भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 233

साक्षीरूप आनन्दका अनावृतत्व-विचार] भाषानुवादसहित २०३

वरणानुभवात् आवृत एव। एकस्मिन्नपि साक्षिण्यविद्याकल्पितरूपभेद- सम्भवेन चैतन्यरूपेणाऽनावरणस्याऽऽनन्दरूपेणाऽऽवरणस्य चाऽविरोधात्। स्वरूपप्रकाशस्याऽऽवरणनिवर्तकतया प्रकाशमाने आवरणस्याऽविरोधाच्च। 'त्वदु-

'मयि नास्ति, न प्रकाशते' (मेरेमें वेदान्तप्रतिपाद्य ब्रह्मस्वरूप आनन्द नहीं है, हमें उस आनन्दका प्रकाश नहीं होता है) इस प्रकारसे आवरणका अनुभव होनेसे आवृत ही है। यद्यपि साक्षी एक है, तो भी अविद्यासे कल्पित रूपभेदके होनेसे चैतन्यरूपसे अनावरण और आनन्दरूपसे आवरणके होनेमें कोई विरोध नहीं है। और [आगन्तुक वृत्तिरूप प्रकाशके ही आवरणका विरोधी होनेसे] स्वरूपप्रकाश आवरणका निवर्तक नहीं है, अतः स्वरूपके प्रकाश- मान होनेपर भी आवरणका विरोध† नहीं है। 'त्वदुक्तमर्थं न जानामि'


भी संसार और मुक्तिमें विशेषता हो सकती है, इस मतमें साक्षीरूप आनन्दको आवृत मानकर पूर्वोक्त आक्षेपका परिहार करके संसार और मोक्षमें भिन्नताका प्रतिपादन किया गया है, साक्षीरूप आनन्दको आवृत माननेसे ही यह प्रतीति उपपन्न होती है—'वेदान्तप्रतिपाद्य स्वरूपानन्द मुझमें नहीं है और प्रकाशित नहीं होता है', यदि उसे आवृत न मानें, तो व्यवहारमें अतिप्रसिद्ध इस प्रतीतिका लोप प्राप्त होगा, इसलिए आनन्दके प्रकाशमान होनेपर भी संसारदशामें उसे आवृत मानना और मुक्तिमें आवरणके विध्वस्त होनेसे उस-परिपूर्णानन्दका स्फुरण मानना चाहिए। इसमें यह शङ्का अवश्य होती है कि यदि उसे आवृत मानें तो अनौपाधिक प्रेमविषयत्व आत्मामें सदा नहीं होगा, क्योंकि वृत्ति द्वारा हुआ आनन्दका स्फुरण कादाचित्क हुआ करता है, परन्तु यह शङ्का अयुक्त है, क्योंकि आवृत्त और प्रकाशमान आनन्दमें फलबलसे निरुपाधिक प्रेमविषयत्वकी कल्पना करते हैं। इसीसे 'भासते एव परमप्रेमास्पदत्वलक्षणं सुखम्' (परम प्रेमास्पदत्वरूप सुख भासता है) इस विवरणके वचनका भी इसीमें तात्पर्य है। इसी अभिप्रायसे 'प्रकाशमान' यह आनन्दका विशेषण दिया गया है, अन्यथा प्रकाशमान आनन्दको आवृत मानना अतिविरुद्ध होगा यह भाव है।

† तात्पर्य यह है कि जैसे वस्तुस्थितिमें एक ही चैतन्यमें जीवत्व और ईश्वरत्व रूप दो धर्म माने जाते हैं, क्योंकि 'मैं ईश्वर नहीं हूँ, किन्तु संसारी हूँ' और 'मैं साक्षात् परमात्मा हूँ संसारी नहीं हूँ' ऐसा अवस्थाभेदसे व्यवहार होता है, वैसे ही 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि ज्ञान आनन्द नहीं है, इस रूपसे अहङ्कारके अवभासके ज्ञानका आनन्दसे भेद-व्यवहार होता है, इसलिए चित्त्व और आनन्दत्व दो स्वरूप चैतन्यमें मानने ही चाहिएँ। इसी प्रकार जैसे एक ही चैतन्यमें जीवत्वावच्छेदेन अज्ञान और ईश्वरत्वावच्छेदेन अज्ञानके अभावकी कल्पना की जाती है, वैसे ही अहंकारके अवगाहक चित्में आनन्दावच्छेदेन आवृतत्व और चित्त्वावच्छेदेन अनावृतत्वकी कल्पना फलके अनुसार करनी चाहिए।