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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ
२१८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

त्मना अधिष्ठानसाक्षात्कारानन्तरभाविन्यामावरणनिवृत्तावपि विक्षेपशक्तिसहिताज्ञानमात्रस्योपादानत्वसम्प्रतिपत्तेरित्याहुः ।

नृसिंहभट्टोपाध्यायः पूर्वं रजतविभ्रमात् ।
न मानमिदमाकारवृत्ताविति समव्यधात् ॥ १११ ॥

नृसिंहभट्टोपाध्यायने कहा है कि रजतभ्रमके पूर्वमें इदमाकार वृत्तिमें कोई प्रमाण नहीं है, [अतः वह अज्ञानकी निवर्तक है या नहीं, यह विचार ही असङ्गत है] ॥१११॥

कवितार्किकचक्रवर्तिनृसिंहभट्टोपाध्यायास्तु—'इदं रजतम्' इति भ्रमरूपवृत्तिव्यतिरेकेण रजतोत्पत्तेः प्रागिदमाकारा वृत्तिरेव नास्तीति तस्या अज्ञाननिवर्तकत्वतदसद्भावविचारं निरालम्बनं मन्यन्ते ।


होनेके अनन्तर आवरणकी निवृत्ति होनेपर भी केवल विक्षेपशक्तिसे युक्त अज्ञान उपादान कारण माना जाता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।

† कवितार्किकचक्रवर्ती नृसिंहभट्टोपाध्याय तो—'इदं रजतम्' (यह रजत है) इस स्थलमें भ्रमवृत्तिसे पृथक् रजतकी उत्पत्तिके पूर्वमें इदमाकार अन्य वृत्ति ही नहीं है, इससे इदमाकार वृत्तिमें अज्ञाननिवर्तकत्वका और अज्ञाननिवर्तकत्वाभावका विचार निरालम्बन ही है—ऐसा मानते हैं ।


हो सकती है। प्रतिबिम्बविभ्रमस्थलमें—जलके किनारेके वृक्षोंका जलमें प्रतिबिम्ब पड़ता है वहाँ जो वृक्षका अग्रभाग ऊपर है उसका जलमें नीचे भान होता है, इस स्थलमें—'जलमें वृक्ष नहीं है और वृक्षका अग्रभाग ऊपर ही है' इस प्रकार सर्वांशसे विशेष दर्शन होनेसे विशेषांशका अज्ञान निवृत्त नहीं है और सामान्यांशका निवृत्त है, इस प्रकार विभाग न होनेसे विशेषका अज्ञान उस प्रतिबिम्बाध्यास में कारण है, ऐसा नहीं कह सकते हैं, इससे इस अध्यासके अनुरोधसे, यह कहना होगा कि एक ही अज्ञानके आवरणांशके निवृत्त होनेपर भी विक्षेपशक्तिवाले अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती है और यही अध्यासमें कारण है। इसी प्रकार जीवन्मुक्तिमें भी ब्रह्मतत्त्वके साक्षात्कारसे आवरणांशकी निवृत्ति होती है और विक्षेपशक्तिवाले अंशकी निवृत्ति नहीं होती है। यह मानना चाहिए, इसलिए रजताध्यासमें भी विक्षेपशक्तिसे युक्त इदमंशका अज्ञान ही कारण है, ऐसा मानना चाहिए, यह भाव है।

† इनके मतमें जब पहले इदमाकार वृत्ति होती ही नहीं है, तो व्यभिचार-शङ्का और उसका समाधान करना व्यर्थ ही है, इसलिए पूर्वोक्त विचार निरर्थक है, यही पूर्वोक्त मतमें अरुचि है। पूर्वमतमें इदमाकार वृत्तिके होनेसे उस वृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्य ही शुक्तिरजतादि ज्ञान है, वृत्त्यात्मकं ज्ञान नहीं है। और इस मतमें भ्रमसे पहले इदमाकार वृत्तिके न होनेसे वृत्तिरूप ही शुक्तिरजत ज्ञान है, ऐसा समझना चाहिए यह बात विशेषरूपसे आगे स्पष्ट होगी, यह भाव है।

सकारणे अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहितं २११


तथाहि—न तावत् भ्रमरूपवृत्तित्यतिरेकेण इदमाकारा वृत्तिरनुभवसिद्धा; ज्ञानद्वित्वाननुभवात्। नाप्यधिष्ठानसामान्यज्ञानमध्यासकारणमिति कार्यकल्प्या; तस्यास्तत्कारणत्वे मानाभावात्। न चाऽधिष्ठानसम्प्रयोगाभावे रजताद्यनुत्पत्तिस्तत्र मानम्; ततो दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगस्यैवाऽध्यासकारणत्वप्राप्तेः। न च सम्प्रयोगो न सर्वत्र भ्रमव्यापी, अधिष्ठानस्फुरणं तु स्वतः


कारण कि [ 'इदं रजतम्' इत्यादि भ्रमस्थलमें ] भ्रमवृत्तिसे अलग इदमाकार वृत्तिका अनुभव होता ही नहीं है, क्योंकि उस स्थलमें 'इदम्' और 'इदं रजतम्' इस प्रकार दो ज्ञानोंका अनुभव नहीं होता है। और अध्यासके प्रति अधिष्ठानका सामान्यज्ञान कारण भी नहीं है, जिससे कि अध्यासरूप कार्यके बलपर इदमाकार वृत्तिकी कल्पना की जाय, क्योंकि इदमाकार सामान्य वृत्तिको अध्यासके प्रति कारण माननेमें कोई प्रमाण नहीं है। शङ्का—अधिष्ठानके साथ इन्द्रिय आदिका सम्बन्ध न होनेपर रजतकी उत्पत्ति नहीं होगी, अतः यही अनुपपत्ति अध्यासके प्रति अधिष्ठानके सामान्य ज्ञानकी कारणतामें * प्रमाण है ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उक्त प्रमाणसे दुष्ट इन्द्रियका सम्बन्ध ही अध्यासके प्रति कारण प्राप्त होता है, अधिष्ठानका सामान्यज्ञान अध्यासके प्रति कारण प्राप्त नहीं होता है। अब शङ्का होती है कि इन्द्रियका सम्प्रयोग सर्वत्र भ्रमव्यापी (भ्रमका अव्यभिचारी कारण) नहीं है [अर्थात् जहाँ जहाँ


