सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
साक्षीका स्वरूप-विचार ] भाषानुवादसहित १८९
जीवेश्वरोभयपरः, गुहाधिकरणभाष्योदाहृतपैङ्गिरहस्यब्राह्मणव्याख्यातेन प्रकारेण जीवान्तःकरणोभयपरो वेति न कश्चिद्विरोध इत्याहुः ।
लिङ्गैरुपहितः परैः ॥ ९५ ॥
और कोई लोग कहते हैं कि अन्तःकरणसे उपहित जीवचैतन्य ही साक्षी है ॥९५॥
'द्वा सुपर्णा' यह मन्त्र जीव और ईश्वर उभयपरक है अथवा गुहाधिकरणके भाष्यमें उदाहरणरूपसे दिये गये पैङ्गीरहस्यब्राह्मणके व्याख्यानप्रकारसे जीव और अन्तःकरणपरक है, इसलिए कोई विरोध नहीं ‡ है ।
स्वीकार करेंगे । 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्रको जीवेश्वरपरक माननेमें गुहाधिकरण न्याय ही हेतु है । गुहाधिकरणमें प्रथम सूत्र है—'गुहां प्रविष्टावात्मानौ न तद्दर्शनात्' । सूत्रार्थ यह है कि 'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे' ( अपने किये हुए कर्मोंके अवश्य भावी फलोंका उपभोग करते हुए और अपने शरीरस्थ हृदयकी आकाशरूप गुहामें प्रविष्ट हुए ) इस मन्त्रमें जीव और ईश्वरका ग्रहण किया जाता है, क्योंकि 'गुहाहितं गहरेष्ठम्' इत्यादिमें वैसा ही देखा जाता है । इसी न्यायके अनुसार 'द्वा सुपर्णा' इत्यादिमें भी जीव और ईश्वरका ही ग्रहण है ।
‡ इसका तात्पर्य यह है कि गुहाधिकरणमें पैङ्गिरहस्यब्राह्मणका उदाहरण दिया गया है । वह इस प्रकार है—'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति इति सत्त्वम्, अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति इत्यनश्नन्न्योऽभिपश्यति ज्ञः, तावेताँ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ' । ( उन दोनोंमें एक जो कर्मफलका उपभोग करता है, वह सत्त्व—अन्तःकरण है और अन्य जो उपभोग नहीं करता हुआ देखता है, वह ज्ञ—क्षेत्रज्ञ है, इस प्रकार ये सत्त्व और क्षेत्रज्ञ हैं ) इस ब्राह्मणसे अदनवाक्य अन्तःकरणपरक और अनशनवाक्य क्षेत्रज्ञपरक है, ऐसा व्याख्यान प्रतिपादित है, यह ज्ञान होता है । इस अवस्थामें भाष्यकारने कैसे उक्त वाक्यको जीवेश्वरपरक माना ? यह शङ्का हो सकती है, परन्तु यह युक्त नहीं है, क्योंकि अभ्युपगमवादमात्रसे कथन होनेके कारण ब्राह्मणव्याख्यान और भाष्यका परस्पर विरोध नहीं है । इस अवस्थामें यदि अन्तःकरणप्रतिबिम्बित चैतन्य ही पैङ्गिरहस्यका अभिमत क्षेत्रज्ञ हो, तो वही 'अनश्नन्' इत्यादि वाक्योक्त साक्षी होगा, अविद्याप्रतिबिम्बित चैतन्य नहीं होगा, ऐसी परिस्थितिमें अविद्याप्रतिबिम्बित ब्रह्मस्वभाव जीवचैतन्य साक्षी है, यह पक्ष पैङ्गिब्राह्मणनिर्णीतार्थक 'द्वा सुपर्णा' इत्यादि मन्त्रभागसे विरुद्ध होगा, इस विरोधका 'गुहाधिकरणभाष्योदाहृत' इत्यादिसे परिहार किया गया है, परिहारका अभिप्राय यह है कि पैङ्गिब्राह्मणमें कहा गया क्षेत्रज्ञ अन्तःकरणगत चैतन्यप्रतिबिम्बरूप जीव नहीं है, क्योंकि उसके कर्तृत्वादि-स्वभाव होनेसे 'अनश्नन्' इत्यादि वाक्यसे कहे गये साक्षित्वका उसमें सम्भव नहीं है, किन्तु असङ्ग, उदासीन और प्रकाशरूप अविद्याप्रतिबिम्बरूप जीव ही अभिप्रेत है, और वह अनश्नन् वाक्योक्त साक्षिरूप हो सकता है, इसका पूर्वमें कथन हुआ है । अतः अविद्या-प्रतिबिम्ब जीवके साक्षित्वपक्षमें पैङ्गिब्राह्मणके साथ विरोध नहीं है ।
१९० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
अन्ये तु—सत्यं जीव एव साक्षी, न तु सर्वगतेनाऽविद्योपहितेन रूपेण । पुरुषान्तरान्तःकरणादीनामपि पुरुषान्तरं प्रति स्वान्तःकरणभासकसाक्षिसंसर्गाविशेषेण प्रत्यक्षत्वापत्तेः । न चाऽन्तःकरणभेदेन प्रमातृभेदात् तदनापत्तिः । साक्षिभास्येऽन्तःकरणादौ सर्वत्र साक्ष्यभेदे सति प्रमातृभेदस्याऽप्रयोजकत्वात् । तस्मादन्तःकरणोपधानेन जीवः साक्षी । तथा च प्रतिपुरुषं साक्षिभेदात् पुरुषान्तरान्तःकरणादेः पुरुषान्तरसाक्ष्यसंसर्गाद्वा तदयोग्य-
इतर लोग कहते हैं कि जीव ही साक्षी है, यह ठीक है परन्तु सर्वगत अविद्यासे उपहितरूपसे जीव साक्षी नहीं है। यदि अविद्योपहितरूपसे साक्षी माने, तो अन्य पुरुषको अन्य पुरुषोंके अन्तःकरण आदिका प्रत्यक्ष हो जायगा, क्योंकि उसके अन्तःकरणके अवभासक साक्षीके साथ * सामान्यरूपसे पुरुषान्तरके अन्तःकरणादिका संसर्ग है । परन्तु साक्षीके एक होनेपर भी अन्तःकरणप्रयुक्त प्रमाताओंके भिन्न-भिन्न होनेसे पूर्वोक्त आपत्ति नहीं आ सकती है ? नहीं, यह समाधान युक्त नहीं हो सकता, क्योंकि साक्षिभास्य सम्पूर्ण अन्तःकरण आदिमें साक्षीके एक होनेपर प्रमाताका भेद अकिञ्चित्कर † है । इससे अन्तःकरणोपहित चैतन्यरूपसे ही जीव साक्षी है । तब साक्षीके भेदमें प्रयोजकीभूत उपाधिका भेद होनेपर प्रतिपुरुष साक्षीका भेद सिद्ध होता है, इससे अन्य पुरुषोंके अन्तःकरण आदिका अन्य पुरुषके साक्षीके साथ सम्बन्ध न होनेसे
* तात्पर्य यह है कि देवदत्तके अन्तःकरणका अवभासक जो साक्षी है, उस साक्षीके साथ देवदत्तीय अन्तःकरणके समान यज्ञदत्तके अन्तःकरण आदिका भी सम्बन्ध होनेसे जैसे देवदत्तको अपने अन्तःकरणका भान होता है, वैसे ही यज्ञदत्तके अन्तःकरणका भी भान हो जायगा, इसी प्रकार यज्ञदत्तके अन्तःकरणकी वृत्तियोंका भी प्रत्यक्ष हो जायगा, इसलिए व्यापकीभूत अविद्यामें प्रतिबिम्बितचिद्रूप ईश्वरको साक्षी नहीं मानना चाहिए, किन्तु वक्ष्यमाण अन्तःकरणोपहित जीवको ही साक्षी मानना चाहिए ।
† तात्पर्य यह है कि देवदत्तके प्रति देवदत्तके अन्तःकरणके प्रत्यक्षमें देवदत्तके साक्षीका संसर्ग प्रयोजक है, इसलिए देवदत्तके साक्षीका संसर्ग अविशेषसे यज्ञदत्तके अन्तःकरणके साथ भी होनेसे यज्ञदत्तके अन्तःकरण आदिका प्रत्यक्ष देवदत्तको अवश्य प्रसक्त होगा, इसलिए इसका परिहार साक्षीके संसर्गभेदसे ही हो सकता है, अप्रयोजक प्रमाताके भेदसे नहीं, अतः प्रमाताके भेदसे यह व्यवस्था नहीं हो सकती है कि देवदत्तका अन्तःकरण देवदत्तके प्रति प्रत्यक्ष है, अन्य यज्ञदत्तका अन्तःकरण प्रत्यक्ष नहीं है । इसलिए भी अपरिच्छिन्न अविद्याबिम्बित चैतन्य साक्षी नहीं है ।
साक्षीका स्वरूप-विचार ] भाषाअनुवादसहित १९१
त्वाद्वा अप्रकाश उपपद्यते। सुषुप्तावपि सूक्ष्मरूपेणान्तःकरणसद्भावात् तदुपहितः साक्षी तदाऽप्यस्त्येव। न चान्तःकरणोपहितस्य प्रमातृत्वेन न तस्य साक्षित्वम्, सुषुप्तौ प्रमात्राभावेऽपि साक्षिसत्त्वेन तयोर्भेदश्चाऽवश्यं वक्तव्य इति वाच्यम्।
विशेषणोपाध्योर्भेदस्य सिद्धान्तसम्मतत्वेनाऽन्तःकरणविशिष्टः प्रमाता, तदुपहितः साक्षीति भेदोपपत्तेरित्याहुः ॥ १४ ॥
अविद्ययाऽऽवृतः साक्षी तेनाऽन्यस्य प्रथा कथम् ? ।
साक्षी अविद्यासे आवृत रहता है, अतः उससे अविद्या, अहंकार आदिका प्रकाश कैसे होगा ?।
