भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 590 में से

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पृष्ठ 249

सकारणे अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहितं २११


तथाहि—न तावत् भ्रमरूपवृत्तित्यतिरेकेण इदमाकारा वृत्तिरनुभवसिद्धा; ज्ञानद्वित्वाननुभवात्। नाप्यधिष्ठानसामान्यज्ञानमध्यासकारणमिति कार्यकल्प्या; तस्यास्तत्कारणत्वे मानाभावात्। न चाऽधिष्ठानसम्प्रयोगाभावे रजताद्यनुत्पत्तिस्तत्र मानम्; ततो दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगस्यैवाऽध्यासकारणत्वप्राप्तेः। न च सम्प्रयोगो न सर्वत्र भ्रमव्यापी, अधिष्ठानस्फुरणं तु स्वतः


कारण कि [ 'इदं रजतम्' इत्यादि भ्रमस्थलमें ] भ्रमवृत्तिसे अलग इदमाकार वृत्तिका अनुभव होता ही नहीं है, क्योंकि उस स्थलमें 'इदम्' और 'इदं रजतम्' इस प्रकार दो ज्ञानोंका अनुभव नहीं होता है। और अध्यासके प्रति अधिष्ठानका सामान्यज्ञान कारण भी नहीं है, जिससे कि अध्यासरूप कार्यके बलपर इदमाकार वृत्तिकी कल्पना की जाय, क्योंकि इदमाकार सामान्य वृत्तिको अध्यासके प्रति कारण माननेमें कोई प्रमाण नहीं है। शङ्का—अधिष्ठानके साथ इन्द्रिय आदिका सम्बन्ध न होनेपर रजतकी उत्पत्ति नहीं होगी, अतः यही अनुपपत्ति अध्यासके प्रति अधिष्ठानके सामान्य ज्ञानकी कारणतामें * प्रमाण है ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त प्रमाणसे दुष्ट इन्द्रियका सम्बन्ध ही अध्यासके प्रति कारण प्राप्त होता है, अधिष्ठानका सामान्यज्ञान अध्यासके प्रति कारण प्राप्त नहीं होता है। अब शङ्का होती है कि इन्द्रियका सम्प्रयोग सर्वत्र भ्रमव्यापी (भ्रमका अव्यभिचारी कारण) नहीं है [अर्थात् जहाँ जहाँ


* अध्यासके प्रति अधिष्ठानका सामान्य ज्ञान कारण है, इस कार्यकारणभावमें कोई प्रमाण नहीं है, ऐसा पहले कहा जा चुका, अब शङ्का करते हैं कि उक्त कार्यकारणभावमें प्रमाण है, क्योंकि अधिष्ठानके साथ जबतक चक्षु आदिका सम्बन्ध नहीं होता है, तबतक रजत आदिकी उत्पत्ति नहीं होती है, और सम्बन्ध होनेसे होती है, इसी अन्वय और व्यतिरेकरूप प्रमाणसे अधिष्ठानसामान्यके ज्ञानको अध्यासका कारण मानेंगे। यदि इसपर शङ्का की जाय कि उक्त अन्वय-व्यतिरेकसे इन्द्रियके सम्बन्धमें ही अध्यासकारणताका ग्रह होता है, अधिष्ठान सामान्य ज्ञानमें नहीं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अहङ्कार आदिके अध्यासमें इन्द्रिय-सम्प्रयोगके न होनेसे व्यभिचार होगा ? जो अन्वय और व्यतिरेक सम्प्रयोगमें अध्यासकी कारणताके ग्राहक हैं, उन्ही अन्वय और व्यतिरेकसे शुक्ति-रजत आदि स्थलमें इन्द्रियसम्बन्ध-साध्य धर्मिज्ञानको ही कारण मानते हैं, इस अवस्थामें अधिष्ठानके सामान्यज्ञानको अध्यासके प्रति कारण माननेमें तथा कथित अन्वय और व्यतिरेक प्रमाण हैं, यह प्रकृतमें पूर्वपक्षीका गूढ़ अभिप्राय है, परन्तु इसकी ओर ध्यान न देकर ही 'ततः' इत्यादिसे उत्तर देते हैं। 'ततः' का अन्वय और व्यतिरेकके बलसे, यह अर्थ है।