सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद
न्देऽनवच्छेदांशस्याऽपुरुषार्थत्वादानन्दापरोक्षमात्रस्य चेदानीमपि सत्त्वात् । नन्ववच्छिन्नः साक्ष्यानन्दः सातिशयः, सुषुप्तिसाधारणादनतिस्पष्टात् ततो वैषयिकानन्देष्वतिशयानुभवात् । अनवच्छिन्नो ब्रह्मानन्दस्तु निरतिशयः ।
क्योंकि आनन्दमें अनवच्छेद अंश पुरुषार्थ नहीं है और केवल आनन्दका संसार दशामें भी अपरोक्ष प्रकाश होता है। [शङ्का तथा समाधानका तात्पर्य यह है कि साक्षीरूप आनन्दका अर्थ है—अविद्यामें आनन्दका प्रतिबिम्ब, इस प्रतिबिम्बभूत आनन्दका बिम्बभूत आनन्दसे अवश्य कल्पित भेद है, अन्यथा बिम्बप्रतिबिम्ब- भावकी उपपत्ति ही नहीं हो सकेगी । इसलिए संसारदशामें अनावृत साक्षि- स्वरूप प्रतिबिम्बानन्दका प्रकाश होनेपर भी बिम्बभूत ब्रह्मानन्दका प्रकाश नहीं होता है। और दूसरी बात यह भी है कि प्रतिशरीर साक्षीरूप आनन्द भिन्न-भिन्न है और अनवच्छिन्न आनन्द प्रतिशरीरमें भिन्न नहीं है, अतः संसारदशा और मुक्ति- दशामें अवश्य भेद है । इससे मुक्ति और संसारदशामें अविशेषप्रसक्तिरूप दोष नहीं है । इसपर उत्तर दाताका वक्तव्य यह है कि संसारदशासे मोक्षमें जो विशेष है, क्या वह अनवच्छिन्न आनन्दके स्फुरणसे है या केवल आनन्द ही के स्फुरणसे है ? प्रथमकल्प युक्त नहीं है, क्योंकि अनवच्छिन्न शब्दका अर्थ है—भेदाभाव, इसको यदि आनन्दसे भिन्न माने, तो वह पुरुषार्थ नहीं होगा, अतः अपुरुषार्थवस्तुनिबन्धन विशेष अर्थात् अनवच्छेदप्रयुक्त वैशिष्ट्य मुक्तिमें अप्रयोजक है, यदि अवच्छेदाभावको आनन्दरूप माना* जाय, तो द्वितीय कल्प ही पर्यवसन्न होगा अर्थात् आनन्दका स्फुरणमात्र ही मोक्षमें विशेष है, परन्तु यह भी अयुक्त है, क्योंकि संसारदशामें भी आनन्दका स्फुरणमात्र तो है ही, अतः संसार और मुक्तिमें अविशेषप्रसङ्गका भङ्ग कोई भी नहीं कर सकता है ]। प्रकारान्तरसे आशङ्का होती है कि संसारदशामें प्रति- शरीरमें एकरूपसे प्रकाशित न होनेवाला साक्षीरूप आनन्द उत्कर्ष और अपकर्ष- रूप अतिशयसे युक्त होता है, क्योंकि सुषुप्तिसाधारण आनन्दसे, जो अति- स्पष्टतासे रहित है, स्रक्, चन्दन आदि विषयजन्य आनन्दोंमें अतिस्पष्टता भासती है । और मुक्तिकालीन ब्रह्मानन्द एकरूपसे प्रकाशमान एवम् उत्कर्ष
* कल्पित अभाव अधिष्ठानरूप होता है, इसलिए आनन्दरूप अधिष्ठानमें रहनेवाला भेदाभाव आनन्दरूप ही होगा, तदतिरिक्त नहीं होगा यह भाव है ।