सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 218, कुल 590 में से
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प्रकाशरूपे जीवे एव साक्षात् सम्भवति, जीवस्याऽन्तःकरणतादात्म्यापत्त्या कर्तृत्वाद्यारोपभाक्त्वेऽपि स्वयमुदासीनत्वात् । 'एको देवः' इति मन्त्रस्तु ब्रह्मणो जीवभावाभिप्रायेण साक्षित्वप्रतिपादकः । 'द्वा सुपर्णा' इति मन्त्रः गुहाधिकरणन्यायेन ( उ० मी० अ० १ पा० २ अधि ३ सू० ११)
असङ्ग, उदासीन और प्रकाशरूप जीवमें ही साक्षात् * घट सकता है, कारण कि अन्तःकरणके तादात्म्यसे जीवमें कर्तृत्व आदि धर्मोंका आरोप होता है, तो भी स्वयं उदासीन है । 'एको देवः' यह मन्त्र ब्रह्ममें जीवभावके अभिप्रायसे ही साक्षित्वका प्रतिपादन † करता है । गुहाधिकरणके न्यायसे ‡
* भाव यह है कि जब अविद्याप्रतिविम्बित चैतन्यरूप जीवमें ही साक्षित्वकी उपपत्ति हो सकती है, तो फिर उससे अतिरिक्त साक्षी माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है । यदि इसपर भी अतिरिक्त साक्षी माननेकी जबरदस्ती की जाय, तो केवल गौरवके सिवा और कुछ हाथ न लगेगा । और जीव वास्तविकमें उदासीन ही है, परन्तु बुद्धितादात्म्यापन्न होनेसे उसमें औपचारिक कर्तृत्व आदि है, वस्तुतः नहीं, अतः उसे साक्षी स्वीकार करनेमें आपत्ति नहीं है ।
† तात्पर्य यह है कि यदि जीव ही पूर्वोक्त रीतिसे साक्षी माना जाय, तो 'एको देवः' इत्यादि मन्त्रके साथ, जो कि जीवातिरिक्त उदासीन साक्षीका प्रतिपादन करता है, अवश्य विरोध होगा । इसपर जीवमें साक्षित्वका प्रतिपादन करनेवाले कहते हैं कि नहीं, विरोध नहीं होगा, क्योंकि यह भी मन्त्र जीवमें ही साक्षित्वका प्रतिपादन करता है, उससे भिन्नमें नहीं । भाव यह है—यह बार बार कहा गया है कि जो साक्षी है वह जीवका अपरोक्ष है, यदि ईश्वरको साक्षी माना जाय, तो वह जीवका अपरोक्ष नहीं होगा, क्योंकि प्रतिबिम्ब और बिम्बरूपसे जीव और ईश्वरका औपाधिक भेद होनेके कारण जीवके प्रति जीवान्तरके समान (अर्थात् जैसे यज्ञदत्तजीव विष्णुमित्रजीवका अपरोक्ष नहीं कर सकता है, वैसे ) ईश्वरका भी अपरोक्ष साक्षात्कार नहीं हो सकेगा, इससे जीवभावापन्न ब्रह्म ही अपरोक्ष होनेसे साक्षी है, यह 'एको देवः' इत्यादि मन्त्रके साक्षीको प्रतिपादन करनेवाले अंशका भाव है ।
‡ यहाँ शङ्का करनेवालेका तात्पर्य यह है कि जैसे 'गुहां प्रविष्टौ' यह मन्त्र जीव और ईश्वर दोनोंका प्रतिपादन करता है, वैसे ही 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्र भी जीव और ईश्वर दोनोंका प्रतिपादन करता है, यह (ब्रह्मसूत्रके) भाष्यमें कहा गया है । इस अवस्थामें 'द्वा सुपर्णा' इस मन्त्रमें 'तयोरन्यः पिप्पलं' यह वाक्य भी जीवपरक ही होगा 'अनश्नन्'--- इत्यादि वाक्य ईश्वरपरक होगा, यह ज्ञात होता है, ऐसी परिस्थितिमें 'जीव साक्षी है' इस पक्षमें 'अनश्नन्नन्यः' इस मन्त्रभागके साथ, जो जीवातिरिक्त साक्षीका प्रतिपादन करता है, विरोध होगा, इस शङ्काके समाधानमें कहते हैं कि 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्र जिस पक्षमें ईश्वर परक और जीवपरक है उस पक्षमें भी कोई विरोध नहीं है, क्योंकि 'एको देवः' इस मन्त्रकी नाईं 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्र भी जीवभावापन्न परमात्माका बोध करता है, ऐसा