भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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१२७सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

प्रकाशमाने प्रत्यगात्मनि अहङ्काराध्यासमपि व्याप्नोतीति वाच्यम्; तस्याऽपि घटाद्यध्यासाव्यापित्वात् । घटादिप्रत्यक्षात् प्राक् तदधिष्ठानभूतनीरूप-ब्रह्ममात्रगोचरचाक्षुषवृत्तेरसम्भवात् । स्वरूपप्रकाशस्याऽऽवृतत्वात् । आवृतानावृतसाधारण्येनाऽधिष्ठानप्रकाशमात्रस्याऽध्यासकारणत्वे शुक्तीदमंशसम्पयोगात् प्रागपि तदवच्छिन्नचैतन्यरूपप्रकाशस्याऽऽवृतस्य सद्भावेन तदाऽप्यध्यासापत्तेः । न चाऽध्याससामान्ये अधिष्ठानप्रकाशसामान्यं हेतुः, प्रातिभासिकाध्यासेऽभिव्यक्ताधिष्ठानप्रकाश इति नाऽतिप्रसङ्गः, सामान्ये सामा-


भ्रम होता है, वहाँ वहाँ इन्द्रियसम्प्रयोग रहता है, यह बात नहीं है, क्योंकि अहङ्कार आदिके अध्यासमें इन्द्रियसम्प्रयोग नहीं है ] और अधिष्ठानका सामान्य ज्ञान तो स्वतः प्रकाशमान प्रत्यगात्मरूप अधिष्ठानमें अहङ्कार आदि अध्यासको भी व्याप्त करता है, अतः सामान्यतः अधिष्ठानका ज्ञान ही अध्यासके प्रति कारण है, इन्द्रियसम्प्रयोग कारण नहीं है ? यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अधिष्ठानका सामान्य स्फुरण भी घटादि-अध्यासका व्यापी नहीं है, कारण कि घट आदिके प्रत्यक्षसे पूर्व घटके अधिष्ठानभूत नीरूप ( रूपरहित ) ब्रह्ममात्रको विषय करनेवाली चक्षुकी वृत्ति [ उक्त स्थलमें ] नहीं होती है । और स्वरूपप्रकाशके आवृत होनेसे [ अधिष्ठानभूत ब्रह्मका स्वतः स्फुरण भी नहीं हो सकता है ] । यदि आवृत और अनावृत साधारण † अधिष्ठानका प्रकाशमात्र अध्यासके प्रति कारण माना जाय, तो भी शुक्तिके इदमंशके साथ इन्द्रियसम्बन्धसे पूर्व आवृत शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्यरूप प्रकाशके होनेसे उस समयमें भी रजताध्यासकी प्रसक्ति होगी । अब पुनः शङ्का करते हैं कि अध्याससामान्यमें अधिष्ठानका प्रकाशसामान्य कारण मानेंगे और प्रातिभासिक अध्यासमें अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाश कारण मानेंगे, इससे पूर्वोक्त दोष नहीं है ? क्योंकि


† शङ्काका तात्पर्य यह है कि अध्यासके प्रति अधिष्ठानका प्रकाशमात्र कारण मानते हैं, अभिव्यक्त अधिष्ठानका ज्ञान कारण नहीं मानते हैं, क्योंकि उसके माननेमें लाघव है, इससे 'सन् घटः, सन् पटः' इत्यादि अध्यासोंके अधिष्ठानभूत सद्रूप ब्रह्मका प्रकाश होनेसे अधिष्ठान प्रकाश है, इसलिए व्यभिचार नहीं है, क्योंकि ब्रह्मके स्वप्रकाश होनेसे उक्त स्थलमें ब्रह्मका प्रकाश तो होता ही है।