सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २२३
ध्यासकादाचित्कत्वस्याऽपि निर्वाहादधिष्ठानप्रकाशस्य सामान्यतो विशेषतो वाऽध्यासकारणत्वस्याऽसिद्धेः। ननु सादृश्यनिरपेक्षे अध्यासान्तरे अकारणत्वेऽपि तत्सापेक्षे रजताद्य-
की भी उपपत्ति हो सकनेसे सामान्यरूपसे या विशेषरूपसे अधिष्ठानके प्रकाशमें अध्यासके प्रति कारणता †सिद्ध नहीं होती ‡ है । -* जिस अध्यासमें सादृश्यकी अपेक्षा नहीं है, ऐसे पीतशङ्ख आदि अन्य अध्यासमें अधिष्ठानसामान्यज्ञान भले ही कारण न हो, परन्तु सादृश्यकी
† तात्पर्य यह है कि अधिष्ठानका प्रकाशमात्र सम्पूर्ण अध्यासके प्रति कारण है और अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाश प्रातिभासिक अध्यासके प्रति कारण है, इस प्रकारके सामान्य और विशेष कार्यकारणभाव सिद्ध नहीं होते हैं ।
‡ यहाँपर कोई विचार करते हैं कि मूलमें जो प्रातिभासिक अध्यासमात्रमें दुष्टेन्द्रियका सम्प्रयोग कारण माना गया है, वह असङ्गत है, क्योंकि अहंकाराध्यासमें और साक्षीमें स्वाप्नाध्यासस्थलमें इन्द्रियसम्प्रयोगके न होनेसे व्यभिचार है, यदि इसपर कहें कि अहङ्कार-का अध्यास व्यावहारिक है, प्रातिभासिक नहीं है, अतः व्यभिचार नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो अहङ्काराध्यासको प्रातिभासिक मानते हैं, उनके मतमें व्यभिचारका परिहार नहीं हो सकेगा । यदि कहें कि स्वप्नप्रपञ्चके अध्यासमें अभिव्यक्त अधिष्ठानका ज्ञान ही कारण होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि दो कार्यकारणभाव माननेकी अपेक्षा एक कार्यकारणभाव माननेमें लाघव होनेसे अभिव्यक्ताधिष्ठान ज्ञानको कारण मानने हीमें लाघव है, क्योंकि दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगकी ( विषयके साथ दुष्ट इन्द्रियोंके सम्बन्धकी ) अधिष्ठान चैतन्याभिव्यञ्जक वृत्तिके उत्पादनमें ही सफलता है, अतः वह अध्यासके प्रति कारण नहीं हो सकता है । और पीतशंख आदि अध्यासॉमें भी अधिष्ठान चैतन्याभिव्यञ्जक वृत्तिके सम्भवका पूर्वकी टिप्पणीमें उल्लेख किया गया है, अतः इन सब युक्तियोंका विचार करनेसे यद्यपि धर्मिज्ञानको अध्यासके प्रति कारण मानना यही पक्ष युक्तियुक्त भासता है तथापि सूक्ष्मदृष्टिसे विचार करनेपर यही पक्ष ठीक है, किन्तु स्थूल दृष्टिसे लाघवतः इन्द्रियसम्प्रयोग कारण माना गया है, यह जानना चाहिए ।
- धर्मिज्ञानको कारण मानना चाहिए, इसमें अन्य युक्तिका प्रदर्शन करते हैं-‘ननु, सादृश्य०’ इत्यादिसे । तात्पर्य यह है कि पीतरूपके साथ शंखका सादृश्य न होनेसे 'पीत शंख है' इस अध्यासमें सादृश्यज्ञान कारण नहीं है, परन्तु शुक्तिरजतस्थलमें रजतके साथ शुक्ति आदिका रूपविशेषसे अवश्य सादृश्य है, इसलिए उक्त रूपसे विशिष्ट धर्मिज्ञान हो सकता है और उसीसे रजताध्यास होगा, तो शुक्त्यादि अध्यासके प्रति अधिष्ठानज्ञान कारण क्यों न माना जाय ? यदि लाघवसे कहेंगे कि इन्द्रियसम्प्रयोग कारण है, तो इंगालमें भी रजताध्यासकी प्रसक्ति होगी।