भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 235

साक्षीरूप आनन्दका अनावृतत्व-विचार] भाषानुवादसहित २०५


युज्यते । अज्ञानं च यथा साक्ष्यंशं विहाय चैतन्यमावृणोति, एवमा- नन्दमपि तत्तत्सुखरूपवृत्तिकवलीकृतं विहायैवाऽऽवृणोति । स एव वैषयिका- नन्दस्याऽऽवरणाभिभवः। स चाऽऽवरणाभिभवः प्रत्यूषसमये बाह्याऽऽवरणा ऽभिभववत् कारणविशेषप्रयुक्तवृत्तिविशेषवशात्तरतमभावेन भवति । अतः स्वरूपानन्दविषयानन्दयोः विषयानन्दानां च परस्परभेदसिद्धिरिति वदन्ति । सर्वथाऽपि साक्षिचैतन्यस्याऽनावृतत्वेनाऽऽवरणाभिभवार्थं वृत्तिमपेक्ष्यैव तेनाऽहङ्कारादिप्रकाशनमिति तुल्यमेव ॥१६॥

अहङ्कारादिनः साक्षिभास्यस्य स्मरणं कथम् । सूक्ष्मावस्था हि संस्कारो वृत्तीनां स्यान्न साक्षिणः ॥१०१॥

साक्षीसे प्रकाशित होनेवाले अहंकार आदिका स्मरण कैसे होगा ? सूक्ष्मावस्थारूप संस्कार वृत्तियोंका हो सकता है, साक्षीरूप नित्य चैतन्यका नहीं हो सकता है [ और संस्कारके बिना स्मरण नहीं होता है ] ॥१०१॥

तद्विषयक अज्ञान रहता है, यह युक्त है। जैसे अज्ञान साक्षी अंशका त्यागकर अन्य चैतन्यका आवरण करता है, वैसे ही तत्-तत् सुखरूप वृत्तिके विषयी- भूत आनन्दका परित्यागकर अन्य आनन्दको ही आवृत करता है। यही अर्थात् सुखवृत्तिविषयत्वनिबन्धन अनावरकत्वस्वभाव ही—विषयप्रयुक्त आनन्दका ( वृत्तिकृत ) आवरणाभिभव है। जैसे उषाकालमें सूर्यके प्रकाशके तारतम्यसे बाह्य अन्धकारका अभिभव होता है, वैसे ही वृत्तिकृत वह आवरणा- भिभव भी विषयविशेषरूप कारणविशेषसे जन्य वृत्तिविशेषके आधारपर ही उत्कर्ष और अपकर्षरूप तारतम्यसे युक्त होता है। इसीसे * स्वरूपानन्द, विषयानन्दका एवं अनेक विषयानन्दोंका परस्पर भेद सिद्ध होता है, ऐसा कहा जाता है। साक्षीरूप चैतन्यके किसी अंशसे आवृत न होनेके कारण आवरणाभिभवके लिए वृत्तिकी अपेक्षा न करके ही उस साक्षीसे अहंकार आदिका प्रकाश होता है, यह तो दोनोंके † मतमें समान है ॥ १६ ॥


* दृष्टीसे अर्थात् वस्तुतः आनन्दके एक होनेपर भी उपाधियुक्त आनन्दका भेद माननेसे ही स्वरूपानन्द आदिका भेद होता है। तात्पर्य यह है कि विद्यासे आवरणकी निवृत्ति होनेसे प्रकाशमान आनन्द स्वरूपानन्द है, और अविद्याकी अनिवृत्तिदशामें वृत्तिके सम्बन्धसे प्रकाशमान आनन्द विषयानन्द कहा जाता है, इसी प्रकार वृत्तियोंके अनेक होनेसे विषयानन्द भी अनेक होते हैं, अतः विषयानन्दोंका भी परस्पर भेद है, यह जानना चाहिए ।
† स्वरूपानन्दके आवृतत्व पक्षमें अथवा अनावृतत्व पक्षमें, यह अर्थ है।

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