भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 254

३२४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


ध्यासे रजतादिसादृश्यभूतरूपविशेषादिविशिष्टधर्मिज्ञानरूपमधिष्ठानसामान्यज्ञानं कारणमवश्यं वाच्यम्, दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगमात्रस्य कारणत्वे शुक्तिवदिङ्गालेऽपि तद्रजताध्यासप्रसङ्गात् ।

न च सादृश्यमपि विषयदोषत्वेन कारणमिति वाच्यम् ; विसदृशेऽपि सादृश्यभ्रमे सत्यध्याससद्भावात् जलधिसलिलपूरे दूरे नीलशिलातलत्वारोपदर्शनात् । न च ‘तद्धेतोरेव’ इति न्यायात् सादृश्यज्ञानसामग्र्येवाध्यासकारणमस्त्विति युक्तम्, ज्ञानसामग्र्या अर्थकारणत्वस्य क्वचिदप्यदृष्टेः । तत्तस्सादृश्यज्ञानत्वस्यैव लघुत्वाच्च ।


अपेक्षा रखनेवाले रजत आदिके अध्यासमें, रजत आदिके सदृश रूपसे युक्त धर्मिका ज्ञानरूप जो अधिष्ठानसामान्यज्ञान है, उसे कारण अवश्य मानना चाहिए। यदि सादृश्यकी अपेक्षा न करके केवल दुष्ट इन्द्रियके सम्बन्धको ही कारण माना जाय, तो शुक्तिके समान इङ्गालमें—कोयलोंमें—भी रजताध्यासकी प्रसक्ति होगी।

* यदि कहो कि विषयके दोषरूपसे सादृश्य भी आध्यासका कारण माना जायगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सादृश्यसे रहित पदार्थोंमें सादृश्यके भ्रमसे अध्यास होता है, कारण कि दूरस्थ समुद्रके जलप्रवाहमें नील शिलातलका आरोप—भ्रम देखा जाता है। यदि कहें कि तद्धेतोरेव † इस न्यायसे सादृश्यज्ञानकी सामग्री ही अध्यासकी कारण हो, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानकी सामग्रीमें अर्थकी कारणता कहींपर भी नहीं देखी जाती है। और सादृश्यज्ञानकी सामग्रीत्वको कारणतावच्छेदक माननेकी अपेक्षासे सादृश्यज्ञानत्वको अध्यासके प्रति कारणतावच्छेदक माननेमें लाघव भी है।


* इसका तात्पर्य यह है कि यद्यपि सादृश्य अध्यासोंमें अवश्य अपेक्षित है, तथापि वह स्वरूपतः कारण है, ज्ञात कारण नहीं है, अतः इंगालमें रजताध्यासकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है, इसलिए धर्मिज्ञानको कारण माननेकी आवश्यकता नहीं है।

† इस न्यायका यह स्वरूप है—‘तद्धेतोरेवास्तु तद्धेतुत्वम् मध्ये किं तेन’ अर्थात् जिसको तुम हेतु—कारण मानते हो, उसीके कारणसे यदि कार्य हो सकता है, तो मध्यमें उसको कारण मानना व्यर्थ है, प्रकृतमें सादृश्यज्ञानको अध्यासके प्रति कारण माननेकी अपेक्षा उसकी कारण सामग्रीको ही अध्यासके प्रति कारण माननेसे उपपत्ति हो सकती है, फिर उसे बीचमें कारण मानना व्यर्थ ही है, यह भाव है।