अथवा पुरुषान्तरके प्रति अयोग्यत्वकी कल्पनासे अप्रकाश - प्रत्यक्षत्वका अभाव- उपपन्न होता है। सुषुप्तिमें भी सूक्ष्मरूपसे अन्तःकरणका अस्तित्व होनेसे उस अन्तःकरणसे उपहित साक्षी सुषुप्तिकालमें भी रहता ही है। यदि कोई शङ्का करे कि जो अन्तःकरणसे उपहित चैतन्य है, वह प्रमाता है, साक्षी नहीं हैं, क्योंकि सुषुप्तिमें प्रमाताके न रहनेपर भी ‡ साक्षीके रहनेसे उन दोनोंका भेद अवश्य मानना होगा, तो यह शङ्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि विशेषण और उपाधिके भेदका सिद्धान्तमें स्वीकार होनेसे अन्तःकरणरूप विशेषणसे विशिष्ट चैतन्य प्रमाता है और अन्तःकरणसे उपहित चैतन्य साक्षी है, इस प्रकार प्रमाता और साक्षीका भेद उपपन्न $\times$ होता है ॥ १४ ॥
‡ सुषुप्तिकालमें साक्षीकी अवश्य सत्ता है, यह मानना चाहिए, क्योंकि 'त्रिषु धामसु' (तीनों अवस्थाओंमें [साक्षीकी सत्ता है]) इत्यादि श्रुतियाँ साक्षीके अस्तित्वका जाग्रत्, सुषुप्ति और स्वप्नावस्था में प्रतिपादन करती हैं। और सुषुप्तिकालमें साक्षी द्वारा अनुभूत अज्ञानका 'मैंने कुछ नहीं जाना' इत्यादि रूपसे स्मरण भी होता है। अनेक प्रमाताके प्रलयका प्रतिपादन करनेवाली अनेक श्रुतियोंके साथ विरोध होनेसे 'अहमस्वाप्सम्' (मैं सोया था) इत्यादि स्मरणको अहमर्थ प्रमाताके अंशमें अनुभव ही मानना चाहिए, सुषुप्तिमें प्रमाताकी सत्ता नहीं माननी चाहिए। इसलिए सुषुप्तिमें सत्त्व और असत्त्वरूपसे साक्षी और प्रमाताका अवश्य भेद है, अतः प्रमातासे साक्षीका अवश्य भेद मानना ही चाहिए, तथा प्रमाता और साक्षीको एकरूप माना जाय, तो साक्षीमें उदासीनत्व आदिका प्रतिपादन भी विरुद्ध होगा, यह भाव है।
अविद्योपाधिक जीवमें अन्तःकरण प्रमातृत्वका विशेषणत्वरूपसे प्रयोजक है और उपाधित्वरूपसे साक्षित्वका प्रयोजक है। इसीलिए विशिष्ट और उपहित प्रमाता एवं
१९२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
[ टिप्पणी ]
साक्षीका भी भेद है। यद्यपि अन्तःकरणसे विशिष्ट चैतन्यमें कर्तृत्व आदि स्वभाव हैं, तथापि उपहित चैतन्यमें स्वतः उदासीन होनेसे साक्षित्वकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है। अब प्रसङ्गतः विशेषण और उपाधिका निर्वचन करते हैं, जो प्रकृतमें अत्यन्त उपादेय है। विशेषणका लक्षण है—कार्यान्वयित्वे सति व्यावर्तकत्वम् अर्थात् विधेयके साथ अन्वयी हो कर जो लक्ष्यकी अन्य पदार्थोंसे व्यावृत्ति करे। जैसे 'नीलोत्पलमानय' (नील कमल लाओ) इत्यादिमें नील है—विशेषण, विधेय—आनयनमें नीलका उत्पल द्वारा अन्वय भी होता है और रक्त उत्पलसे व्यावृत्ति भी करता है। इसलिए उत्पलका नैल्य विशेषण है। उपलक्षणीभूत पदार्थमें अतिव्याप्तिका निवारण करनेके लिए 'कार्यान्वयित्वे सति' यह विशेषण दिया गया है, जैसे 'यत् काकवत्, तत् देवदत्तगृहम्' (जो कौआवाला है, वह देवदत्तका घर है) इसमें विधेय है देवदत्तगृहत्व, उसका काकके साथ किसी प्रकारसे अन्वय है नहीं, परन्तु अन्य गृहकी व्यावृत्ति तो काक करता है, इसलिए उपलक्षण काकमें दोषनिवारण करनेके लिए सत्यन्त है। यदि केवल यही विशेषणका लक्षण किया जाय कि जो कार्यान्वयी हो वह विशेषण है तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि विधेयके साथ विशेष्यका भी अन्वय होता है, अतः विशेष्यमें विशेषणत्वका प्रसङ्ग हटानेके लिए विशेष्यदल—व्यावर्तकत्वदल—अवश्य देना चाहिए। उसके देनेसे विशेष्यमें अतिप्रसङ्ग नहीं है। 'कार्यानन्वयित्वे सति व्यावर्तकत्वे सति कार्यान्वयकाले विद्यमानत्वम् उपाधिलक्षणम्' अर्थात् विधेयके साथ अन्वयी न होकर, विशेष्यका व्यावर्तक होकर कार्यान्वयकालमें विद्यमान हो, वह उपाधि—है। जैसे—लोहितं स्फटिकमानय' (रक्त स्फटिक लाओ) इसमें स्फटिकसन्निहित जपाकुसुम स्फटिकका विशेषण नहीं है, उपाधि है, क्योंकि आनयनरूप विधेयमें जपाकुसुमका किसी प्रकारसे अन्वय नहीं होता है और अन्य स्फटिकसे व्यावृत्ति अवश्य करता है। इसमें 'कार्यानन्वयित्वे सति' यह सत्यन्त विशेषणमें अतिप्रसक्तिके निरासके लिए दिया गया है, और द्वितीय सत्यन्त देनेका प्रयोजन इस प्रकार है, कहींपर यह कहा जाय कि 'काकवद् गृहं प्रविश' (काकवत् गृहमें प्रवेश करो) इसमें प्रवेशरूपकार्यके अन्वयकालमें कदाचित् दैवयोगसे उपलक्षणीभूत काक अन्यत्र चला गया और दूसरा कौआ उस स्थलमें आ गया उस समयमें आये हुए नवीन काकमें कार्यानन्वयित्वे सति अन्वयकालविद्यमानत्वरूप उपाधिका लक्षण होनेसे अतिव्याप्ति हो जायगी, अतः इसके भङ्गके लिए द्वितीय सत्यन्त दिया, इसके देनेसे आगत नवीन काकमें दोष नहीं है, क्योंकि वह व्यावर्तक नहीं है, इसी स्थलमें उपलक्षण काकमें अतिव्याप्तिके वारण करनेके लिए कार्यान्वयकालमें विद्यमानत्वरूप विशेष्य दल दिया। कार्यके अन्वयकालमें दैव योगसे उपलक्षण काककी स्थिति हो सकती है। इससे उपलक्षणमें अतिव्याप्तिके वारणके लिए विद्यमानत्वमें 'नियमेन' यह विशेषण भी देना चाहिये, इसलिए कार्यान्वयकालमें नियमतः जो रहे, यह विशेष्य भागका अर्थ है। कार्यान्वयकालमें नियमतः काक रहता नहीं है, अतः दोष नहीं है, यह भाव है। इसका अधिक विचार अन्यत्र कृष्णालङ्कार व्याख्यामें पृ० १९५ चौ० मु० काशीमें देखना चाहिए।
साक्षीकी अनावृतताका विचार ] भाषानुवादसहित १९३
नन्नूक्तरूपस्य साक्षिणः चैतन्यमात्रावरकेणाऽज्ञानेनाऽऽवरणमवर्जनीय-मिति कथमावृतेनाऽविद्याहङ्कारादिभानमिति चेत् ।
अत्राहू राहुवत् केचित् तस्य स्वावृतभास्यताम् ॥ ९६ ॥
**इस विषयमें—**राहुके समान अर्थात् जैसे राहुका प्रकाश राहुसे आवृत चन्द्रमण्डलसे ही होता है, वैसे ही अविद्याका प्रकाश अविद्यासे आवृत साक्षीसे ही होता है, ऐसा भी—कुछ लोग कहते हैं ॥९६॥
राहुवदविद्या स्वावृतप्रकाशप्रकाशयेति केचित् ।
अब यह शङ्का होती है कि पूर्वोक्त लक्षणसे लक्षित साक्षी अवश्य चैतन्यमात्रको आवृतकरनेवाले अज्ञानसे आवृत होगा, अतः अज्ञानावरणसे आवृत साक्षीसे अहङ्कार आदिका भान कैसे होगा ? * अर्थात् किसी प्रकारसे भी नहीं हो सकेगा, परन्तु यह शङ्का युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि—
राहुके समान अविद्या स्वावृत प्रकाशसे प्रकाशित होती है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं । [ तात्पर्य यह है कि ग्रहणके समयमें चन्द्रमण्डल राहुसे आच्छादित होता है, परन्तु उस समयमें राहुका प्रकाश चन्द्रसे ही होता है, जो कि चन्द्र राहुसे आवृत है । इसी प्रकार यद्यपि अविद्यासे साक्षी आवृत है, तथापि उस अविद्याका प्रकाश स्वावृत साक्षीसे ही होता है ] ।