* अध्यासके प्रति अधिष्ठानका सामान्य ज्ञान कारण है, इस कार्यकारणभावमें कोई प्रमाण नहीं है, ऐसा पहले कहा जा चुका, अब शङ्का करते हैं कि उक्त कार्यकारणभावमें प्रमाण है, क्योंकि अधिष्ठानके साथ जबतक चक्षु आदिका सम्बन्ध नहीं होता है, तबतक रजत आदिकी उत्पत्ति नहीं होती है, और सम्बन्ध होनेसे होती है, इसी अन्वय और व्यतिरेकरूप प्रमाणसे अधिष्ठानसामान्यके ज्ञानको अध्यासका कारण मानेंगे। यदि इसपर शङ्का की जाय कि उक्त अन्वय-व्यतिरेकसे इन्द्रियके सम्बन्धमें ही अध्यासकारणताका ग्रह होता है, अधिष्ठान सामान्य ज्ञानमें नहीं, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अहङ्कार आदिके अध्यासमें इन्द्रिय-सम्प्रयोगके न होनेसे व्यभिचार होगा ? जो अन्वय और व्यतिरेक सम्प्रयोगमें अध्यासकी कारणताके ग्राहक हैं, उन्ही अन्वय और व्यतिरेकसे शुक्ति-रजत आदि स्थलमें इन्द्रियसम्बन्ध-साध्य धर्मिज्ञानको ही कारण मानते हैं, इस अवस्थामें अधिष्ठानके सामान्यज्ञानको अध्यासके प्रति कारण माननेमें तथा कथित अन्वय और व्यतिरेक प्रमाण हैं, यह प्रकृतमें पूर्वपक्षीका गूढ़ अभिप्राय है, परन्तु इसकी ओर ध्यान न देकर ही 'ततः' इत्यादिसे उत्तर देते हैं। 'ततः' का अन्वय और व्यतिरेकके बलसे, यह अर्थ है।

१२७सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

प्रकाशमाने प्रत्यगात्मनि अहङ्काराध्यासमपि व्याप्नोतीति वाच्यम्; तस्याऽपि घटाद्यध्यासाव्यापित्वात् । घटादिप्रत्यक्षात् प्राक् तदधिष्ठानभूतनीरूप-ब्रह्ममात्रगोचरचाक्षुषवृत्तेरसम्भवात् । स्वरूपप्रकाशस्याऽऽवृतत्वात् । आवृतानावृतसाधारण्येनाऽधिष्ठानप्रकाशमात्रस्याऽध्यासकारणत्वे शुक्तीदमंशसम्पयोगात् प्रागपि तदवच्छिन्नचैतन्यरूपप्रकाशस्याऽऽवृतस्य सद्भावेन तदाऽप्यध्यासापत्तेः । न चाऽध्याससामान्ये अधिष्ठानप्रकाशसामान्यं हेतुः, प्रातिभासिकाध्यासेऽभिव्यक्ताधिष्ठानप्रकाश इति नाऽतिप्रसङ्गः, सामान्ये सामा-


भ्रम होता है, वहाँ वहाँ इन्द्रियसम्प्रयोग रहता है, यह बात नहीं है, क्योंकि अहङ्कार आदिके अध्यासमें इन्द्रियसम्प्रयोग नहीं है ] और अधिष्ठानका सामान्य ज्ञान तो स्वतः प्रकाशमान प्रत्यगात्मरूप अधिष्ठानमें अहङ्कार आदि अध्यासको भी व्याप्त करता है, अतः सामान्यतः अधिष्ठानका ज्ञान ही अध्यासके प्रति कारण है, इन्द्रियसम्प्रयोग कारण नहीं है ? यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अधिष्ठानका सामान्य स्फुरण भी घटादि-अध्यासका व्यापी नहीं है, कारण कि घट आदिके प्रत्यक्षसे पूर्व घटके अधिष्ठानभूत नीरूप ( रूपरहित ) ब्रह्ममात्रको विषय करनेवाली चक्षुकी वृत्ति [ उक्त स्थलमें ] नहीं होती है । और स्वरूपप्रकाशके आवृत होनेसे [ अधिष्ठानभूत ब्रह्मका स्वतः स्फुरण भी नहीं हो सकता है ] । यदि आवृत और अनावृत साधारण † अधिष्ठानका प्रकाशमात्र अध्यासके प्रति कारण माना जाय, तो भी शुक्तिके इदमंशके साथ इन्द्रियसम्बन्धसे पूर्व आवृत शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्यरूप प्रकाशके होनेसे उस समयमें भी रजताध्यासकी प्रसक्ति होगी । अब पुनः शङ्का करते हैं कि अध्याससामान्यमें अधिष्ठानका प्रकाशसामान्य कारण मानेंगे और प्रातिभासिक अध्यासमें अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाश कारण मानेंगे, इससे पूर्वोक्त दोष नहीं है ? क्योंकि


