्वशुद्धिमें भी—जैसे 'इदं रजतम्' ( यह रजत है ) इस प्रकारके भ्रम-स्थलमें वस्तुतः 'इदम्' अंश शुक्तिकोटिमें यद्यपि अन्तर्भूत है, तो भी प्रतिभास
ईश्वरका प्रतिपादन होनेसे परमेश्वरका ही ग्रहण करना चाहिए, संसारी जीवका नहीं, यह उक्त सूत्रका अक्षरार्थ है । तात्पर्य यह है कि 'कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः' (आत्मा कौन है ? जो विज्ञानमय है, वह आत्मा है ) इत्यादि अनेक वाक्य बृहदारण्यकके षष्ठ अध्यायमें उपलब्ध होते हैं, वे क्या जीवके कथनमें पर्य्यवसित हैं या ईश्वरके बोधनमें पर्य्यवसन्न हैं ? इस प्रकारके संशयमें पूर्वपक्ष प्राप्त होता है कि वे जीवके अनुवादमें अपना तात्पर्य रखते हैं, क्योंकि 'योऽयं विज्ञानमयः' इत्यादि उपक्रम, उपसंहार आदि संसारी जीवके प्रतिपादनमें ही कटिवद्ध हैं । इसपर सिद्धान्तीका कहना है कि बृहदारण्यकका षष्ठ प्रपाठक जीवका अनुवाद नहीं करता है, परन्तु परमेश्वरका ही बोध करता है, कारण कि 'तद्यथा प्रियया' इत्यादि वाक्य सुषुप्ति और उत्क्रान्तिमें जीवसे भिन्न परमेश्वरका तृतीयाविभक्त्यन्त प्राज्ञशब्दसे प्रतिपादन करते हैं, और ऐसा इसलिए प्रतिपादन किया जाता है कि लोकसिद्ध जीवका ईश्वरके साथ अभेदप्रतिपादन हो । 'स वा एष महानज आत्मा' ( वह व्यापक, नित्य, आत्मा है ) इस प्रकारके वाक्यशेषमें साक्षात् ईश्वरका ही स्वरूप बतलाया गया है, अतः उपक्रम, और उपसंहारके आधारपर बृहदारण्यकीय षष्ठ प्रपाठकस्थ आत्मपरक यावत् श्रुतिवाक्योंमें जीवातिरिक्त ईश्वरका ही जीवानुवादसे तदभिन्नताके लिए प्रतिपादन किया गया है, यह उक्त सुषुप्त्युत्क्रान्त्यधिकरणका निर्णय है । परन्तु इससे उदासीन, ईश्वरस्वरूप साक्षीकी सिद्धि नहीं हो सकती, क्योंकि इस प्रकरणमें 'एष भूताधिपतिः, एष सर्वेश्वरः' इत्यादि ग्रन्थसे सर्वेश्वरत्व इत्यादि गुणोंका कथन है । इस प्रश्नका उत्तर यह है कि ज्ञेय ब्रह्मके प्रकरणमें सर्वेश्वरत्व आदि गुणोंके प्रतिपादक वाक्य स्तुतिपरक हैं, अतः सर्वेश्वरत्व आदिके प्रतिपादनमें उनका तात्पर्य न होनेसे उदासीन साक्षीकी सिद्धि होती है ।