सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 219, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाक्षीका स्वरूप-विचार ] भाषानुवादसहित १८९
जीवेश्वरोभयपरः, गुहाधिकरणभाष्योदाहृतपैङ्गिरहस्यब्राह्मणव्याख्यातेन प्रकारेण जीवान्तःकरणोभयपरो वेति न कश्चिद्विरोध इत्याहुः ।
लिङ्गैरुपहितः परैः ॥ ९५ ॥
और कोई लोग कहते हैं कि अन्तःकरणसे उपहित जीवचैतन्य ही साक्षी है ॥९५॥
'द्वा सुपर्णा' यह मन्त्र जीव और ईश्वर उभयपरक है अथवा गुहाधिकरणके भाष्यमें उदाहरणरूपसे दिये गये पैङ्गीरहस्यब्राह्मणके व्याख्यानप्रकारसे जीव और अन्तःकरणपरक है, इसलिए कोई विरोध नहीं ‡ है ।
स्वीकार करेंगे । 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्रको जीवेश्वरपरक माननेमें गुहाधिकरण न्याय ही हेतु है । गुहाधिकरणमें प्रथम सूत्र है—'गुहां प्रविष्टावात्मानौ न तद्दर्शनात्' । सूत्रार्थ यह है कि 'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे' ( अपने किये हुए कर्मोंके अवश्य भावी फलोंका उपभोग करते हुए और अपने शरीरस्थ हृदयकी आकाशरूप गुहामें प्रविष्ट हुए ) इस मन्त्रमें जीव और ईश्वरका ग्रहण किया जाता है, क्योंकि 'गुहाहितं गहरेष्ठम्' इत्यादिमें वैसा ही देखा जाता है । इसी न्यायके अनुसार 'द्वा सुपर्णा' इत्यादिमें भी जीव और ईश्वरका ही ग्रहण है ।
‡ इसका तात्पर्य यह है कि गुहाधिकरणमें पैङ्गिरहस्यब्राह्मणका उदाहरण दिया गया है । वह इस प्रकार है—'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति इति सत्त्वम्, अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति इत्यनश्नन्न्योऽभिपश्यति ज्ञः, तावेताँ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ' । ( उन दोनोंमें एक जो कर्मफलका उपभोग करता है, वह सत्त्व—अन्तःकरण है और अन्य जो उपभोग नहीं करता हुआ देखता है, वह ज्ञ—क्षेत्रज्ञ है, इस प्रकार ये सत्त्व और क्षेत्रज्ञ हैं ) इस ब्राह्मणसे अदनवाक्य अन्तःकरणपरक और अनशनवाक्य क्षेत्रज्ञपरक है, ऐसा व्याख्यान प्रतिपादित है, यह ज्ञान होता है । इस अवस्थामें भाष्यकारने कैसे उक्त वाक्यको जीवेश्वरपरक माना ? यह शङ्का हो सकती है, परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि अभ्युपगमवादमात्रसे कथन होनेके कारण ब्राह्मणव्याख्यान और भाष्यका परस्पर विरोध नहीं है । इस अवस्थामें यदि अन्तःकरणप्रतिबिम्बित चैतन्य ही पैङ्गिरहस्यका अभिमत क्षेत्रज्ञ हो, तो वही 'अनश्नन्' इत्यादि वाक्योक्त साक्षी होगा, अविद्याप्रतिबिम्बित चैतन्य नहीं होगा, ऐसी परिस्थितिमें अविद्याप्रतिबिम्बित ब्रह्मस्वभाव जीवचैतन्य साक्षी है, यह पक्ष पैङ्गिब्राह्मणनिर्णीतार्थक 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्रभागसे विरुद्ध होगा, इस विरोधका 'गुहाधिकरणभाष्योदाहृत' इत्यादिसे परिहार किया गया है, परिहारका अभिप्राय यह है कि पैङ्गिब्राह्मणमें कहा गया क्षेत्रज्ञ अन्तःकरणगत चैतन्यप्रतिबिम्बरूप जीव नहीं है, क्योंकि उसके कर्तृत्वादि-स्वभाव होनेसे 'अनश्नन्' इत्यादि वाक्यसे कहे गये साक्षित्वका उसमें सम्भव नहीं है, किन्तु असङ्ग, उदासीन और प्रकाशरूप अविद्याप्रतिबिम्बरूप जीव ही अभिप्रेत है, और वह अनश्नन् वाक्योक्त साक्षिरूप हो सकता है, इसका पूर्वमें कथन हुआ है । अतः अविद्या-प्रतिबिम्ब जीवके साक्षित्वपक्षमें पैङ्गिब्राह्मणके साथ विरोध नहीं है ।