† शङ्काका तात्पर्य यह है कि अध्यासके प्रति अधिष्ठानका प्रकाशमात्र कारण मानते हैं, अभिव्यक्त अधिष्ठानका ज्ञान कारण नहीं मानते हैं, क्योंकि उसके माननेमें लाघव है, इससे 'सन् घटः, सन् पटः' इत्यादि अध्यासोंके अधिष्ठानभूत सद्रूप ब्रह्मका प्रकाश होनेसे अधिष्ठान प्रकाश है, इसलिए व्यभिचार नहीं है, क्योंकि ब्रह्मके स्वप्रकाश होनेसे उक्त स्थलमें ब्रह्मका प्रकाश तो होता ही है।

सकारणं अध्यासका विचारं] भाषानुवादसहितं ३२१


न्यस्य विशेषे विशेषस्य हेतुत्वौचित्यादिति वाच्यम्, एवमपि प्रातिभासिकशङ्खपीतिमकूपजलनैल्याद्यध्यासाव्यापनात् । रूपानुपहितचाक्षुषप्रत्ययायोगेन तदानीं शङ्खादिगतशौक्ल्योपलम्भाभावेन चाऽध्यासात् प्राक् शङ्खादिनीरूपाधिष्ठानगोचरवृत्त्यसम्भवात् ।


सामान्यमें सामान्य और विशेषमें विशेष कारण मानना उचित है, परन्तु यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शङ्खमें प्रातिभासिकपीतिमरूपके और कूपजलमें प्रातिभासिक नैल्यके अध्यासमें अभिव्यक्त अधिष्ठानके प्रत्यक्षकी व्याप्ति नहीं है, कारण कि रूपरहितकी * चाक्षुषवृत्ति न होनेके कारण और अध्यासके पूर्वकालमें शङ्ख आदिके शुक्लरूपका उपलम्भ न होनेके कारण उस समयमें रूपरहित शङ्ख आदि अधिष्ठानोंकी अपरोक्षवृत्ति नहीं † हो सकती है ।


* रूपरहित जितने पदार्थ हैं, उनकी चाक्षुष वृत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि यदि रूपरहितकी चाक्षुषवृत्ति मानी जाय, तो वायुकी भी चाक्षुष वृत्ति प्राप्त होगी और उसका चक्षुसे प्रत्यक्ष होने लगेगा । शंखमें पीत रूपके अध्याससे पूर्वकालमें यदि उसमें शुक्लरूपकी उपलब्धि मानी जाय, तो 'पीतः शङ्खः' यह अध्यास ही नहीं होगा, इसलिए धर्मीके ज्ञानको जो अध्यासके प्रति कारण मानते हैं, उनका पक्ष अत्यन्त असङ्गत है, क्योंकि उनके मतमें अभिव्यक्त शङ्ख और जल आदिसे अवच्छिन्न चैतन्यमें पीत और नील आदि रूपोंका अध्यास होता है, इसलिए उनके मतमें पहले 'इदम्' इत्याकारक वृत्तिकी उत्पत्ति होती है, और उस वृत्तिसे अभिव्यक्त पूर्वोक्त पदार्थावच्छिन्न चैतन्यमें पीतादिरूप अध्यस्त होते हैं । परन्तु उनसे (धर्मिज्ञानकारणवादियोंसे) पूछना चाहिए कि उस स्थलमें इदमाकार वृत्ति केवल शंखमात्रको अवलम्बन करती है, या रूपविशिष्ट शंखको ? इनमें प्रथम पक्ष तो हो ही नहीं सकता, क्योंकि रूपाविषयक चाक्षुषवृत्ति नहीं होती, इसका ऊपर अभी निरूपण किया गया है । द्वितीय पक्षमें भी यह प्रष्टव्य हो सकता है कि क्या शुक्लरूप विशिष्ट शङ्खको वह विषय करती है, अथवा पीतरूपविशिष्ट शंखको ? इसमें द्वितीय पक्षका अवलम्बन करेंगे, तो वह धर्मिज्ञान नहीं है, क्योंकि आरोप्य पीत रूप विशिष्ट शङ्खज्ञान ही तो भ्रान्ति है । और प्रथम पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि अध्यासके पूर्वकालमें यदि शुक्ल रूप प्रतीत हो, तो पीत शंखाध्यास ही विलीन हो जायगा, इसलिए व्यभिचार होनेसे धर्मिज्ञानको अध्यासके प्रति कारण माननेवालोंका पक्ष असङ्गत ही है, यह नृसिंहभट्टोपाध्यायका मत है ।

† वस्तुतस्तु अध्याससे पूर्व द्रव्यमात्ररूपसे शङ्खादिविषयक वृत्तिका उदय होता ही है, क्योंकि द्रव्यगोचर चाक्षुषवृत्तिमें रूपविषयकत्व नियम अप्रयोजक है । वायुका चाक्षुषप्रसङ्ग भी नहीं आ सकता है, क्योंकि द्रव्यके चाक्षुष प्रत्यक्षमें उद्भूतरूप प्रयोजक है, इससे अध्यासके

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२३२सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ प्रथम परिच्छेदे

न च प्रातिभासिकेष्वपि रजताद्यध्यासमात्रे निरुक्तो विशेषहेतुरास्तामिति वाच्यम्; तथा सति सम्प्रयोगात् प्राक् पीतशङ्खाद्यध्यासाप्रसङ्गाय तदध्यासे दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगः कारणमित्यवश्यं वक्तव्यतया तस्यैव सामान्यतः प्रातिभासिकाध्यासमात्रे लाघवात् कारणत्वसिद्धौ, तत एव रजता-


शङ्का करते हैं कि प्रातिभासिक अध्यासोंमें से भी केवल रजत आदि अध्यासमें ही उक्त अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाशविशेष हेतु है, पीतशंख आदि अध्यासोंमें हेतु नहीं है ? नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि यदि पीतशंख आदि अध्यासोंमें अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाश हेतु न माना जाय, तो इन्द्रियसम्प्रयोगसे पूर्वमें भी पीतशङ्ख आदि अध्यासकी प्रसक्ति हो जायगी, वह न हो, इसलिए उन अध्यासोंमें दुष्ट इन्द्रियोंके सम्प्रयोगको अवश्य कारण कहना होगा, इससे उसी इन्द्रियके सम्प्रयोगमें सामान्यतः प्रातिभासिक अध्यासमात्रके प्रति लाघवसे कारणत्वकी सिद्धि होनेपर उसीसे रजताध्यासके ⁕ कादाचित्कत्व-


