सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
अत एव शुक्त्यंशोऽधिष्ठानम् , इदमंश आधारः । सविलासाज्ञानविषयोऽधिष्ठानम् , अतद्रूपोऽपि तद्रूपेणाऽऽरोप्यबुद्धौ स्फुरन्नाधार इति संक्षेपशारीरकेऽपि विवेचनादिति ।
ऐसा—अज्ञान ही रजत आदि अध्यासके प्रति उपादान कहा गया है ।
* इसीसे शुक्त्यंश अर्थात् शुक्तित्वरूप विशेषधर्मसे पुरोवर्ती पदार्थावच्छिन्न चैतन्य अधिष्ठान है और इदमंश आधार है । क्योंकि अधिष्ठानका अर्थ है—रजत आदि विक्षेपसे युक्त अज्ञानका विषय, और आधारशब्दका अर्थ है—तद्रूप न होनेपर भी तद्रूपसे आरोप्यबुद्धिमें स्फुरनेवाला अर्थात् सचमुच अध्यस्त रजत आदिरूप न होकर रजत आदिरूपसे रजतादि बुद्धिमें भासने-
विषयतयाऽज्ञानस्याऽध्यासेनाऽन्वयव्यतिरेकावन्यथासिद्धौ, नैतत्सारम्, पुष्कलकारणे हि सति कार्योत्पादविरोधि प्रतिबन्धकम् , न चाऽध्यासपुष्कलकारणे सति तत्त्वज्ञानोदयः, तस्माच्चान्वयव्यतिरेकौ प्रतिबन्धकाभावविषयौ, तथापि विरोधिसंसर्गाभाव इति चेत्.....................मिथ्याज्ञानमेवाध्यासोपादानम् , नात्मान्तःकरणकाचादिदोषा इति सूक्तम्, [ द्रष्टव्य—भामती आदि नवव्याख्यायुत शाङ्करभाष्य पृ० ८९ कलकत्ता मुद्रित ] शङ्का—मिथ्याज्ञान अध्यासका उपादान कैसे है ? समाधान—मिथ्याज्ञानके रहनेपर अध्यास होता है और न रहनेपर नहीं होता है, इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक ही प्रमाण हैं । शङ्का—अध्यासका प्रतिबन्धक तत्त्वज्ञान है और तत्त्वज्ञानका अभाव अज्ञान है, इस प्रकार प्रतिबन्धकाभावविषयक होनेसे अज्ञानके साथ अन्वय और व्यतिरेक अन्यथासिद्ध हैं ? समाधान—नहीं, क्योंकि प्रतिबन्धकका अर्थ है-पुष्कल (सब) कारणके रहते कार्यकी उत्पत्तिमें विरोधी । और अध्यासके कारणोंके रहते तत्त्वज्ञान नहीं होता है, इससे उक्त अन्वय और व्यतिरेक प्रतिबन्धकाभावविषयक नहीं हैं, शङ्का—तथापि विरोधिसंसर्गाभावविषयक होंगे ? नहीं.........इत्यादिसे अनेक प्रकारकी आशङ्का करके अन्तमें स्थिर किया गया है कि अध्यासका उपादान कारण मिथ्या अज्ञान ही है, आत्मा, अन्तःकरण या काचादि दोष नहीं हैं, यह उपर्युक्त पङ्क्तियोंका आशय है ।
* तात्पर्य यह है कि शुक्तित्व आदि धर्मोंसे विशिष्ट पुरोवर्ती पदार्थ ही यदि प्रातिभासिक रजतके कारण अज्ञानसे आवृत माना जाय, तो वह रजतत्वादि विशिष्ट द्रव्य अधिष्ठान होगा, इदन्त्वविशिष्ट इदमंश नहीं होगा, क्योंकि जो अज्ञानसे आवृत होता है, वही अधिष्ठान होता है, इस अवस्थामें अधिष्ठान और आरोप्यके एकज्ञानविषयत्व नियमसे 'शुक्ति रजत है' ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, 'इदं रजतम्' यह प्रतीति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इदमंश अधिष्ठान नहीं है, इसलिए अधिष्ठान और आधारका लक्षण पृथक् पृथक् करते हैं, इस परिस्थितिमें इस मतके अनुकूल यही नियम होगा कि आधार और आरोप्य ( आरोपके विषय ) ही एक ज्ञानके विषय होंगे, अधिष्ठान और आरोप्य नहीं ।