* साक्षिगोचर अपरोक्ष वृत्तिसे साक्षीके आवरणका भङ्ग होनेपर आवरणसे रहित साक्षीसे अविद्या आदिका भान हो सकता है, यह नहीं कहना चाहिए, क्योंकि 'अविद्या आदिका भान केवल साक्षीसे ही होता है' इस सिद्धान्तके साथ विरोध होगा, कारण कि उनके भानमें इस प्रकार वृत्तिका अवलम्बन करनेसे साक्षीसे अतिरिक्त वृत्तिकी भी अपेक्षा हुई । दूसरी बात यह भी है कि मनमें करणत्वका भी आगे चलकर निरास किया जायगा, इससे करणके अभावसे साक्षीको अवलम्बन करनेवाली तदाकार वृत्ति भी नहीं हो सकती है । और अहङ्कार आदिकी सत्ताके कालों उनके संशय आदि नहीं होते हैं, इसलिए सदा उनका प्रकाशस्वरूप साक्षीके साथ सम्बन्ध है, यह कहना चाहिए, यदि कादाचित्क वृत्तिसे उनका भान माना जाय, तो उनके सदा भासमानत्वके साथ भी विरोध होगा, इसलिए केवल साक्षिभास्यत्व ही अहङ्कार आदिमें स्वीकार करना चाहिए, परन्तु यह नहीं हो सकता है, क्योंकि वह साक्षिचैतन्य तो अज्ञानसे आवृत है । और साक्षिरूप चैतन्यसे अन्य चैतन्यका ही अज्ञान आवरण करता है, यह भी नहीं कह सकते हैं, क्योंकि अज्ञानका सम्पूर्ण चैतन्यको आवृत करना स्वभाव है, यदि हठात् इसे नहीं माना जाय, तो साक्षि-चैतन्यसे अन्य चैतन्यमें भी आवरणका अभाव प्रसक्त होगा, यह प्रश्नका आशय है ।
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| १९४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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अविद्यावृत्तितद्धर्माभासकांशेतरावृतिः ।
कल्प्यते वस्तुतस्तेषु संशयादेरदर्शनात् ॥ ९७ ॥
वस्तुतः अविद्या, अन्तःकरण और अन्तःकरणके धर्मोंके अवभासक साक्षिरूप चैतन्यको छोड़कर अन्य चैतन्यको अविद्या आवृत करती है, इस प्रकार—अविद्या आदिमें संशय आदिके न देखनेसे—कल्पना की जाती है ॥९७॥
वस्तुतोऽविद्याऽन्तःकरणतद्धर्मावभासकं साक्षिचैतन्यं विहायैवाऽज्ञानं चैतन्यमावृणोतीत्यनुभवानुसारेण कल्पनान्न कश्चिद्दोषः । अत एव सर्वदा तेषामनावृतप्रकाशसंसर्गात् अज्ञानविपरीतज्ञानसंशयागोचरत्वम् ।
स्याच्चेदनावृतः साक्षी भासेताऽस्य सुखात्मता ।
प्रेमास्पदत्वाद् भात्येव परिच्छेदात्तृप्तता ॥ ९८ ॥
यदि साक्षी चैतन्य आवृत नहीं है, तो सर्वदा तदभिन्न आनन्दका प्रकाश होना चाहिए ? ( कहते हैं ) होता ही है, क्योंकि आत्मा परम प्रेमका विषय है, उपाधिसे आनन्दके परिच्छिन्न होनेसे तृप्ति नहीं होती है ॥९८॥
साक्षिचैतन्यस्याऽनावृतत्वे तत्स्वरूपभूतस्याऽऽनन्दस्याऽपि प्रकाशापत्तिरिति चेत्, न; इष्टापत्तेः । आनन्दरूपप्रकाशप्रयुक्तस्याऽऽत्मनि निरूपा-
वस्तुस्थितिमें साक्षिचैतन्यको, जो अविद्या, अन्तःकरण और अन्तः-करणके धर्म सुख आदिका प्रकाशक है, छोड़ कर अन्य चैतन्यको ही अज्ञान आवृत करता है, ऐसी अनुभवके अनुसार कल्पना करनी चाहिए, इसलिए किसी दोषकी प्रसक्ति नहीं है । अतएव—साक्षी चैतन्यसे अतिरिक्त चैतन्यका ही अज्ञान आवरण करता है, इसीसे—वे अन्तःकरण और तद्धर्म आदि सदा अनावृत प्रकाशके साथ सम्बद्ध होनेके कारण अज्ञान, विपरीत ज्ञान और संशय आदिके विषय नहीं † होते हैं ।
यदि साक्षी चैतन्य सदा अनावृत है, तो उसके स्वरूपभूत आनन्दका भी साथ-साथ प्रकाश होना चाहिए ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यह .
† अविद्याके भावरूपत्वमें, अहङ्कारके अनात्मत्वमें, सुख, दुःख आदि वृत्तियोंके अनात्मधर्मत्वमें अज्ञान, विपरीतज्ञान आदिके होनेसे यह कैसे कह सकते हैं कि अविद्या आदि संशय आदिके गोचर नहीं है ? इस शङ्कापर यह उत्तर है कि अविद्या आदिके सत्त्वकालमें अविद्यादिसत्त्वप्रकारक अज्ञान, संशय आदि नहीं होते हैं, इसलिए पूर्वोक्त आशङ्का नहीं हो सकती है, यह भाव है !
साक्षीरूप आनन्दका अनावृतत्व-विचारं ] भाषानुवादसहितं १५५
धिकप्रेम्णो दर्शनात् । 'भासत एव परमप्रेमास्पदत्वलक्षणं सुखम्' इति विवरणाच्च ॥ १५ ॥
स्यादेतत्—इदानीमप्यानन्दप्रकाशे मुक्तसंसारयोरविशेषप्रसङ्गः ।
ननु कल्पितभेदस्य साक्ष्यानन्दस्य प्रकाशेऽपि अनवच्छिन्नस्य ब्रह्मानन्दस्याऽऽवृतस्य संसारदशायामप्रकाशेन विशेषोऽस्तीति चेत्, न; आन-
आपत्ति इष्ट ही है अर्थात् उस साक्षीके स्वरूपभूत आनन्दका प्रकाश होता ही है, क्योंकि आनन्दरूपके * प्रकाश होनेसे ही आत्मामें निरुपाधिक प्रेम देखा जाता है । इस प्रकृत अर्थमें विवरणकारने कहा भी है † कि जिस सुखका लक्षण परम प्रेम-विषयत्व है, वह सुख भासता ही है [ कारण कि वह सुख ( आनन्द ) साक्षिचैतन्यसे अभिन्न है, अतः स्वरूपानन्दके प्रकाशमें कोई हानि नहीं है, ] ॥ १५ ॥
यह शङ्का होती है कि यदि संसारदशामें भी आत्मस्वरूप आनन्दका प्रकाश होता है, तो मुक्ति और संसारमें कोई विशेष नहीं होगा ? [ इससे साक्षिस्वरूप आनन्दका संसारदशामें प्रकाश मानना अयुक्त है, यह पूर्वपक्षीका भाव है ] ।
परन्तु इस शङ्काका अवसर नहीं है, क्योंकि साक्षिस्वरूप आनन्दका, जिसका कि बिम्बभूत आनन्दसे भेद कल्पित है, प्रकाश होनेपर भी संसारदशामें आवृत होनेके कारण अनवच्छिन्न ब्रह्मानन्दका प्रकाश न होनेसे मुक्ति और संसार दशामें विशेष हो सकता है, तो यह भी समाधान युक्त नहीं है,
* तात्पर्य यह है कि लोकमें जिन जिन पुरुषोंको आनन्दका अनुभव होता है, उन उन पुरुषोंके अनुभवके विषय आनन्दमें प्रीति अनुभवसिद्ध है । इसलिए प्रकाशमान आनन्द प्रीतिका विषय है, यह सिद्ध होता है, अतः दुःखदशामें भी प्राणिमात्रको अपने-अपने आत्मामें प्रीतिके देखनेसे आत्मविषयक प्रीति भी प्रकाशमान आनन्दविषयक है, यह सिद्ध होता है, पुत्रादिविषयक जो प्रीति है, वह तो औपाधिक है, क्योंकि वहांपर पुत्रादिमें जो सुखसाधनता-रूप उपाधि है, तत्-प्रयुक्त ही आत्मसुखकी अभिव्यक्ति देखी जाती है और उसके अभावमें अनात्म पुत्र आदिमें प्रीति नहीं देखी जाती है । इसीलिए यह श्रुति है—'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' ( आत्माके स्वार्थसे ही सभी प्रिय होते हैं ) अतः आत्माका आनन्द प्रकाशित होता है, यह अवश्य मानना चाहिए, यदि न माना जाय, तो श्रुतिसिद्ध निरुपाधिक प्रीति आत्मामें नहीं होगी, क्योंकि प्रीति प्रकाशमान आनन्दविषयक ही होती है । अतः साक्ष्यानन्दके प्रकाशमें इष्टापत्ति युक्त ही है ।
१९६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
न्देऽनवच्छेदांशस्याऽपुरुषार्थत्वादानन्दापरोक्षमात्रस्य चेदानीमपि सत्त्वात् । नन्ववच्छिन्नः साक्ष्यानन्दः सातिशयः, सुषुप्तिसाधारणादनतिस्पष्टात् ततो वैषयिकानन्देष्वतिशयानुभवात् । अनवच्छिन्नो ब्रह्मानन्दस्तु निरतिशयः ।