पूर्वमें द्रव्यका ग्रहण होनेपर भी दोषविशेषसे जैसे शुक्तित्वका ग्रहण नहीं होता है, वैसे ही दोषविशेषसे शुक्लरूपमात्रका अग्रहण हो सकता है, इसीसे भामतीकारने भी कहा है कि—

'शङ्खश्च दोषाच्छादितशुक्लिमानमननुभवन्' [ पृ० २१ निर्णयसागर भामतीकल्पतरु ]

अर्थात् दोषसे शङ्खके शुक्लरूपका अनुभव न करके, यह उक्त पंक्तिका आशय है । अथवा यह मान भी लिया जाय कि उक्त स्थलमें अध्यासके पूर्वमें शुक्लरूपविशिष्ट शंखका ग्रहण होता है, तो भी अध्यासकी अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि दोषवलसे शुक्लका ग्रहण नहीं होता है, इसीसे उपपत्ति हो सकती है । इससे प्रातिभासिक अध्यासोंमें अभिव्यक्त अधिष्ठानसामान्य-ज्ञान कारण माना जाय, तो भी व्यभिचार नहीं है, अंतः धर्मिज्ञानरूप इदमाकार वृत्ति सिद्ध होती है । उसकी सिद्धि होनेसे उसमें आवरणनिवर्तकत्व शक्ति है या नहीं है, उसका विचार सालम्बन ही है निरालम्बन नहीं है, यही अस्वरस इस मतमें 'उपाध्याया मन्यन्ते' इससे सूचित किया गया है, इसे नहीं भूलना चाहिए ।

⁕ धर्मिज्ञानको कारण माननेवाले कहते हैं कि सर्वदा अध्यासका प्रसङ्ग न हो, इसलिए अभिव्यक्त अधिष्ठानसामान्यके ज्ञानको कारण मानना चाहिए, उसके माननेसे शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्यरूप अधिष्ठानप्रकाशके आवृत्त होनेसे सदा उसकी अभिव्यक्तिके न रहनेसे सर्वदा अध्यासकी प्रसक्ति नहीं होती है । इसलिए सर्वदा अध्यासके प्रसङ्गका अभाव है । परन्तु यह प्रसङ्ग धर्मिज्ञानकी कारणताका खण्डन करनेवालोंके मतमें भी नहीं होता है, क्योंकि उसका परिहार पीतशङ्खस्थलमें क्लृप्तसम्प्रयोगसे भी हो सकता है, यह भाव है ।

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सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २२३

ध्यासकादाचित्कत्वस्याऽपि निर्वाहादधिष्ठानप्रकाशस्य सामान्यतो विशेषतो वाऽध्यासकारणत्वस्याऽसिद्धेः। ननु सादृश्यनिरपेक्षे अध्यासान्तरे अकारणत्वेऽपि तत्सापेक्षे रजताद्य-

की भी उपपत्ति हो सकनेसे सामान्यरूपसे या विशेषरूपसे अधिष्ठानके प्रकाशमें अध्यासके प्रति कारणता †सिद्ध नहीं होती ‡ है । -* जिस अध्यासमें सादृश्यकी अपेक्षा नहीं है, ऐसे पीतशङ्ख आदि अन्य अध्यासमें अधिष्ठानसामान्यज्ञान भले ही कारण न हो, परन्तु सादृश्यकी


† तात्पर्य यह है कि अधिष्ठानका प्रकाशमात्र सम्पूर्ण अध्यासके प्रति कारण है और अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाश प्रातिभासिक अध्यासके प्रति कारण है, इस प्रकारके सामान्य और विशेष कार्यकारणभाव सिद्ध नहीं होते हैं ।

‡ यहाँपर कोई विचार करते हैं कि मूलमें जो प्रातिभासिक अध्यासमात्रमें दुष्टेन्द्रियका सम्प्रयोग कारण माना गया है, वह असङ्गत है, क्योंकि अहंकाराध्यासमें और साक्षीमें स्वाप्नाध्यासस्थलमें इन्द्रियसम्प्रयोगके न होनेसे व्यभिचार है, यदि इसपर कहें कि अहङ्कार-का अध्यास व्यावहारिक है, प्रातिभासिक नहीं है, अतः व्यभिचार नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो अहङ्काराध्यासको प्रातिभासिक मानते हैं, उनके मतमें व्यभिचारका परिहार नहीं हो सकेगा । यदि कहें कि स्वप्नप्रपञ्चके अध्यासमें अभिव्यक्त अधिष्ठानका ज्ञान ही कारण होगा ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि दो कार्यकारणभाव माननेकी अपेक्षा एक कार्यकारणभाव माननेमें लाघव होनेसे अभिव्यक्ताधिष्ठान ज्ञानको कारण मानने हीमें लाघव है, क्योंकि दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगकी ( विषयके साथ दुष्ट इन्द्रियोंके सम्बन्धकी ) अधिष्ठान चैतन्याभिव्यञ्जक वृत्तिके उत्पादनमें ही सफलता है, अतः वह अध्यासके प्रति कारण नहीं हो सकता है । और पीतशंख आदि अध्यासॉमें भी अधिष्ठान चैतन्याभिव्यञ्जक वृत्तिके सम्भवका पूर्वकी टिप्पणीमें उल्लेख किया गया है, अतः इन सब युक्तियोंका विचार करनेसे यद्यपि धर्मिज्ञानको अध्यासके प्रति कारण मानना यही पक्ष युक्तियुक्त भासता है तथापि सूक्ष्मदृष्टिसे विचार करनेपर यही पक्ष ठीक है, किन्तु स्थूल दृष्टिसे लाघवतः इन्द्रियसम्प्रयोग कारण माना गया है, यह जानना चाहिए ।

