सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 225, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाक्षीरूप आनन्दका अनावृतत्व-विचारं ] भाषानुवादसहितं १५५
धिकप्रेम्णो दर्शनात् । 'भासत एव परमप्रेमास्पदत्वलक्षणं सुखम्' इति विवरणाच्च ॥ १५ ॥
स्यादेतत्—इदानीमप्यानन्दप्रकाशे मुक्तसंसारयोरविशेषप्रसङ्गः ।
ननु कल्पितभेदस्य साक्ष्यानन्दस्य प्रकाशेऽपि अनवच्छिन्नस्य ब्रह्मानन्दस्याऽऽवृतस्य संसारदशायामप्रकाशेन विशेषोऽस्तीति चेत्, न; आन-
आपत्ति इष्ट ही है अर्थात् उस साक्षीके स्वरूपभूत आनन्दका प्रकाश होता ही है, क्योंकि आनन्दरूपके * प्रकाश होनेसे ही आत्मामें निरुपाधिक प्रेम देखा जाता है । इस प्रकृत अर्थमें विवरणकारने कहा भी है † कि जिस सुखका लक्षण परम प्रेम-विषयत्व है, वह सुख भासता ही है [ कारण कि वह सुख ( आनन्द ) साक्षिचैतन्यसे अभिन्न है, अतः स्वरूपानन्दके प्रकाशमें कोई हानि नहीं है, ] ॥ १५ ॥
यह शङ्का होती है कि यदि संसारदशामें भी आत्मस्वरूप आनन्दका प्रकाश होता है, तो मुक्ति और संसारमें कोई विशेष नहीं होगा ? [ इससे साक्षिस्वरूप आनन्दका संसारदशामें प्रकाश मानना अयुक्त है, यह पूर्वपक्षीका भाव है ] ।
परन्तु इस शङ्काका अवसर नहीं है, क्योंकि साक्षिस्वरूप आनन्दका, जिसका कि बिम्बभूत आनन्दसे भेद कल्पित है, प्रकाश होनेपर भी संसारदशामें आवृत होनेके कारण अनवच्छिन्न ब्रह्मानन्दका प्रकाश न होनेसे मुक्ति और संसार दशामें विशेष हो सकता है, तो यह भी समाधान युक्त नहीं है,
* तात्पर्य यह है कि लोकमें जिन जिन पुरुषोंको आनन्दका अनुभव होता है, उन उन पुरुषोंके अनुभवके विषय आनन्दमें प्रीति अनुभवसिद्ध है । इसलिए प्रकाशमान आनन्द प्रीतिका विषय है, यह सिद्ध होता है, अतः दुःखदशामें भी प्राणिमात्रको अपने-अपने आत्मामें प्रीतिके देखनेसे आत्मविषयक प्रीति भी प्रकाशमान आनन्दविषयक है, यह सिद्ध होता है, पुत्रादिविषयक जो प्रीति है, वह तो औपाधिक है, क्योंकि वहांपर पुत्रादिमें जो सुखसाधनता-रूप उपाधि है, तत्-प्रयुक्त ही आत्मसुखकी अभिव्यक्ति देखी जाती है और उसके अभावमें अनात्म पुत्र आदिमें प्रीति नहीं देखी जाती है । इसीलिए यह श्रुति है—'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति' ( आत्माके स्वार्थसे ही सभी प्रिय होते हैं ) अतः आत्माका आनन्द प्रकाशित होता है, यह अवश्य मानना चाहिए, यदि न माना जाय, तो श्रुतिसिद्ध निरुपाधिक प्रीति आत्मामें नहीं होगी, क्योंकि प्रीति प्रकाशमान आनन्दविषयक ही होती है । अतः साक्ष्यानन्दके प्रकाशमें इष्टापत्ति युक्त ही है ।