क्योंकि आनन्दमें अनवच्छेद अंश पुरुषार्थ नहीं है और केवल आनन्दका संसार दशामें भी अपरोक्ष प्रकाश होता है। [शङ्का तथा समाधानका तात्पर्य यह है कि साक्षीरूप आनन्दका अर्थ है—अविद्यामें आनन्दका प्रतिबिम्ब, इस प्रतिबिम्बभूत आनन्दका बिम्बभूत आनन्दसे अवश्य कल्पित भेद है, अन्यथा बिम्बप्रतिबिम्ब- भावकी उपपत्ति ही नहीं हो सकेगी । इसलिए संसारदशामें अनावृत साक्षि- स्वरूप प्रतिबिम्बानन्दका प्रकाश होनेपर भी बिम्बभूत ब्रह्मानन्दका प्रकाश नहीं होता है। और दूसरी बात यह भी है कि प्रतिशरीर साक्षीरूप आनन्द भिन्न-भिन्न है और अनवच्छिन्न आनन्द प्रतिशरीरमें भिन्न नहीं है, अतः संसारदशा और मुक्ति- दशामें अवश्य भेद है । इससे मुक्ति और संसारदशामें अविशेषप्रसक्तिरूप दोष नहीं है । इसपर उत्तर दाताका वक्तव्य यह है कि संसारदशासे मोक्षमें जो विशेष है, क्या वह अनवच्छिन्न आनन्दके स्फुरणसे है या केवल आनन्द ही के स्फुरणसे है ? प्रथमकल्प युक्त नहीं है, क्योंकि अनवच्छिन्न शब्दका अर्थ है—भेदाभाव, इसको यदि आनन्दसे भिन्न माने, तो वह पुरुषार्थ नहीं होगा, अतः अपुरुषार्थवस्तुनिबन्धन विशेष अर्थात् अनवच्छेदप्रयुक्त वैशिष्ट्य मुक्तिमें अप्रयोजक है, यदि अवच्छेदाभावको आनन्दरूप माना* जाय, तो द्वितीय कल्प ही पर्यवसन्न होगा अर्थात् आनन्दका स्फुरणमात्र ही मोक्षमें विशेष है, परन्तु यह भी अयुक्त है, क्योंकि संसारदशामें भी आनन्दका स्फुरणमात्र तो है ही, अतः संसार और मुक्तिमें अविशेषप्रसङ्गका भङ्ग कोई भी नहीं कर सकता है ]। प्रकारान्तरसे आशङ्का होती है कि संसारदशामें प्रति- शरीरमें एकरूपसे प्रकाशित न होनेवाला साक्षीरूप आनन्द उत्कर्ष और अपकर्ष- रूप अतिशयसे युक्त होता है, क्योंकि सुषुप्तिसाधारण आनन्दसे, जो अति- स्पष्टतासे रहित है, स्रक्, चन्दन आदि विषयजन्य आनन्दोंमें अतिस्पष्टता भासती है । और मुक्तिकालीन ब्रह्मानन्द एकरूपसे प्रकाशमान एवम् उत्कर्ष
* कल्पित अभाव अधिष्ठानरूप होता है, इसलिए आनन्दरूप अधिष्ठानमें रहनेवाला भेदाभाव आनन्दरूप ही होगा, तदतिरिक्त नहीं होगा यह भाव है ।
साक्षीरूप आनन्दका अनावृतत्व-विचार] भाषानुवादसहित १९७
आनन्दवल्ल्यां मानुषानन्दाद्युत्तरोत्तरशतगुणोत्कर्षवर्णनस्य ब्रह्मानन्दे समापनादिति चेत्, न; सिद्धान्ते साक्ष्यानन्दविषयानन्दब्रह्मानन्दानां वस्तुत एकत्वेनोत्कर्षापकर्षासम्भवात् । मानुषानन्दादीनामुत्तरोत्तरमुत्कर्ष
और अपकर्षसे रहित है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि सुषुप्तिकालमें प्रकाशमान साक्षीरूप आनन्द अवश्य स्पष्ट है, इसीलिए तो जाग्रद् अवस्थामें 'मैं सुखपूर्वक सोया' यह स्मरण होता है, लोकमें स्पष्टरूपसे जिस आनन्दका अनुभव किया जाता है, उसीका पुनः स्मरण होता है, स्पष्टतया अननुभूत आनन्दका स्मरण नहीं होता है, परन्तु सौषुप्त आनन्दकी अपेक्षासे कुसुममाला, चन्दन आदिसे प्रादुर्भूत आनन्द अधिक स्पष्ट होता है, इसलिए सांसारिक आनन्द सातिशय और प्रतिशरीर भिन्न-भिन्न हुआ करते हैं, मुक्तिकालमें ऐसी अवस्था नहीं है, क्योंकि उस आनन्दका कल्पित भेद या अतिशय नहीं भासता है, किन्तु उस कालमें एकरूप, शुद्ध और उत्कर्ष एवं अपकर्ष आदि धर्मोंसे शून्य ब्रह्मरूप आनन्द भासता है, अतः संसार और मुक्तिमें विशेष नहीं है, यह कहना अनुचित है ] ।
क्योंकि * आनन्दवल्लीमें मनुष्यके आनन्दसे लेकर उत्तरोत्तर आनन्दोंमें किया हुआ शतगुण उत्कर्षका वर्णन ब्रह्मानन्दमें ही समाप्त किया गया है, [ अतः सांसारिक आनन्द सातिशय है, और वह मुक्तिमें नहीं रहता है ], परन्तु यह भी शङ्का अनुपपन्न है, क्योंकि सिद्धान्तमें साक्षीरूप आनन्द, विषयानन्द और ब्रह्मानन्द वस्तुतः अभिन्न ही हैं, अतः उत्कर्ष और अपकर्ष आनन्दमें हो ही नहीं सकता । यदि इसमें शङ्का हो कि मनुष्य आदिके
* आनन्दवल्लीकी श्रुतिमें ऐसा वर्णन मिलता है—एक सार्वभौम राजाके आनन्दसे सौगुना मनुष्यगन्धर्वको आनन्द होता है, और एक श्रोत्रिय कामरहित (ब्राह्मण) को भी होता है, और इनके आनन्दसे सौगुना आनन्द एक देवगन्धर्वको होता है, इस प्रकार क्रमशः वर्णन करते करते आखिर अन्तमें सम्पूर्ण आनन्दोंकी परिसमाप्ति बतलाई गई है, अर्थात् ब्रह्मानन्दसे बढ़ कर और कोई आनन्द नहीं है, अन्य सब आनन्द उस ब्रह्मानन्दसे निकृष्ट-निकृष्टतर ही हैं, ऐसा कहा गया है । इस विषयको अधिक जाननेके लिए निम्नलिखित मन्त्र देखिये ।
सैषानन्दस्य मीमांसा भवति । युवा स्यात् साधु युवाध्यापकः । आशिष्ठो द्रढिष्ठो बलिष्ठः । तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् । स एको मानुष आनन्दः । ते ये शतं मानुषा आनन्दाः । स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणा-मानन्दाः । स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं देवगन्ध-र्वाणामानन्दाः । इत्यादि [ तैत्तिरीयोपनिषद् ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवा० ८ ] ।
१९८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
श्रुतिर्वदतीति चेत् ? । को वा ब्रूते श्रुतिर्न वदतीति । किन्तु अद्वैतवादे तदुपपादनमशक्यमित्युच्यते ।
नन्वेकस्यैव सौरालोकस्य करतलस्फटिकदर्पणाद्यभिव्यञ्जकविशेषोपधानेनाऽभिव्यक्तितारतम्यदर्शनादेकत्वेऽप्यानन्दस्याऽभिव्यञ्जकसुखवृत्तिभेदोपधानेनाऽभिव्यक्तितारतम्यरूपमुत्कर्षापकर्षवत्त्वं युक्तमिति चेत्, न; दृष्टान्तासंप्रतिपत्तेः । सर्वतः प्रसृमरस्य सौरालोकस्य गगने विना करतलादिसम्बन्धमस्पष्टं प्रकाशमानस्य निम्नतले प्रसृमरस्य जलस्येव करतलसम्बन्धेन
आनन्दका उत्तरोत्तर उत्कर्ष श्रुति कहती है, तो यह कौन कहता है कि श्रुति नहीं कहती है ? अर्थात् श्रुति आनन्दका उत्कर्ष कहती तो अवश्य है, परन्तु अद्वैतवादमें उसका उपपादन करना असम्भव है, यह हमारा ( पूर्वपक्षी का ) अभिप्राय है । यदि यह कहा जाय कि जैसे सूर्यके तेजके एक होनेपर भी करतल, स्फटिक और दर्पण आदि विशेष अभिव्यञ्जक पदार्थोंके * उपधान से आलोकाभिव्यक्तिमें कुछ तारतम्य देखा जाता है, वैसे ही यद्यपि स्वतः आनन्द एकरूप है, तथापि अभिव्यञ्जक सुखवृत्तिविशेषके उपधानसे आनन्दकी अभिव्यक्तिमें तारतम्यरूप उत्कर्ष और अपकर्ष हो सकते हैं ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आपका दिया हुआ जो दृष्टान्त है, उसमें हमारी सम्प्रतिपत्ति—सम्मति नहीं † है, क्योंकि जैसे स्वभावतः निम्नभू-भागमें गमनशील जलकी करतलके सम्बन्धसे गतिका प्रतिबन्ध होनेपर एकस्थानमें उसका अधिक जमाव हो जाता है, वैसे ही सर्वत्र गमनशील सूर्यका तेज, जो गगनमें किसी करतल आदिके सम्बन्धके बिना
* तात्पर्य यह है कि करतल आदिके सम्बन्धके बिना तेजकी जो आकाशमें अभिव्यक्ति होती है, उसकी अपेक्षासे करतलमें अधिक अभिव्यक्ति होती है, करतलकी अपेक्षा स्फटिकमें अधिक होती है, उसकी अपेक्षा दर्पणमें अधिक होती है, यह अनुभवसिद्ध है, इसीके अनुसार आनन्दकी अभिव्यञ्जक वृत्तियोंके प्रभावसे साक्षीरूप आनन्दमें भी उत्कर्ष और अपकर्ष हो सकता है, यह पूर्वपक्षकर्ता ( सिद्धान्ती )-का वक्तव्य है ।
† उत्तर देनेवाले पूर्ववादीका भाव यह है कि आपका आनन्दके विषयमें आलोकदृष्टान्त तभी हमें मंजूर हो सकता है, जब कि स्वतः तेज एक व्यक्ति हो, परन्तु आलोक एक व्यक्ति तो है नहीं, क्योंकि वह अनेक किरणोंका समूहरूप है और एक स्वरूप भी नहीं है, कारण कि तत्-तत् स्थानोंमें किरणोंकी अल्पता और बाहुल्य आदि नाना स्वरूप उपलब्ध होते हैं, अतः आलोकके दृष्टान्तसे साक्षीरूप आनन्दका तारतम्य नहीं सिद्ध कर सकते हैं ।
साक्षीरूप आनन्दका अनावृतत्व-विचार] भाषानुवादसहित १९९