  • धर्मिज्ञानको कारण मानना चाहिए, इसमें अन्य युक्तिका प्रदर्शन करते हैं-‘ननु, सादृश्य०’ इत्यादिसे । तात्पर्य यह है कि पीतरूपके साथ शंखका सादृश्य न होनेसे 'पीत शंख है' इस अध्यासमें सादृश्यज्ञान कारण नहीं है, परन्तु शुक्तिरजतस्थलमें रजतके साथ शुक्ति आदिका रूपविशेषसे अवश्य सादृश्य है, इसलिए उक्त रूपसे विशिष्ट धर्मिज्ञान हो सकता है और उसीसे रजताध्यास होगा, तो शुक्त्यादि अध्यासके प्रति अधिष्ठानज्ञान कारण क्यों न माना जाय ? यदि लाघवसे कहेंगे कि इन्द्रियसम्प्रयोग कारण है, तो इंगालमें भी रजताध्यासकी प्रसक्ति होगी।

३२४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद


ध्यासे रजतादिसादृश्यभूतरूपविशेषादिविशिष्टधर्मिज्ञानरूपमधिष्ठानसामान्यज्ञानं कारणमवश्यं वाच्यम्, दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगमात्रस्य कारणत्वे शुक्तिवदिङ्गालेऽपि तद्रजताध्यासप्रसङ्गात् ।

न च सादृश्यमपि विषयदोषत्वेन कारणमिति वाच्यम् ; विसदृशेऽपि सादृश्यभ्रमे सत्यध्याससद्भावात् जलधिसलिलपूरे दूरे नीलशिलातलत्वारोपदर्शनात् । न च ‘तद्धेतोरेव’ इति न्यायात् सादृश्यज्ञानसामग्र्येवाध्यासकारणमस्त्विति युक्तम्, ज्ञानसामग्र्या अर्थकारणत्वस्य क्वचिदप्यदृष्टेः । तत्तस्सादृश्यज्ञानत्वस्यैव लघुत्वाच्च ।


अपेक्षा रखनेवाले रजत आदिके अध्यासमें, रजत आदिके सदृश रूपसे युक्त धर्मिका ज्ञानरूप जो अधिष्ठानसामान्यज्ञान है, उसे कारण अवश्य मानना चाहिए। यदि सादृश्यकी अपेक्षा न करके केवल दुष्ट इन्द्रियके सम्बन्धको ही कारण माना जाय, तो शुक्तिके समान इङ्गालमें—कोयलोंमें—भी रजताध्यासकी प्रसक्ति होगी।

* यदि कहो कि विषयके दोषरूपसे सादृश्य भी आध्यासका कारण माना जायगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सादृश्यसे रहित पदार्थोंमें सादृश्यके भ्रमसे अध्यास होता है, कारण कि दूरस्थ समुद्रके जलप्रवाहमें नील शिलातलका आरोप—भ्रम देखा जाता है। यदि कहें कि तद्धेतोरेव † इस न्यायसे सादृश्यज्ञानकी सामग्री ही अध्यासकी कारण हो, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानकी सामग्रीमें अर्थकी कारणता कहींपर भी नहीं देखी जाती है। और सादृश्यज्ञानकी सामग्रीत्वको कारणतावच्छेदक माननेकी अपेक्षासे सादृश्यज्ञानत्वको अध्यासके प्रति कारणतावच्छेदक माननेमें लाघव भी है।


* इसका तात्पर्य यह है कि यद्यपि सादृश्य अध्यासोंमें अवश्य अपेक्षित है, तथापि वह स्वरूपतः कारण है, ज्ञात कारण नहीं है, अतः इंगालमें रजताध्यासकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है, इसलिए धर्मिज्ञानको कारण माननेकी आवश्यकता नहीं है।

† इस न्यायका यह स्वरूप है—‘तद्धेतोरेवास्तु तद्धेतुत्वम् मध्ये किं तेन’ अर्थात् जिसको तुम हेतु—कारण मानते हो, उसीके कारणसे यदि कार्य हो सकता है, तो मध्यमें उसको कारण मानना व्यर्थ है, प्रकृतमें सादृश्यज्ञानको अध्यासके प्रति कारण माननेकी अपेक्षा उसकी कारण सामग्रीको ही अध्यासके प्रति कारण माननेसे उपपत्ति हो सकती है, फिर उसे बीचमें कारण मानना व्यर्थ ही है, यह भाव है।

सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २२५


न च स्वतश्शुभ्रेऽपि शुभ्रकलधौतभृङ्गारगतेऽपि स्वच्छे जले एव नैल्याध्यासः, न मुक्ताफले इति व्यवस्थावत् वस्तुस्वभावादेव शुक्तौ रजताध्यासः नेङ्गालादाविति व्यवस्था, न तु सादृश्यज्ञानापेक्षणादिति वाच्यम् ; स्वतः पटखण्डे पुण्डरीकमुकुलत्वानध्यासेऽपि तत्रैव कर्तनादि-घटिततदाकारे तदध्यासदर्शनेन तदध्यासस्य वस्तुस्वभावमननुरुध्य सादृश्य-ज्ञानभावाभावानुरोधित्वनिश्चयात् । अन्यथाऽन्यदाऽपि तत्र तदध्यास-प्रसङ्गात् ।

