सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 248, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| २१८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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त्मना अधिष्ठानसाक्षात्कारानन्तरभाविन्यामावरणनिवृत्तावपि विक्षेपशक्तिसहिताज्ञानमात्रस्योपादानत्वसम्प्रतिपत्तेरित्याहुः ।
नृसिंहभट्टोपाध्यायः पूर्वं रजतविभ्रमात् ।
न मानमिदमाकारवृत्ताविति समव्यधात् ॥ १११ ॥
नृसिंहभट्टोपाध्यायने कहा है कि रजतभ्रमके पूर्वमें इदमाकार वृत्तिमें कोई प्रमाण नहीं है, [अतः वह अज्ञानकी निवर्तक है या नहीं, यह विचार ही असङ्गत है] ॥१११॥
कवितार्किकचक्रवर्तिनृसिंहभट्टोपाध्यायास्तु—'इदं रजतम्' इति भ्रमरूपवृत्तिव्यतिरेकेण रजतोत्पत्तेः प्रागिदमाकारा वृत्तिरेव नास्तीति तस्या अज्ञाननिवर्तकत्वतदसद्भावविचारं निरालम्बनं मन्यन्ते ।
होनेके अनन्तर आवरणकी निवृत्ति होनेपर भी केवल विक्षेपशक्तिसे युक्त अज्ञान उपादान कारण माना जाता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।
† कवितार्किकचक्रवर्ती नृसिंहभट्टोपाध्याय तो—'इदं रजतम्' (यह रजत है) इस स्थलमें भ्रमवृत्तिसे पृथक् रजतकी उत्पत्तिके पूर्वमें इदमाकार अन्य वृत्ति ही नहीं है, इससे इदमाकार वृत्तिमें अज्ञाननिवर्तकत्वका और अज्ञाननिवर्तकत्वाभावका विचार निरालम्बन ही है—ऐसा मानते हैं ।
हो सकती है। प्रतिबिम्बविभ्रमस्थलमें—जलके किनारेके वृक्षोंका जलमें प्रतिबिम्ब पड़ता है वहाँ जो वृक्षका अग्रभाग ऊपर है उसका जलमें नीचे भान होता है, इस स्थलमें—'जलमें वृक्ष नहीं है और वृक्षका अग्रभाग ऊपर ही है' इस प्रकार सर्वांशसे विशेष दर्शन होनेसे विशेषांशका अज्ञान निवृत्त नहीं है और सामान्यांशका निवृत्त है, इस प्रकार विभाग न होनेसे विशेषका अज्ञान उस प्रतिबिम्बाध्यास में कारण है, ऐसा नहीं कह सकते हैं, इससे इस अध्यासके अनुरोधसे, यह कहना होगा कि एक ही अज्ञानके आवरणांशके निवृत्त होनेपर भी विक्षेपशक्तिवाले अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है और यही अध्यासमें कारण है। इसी प्रकार जीवन्मुक्तिमें भी ब्रह्मतत्त्वके साक्षात्कारसे आवरणांशकी निवृत्ति होती है और विक्षेपशक्तिवाले अंशकी निवृत्ति नहीं होती है। यह मानना चाहिए, इसलिए रजताध्यासमें भी विक्षेपशक्तिसे युक्त इदमंशका अज्ञान ही कारण है, ऐसा मानना चाहिए, यह भाव है।
† इनके मतमें जब पहले इदमाकार वृत्ति होती ही नहीं है, तो व्यभिचार-शङ्का और उसका समाधान करना व्यर्थ ही है, इसलिए पूर्वोक्त विचार निरर्थक है, यही पूर्वोक्त मतमें अरुचि है। पूर्वमतमें इदमाकार वृत्तिके होनेसे उस वृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्य ही शुक्तिरजतादि ज्ञान है, वृत्त्यात्मकं ज्ञान नहीं है। और इस मतमें भ्रमसे पहले इदमाकार वृत्तिके न होनेसे वृत्तिरूप ही शुक्तिरजत ज्ञान है, ऐसा समझना चाहिए यह बात विशेषरूपसे आगे स्पष्ट होगी, यह भाव है।