गतिप्रतिहतौ बहुलीभावादधिकप्रकाशः, भास्वरदर्पणादिसम्बन्धेन गतिप्रतिहतौ बहुलीभावात् तदीयदीप्तिसंवलनाच्च ततोऽप्यधिकप्रकाश इति तत्राऽभिव्यञ्जकोपाधिकाभिव्यक्तितारतम्यानभ्युपगमात् । दृष्टान्तसम्प्रतिपत्तौ च गगनप्रसृतसौरालोकवत् अनवच्छिन्नानन्दस्याऽस्पष्टता, करतलाद्यवच्छिन्नसौरालोकवत् सुखवृत्त्यवच्छिन्नानन्दस्याऽधिकाभिव्यक्तिरिति मुक्तितः संसारस्यैवाऽभ्यर्हितत्वापत्तेश्च । एतेन 'संसारदशायां प्रकाशमानोऽप्यानन्दो मिथ्याज्ञानतत्संस्कारविक्षिप्ततया तीव्रवायुविक्षिप्तप्रदीपप्रभावदस्पष्टं प्रकाशते, मुक्तौ तदभावात् यथावदवभासते' इत्यपि निरस्तम् । निर्विशेषस्वरूपानन्दे
अस्पष्ट प्रकाशमान है, उसकी करतलके सम्बन्धसे गति रुक जाती है, इस अवस्थामें वह (तेज) एकत्र जमा होकर अधिक प्रकाश करता है और अति निर्मल दर्पण आदिके सम्बन्धसे तेजकी गतिका प्रतिरोध होनेपर तेजकी जमावटसे और दर्पणकी प्रभाके सम्मिश्रणसे करतलगत प्रकाशसे भी अधिक प्रकाश होता है, अतः तेजस्थलमें अभिव्यञ्जक उपाधिके तारतम्यसे अभिव्यक्तिमें तारतम्य नहीं माना जाता है। किन्तु जमावट प्रयुक्त ही तारतम्य है ] यदि कथञ्चित् दृष्टान्तको मान लें, तो गगनमें गतिशील सूर्यके आलोकके समान अनवच्छिन्न आनन्दमें अस्पष्टता होगी और करतल आदिसे युक्त सूर्यके आलोकके समान सुखाकार वृत्तिसे युक्त आनन्दकी अधिक अभिव्यक्ति होगी, इसलिए मुक्तिकी अपेक्षासे संसार ही अभ्यर्हित—सभीका अभीष्ट प्रसक्त होगा * । इससे यह भी निरस्त हुआ समझना चाहिए कि संसारकालमें आनन्द प्रकाशमान है, तो भी मिथ्याज्ञान † और मिथ्याज्ञानके संस्कारसे विक्षिप्त होनेके कारण तीव्र वायुसे संचालित दीपकी प्रभाके समान वह अस्पष्ट-सा प्रकाशित होता है, और मुक्तिमें तो मिथ्याज्ञान
* अर्थात् सांसारिक सुख ही मुक्ति सुखकी अपेक्षासे अधिक उत्कृष्ट और स्थायी सिद्ध होंगे, अतः मुक्तिके उद्देश्यसे मुक्तिके साधनोंमें किसीकी प्रवृत्ति नहीं होगी, यह भाव है ।
† देहादि अनात्म पदार्थोंमें आत्मत्वग्रह और वस्तुतः आत्माके सम्बन्धसे वञ्चित पुत्रादिमें आत्मीयत्वग्रह ही मिथ्याज्ञान है, यही मिथ्याज्ञान जाग्रत् अवस्थामें स्वरूपानन्दके प्रकाशनमें विक्षेपक और उसकी अस्पष्टताका आपादक है, और इसी मिथ्याज्ञानसे उत्पन्न हुए संस्कारके सुषुप्तिकालमें प्रकाशमान आनन्दके विक्षेपक और पुरुषार्थत्वका विनाशक हैं, क्योंकि प्रारब्धकर्मके बलसे सभी जीव सौषुप्त आनन्दका त्यागकर जाग्रत्में आ जाते हैं, अतः मुमुक्षु लोग सौषुप्त आनन्दकी अभिलाषा नहीं करते हैं, यह शङ्काका भाव है, और दीपप्रभा दृष्टान्त है ।
| २०० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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प्रकाशमाने तत्र विक्षेपदोषादप्रकाशमानस्य मुक्त्यन्वयिनोऽतिशयस्याऽ-
सम्भवात् । तस्मात् साक्ष्यानन्दस्याऽनावृतत्वकल्पनमयुक्तम् ।
साक्षिण्युपाधिमालिन्यादध्यस्तादपकर्षतः ।
सुखापकर्षमद्वैतविद्याचार्याः प्रचक्षते ॥ ९९ ॥
अद्वैताचार्य कहते हैं कि संसारावस्थामें साक्षीमें अध्यस्त उपाधिके मालिन्यरूप अपकर्षसे सुखका अपकर्ष अर्थात् तारतम्य है ॥९९॥
अत्राहुरद्वैतविद्याचार्याः—यथाऽत्युत्कृष्टस्यैकस्यैव धवलरूपस्य मालि-
आदिके न रहनेसे पूर्णरूपसे आनन्द प्रकाशित होता है, अतः संसार और मुक्तिदशामें विशेष है, क्योंकि जब निर्विशेष आत्मस्वरूप आनन्द प्रकाशमान है, तो उस दशामें विक्षेपदोषसे अप्रकाशमान और मुक्तिदशामें* प्रकाशमान आनन्दका दृष्टान्तके समान कोई जातिरूप या अवयवरूप विशेष हो ही नहीं सकता है, इससे साक्षीरूप आनन्दको अनावृत मानना अयुक्त है ।
इस आक्षेपके समाधानमें अद्वैत विद्याचार्य† कहते हैं कि जैसे अत्यन्त
* दीपप्रभाके सावयव होनेसे प्रबल वायुके प्रभावसे उसके कुछ अवयवोंके विनाशरूप विक्षेपसे अथवा प्रभागत भास्वरत्वके वायु द्वारा प्रतिबन्धरूप विक्षेपसे दीपप्रभाके प्रकाशमान होनेपर भी उसमें अस्पष्ट प्रकाशता उपपन्न हो सकती है, परन्तु अवयव, गुण आदि विशेषसे रहित ब्रह्मानन्दके—न तो संस्कार या मिथ्याज्ञानसे—अवयवका विनाश या किसी गुणविशेषका प्रतिबन्ध हो सकता है, अतः तत्प्रयुक्त अस्पष्ट प्रकाशता साक्ष्यानन्दमें नहीं आ सकती है, अतः पूर्वोक्त पक्ष असङ्गत है अर्थात् इस रीतिसे भी मुक्ति और संसारमें वैलक्षण्यकी सिद्धि नहीं हो सकती है, यह पूर्वपक्षीका भाव है ।
† जैसे साधारण मलिन दर्पणमें पड़े हुए धवलरूपके प्रतिबिम्बमें साधारण अपकर्ष अध्यस्त होता है, और मध्यम रीतिसे मलिन दर्पणमें प्रतिबिम्बित धवलरूपमें पूर्वकी अपेक्षासे अधिक अपकर्ष अध्यस्त होता है इसी रीतिसे अत्यन्त मलिन दर्पणमें प्रतिबिम्बित धावल्यमें पूर्वकी अपेक्षा अत्यन्त निकृष्ट अपकर्ष अध्यस्त होता है, वैसे ही अन्तःकरणमें जब निरतिशय और अद्वितीय आनन्दका प्रतिबिम्ब होता है, तब साक्षीरूप आनन्द कहा जाता है अर्थात् साक्षी-रूप आनन्दभावको प्राप्त होता है और पूर्व जन्मके किसी विशेष पुण्यकर्मके परिपाकसे स्रक्, चन्दन आदि सुन्दर विषयोंके आकारमें अन्तःकरणकी वृत्ति होती है, तब उस वृत्तिमें प्रति-बिम्बित आनन्द विषयानन्दके नामसे प्रसिद्ध होता है । यहांपर यह विशेषरूपसे जानने लायक वार्ता है—अन्तःकरणका—वृत्ति द्वारा यदि उत्कृष्ट विषय-विशेषोंके साथ—सम्पर्क हुआ है, तो उन उत्कृष्ट विषयोंके साथ अन्तःकरणके सत्त्वगुणका सम्बन्ध होनेसे उत्कर्ष होगा, यदि निकृष्ट विषयोंके साथ सम्बन्ध होगा, तो अकर्ष होगा । इसके अनन्तर अन्तःकरणके सत्त्वांशके
साक्षीकी अनावृतताका विचार ] भाषानुवादसहित २०१
न्यतारतम्ययुक्तेष्वनेकेषु दर्पणेषु प्रतिबिम्बे सत्युपाधिमालिन्यतारतम्यात् तत्र तत्र प्रतिबिम्बे धावल्यापकर्षस्तारतम्येनाऽध्यस्यते, एवं वस्तुतो निरतिशयस्यैकस्यैव स्वरूपानन्दस्याऽन्तःकरणप्रतिबिम्बिततया साक्ष्यानन्दभावे प्राक्तनसुकृतसंपत्त्यधीनविषयविशेषसंपर्कप्रयुक्तसत्त्वोत्कर्षापकर्षरूपशुद्धितारतम्ययुक्तसुखरूपान्तःकरणवृत्तिप्रतिबिम्बिततया विषयानन्दभावे च तमोगुणरूपोपाधिमालिन्यतारतम्यदोषादपकर्षस्तारतम्येनाऽध्यस्यते इति संसारदशायां प्रकाशमानेऽप्यानन्दे अध्यस्तापकर्षतारतम्येन सातिशयत्वादतृप्तिः। विद्यो-
त्कृष्ट एक ही श्वेत रूपके—मालिन्यके तारतम्यसे युक्त अनेक दर्पणोंमें—प्रतिबिम्बित होनेपर उपाधिकी मलिनताके तारतम्यसे तत्-तत् प्रतिबिम्बमें धवलताका अपकर्ष तारतम्यसे अध्यस्त होता है, वैसे ही वस्तुतः निरतिशय एक ही स्वरूपानन्दके अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित होनेके कारण साक्षीरूप आनन्दभावके प्राप्त होनेपर और पूर्व पुण्यके परिपाकके अधीन विषयविशेषके सम्पर्कसे हुए सत्त्वके उत्कर्ष और अपकर्षसे शुद्धिके तारतम्यसे युक्त सुखाकार वृत्तियोंमें प्रतिबिम्बित होनेके कारण विषयानन्दत्वके प्राप्त होनेपर † तमोगुणरूप उपाधिकी मलिनताके तारतम्यदोषसे अपकर्ष भी तारतम्यसे अध्यस्त होता है। इसलिए संसारदशामें * आनन्दके प्रकाशित होनेपर भी अध्यस्त अपकर्षके तारतम्यसे