उच्यते—सादृश्यज्ञानस्याऽध्यासकारणत्ववादेऽपि विशेषदर्शनप्रतिबध्येपु

यदि शङ्का की जाय कि जैसे स्वतः शुभ्र, सफेद रजतके पात्र विशेषमें स्थित निर्मल जलमें ही नीलिमाका अध्यास होता है, मोतीमें नहीं होता, इस प्रकार वस्तुके स्वभावविशेषसे व्यवस्था होती है, वैसे ही शुक्तिमें रजतका अध्यास होता है, इङ्गालमें नहीं होता, इस प्रकारकी व्यवस्था भी स्वभावसे हो सकती है, सादृश्य-ज्ञानकी अपेक्षासे नहीं होती है, तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि साक्षात् वस्त्रके खण्डमें कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास न होनेपर भी कैंचीसे कतर कर कमलाकार बनानेसे उसमें कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास देखा जाता है, इससे कमलाध्यासमें—वस्तुस्वभावका अनुरोध न करके † सादृश्यज्ञानके होनेपर होता है और न होनेपर नहीं होता—इस प्रकार सादृश्यज्ञके अनुरोधका निश्चय किया जाता है। अन्यथा अर्थात् वस्तुस्वभावको अध्यासके प्रति कारण माननेपर पटमें कतरनेके पूर्व भी कमलकी मुकुलावस्थाके अध्यासकी प्रसक्ति होगी।

* उक्त शङ्काका समाधान कहते हैं कि सादृश्यज्ञान अध्यासका कारण है,


‡ अर्थात् कतरनेसे सादृश्यज्ञान होनेपर ही कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास होता है, और उसके न होनेपर नहीं होता, अतः वस्तुस्वभावकी अपेक्षा न करके अन्वयव्यतिरेकसे अध्यास सादृश्यज्ञानकी अपेक्षा करता है, यह भाव है।

* विशेष अध्यासमें कारणरूपसे प्राप्त सादृश्यज्ञान द्वारा समादृत धर्मिज्ञानकी कारणताका परिहार करते हैं—'उच्यते' इत्यादि ग्रन्थसे। परिहारका तात्पर्य यह है कि विशेषदर्शनसे जिनकी उत्पत्ति नहीं होती, ऐसे 'शुक्तौ इदं रजतम्' इत्यादि अध्यासोंमें ही सादृश्यज्ञान कारण है और विशेषदर्शनसे जिन अध्यासोंका प्रतिबन्ध नहीं होता है, ऐसे अध्यासोंमें सादृश्यज्ञान कारण नहीं है, इस बातको धर्मिज्ञानकारणवादी अवश्य स्वीकार करेंगे शुक्तिरजतस्थलमें 'रजतत्वाभावव्याप्यशुक्तित्ववान् अयम्' (रजतत्वके अभावसे व्याप्य जो

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२२६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

रजताद्यध्यासेष्वेव तस्य कारणत्वं वाच्यम् ; न तु तदप्रतिबध्येपु पीत-शङ्खाद्यध्यासेषु, असम्भवात् । विशेषदर्शनप्रतिबध्येपु च प्रतिबन्धकज्ञानसामग्र्याः प्रतिबन्धकत्वनियमेन विशेषदर्शनसामग्र्यप्यवश्यं प्रतिबन्धिका वाच्येति तत एव सर्वव्यवस्थोपपत्तेः, किं सादृश्यज्ञानस्य कारणत्वकल्पनया ?

तथाहि—इङ्गालादौ चक्षुःसम्प्रयुक्ते तदीयनैल्यदिरूपविशेषदर्शनसामग्रीसत्त्वान्न रजताध्यासः शुक्त्यादावपि नीलभागादिव्यापिचक्षुःसम्प्रयोगे


इस वादमें भी विशेषदर्शनसे प्रतिबध्य रजत आदि अध्यासोंमें ही सादृश्यज्ञानको कारण मानना चाहिए, विशेषदर्शनसे जो प्रतिबध्य नहीं हैं, ऐसे पीत शङ्ख आदि अध्यासोंमें उसे कारण नहीं मानना चाहिए, क्योंकि वस्तुतः उन स्थलोंमें सादृश्य है ही नहीं। और विशेषदर्शनसे जिनका प्रतिबन्ध होता है, ऐसे शुक्तिरजत आदि अध्यासोंमें प्रतिबन्धक ज्ञानकी सामग्रीके † प्रतिबन्धकत्व-नियमसे विशेषदर्शनसामग्रीको भी अवश्य प्रतिबन्धक मानना चाहिए, इसलिए उसीसे सब व्यवस्थाकी उपपत्ति हो सकती है, तो सादृश्यज्ञानको क्यों कारण मानना ? अर्थात् उसे कारण माननेकी आवश्यकता नहीं है।

चक्षुसे संयुक्त इङ्गाल आदिमें उनके नीलरूप विशेषके दर्शनकी सामग्रीके होनेसे—रजतका अध्यास नहीं होता है। शुक्तिरजत आदि स्थलमें भी, जिसका कि नील भाग चक्षुसे संयुक्त है, विशेषदर्शन सामग्रीके होनेसे रजतका अध्यास


शुक्तित्व तदाश्रय यह है ) इस विशेषदर्शनसे 'इदं रजतम्' यह भ्रम नहीं होता है, किन्तु उसके अभावमें ही होता है, अतः विशेषदर्शनसे वह रजताध्यास प्रतिबध्य कहलाता है, 'पीतत्वाभावव्याप्यशङ्खत्ववान् अयम्' इस प्रकारके विशेषदर्शनके होनेपर भी 'पीतः शङ्खः' यह अध्यास होता है, अतः विशेष दर्शनसे यह प्रतिबध्य नहीं है, इसलिए धर्मिज्ञान इसमें कारण नहीं होगा, क्योंकि सचमुच पीत पदार्थका सादृश्य शंखमें है ही नहीं, यह भाव है।

