सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| २३२ | सिद्धान्तलेशसंग्रहे | [ प्रथम परिच्छेदे |
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न च प्रातिभासिकेष्वपि रजताद्यध्यासमात्रे निरुक्तो विशेषहेतुरास्तामिति वाच्यम्; तथा सति सम्प्रयोगात् प्राक् पीतशङ्खाद्यध्यासाप्रसङ्गाय तदध्यासे दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगः कारणमित्यवश्यं वक्तव्यतया तस्यैव सामान्यतः प्रातिभासिकाध्यासमात्रे लाघवात् कारणत्वसिद्धौ, तत एव रजता-
शङ्का करते हैं कि प्रातिभासिक अध्यासोंमें से भी केवल रजत आदि अध्यासमें ही उक्त अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाशविशेष हेतु है, पीतशंख आदि अध्यासोंमें हेतु नहीं है ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यदि पीतशंख आदि अध्यासोंमें अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाश हेतु न माना जाय, तो इन्द्रियसम्प्रयोगसे पूर्वमें भी पीतशङ्ख आदि अध्यासकी प्रसक्ति हो जायगी, वह न हो, इसलिए उन अध्यासोंमें दुष्ट इन्द्रियोंके सम्प्रयोगको अवश्य कारण कहना होगा, इससे उसी इन्द्रियके सम्प्रयोगमें सामान्यतः प्रातिभासिक अध्यासमात्रके प्रति लाघवसे कारणत्वकी सिद्धि होनेपर उसीसे रजताध्यासके ⁕ कादाचित्कत्व-
पूर्वमें द्रव्यका ग्रहण होनेपर भी दोषविशेषसे जैसे शुक्तित्वका ग्रहण नहीं होता है, वैसे ही दोषविशेषसे शुक्लरूपमात्रका अग्रहण हो सकता है, इसीसे भामतीकारने भी कहा है कि—
'शङ्खश्च दोषाच्छादितशुक्लिमानमननुभवन्' [ पृ० २१ निर्णयसागर भामतीकल्पतरु ]
अर्थात् दोषसे शङ्खके शुक्लरूपका अनुभव न करके, यह उक्त पंक्तिका आशय है । अथवा यह मान भी लिया जाय कि उक्त स्थलमें अध्यासके पूर्वमें शुक्लरूपविशिष्ट शंखका ग्रहण होता है, तो भी अध्यासकी अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि दोषवलसे शुक्लका ग्रहण नहीं होता है, इसीसे उपपत्ति हो सकती है । इससे प्रातिभासिक अध्यासोंमें अभिव्यक्त अधिष्ठानसामान्य-ज्ञान कारण माना जाय, तो भी व्यभिचार नहीं है, अंतः धर्मिज्ञानरूप इदमाकार वृत्ति सिद्ध होती है । उसकी सिद्धि होनेसे उसमें आवरणनिवर्तकत्व शक्ति है या नहीं है, उसका विचार सालम्बन ही है निरालम्बन नहीं है, यही अस्वरस इस मतमें 'उपाध्याया मन्यन्ते' इससे सूचित किया गया है, इसे नहीं भूलना चाहिए ।
⁕ धर्मिज्ञानको कारण माननेवाले कहते हैं कि सर्वदा अध्यासका प्रसङ्ग न हो, इसलिए अभिव्यक्त अधिष्ठानसामान्यके ज्ञानको कारण मानना चाहिए, उसके माननेसे शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्यरूप अधिष्ठानप्रकाशके आवृत्त होनेसे सदा उसकी अभिव्यक्तिके न रहनेसे सर्वदा अध्यासकी प्रसक्ति नहीं होती है । इसलिए सर्वदा अध्यासके प्रसङ्गका अभाव है । परन्तु यह प्रसङ्ग धर्मिज्ञानकी कारणताका खण्डन करनेवालोंके मतमें भी नहीं होता है, क्योंकि उसका परिहार पीतशङ्खस्थलमें क्लृप्तसम्प्रयोगसे भी हो सकता है, यह भाव है ।