परिणामरूप वृत्तियाँ स्वरूपानन्दविषयक होंगी, तो अवश्य उत्कर्ष और अपकर्षसे युक्त होंगी, अतः उनमें पड़ा हुआ आनन्दका प्रतिबिम्ब भी उत्कृष्ट और अपकृष्ट अवश्य होगा। इसलिए संसारदशामें प्रकाशमान आनन्दके उत्कर्षापकर्षसे युक्त होनेसे सातिशय होनेके कारण तृप्ति नहीं होती है। और मुक्तिदशामें इस प्रकार सातिशयत्व न होनेसे तृप्ति ही रहती है, अतः विशेषकी उपपत्ति हो सकती है, यह तात्पर्य है।
† अन्तःकरणके सत्त्व, रज और तम स्वरूप होनेसे उसकी वृत्तिमें भी तमोगुणकी अनुवृत्ति अवश्य होगी, और उसी तमोगुणसे अपकर्षतारतम्यात्मक मालिन्यतारतम्यदोष वृत्तिनिष्ठ भी होगा, इसी दोषके बलसे सत्त्ववृत्तिके प्रतिबिम्बमें भी अर्थात् विषयानन्दमें भी तारतम्य अध्यस्त होता है, यह भाव है।
- संसारदशामें जो प्रकाशमान आनन्दमें अपकर्षतारतम्य अध्यस्त होता है, उससे वह आनन्द सातिशय होगा, इस अवस्थामें जो अत्यन्त साधारण आनन्दका अनुभव कर रहा है, वह अवश्य उत्कृष्ट आनन्दकी अभिलाषा करेगा और उसके सम्पादन करनेमें जीतोड़ यत्न करता हुआ आनन्दसाधनत्वकी भ्रान्तिसे कदाचित् दुःखके साधनोंमें भी प्रवृत्त होकर अनेक योनिमें जन्मप्रयुक्त दुःखकी—अनर्थकी—ही प्राप्ति करेगा, अतः कभी भी दुःखके निवृत्त न होनेसे उसे तृप्ति नहीं होगी, यह भाव है।
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| २०२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह . | [ प्रथम परिच्छेद |
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दये निखिलापकर्षाध्यासनिवृत्तेरारोपितसातिशयत्वापायात् कृतकृत्यतेति विशेषोपपत्तेः निरूपाधिकप्रेमगोचरतया प्रकाशमानस्साक्ष्यानन्दोऽनावृत एवेति ।
सुखांशोऽस्यावृतो नास्ति न भातीत्यनुभूतितः ।
चिदंशोनावृतो वृत्त्या सौख्यव्यक्तिरितीतरे ॥१००॥
साक्षीका सुखांश आवृत रहता है, क्योंकि 'हमें आनन्द नहीं है, आनन्द नहीं भासता है' ऐसा अनुभव होता है । और साक्षीका चिदंश तो अनावृत है । सुखकी अभिव्यक्ति—प्रकाश—अन्तःकरणकी वृत्तिसे होती है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १०० ॥
अन्ये तु—प्रकाशमानोऽप्यानन्दो 'मयि नास्ति, न प्रकाशते' इत्या-
सातिशयता होनेके कारण तृप्ति नहीं होती है । विद्याका आविर्भाव होनेके पीछे, तो सम्पूर्ण अपकर्षाध्यासकी निवृत्ति होनेसे आरोपित सातिशयत्वका निरास होनेसे कृतकृत्यता † होती है, इस प्रकार संसार और मुक्तिमें विशेष हो सकता है, अतः निरुपाधिक प्रेमकी विषयता होनेसे प्रकाशमान साक्षीरूप आनन्द अनावृत ही है ।
✱ कुछ लोग यह कहते हैं कि यद्यपि आनन्द प्रकाशमान है, तथापि
† ज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्ति होनेसे मूलाज्ञानके कार्यकी भी अवश्य निवृत्ति होगी, इससे तत्कृत अपकर्ष आदि अध्यासकी निवृत्ति हो जानेसे मुक्तिदशामें कृतकृत्यता है । कृतकृत्यता-शब्दका अर्थ है—कृत्यम्—कर्त्तव्यजातम्, कृतम्—सम्पादितं येन, इस प्रकारकी व्युत्पत्तिसे—जिसने अपना वास्तविक कर्तव्य सम्पादन कर लिया है, ऐसा पुरुष । तात्पर्य यह है कि पुरुषको जब तक ज्ञान नहीं हुआ है, तब तक दुःखकी निवृत्ति या सुखकी प्राप्तिके लिए अनेक प्रकारके यत्न करने पड़ते हैं और विद्याके उदित होनेपर तो सम्पूर्ण दुःखोंके विनष्ट होनेसे उत्कृष्ट धवल रूपका जैसे निर्मल दर्पणमें आविर्भाव होता है, वैसे ही—निरतिशय ब्रह्मस्वरूप आनन्दका आविर्भाव होता है, अतः दुःखकी निवृत्ति या सुखकी प्राप्तिके लिए कोई यत्नकी आवश्यकता नहीं रहती है । इसीलिए भगवान् पूर्णावतार श्रीकृष्णचन्द्रने गीतामें कहा है कि—
'एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ।'
अर्थात् हे अर्जुन ! निरतिशय ब्रह्मस्वरूप आनन्दको अपरोक्षरूपसे जानकर बुद्धिमान् (पण्डित) और कृतकृत्य हो जाता है, यह इसका भाव है ।
✱ इन लोगोंके मतमें पूर्वमतसे यह भेद है—साक्षीरूप चैतन्यको अनावृत माननेपर तदभिन्न आनन्द भी प्रकाशित होगा, अतः संसार और मुक्तिमें कोई विशेष नहीं होगा, इस आक्षेपके समाधानमें अद्वैतविद्याचार्यने कहा है कि साक्षीरूप आनन्दको अनावृत मानें, तो.
साक्षीरूप आनन्दका अनावृतत्व-विचार] भाषानुवादसहित २०३
वरणानुभवात् आवृत एव। एकस्मिन्नपि साक्षिण्यविद्याकल्पितरूपभेद- सम्भवेन चैतन्यरूपेणाऽनावरणस्याऽऽनन्दरूपेणाऽऽवरणस्य चाऽविरोधात्। स्वरूपप्रकाशस्याऽऽवरणनिवर्तकतया प्रकाशमाने आवरणस्याऽविरोधाच्च। 'त्वदु-
'मयि नास्ति, न प्रकाशते' (मेरेमें वेदान्तप्रतिपाद्य ब्रह्मस्वरूप आनन्द नहीं है, हमें उस आनन्दका प्रकाश नहीं होता है) इस प्रकारसे आवरणका अनुभव होनेसे आवृत ही है। यद्यपि साक्षी एक है, तो भी अविद्यासे कल्पित रूपभेदके होनेसे चैतन्यरूपसे अनावरण और आनन्दरूपसे आवरणके होनेमें कोई विरोध नहीं है। और [आगन्तुक वृत्तिरूप प्रकाशके ही आवरणका विरोधी होनेसे] स्वरूपप्रकाश आवरणका निवर्तक नहीं है, अतः स्वरूपके प्रकाश- मान होनेपर भी आवरणका विरोध† नहीं है। 'त्वदुक्तमर्थं न जानामि'
भी संसार और मुक्तिमें विशेषता हो सकती है, इस मतमें साक्षीरूप आनन्दको आवृत मानकर पूर्वोक्त आक्षेपका परिहार करके संसार और मोक्षमें भिन्नताका प्रतिपादन किया गया है, साक्षीरूप आनन्दको आवृत माननेसे ही यह प्रतीति उपपन्न होती है—'वेदान्तप्रतिपाद्य स्वरूपानन्द मुझमें नहीं है और प्रकाशित नहीं होता है', यदि उसे आवृत न मानें, तो व्यवहारमें अतिप्रसिद्ध इस प्रतीतिका लोप प्राप्त होगा, इसलिए आनन्दके प्रकाशमान होनेपर भी संसारदशामें उसे आवृत मानना और मुक्तिमें आवरणके विध्वस्त होनेसे उस-परिपूर्णानन्दका स्फुरण मानना चाहिए। इसमें यह शङ्का अवश्य होती है कि यदि उसे आवृत मानें तो अनौपाधिक प्रेमविषयत्व आत्मामें सदा नहीं होगा, क्योंकि वृत्ति द्वारा हुआ आनन्दका स्फुरण कादाचित्क हुआ करता है, परन्तु यह शङ्का अयुक्त है, क्योंकि आवृत्त और प्रकाशमान आनन्दमें फलबलसे निरुपाधिक प्रेमविषयत्वकी कल्पना करते हैं। इसीसे 'भासते एव परमप्रेमास्पदत्वलक्षणं सुखम्' (परम प्रेमास्पदत्वरूप सुख भासता है) इस विवरणके वचनका भी इसीमें तात्पर्य है। इसी अभिप्रायसे 'प्रकाशमान' यह आनन्दका विशेषण दिया गया है, अन्यथा प्रकाशमान आनन्दको आवृत मानना अतिविरुद्ध होगा यह भाव है।
† तात्पर्य यह है कि जैसे वस्तुस्थितिमें एक ही चैतन्यमें जीवत्व और ईश्वरत्व रूप दो धर्म माने जाते हैं, क्योंकि 'मैं ईश्वर नहीं हूँ, किन्तु संसारी हूँ' और 'मैं साक्षात् परमात्मा हूँ संसारी नहीं हूँ' ऐसा अवस्थाभेदसे व्यवहार होता है, वैसे ही 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि ज्ञान आनन्द नहीं है, इस रूपसे अहङ्कारके अवभासके ज्ञानका आनन्दसे भेद-व्यवहार होता है, इसलिए चित्त्व और आनन्दत्व दो स्वरूप चैतन्यमें मानने ही चाहिएँ। इसी प्रकार जैसे एक ही चैतन्यमें जीवत्वावच्छेदेन अज्ञान और ईश्वरत्वावच्छेदेन अज्ञानके अभावकी कल्पना की जाती है, वैसे ही अहंकारके अवगाहक चित्में आनन्दावच्छेदेन आवृतत्व और चित्त्वावच्छेदेन अनावृतत्वकी कल्पना फलके अनुसार करनी चाहिए।