† प्रतिबन्धक ज्ञानसे यहां विशेषदर्शनात्मक ज्ञान ही विवक्षित है। जैसे रजतादि अध्यासमें विशेषदर्शन प्रतिबन्धक है, वैसे ही उसकी सामग्री भी प्रतिबन्धक है, दाहकी प्रतिबन्धक मणिकी सामग्री लोकमें दाहके प्रतिबन्धकरूपसे प्रसिद्ध नहीं है, अतः ज्ञान पदका उपादान किया गया है, जो धर्मिज्ञान है, उसमें प्रतिबन्धकज्ञानत्व नहीं है, अतः उसमें भी प्रतिबन्धकत्वकी प्रसक्ति नहीं है, क्योंकि वह अध्यासका अनुगुण ही है। इसीलिए नैयायिकोंने पक्षमें साध्याभाववत्ता ज्ञानको ग्राह्याभावका अवगाहन करनेसे प्रतिबन्धक माना है। उसमें साध्याभावव्याप्यवत्ताज्ञानको प्रतिबन्धक ज्ञानकी सामग्रीके रूपसे अनुमितिका प्रतिबन्धक माना है। इस परिस्थितिमें इसी प्रतिबन्धकी सामग्रीके प्रभावसे अध्यासके कादाचित्कत्व

संकारणं अध्यासका विचार] भाषानुवादसहितं २२७


तत्सत्त्वान्न तदध्यासः। सदृशभागमात्रसम्प्रयोगे तदभावादध्यासः। तदाऽपि शुक्तिस्वरूपविशेषदर्शनसामग्रीसत्त्वादनध्यासप्रसङ्ग इति चेत्, न; अध्यास-समये शुक्तित्वदर्शनाभावेन तत्पूर्वं तत्सामग्र्यभावस्य त्वयाऽपि वाच्यत्वात्। मम सादृश्यज्ञानरूपाध्यासकारणदोषेण प्रतिबन्धात् तदा शुक्तित्वदर्शन-सामग्र्यभावाभ्युपगमः। तव तथाऽभ्युपगमे तु घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्त इति

नहीं होता है। केवल समान भागमें ही इन्द्रियका सम्बन्ध होनेसे विशेष-दर्शनकी सामग्रीके न होनेके कारण रजतका अध्यास होता है। इसपर शङ्का होती है कि रजतके सदृश शुक्तिके किसी हिस्सेके साथ संप्रयोगके समयमें भी शुक्तित्वरूप विशेषदर्शनकी सामग्रीके होनेसे रजतका अध्यास नहीं होना चाहिए, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि अध्यासके पूर्वमें तुमको भी * शुक्तित्व-रूप विशेषके दर्शनकी सामग्रीका अभाव कहना होगा, क्योंकि अध्यासके समयमें शुक्तित्वका ज्ञान नहीं है। यदि शङ्का हो कि हमें † तो सादृश्य-ज्ञानरूप अध्यासके कारण दोषसे प्रतिबन्ध होनेके कारण अध्यासकालमें शुक्तित्वदर्शनकी सामग्रीका अभाव है, यदि तुम सादृश्यज्ञानको अध्यासके प्रति कारण मानते हो, तो ‡ घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्त ही हुआ अर्थात्


आदिकी व्यवस्था हो सकती है, तो धर्मिज्ञानरूप इदमाकारवृत्तिको माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है, यह भाव है।

* तात्पर्य यह है कि केवल शुक्तिके रजतसदृश भागके साथ सम्बन्धकालमें जब चक्षुःसंयुक्त तादात्म्यरूप शुक्तित्वदर्शनकी सामग्री रहती है, तब भी अध्यास देखा जाता है, इससे शुक्तित्वरूप विशेषदर्शनकी सामग्रीका प्रतिबन्धक कोई दोष अवश्य कहना चाहिए, वह दोष प्रत्यासत्त्या दूरत्व आदि होगा—सादृश्यज्ञान नहीं होगा, अतः दोषरूपसे भी धर्मिज्ञान अध्यासके प्रति कारण नहीं हो सकेगा। यह सादृश्यज्ञानकी अध्यासकारणताका खण्डन करनेवालेका मन्तव्य है।

† इदमाकारवृत्तिरूप धर्मिज्ञानमें अध्यासकी कारणता माननेवालेको।

‡ धर्मिज्ञानकी कारणताके खण्डनमें प्रवृत्त तुम यदि सादृश्यज्ञानको कारण मानोगे, तो घट्टकुटी-प्रभातवृत्तान्त होगा। उक्त वृत्तान्तका आशय यह है—चुंगीके भयसे रात्रिको ही माल लेकर व्यापारी निकल पड़ा, परन्तु उसका जहाँ सवेरा हुआ, वहींपर चुंगीका ऑफिस आ गया, फलतः उसे अपनी मालकी सारी चुंगी देनी पड़ी, वैसे ही सादृश्यज्ञानकी कारणताका खण्डन करनेमें तो प्रवृत्त हुए, परन्तु प्रकारान्तरसे सादृश्यज्ञानमें कारणता माननी ही पड़ी, अतः घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्त उनके ऊपर लागू हुआ। घट्टकुटी कहते हैं चुंगीके ऑफिसको।

२२८सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ प्रथम परिच्छेदं

चेद्, न; समीपोपसर्पणानन्तरं रजतसादृश्यरूपे चाकचिक्ये दृश्यमाने एव शुक्तित्वोपलम्भेन तस्य तत्सामग्रीप्रतिबन्धकत्वासिद्धौ दूरत्वादिदोषेण प्रतिबन्धाद्वा व्यञ्जकनीलपृष्ठत्वादिग्राहकासमवधानाद्वा तत्सामग्रयभावस्य वक्तव्यत्वात् ।

