सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 220, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें१९० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
अन्ये तु—सत्यं जीव एव साक्षी, न तु सर्वगतेनाऽविद्योपहितेन रूपेण । पुरुषान्तरान्तःकरणादीनामपि पुरुषान्तरं प्रति स्वान्तःकरणभासकसाक्षिसंसर्गाविशेषेण प्रत्यक्षत्वापत्तेः । न चाऽन्तःकरणभेदेन प्रमातृभेदात् तदनापत्तिः । साक्षिभास्येऽन्तःकरणादौ सर्वत्र साक्ष्यभेदे सति प्रमातृभेदस्याऽप्रयोजकत्वात् । तस्मादन्तःकरणोपधानेन जीवः साक्षी । तथा च प्रतिपुरुषं साक्षिभेदात् पुरुषान्तरान्तःकरणादेः पुरुषान्तरसाक्ष्यसंसर्गाद्वा तदयोग्य-
इतर लोग कहते हैं कि जीव ही साक्षी है, यह ठीक है परन्तु सर्वगत अविद्यासे उपहितरूपसे जीव साक्षी नहीं है। यदि अविद्योपहितरूपसे साक्षी माने, तो अन्य पुरुषको अन्य पुरुषोंके अन्तःकरण आदिका प्रत्यक्ष हो जायगा, क्योंकि उसके अन्तःकरणके अवभासक साक्षीके साथ * सामान्यरूपसे पुरुषान्तरके अन्तःकरणादिका संसर्ग है । परन्तु साक्षीके एक होनेपर भी अन्तःकरणप्रयुक्त प्रमाताओंके भिन्न-भिन्न होनेसे पूर्वोक्त आपत्ति नहीं आ सकती है ? नहीं, यह समाधान युक्त नहीं हो सकता, क्योंकि साक्षिभास्य सम्पूर्ण अन्तःकरण आदिमें साक्षीके एक होनेपर प्रमाताका भेद अकिञ्चित्कर † है । इससे अन्तःकरणोपहित चैतन्यरूपसे ही जीव साक्षी है । तब साक्षीके भेदमें प्रयोजकीभूत उपाधिका भेद होनेपर प्रतिपुरुष साक्षीका भेद सिद्ध होता है, इससे अन्य पुरुषोंके अन्तःकरण आदिका अन्य पुरुषके साक्षीके साथ सम्बन्ध न होनेसे
* तात्पर्य यह है कि देवदत्तके अन्तःकरणका अवभासक जो साक्षी है, उस साक्षीके साथ देवदत्तीय अन्तःकरणके समान यज्ञदत्तके अन्तःकरण आदिका भी सम्बन्ध होनेसे जैसे देवदत्तको अपने अन्तःकरणका भान होता है, वैसे ही यज्ञदत्तके अन्तःकरणका भी भान हो जायगा, इसी प्रकार यज्ञदत्तके अन्तःकरणकी वृत्तियोंका भी प्रत्यक्ष हो जायगा, इसलिए व्यापकीभूत अविद्यामें प्रतिबिम्बितचिद्रूप ईश्वरको साक्षी नहीं मानना चाहिए, किन्तु वक्ष्यमाण अन्तःकरणोपहित जीवको ही साक्षी मानना चाहिए ।
† तात्पर्य यह है कि देवदत्तके प्रति देवदत्तके अन्तःकरणके प्रत्यक्षमें देवदत्तके साक्षीका संसर्ग प्रयोजक है, इसलिए देवदत्तके साक्षीका संसर्ग अविशेषसे यज्ञदत्तके अन्तःकरणके साथ भी होनेसे यज्ञदत्तके अन्तःकरण आदिका प्रत्यक्ष देवदत्तको अवश्य प्रसक्त होगा, इसलिए इसका परिहार साक्षीके संसर्गभेदसे ही हो सकता है, अप्रयोजक प्रमाताके भेदसे नहीं, अतः प्रमाताके भेदसे यह व्यवस्था नहीं हो सकती है कि देवदत्तका अन्तःकरण देवदत्तके प्रति प्रत्यक्ष है, अन्य यज्ञदत्तका अन्तःकरण प्रत्यक्ष नहीं है । इसलिए भी अपरिच्छिन्न अविद्याबिम्बित चैतन्य साक्षी नहीं है ।