सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 227, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंसाक्षीरूप आनन्दका अनावृतत्व-विचार] भाषानुवादसहित १९७
आनन्दवल्ल्यां मानुषानन्दाद्युत्तरोत्तरशतगुणोत्कर्षवर्णनस्य ब्रह्मानन्दे समापनादिति चेत्, न; सिद्धान्ते साक्ष्यानन्दविषयानन्दब्रह्मानन्दानां वस्तुत एकत्वेनोत्कर्षापकर्षासम्भवात् । मानुषानन्दादीनामुत्तरोत्तरमुत्कर्ष
और अपकर्षसे रहित है । [ तात्पर्यार्थ यह है कि सुषुप्तिकालमें प्रकाशमान साक्षीरूप आनन्द अवश्य स्पष्ट है, इसीलिए तो जाग्रद् अवस्थामें 'मैं सुखपूर्वक सोया' यह स्मरण होता है, लोकमें स्पष्टरूपसे जिस आनन्दका अनुभव किया जाता है, उसीका पुनः स्मरण होता है, स्पष्टतया अननुभूत आनन्दका स्मरण नहीं होता है, परन्तु सौषुप्त आनन्दकी अपेक्षासे कुसुममाला, चन्दन आदिसे प्रादुर्भूत आनन्द अधिक स्पष्ट होता है, इसलिए सांसारिक आनन्द सातिशय और प्रतिशरीर भिन्न-भिन्न हुआ करते हैं, मुक्तिकालमें ऐसी अवस्था नहीं है, क्योंकि उस आनन्दका कल्पित भेद या अतिशय नहीं भासता है, किन्तु उस कालमें एकरूप, शुद्ध और उत्कर्ष एवं अपकर्ष आदि धर्मोंसे शून्य ब्रह्मरूप आनन्द भासता है, अतः संसार और मुक्तिमें विशेष नहीं है, यह कहना अनुचित है ] ।
क्योंकि * आनन्दवल्लीमें मनुष्यके आनन्दसे लेकर उत्तरोत्तर आनन्दोंमें किया हुआ शतगुण उत्कर्षका वर्णन ब्रह्मानन्दमें ही समाप्त किया गया है, [ अतः सांसारिक आनन्द सातिशय है, और वह मुक्तिमें नहीं रहता है ], परन्तु यह भी शङ्का अनुपपन्न है, क्योंकि सिद्धान्तमें साक्षीरूप आनन्द, विषयानन्द और ब्रह्मानन्द वस्तुतः अभिन्न ही हैं, अतः उत्कर्ष और अपकर्ष आनन्दमें हो ही नहीं सकता । यदि इसमें शङ्का हो कि मनुष्य आदिके
* आनन्दवल्लीकी श्रुतिमें ऐसा वर्णन मिलता है—एक सार्वभौम राजाके आनन्दसे सौगुना मनुष्यगन्धर्वको आनन्द होता है, और एक श्रोत्रिय कामरहित (ब्राह्मण) को भी होता है, और इनके आनन्दसे सौगुना आनन्द एक देवगन्धर्वको होता है, इस प्रकार क्रमशः वर्णन करते करते आखिर अन्तमें सम्पूर्ण आनन्दोंकी परिसमाप्ति बतलाई गई है, अर्थात् ब्रह्मानन्दसे बढ़ कर और कोई आनन्द नहीं है, अन्य सब आनन्द उस ब्रह्मानन्दसे निकृष्ट-निकृष्टतर ही हैं, ऐसा कहा गया है । इस विषयको अधिक जाननेके लिए निम्नलिखित मन्त्र देखिये ।
सैषानन्दस्य मीमांसा भवति । युवा स्यात् साधु युवाध्यापकः । आशिष्ठो द्रढिष्ठो बलिष्ठः । तस्येयं पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् । स एको मानुष आनन्दः । ते ये शतं मानुषा आनन्दाः । स एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं मनुष्यगन्धर्वाणा-मानन्दाः । स एको देवगन्धर्वाणामानन्दः । श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं देवगन्ध-र्वाणामानन्दाः । इत्यादि [ तैत्तिरीयोपनिषद् ब्रह्मानन्दवल्ली अनुवा० ८ ] ।