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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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१९४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अविद्यावृत्तितद्धर्माभासकांशेतरावृतिः ।
कल्प्यते वस्तुतस्तेषु संशयादेरदर्शनात् ॥ ९७ ॥

वस्तुतः अविद्या, अन्तःकरण और अन्तःकरणके धर्मोंके अवभासक साक्षिरूप चैतन्यको छोड़कर अन्य चैतन्यको अविद्या आवृत करती है, इस प्रकार—अविद्या आदिमें संशय आदिके न देखनेसे—कल्पना की जाती है ॥९७॥

वस्तुतोऽविद्याऽन्तःकरणतद्धर्मावभासकं साक्षिचैतन्यं विहायैवाऽज्ञानं चैतन्यमावृणोतीत्यनुभवानुसारेण कल्पनान्न कश्चिद्दोषः । अत एव सर्वदा तेषामनावृतप्रकाशसंसर्गात् अज्ञानविपरीतज्ञानसंशयागोचरत्वम् ।

स्याच्चेदनावृतः साक्षी भासेताऽस्य सुखात्मता ।
प्रेमास्पदत्वाद् भात्येव परिच्छेदात्तृप्तता ॥ ९८ ॥

यदि साक्षी चैतन्य आवृत नहीं है, तो सर्वदा तदभिन्न आनन्दका प्रकाश होना चाहिए ? ( कहते हैं ) होता ही है, क्योंकि आत्मा परम प्रेमका विषय है, उपाधिसे आनन्दके परिच्छिन्न होनेसे तृप्ति नहीं होती है ॥९८॥

साक्षिचैतन्यस्याऽनावृतत्वे तत्स्वरूपभूतस्याऽऽनन्दस्याऽपि प्रकाशापत्तिरिति चेत्, न; इष्टापत्तेः । आनन्दरूपप्रकाशप्रयुक्तस्याऽऽत्मनि निरूपा-


वस्तुस्थितिमें साक्षिचैतन्यको, जो अविद्या, अन्तःकरण और अन्तः-करणके धर्म सुख आदिका प्रकाशक है, छोड़ कर अन्य चैतन्यको ही अज्ञान आवृत करता है, ऐसी अनुभवके अनुसार कल्पना करनी चाहिए, इसलिए किसी दोषकी प्रसक्ति नहीं है । अतएव—साक्षी चैतन्यसे अतिरिक्त चैतन्यका ही अज्ञान आवरण करता है, इसीसे—वे अन्तःकरण और तद्धर्म आदि सदा अनावृत प्रकाशके साथ सम्बद्ध होनेके कारण अज्ञान, विपरीत ज्ञान और संशय आदिके विषय नहीं † होते हैं ।

यदि साक्षी चैतन्य सदा अनावृत है, तो उसके स्वरूपभूत आनन्दका भी साथ-साथ प्रकाश होना चाहिए ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यह .


† अविद्याके भावरूपत्वमें, अहङ्कारके अनात्मत्वमें, सुख, दुःख आदि वृत्तियोंके अनात्मधर्मत्वमें अज्ञान, विपरीतज्ञान आदिके होनेसे यह कैसे कह सकते हैं कि अविद्या आदि संशय आदिके गोचर नहीं है ? इस शङ्कापर यह उत्तर है कि अविद्या आदिके सत्त्वकालमें अविद्यादिसत्त्वप्रकारक अज्ञान, संशय आदि नहीं होते हैं, इसलिए पूर्वोक्त आशङ्का नहीं हो सकती है, यह भाव है !

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