सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 251, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंसकारणं अध्यासका विचारं] भाषानुवादसहितं ३२१
न्यस्य विशेषे विशेषस्य हेतुत्वौचित्यादिति वाच्यम्, एवमपि प्रातिभासिकशङ्खपीतिमकूपजलनैल्याद्यध्यासाव्यापनात् । रूपानुपहितचाक्षुषप्रत्ययायोगेन तदानीं शङ्खादिगतशौक्ल्योपलम्भाभावेन चाऽध्यासात् प्राक् शङ्खादिनीरूपाधिष्ठानगोचरवृत्त्यसम्भवात् ।
सामान्यमें सामान्य और विशेषमें विशेष कारण मानना उचित है, परन्तु यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शङ्खमें प्रातिभासिकपीतिमरूपके और कूपजलमें प्रातिभासिक नैल्यके अध्यासमें अभिव्यक्त अधिष्ठानके प्रत्यक्षकी व्याप्ति नहीं है, कारण कि रूपरहितकी * चाक्षुषवृत्ति न होनेके कारण और अध्यासके पूर्वकालमें शङ्ख आदिके शुक्लरूपका उपलम्भ न होनेके कारण उस समयमें रूपरहित शङ्ख आदि अधिष्ठानोंकी अपरोक्षवृत्ति नहीं † हो सकती है ।
* रूपरहित जितने पदार्थ हैं, उनकी चाक्षुष वृत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि यदि रूपरहितकी चाक्षुषवृत्ति मानी जाय, तो वायुकी भी चाक्षुष वृत्ति प्राप्त होगी और उसका चक्षुसे प्रत्यक्ष होने लगेगा । शंखमें पीत रूपके अध्याससे पूर्वकालमें यदि उसमें शुक्लरूपकी उपलब्धि मानी जाय, तो 'पीतः शङ्खः' यह अध्यास ही नहीं होगा, इसलिए धर्मीके ज्ञानको जो अध्यासके प्रति कारण मानते हैं, उनका पक्ष अत्यन्त असङ्गत है, क्योंकि उनके मतमें अभिव्यक्त शङ्ख और जल आदिसे अवच्छिन्न चैतन्यमें पीत और नील आदि रूपोंका अध्यास होता है, इसलिए उनके मतमें पहले 'इदम्' इत्याकारक वृत्तिकी उत्पत्ति होती है, और उस वृत्तिसे अभिव्यक्त पूर्वोक्त पदार्थावच्छिन्न चैतन्यमें पीतादिरूप अध्यस्त होते हैं । परन्तु उनसे (धर्मिज्ञानकारणवादियोंसे) पूछना चाहिए कि उस स्थलमें इदमाकार वृत्ति केवल शंखमात्रको अवलम्बन करती है, या रूपविशिष्ट शंखको ? इनमें प्रथम पक्ष तो हो ही नहीं सकता, क्योंकि रूपाविषयक चाक्षुषवृत्ति नहीं होती, इसका ऊपर अभी निरूपण किया गया है । द्वितीय पक्षमें भी यह प्रष्टव्य हो सकता है कि क्या शुक्लरूप विशिष्ट शङ्खको वह विषय करती है, अथवा पीतरूपविशिष्ट शंखको ? इसमें द्वितीय पक्षका अवलम्बन करेंगे, तो वह धर्मिज्ञान नहीं है, क्योंकि आरोप्य पीत रूप विशिष्ट शङ्खज्ञान ही तो भ्रान्ति है । और प्रथम पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि अध्यासके पूर्वकालमें यदि शुक्ल रूप प्रतीत हो, तो पीत शंखाध्यास ही विलीन हो जायगा, इसलिए व्यभिचार होनेसे धर्मिज्ञानको अध्यासके प्रति कारण माननेवालोंका पक्ष असङ्गत ही है, यह नृसिंहभट्टोपाध्यायका मत है ।
† वस्तुतस्तु अध्याससे पूर्व द्रव्यमात्ररूपसे शङ्खादिविषयक वृत्तिका उदय होता ही है, क्योंकि द्रव्यगोचर चाक्षुषवृत्तिमें रूपविषयकत्व नियम अप्रयोजक है । वायुका चाक्षुषप्रसङ्ग भी नहीं आ सकता है, क्योंकि द्रव्यके चाक्षुष प्रत्यक्षमें उद्भूतरूप प्रयोजक है, इससे अध्यासके