२६४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
क्तमर्थं न जानामि' इति प्रकाशमाने एवाऽऽवरणदर्शनाच्च । न च तत्राऽनावृत-सामान्याकारावच्छेदेन विशेषावरणमेवाऽनुभूयते इति वाच्यम्, अन्यावरणस्याऽन्यावच्छेदेन भानेऽतिप्रसङ्गात् । न च सामान्यविशेषभावो नियामक इति नाऽतिप्रसङ्ग इति वाच्यम्, व्याप्यव्यापकभावातिरिक्तसामान्यविशेषभावाभावेन 'वह्निं न जानामि' इति धूमावरकाज्ञानानुभवप्रसङ्गात् । तस्माद्यदवच्छिन्नमज्ञानं प्रकाशते, तदेवाऽऽवृतमिति प्रकाशमानेऽप्यज्ञानं
( तुमसे कथित अर्थको मैं नहीं जानता हूँ ) इत्यादि स्थलमें सामान्यरूपसे आत्माके प्रकाश होनेपर भी आवरण देखा जाता है । इस विषयमें शङ्का होती है कि * 'त्वदुक्तमर्थं०' इत्यादि स्थलमें आवरणरहित जो सामान्य आकार है, तदवच्छेदेन विशेषके आवरणका अनुभव होता है, प्रकाशमान सामान्यमें सामान्यका आवरण अनुभूत नहीं होता है, परन्तु यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अन्यके आवरणका अन्यावच्छेदेन भान नहीं होता है । इसपर यदि यह शङ्का की जाय कि सामान्यविशेषभाव नियामक है, अतः दोष नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस विषयमें यह प्रष्टव्य होता है कि सामान्य-विशेषभाव, क्या व्याप्य-व्यापकभावरूप है, या उससे अतिरिक्त है । द्वितीय पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि व्याप्यव्यापकभावसे अतिरिक्त सामान्यविशेषभावका निरूपण ही नहीं कर सकते हैं, यदि व्याप्यव्यापकभावरूप ही सामान्यविशेष भाव माना जाय, तो 'वह्निको मैं नहीं जानता हूँ' इस प्रकार वह्निके आवारक अज्ञानके अनुभवस्थलमें धूमके आवारक अज्ञानका भी अनुभव प्राप्त होगा । इससे यदवच्छिन्न ( जिस वस्तुसे विशेषित ) अज्ञान प्रकाशित होता हो, वही वस्तु आवृत होती है, ऐसा मानना चाहिए, अतः वस्तुके प्रकाशमान होनेपर भी
* गुरुने किसी एक शिष्यको उपदेश दिया—'आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र परमात्मा ही वेदान्तोंसे ज्ञातव्य है और वह परमात्मा दुर्जनोंसे नहीं जाना जाता है ।' परन्तु इसपर भी मन्द शिष्यको अज्ञान रहता है कि आपने जिस परमात्माके विषयमें उपदेश दिया है, उसे मैं नहीं जानता । शिष्यका तात्पर्य यह है कि महाराज ! आप्त वाक्य होनेसे आपके वाक्यका सामान्यतः कुछ अर्थ तो है, किन्तु वह विशेष रूपसे प्रतीत नहीं होता है, इससे उक्त वाक्यसे वाक्यार्थत्वरूपसे सामान्य आकारके ज्ञात होनेपर भी वही सामान्य आकार विशेष वस्तुके आवारक अज्ञानके विषयरूपसे प्रकाशित होता है । इसलिए 'त्वदुक्तमर्थं न जानामि' इत्यादिमें, जो आवरणका विषय है, वह प्रकाशमान नहीं है और जो प्रकाशमान है, वह आवरणका विषय नहीं है, अतः उक्त अनुभव प्रकाशमान वस्तुके आवृतत्वमें प्रमाण नहीं है, यह शङ्का करनेवालेका भाव है ।
साक्षीरूप आनन्दका अनावृतत्व-विचार] भाषानुवादसहित २०५
युज्यते । अज्ञानं च यथा साक्ष्यंशं विहाय चैतन्यमावृणोति, एवमा- नन्दमपि तत्तत्सुखरूपवृत्तिकवलीकृतं विहायैवाऽऽवृणोति । स एव वैषयिका- नन्दस्याऽऽवरणाभिभवः। स चाऽऽवरणाभिभवः प्रत्यूषसमये बाह्याऽऽवरणा ऽभिभववत् कारणविशेषप्रयुक्तवृत्तिविशेषवशात्तरतमभावेन भवति । अतः स्वरूपानन्दविषयानन्दयोः विषयानन्दानां च परस्परभेदसिद्धिरिति वदन्ति । सर्वथाऽपि साक्षिचैतन्यस्याऽनावृतत्वेनाऽऽवरणाभिभवार्थं वृत्तिमपेक्ष्यैव तेनाऽहङ्कारादिप्रकाशनमिति तुल्यमेव ॥१६॥
अहङ्कारादिनः साक्षिभास्यस्य स्मरणं कथम् । सूक्ष्मावस्था हि संस्कारो वृत्तीनां स्यान्न साक्षिणः ॥१०१॥
साक्षीसे प्रकाशित होनेवाले अहंकार आदिका स्मरण कैसे होगा ? सूक्ष्मावस्थारूप संस्कार वृत्तियोंका हो सकता है, साक्षीरूप नित्य चैतन्यका नहीं हो सकता है [ और संस्कारके बिना स्मरण नहीं होता है ] ॥१०१॥
तद्विषयक अज्ञान रहता है, यह युक्त है। जैसे अज्ञान साक्षी अंशका त्यागकर अन्य चैतन्यका आवरण करता है, वैसे ही तत्-तत् सुखरूप वृत्तिके विषयी- भूत आनन्दका परित्यागकर अन्य आनन्दको ही आवृत करता है। यही अर्थात् सुखवृत्तिविषयत्वनिबन्धन अनावरकत्वस्वभाव ही—विषयप्रयुक्त आनन्दका ( वृत्तिकृत ) आवरणाभिभव है। जैसे उषाकालमें सूर्यके प्रकाशके तारतम्यसे बाह्य अन्धकारका अभिभव होता है, वैसे ही वृत्तिकृत वह आवरणा- भिभव भी विषयविशेषरूप कारणविशेषसे जन्य वृत्तिविशेषके आधारपर ही उत्कर्ष और अपकर्षरूप तारतम्यसे युक्त होता है। इसीसे * स्वरूपानन्द, विषयानन्दका एवं अनेक विषयानन्दोंका परस्पर भेद सिद्ध होता है, ऐसा कहा जाता है। साक्षीरूप चैतन्यके किसी अंशसे आवृत न होनेके कारण आवरणाभिभवके लिए वृत्तिकी अपेक्षा न करके ही उस साक्षीसे अहंकार आदिका प्रकाश होता है, यह तो दोनोंके † मतमें समान है ॥ १६ ॥
* दृष्टीसे अर्थात् वस्तुतः आनन्दके एक होनेपर भी उपाधियुक्त आनन्दका भेद माननेसे ही स्वरूपानन्द आदिका भेद होता है। तात्पर्य यह है कि विद्यासे आवरणकी निवृत्ति होनेसे प्रकाशमान आनन्द स्वरूपानन्द है, और अविद्याकी अनिवृत्तिदशामें वृत्तिके सम्बन्धसे प्रकाशमान आनन्द विषयानन्द कहा जाता है, इसी प्रकार वृत्तियोंके अनेक होनेसे विषयानन्द भी अनेक होते हैं, अतः विषयानन्दोंका भी परस्पर भेद है, यह जानना चाहिए ।
† स्वरूपानन्दके आवृतत्व पक्षमें अथवा अनावृतत्व पक्षमें, यह अर्थ है।
२०६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
नन्वेवं कथमहङ्कारादीनामनुसन्धानम्, ज्ञानसूक्ष्मावस्थारूपस्य संस्कारस्य ज्ञाने सत्ययोगेन नित्येन साक्षिणा तदाधानासम्भवात् ।
शृणु यद्वृत्त्यवच्छिन्नसाक्षिणा यत् प्रकाश्यते ।
तत्संस्कारे हि सा धत्ते न त्वाकारव्यवस्थया ॥ १०२ ॥
सुनो, जिस वृत्तिसे अवच्छिन्न साक्षीसे जिस वस्तुका प्रकाश होता है, वह वृत्ति उस विषयके संस्कारको पैदा करती है, आकारव्यवस्थासे संस्कारको पैदा नहीं करती है। अर्थात् जिसके आकारमें परिणत जो वृत्ति हो, वह उसका संस्कार उत्पन्न करे, ऐसा नियम नहीं है ॥ १०२ ॥
अन्ये तु विषयाकारवृत्तिस्थानित्यसाक्षिणा ।
त्रिपुटी भासिनाऽऽधानात् संस्कारस्य स्मृतिं जगुः ॥ १०३ ॥
इतर लोग कहते हैं कि विषयाकार वृत्तिमें प्रतिफलित त्रिपुटीको प्रकाशित करनेवाले अनित्य साक्षीसे ही संस्कारके आधानसे स्मृति उत्पन्न होती है ॥ १०३ ॥
