भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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२६४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


क्तमर्थं न जानामि' इति प्रकाशमाने एवाऽऽवरणदर्शनाच्च । न च तत्राऽनावृत-सामान्याकारावच्छेदेन विशेषावरणमेवाऽनुभूयते इति वाच्यम्, अन्यावरणस्याऽन्यावच्छेदेन भानेऽतिप्रसङ्गात् । न च सामान्यविशेषभावो नियामक इति नाऽतिप्रसङ्ग इति वाच्यम्, व्याप्यव्यापकभावातिरिक्तसामान्यविशेषभावाभावेन 'वह्निं न जानामि' इति धूमावरकाज्ञानानुभवप्रसङ्गात् । तस्माद्यदवच्छिन्नमज्ञानं प्रकाशते, तदेवाऽऽवृतमिति प्रकाशमानेऽप्यज्ञानं

( तुमसे कथित अर्थको मैं नहीं जानता हूँ ) इत्यादि स्थलमें सामान्यरूपसे आत्माके प्रकाश होनेपर भी आवरण देखा जाता है । इस विषयमें शङ्का होती है कि * 'त्वदुक्तमर्थं०' इत्यादि स्थलमें आवरणरहित जो सामान्य आकार है, तदवच्छेदेन विशेषके आवरणका अनुभव होता है, प्रकाशमान सामान्यमें सामान्यका आवरण अनुभूत नहीं होता है, परन्तु यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अन्यके आवरणका अन्यावच्छेदेन भान नहीं होता है । इसपर यदि यह शङ्का की जाय कि सामान्यविशेषभाव नियामक है, अतः दोष नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस विषयमें यह प्रष्टव्य होता है कि सामान्य-विशेषभाव, क्या व्याप्य-व्यापकभावरूप है, या उससे अतिरिक्त है । द्वितीय पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि व्याप्यव्यापकभावसे अतिरिक्त सामान्यविशेषभावका निरूपण ही नहीं कर सकते हैं, यदि व्याप्यव्यापकभावरूप ही सामान्यविशेष भाव माना जाय, तो 'वह्निको मैं नहीं जानता हूँ' इस प्रकार वह्निके आवारक अज्ञानके अनुभवस्थलमें धूमके आवारक अज्ञानका भी अनुभव प्राप्त होगा । इससे यदवच्छिन्न ( जिस वस्तुसे विशेषित ) अज्ञान प्रकाशित होता हो, वही वस्तु आवृत होती है, ऐसा मानना चाहिए, अतः वस्तुके प्रकाशमान होनेपर भी


* गुरुने किसी एक शिष्यको उपदेश दिया—'आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र परमात्मा ही वेदान्तोंसे ज्ञातव्य है और वह परमात्मा दुर्जनोंसे नहीं जाना जाता है ।' परन्तु इसपर भी मन्द शिष्यको अज्ञान रहता है कि आपने जिस परमात्माके विषयमें उपदेश दिया है, उसे मैं नहीं जानता । शिष्यका तात्पर्य यह है कि महाराज ! आप्त वाक्य होनेसे आपके वाक्यका सामान्यतः कुछ अर्थ तो है, किन्तु वह विशेष रूपसे प्रतीत नहीं होता है, इससे उक्त वाक्यसे वाक्यार्थत्वरूपसे सामान्य आकारके ज्ञात होनेपर भी वही सामान्य आकार विशेष वस्तुके आवारक अज्ञानके विषयरूपसे प्रकाशित होता है । इसलिए 'त्वदुक्तमर्थं न जानामि' इत्यादिमें, जो आवरणका विषय है, वह प्रकाशमान नहीं है और जो प्रकाशमान है, वह आवरणका विषय नहीं है, अतः उक्त अनुभव प्रकाशमान वस्तुके आवृतत्वमें प्रमाण नहीं है, यह शङ्का करनेवालेका भाव है ।


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