सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 232, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| २०२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह . | [ प्रथम परिच्छेद |
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दये निखिलापकर्षाध्यासनिवृत्तेरारोपितसातिशयत्वापायात् कृतकृत्यतेति विशेषोपपत्तेः निरूपाधिकप्रेमगोचरतया प्रकाशमानस्साक्ष्यानन्दोऽनावृत एवेति ।
सुखांशोऽस्यावृतो नास्ति न भातीत्यनुभूतितः ।
चिदंशोनावृतो वृत्त्या सौख्यव्यक्तिरितीतरे ॥१००॥
साक्षीका सुखांश आवृत रहता है, क्योंकि 'हमें आनन्द नहीं है, आनन्द नहीं भासता है' ऐसा अनुभव होता है । और साक्षीका चिदंश तो अनावृत है । सुखकी अभिव्यक्ति—प्रकाश—अन्तःकरणकी वृत्तिसे होती है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १०० ॥
अन्ये तु—प्रकाशमानोऽप्यानन्दो 'मयि नास्ति, न प्रकाशते' इत्या-
सातिशयता होनेके कारण तृप्ति नहीं होती है । विद्याका आविर्भाव होनेके पीछे, तो सम्पूर्ण अपकर्षाध्यासकी निवृत्ति होनेसे आरोपित सातिशयत्वका निरास होनेसे कृतकृत्यता † होती है, इस प्रकार संसार और मुक्तिमें विशेष हो सकता है, अतः निरुपाधिक प्रेमकी विषयता होनेसे प्रकाशमान साक्षीरूप आनन्द अनावृत ही है ।
✱ कुछ लोग यह कहते हैं कि यद्यपि आनन्द प्रकाशमान है, तथापि
† ज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्ति होनेसे मूलाज्ञानके कार्यकी भी अवश्य निवृत्ति होगी, इससे तत्कृत अपकर्ष आदि अध्यासकी निवृत्ति हो जानेसे मुक्तिदशामें कृतकृत्यता है । कृतकृत्यता-शब्दका अर्थ है—कृत्यम्—कर्त्तव्यजातम्, कृतम्—सम्पादितं येन, इस प्रकारकी व्युत्पत्तिसे—जिसने अपना वास्तविक कर्तव्य सम्पादन कर लिया है, ऐसा पुरुष । तात्पर्य यह है कि पुरुषको जब तक ज्ञान नहीं हुआ है, तब तक दुःखकी निवृत्ति या सुखकी प्राप्तिके लिए अनेक प्रकारके यत्न करने पड़ते हैं और विद्याके उदित होनेपर तो सम्पूर्ण दुःखोंके विनष्ट होनेसे उत्कृष्ट धवल रूपका जैसे निर्मल दर्पणमें आविर्भाव होता है, वैसे ही—निरतिशय ब्रह्मस्वरूप आनन्दका आविर्भाव होता है, अतः दुःखकी निवृत्ति या सुखकी प्राप्तिके लिए कोई यत्नकी आवश्यकता नहीं रहती है । इसीलिए भगवान् पूर्णावतार श्रीकृष्णचन्द्रने गीतामें कहा है कि—
'एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ।'
अर्थात् हे अर्जुन ! निरतिशय ब्रह्मस्वरूप आनन्दको अपरोक्षरूपसे जानकर बुद्धिमान् (पण्डित) और कृतकृत्य हो जाता है, यह इसका भाव है ।
✱ इन लोगोंके मतमें पूर्वमतसे यह भेद है—साक्षीरूप चैतन्यको अनावृत माननेपर तदभिन्न आनन्द भी प्रकाशित होगा, अतः संसार और मुक्तिमें कोई विशेष नहीं होगा, इस आक्षेपके समाधानमें अद्वैतविद्याचार्यने कहा है कि साक्षीरूप आनन्दको अनावृत मानें, तो.