यदि अहंकार आदिके अवभासमें अन्तःकरणकी अहङ्काराद्याकार वृत्ति न मानी जाय, तो अहङ्कार आदिका स्मरण कैसे होगा ? क्योंकि ज्ञानकी सूक्ष्म अवस्थारूप संस्कारके ज्ञानके अस्तित्वमें सम्भव न होनेसे नित्य साक्षीसे संस्कारकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है। [तात्पर्यार्थ यह है कि वस्तुका अनुभव होनेसे उस अनुभवसे संस्कार उत्पन्न होते हैं, और उसी संस्कारसे कालान्तरमें उस वस्तुका स्मरण होता है। सिद्धान्तमें अनुभवके विनाशको अर्थात् अनुभवकी सूक्ष्मावस्थाको ही संस्कार माना है, इसलिए साक्षीकी जब तक अवस्थिति रहेगी तब तक उसका विनाश—सूक्ष्मावस्था—नहीं हो सकती है, और साक्षी तो स्वयं नित्य है, अतः उसकी किसी समयमें भी सूक्ष्मावस्था या विनाश होनेवाला ही नहीं, अतः संस्कारका अभाव होनेसे अहङ्कार आदिके स्मरणका सम्भव नहीं है। आवरणाभिभवके लिए अहङ्कार आदि गोचर अन्तःकरणकी वृत्ति भले ही न हो। परन्तु स्मरणकी उपपत्तिके लिए तो अवश्य अन्तःकरणकी वृत्ति माननी ही चाहिए]।
अहङ्कार आदिके अनुसन्धानका विचार] भाषानुवादसहित २०७
अत्र केचिदाहुः—स्वसंसृष्टेन साक्षिणा सदा भास्यमानोऽहङ्कारस्तत्तद्-
घटादिविषयवृत्त्याकारपरिणतस्वावच्छिन्नेनापि साक्षिणा भास्यते इति
तस्याऽनित्यत्वात् सम्भवति संस्काराधानं घटादौ विषये इव । नहि
स्वाकारवृत्त्यवच्छिन्नसाक्षिणैव स्वगोचरसंस्काराधानमिति नियमोऽस्ति ।
तथा सति वृत्तिगोचरसंस्कारासम्भवेन वृत्तेरस्मरणप्रसङ्गात् । अनवस्था-
इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि अहङ्कारके साथ सम्बद्ध साक्षीसे सर्वदा भासमान अहङ्कार तत्-तत् घट आदि विषयक वृत्तिके आकारसे परिणत अहङ्कारावच्छिन्न साक्षीसे भी भासमान होता है, अतः घटादिविषयक वृत्तिसे अवच्छिन्न साक्षी चैतन्यके अनित्य होनेके कारण घटादि विषयमें संस्काराधानके समान अहङ्कारमें भी संस्कारका आधान होता है । [तात्पर्यार्थ यह है कि अहङ्कार आदिकी स्मरणोपपत्तिका लिए अहङ्कार आदि विषयक अन्तःकरणवृत्ति माननेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसके बिना भी संस्कारकी उत्पत्ति द्वारा अहङ्कारादिका अनुसन्धान हो सकता है, कारण कि जैसे अहङ्कार साक्षीसे भासता है, वैसे ही घट, पट आदि विषयाकार वृत्ति प्रतिबिम्बित साक्षीसे भी भासता है, अतः वृत्त्यवच्छिन्न साक्षीरूप चैतन्यके वृत्तिप्रयुक्त अनित्य होनेसे उसकी सूक्ष्मावस्था हो सकती है, इसलिए सूक्ष्मावस्थारूप संस्कार द्वारा अहङ्कार आदिके स्मरण होनेमें कोई बाधक नहीं है, क्योंकि अनित्य होनेसे घटादिविषयक वृत्त्यवच्छिन्न साक्षीरूप चैतन्य जैसे घटादि विषयोंमें संस्कारोंका आधान करता है, वैसे ही उसी वृत्त्यवच्छिन्न साक्षी रूप चैतन्यसे अहङ्कार आदिमें भी संस्काराधान कर सकता है] । कारण कि यह नियम नहीं है—स्वाकारवृत्त्यवच्छिन्न साक्षीसे ही स्वविषयक संस्कारका आधान हो, क्योंकि ऐसा माननेसे वृत्तिगोचर संस्कारके असम्भव होनेसे वृत्तिका स्मरण भी* नहीं होगा,
* तात्पर्य यह है कि दृष्टके अनुसार ही किसी वस्तुकी कल्पना होती है, दृष्ट विरुद्ध नहीं होती, अतः अहङ्कारसे भिन्न घट आदि स्थलोंमें घटाकार वृत्तिसे युक्त चैतन्यसे ही घटका संस्कार उत्पन्न होता है, यह देखा जाता है । इसलिए यही नियम लब्ध होता है कि स्वगोचरवृत्तिसे ही स्वगोचर संस्कारोंका आधान होता है, स्वशब्द प्रकृतमें घटादिपरक है । इस परिस्थितिमें कैसे मान सकते हैं कि अहङ्कारमें अन्य वृत्तिसे संस्कार उत्पन्न होते हैं ? इस शङ्काके समाधानमें कहते हैं कि यद्यपि दृष्टानुसारी ही कल्पना होती है, तथापि इस नियममें कोई प्रमाण नहीं है, जिससे कि वह नियम माना जाय । यदि नियम मानो, तो वृत्तिकी स्मृतिके
| २०८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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पत्त्या वृत्तिगोचरवृत्त्यन्तरस्यानुव्यवसायनिरसनेन निरस्तत्वात् । किन्तु यद्वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्येन यत् प्रकाशते, तद्वृत्त्या तद्गोचरसंस्काराधानमित्येव नियमः । एवं च ज्ञानसुखादयोऽप्यन्तःकरणवृत्तयः तन्मायः-
कारण कि अनवस्थाके भयसे वृत्तिगोचर अन्य वृत्तिका अनुव्यवसायके निराससे निरास किया गया है, किन्तु जिस वृत्तिसे युक्त चैतन्यसे जिसका प्रकाश होता हो, उस वृत्तिसे उस वस्तुके संस्कारोंका आधान होता है, ऐसा ही नियम है † । इससे तपे हुए लोहेके पिण्डसे निकलते हुए विस्फुलिङ्गका—जैसे
लिए अन्य वृत्ति माननी पड़ेगी, इस अवस्थामें अनवस्थासे अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगेगा, क्योंकि जैसे प्रथम वृत्तिके स्मरण आदिके लिए द्वितीय वृत्ति मानेंगे, वैसे ही द्वितीय वृत्तिके स्मरणके लिए तृतीय वृत्ति और तृतीय वृत्तिके स्मरणके लिए चतुर्थ वृत्ति, इस क्रमसे अनवस्था प्रसक्त होगी। अनवस्थाशब्दका अर्थ है अप्रामाणिक-अनन्तपदार्थकल्पनाप्रयुक्तअनिष्ट प्रसङ्ग अथवा क्लृप्त वस्तुसे सजातीय वस्तुओंकी परम्पराकी कल्पनाके विरामका अभाव, इसलिए वृत्तिगोचर अन्य वृत्ति नहीं मान सकते हैं, अतः प्रकृतमें उक्त शङ्काका स्थान है नहीं ।
† इस नियमका भाव यह है—यह बात पूर्वमें ही कही जा चुकी है कि अप्रयोजक होनेसे स्वाकार वृत्तिसे युक्त साक्षीसे ही स्वगोचर संस्कारोंका आधान होता है, यह नियम नहीं है, किन्तु जिस वस्तुके आकारमें परिणत वृत्तिमें प्रतिफलित चैतन्यमें जितनी वस्तुओंका आभास होता हो, उस वस्तुके आकारमें परिणत वृत्तिसे प्रकाशित सम्पूर्ण वस्तुओंमें संस्कारोंका आधान होता है। घटाकार वृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यमें पटका प्रकाश नहीं होता है, अतः उस वृत्तिसे पटके संस्कारका आधान नहीं होता है, इसलिए पूर्वोक्त अतिसंकुचित नियम माननेकी आवश्यकता नहीं है। घटायाकार वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यमें अहङ्कारका भी प्रकाश होता है, इस विषयका निरूपण मूलमें ही 'स्वसंसृष्ट' इत्यादि ग्रन्थसे किया गया है, अतः अहङ्कारगोचर संस्कारका आधान होगा। प्रकृतमें और एक शङ्का होती है कि यद्यपि अहङ्कार आदिका उक्त वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे प्रकाश होनेसे तद्गोचर संस्कारका आधान हो सकता है, तथापि उक्त चैतन्यसे वृत्तिका तथा सुख और दुःख आदिका प्रकाशन नहीं होनेसे उससे वृत्ति आदिमें संस्कारका आधान कैसे होगा ? इस शङ्काके समाधानार्थ यदि वृत्ति आदि गोचर वृत्ति मानी जायगी, तो अनवस्था प्रसक्त होगी ? और यदि वृत्ति आदिकी वृत्तियोंको क्रियारूप न मानकर ज्ञानरूप स्वीकार करके अनवस्थाका परिहार किया जाय, तो भी युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानरूप वृत्तिका उत्पादक ही कोई नहीं है—मन ज्ञानका करण नहीं है, इसका आगे विचार किया जायगा, क्रियारूप मानेंगे, तो अनवस्थापिशाचिनी अवश्य उतरेगी, इससे वृत्ति आदिके संस्कारोंकी अनुपपत्तिका प्रसङ्ग कैसे हटेगा ? इसपर 'एवं च' इत्यादि ग्रन्थसे परिहार करते हैं। भाव यह है कि अन्तःकरणमें जिन-जिन वृत्तियोंका उद्भव होता है, वे चाहे ज्ञानरूप हों या ज्ञानरूप न हो, परन्तु वे सबकी-सब स्वसे ( अहङ्कार या ज्ञान ) और स्व