एवं जलधिजले नियतनीलरूपाध्यासप्रयोजकदोषेण दूरे नीरत्वव्यञ्जक-


सादृश्यज्ञान अध्यासका कारण नहीं है, इस प्रकारके तुम्हारे सिद्धान्तका भङ्ग हुआ, तो यह भी ‡ युक्त नहीं है, क्योंकि शुक्तिके पास जानेके अनन्तर रजतके सदृश चाकचिक्यके देखनेपर भी शुक्तित्वका ज्ञान होता है, इससे सादृश्यज्ञान शुक्तित्वरूप विशेषके दर्शनकी सामग्रीका प्रतिबन्धक सिद्ध नहीं होता है और दूरत्व आदि दोषोंसे प्रतिबन्ध होनेके कारण अथवा शुक्तित्वको अभिव्यक्त करनेवाले नीलपृष्ठत्व आदिके ग्राहक ✻ साधनोंके न रहनेसे शुक्तित्वरूप विशेषके दर्शनकी सामग्रीका अभाव तुम्हें और हमें दोनोंको कहना होगा ।

इसी प्रकार अर्थात् जैसे सादृश्यज्ञानरूप दोषके बिना शुक्तिमें रजतका अध्यास होता है, वैसे ही दूरस्थ समुद्रके जलमें नील शिलातलत्वका अध्यास


‡ प्रकृतमें एक बात और ध्यान देने लायक है—किसी समयमें दूरस्थ पुरुषको भी शुक्तिमें शुक्तित्वग्रहण होता है, अतः सादृश्यज्ञानके समान दूरत्वदोषमें भी व्यभिचार समान ही है, इसी प्रकार रजतके लिए अत्यन्त लालायित पुरुषको समीपमें जानेपर भी शुक्तिकी प्रमा नहीं होती, इसलिए दूरत्व दोष ही नहीं होगा । यदि किसी विशेष अध्यासके प्रति किसी समय कोई दोष होता है, और किसी समयमें नहीं इस प्रकार व्यवस्था करेंगे, तो वही दीपज्वाला है, इस भ्रमकी, सादृश्यज्ञानरूप दोषसे ही लोकमें, प्रसिद्धि होनेसे सादृश्यज्ञानको भी अध्यासके प्रति कारणता अनिवार्य होगी । देवताधिकरणमें भाष्यकारने भी कहा है कि ‘सादृश्यात् प्रत्यभिज्ञानं केशादिष्विव’ केशोंके समान सादृश्यज्ञानसे प्रत्यभिज्ञा होती है—वही दीपज्वाला है इत्यादि । और बौद्धाधिकरणमें भी ‘सादृश्यनिमित्तं प्रत्यभिज्ञानम्’ अर्थात् सादृश्यसे ही प्रत्यभिज्ञान होता है—ऐसा कहा गया है । अतः सादृश्यज्ञानको अध्यासके प्रति कारणत्वका निराकरण करना असङ्गत है, यह शङ्का यद्यपि हो सकती है, तथापि प्रकृतमें स्थूल विचार होनेसे—वह दोषावह नहीं है, सूक्ष्मदृष्टिसे तो सादृश्यज्ञानमें अध्यासकारणत्व है ही, यह भाव है ।

✻ ग्राहकसाधनोंसे शुक्ति आदिके नीलपृष्ठ आदि भागोंके साथ चक्षुःसंयोग आदिका ग्रहण करना चाहिए ।

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सकारण अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित २२९


तरङ्गादिग्राहकासमवधानेन च शौक्ल्यजलराशित्वादिविशेषदर्शनसामग्र्य-भावाञ्छिलातलत्वाद्यध्यासः । विस्तृते पटे परिणाहरूपविशेषदर्शनसामग्री-सत्त्वान्न पुण्डरीकमुकुलत्वाध्यासः; कर्तनादिविघटिततदाकारे तदभावात्तद-ध्यास इति ।

हो सकता है *, क्योंकि अध्यासके कारणभूत नियत नीलरूप दोषसे, और दूर होनेसे नीरत्वके अभिव्यञ्जक तरङ्ग आदिका ग्रहण करनेवाले साधनोंका समवधान न होनेसे शुक्लरूप, जलराशित्व आदि विशेषोंके दर्शनकी सामग्रीका अभाव है † । और विस्तृत वस्त्रमें इसलिए कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास नहीं होता है कि उस समयमें विस्ताररूप विशेषदर्शनकी सामग्री है, और कतरनेसे कमलाकार हो जानेसे विस्ताररूप विशेषदर्शनकी सामग्रीके न होनेसे उसमें कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास होता है ‡ ।


* तात्पर्य यह है कि जलमें जो नीलशीलातलत्वका अध्यास होता है, उसमें शुक्लरूपात्मक विशेषका परिज्ञान या जलत्वरूप विशेषका परिदर्शन प्रतिबन्धक है, और इन विशेषदर्शनोंकी सामग्री भी प्रतिबन्धक होगी, इसलिए इन विशेषोंके परिज्ञानकी सामग्रीका अभाव होनेसे ही जलमें नीलशीलातलत्वका अध्यास होता है। पहले जलमें नैल्यका अध्यास होनेके बाद सादृश्यज्ञानके द्वारा होनेसे उसमें नीलशीलातलत्वका अध्यास होता है, यह बात नहीं है, दूरस्थ समुद्रजलमें तथा समीपस्थ समुद्रके जलमें नैल्यका नियमतः अध्यास होता है, अतः उसमें नैल्यकाभ्यास नियत से शुक्लरूप, जलत्व आदि विशेषके ग्रहणकी सामग्री अप्रतिबद्ध नहीं है, क्योंकि नैल्यके अभ्याससे शुक्ल रूपकी ग्राहक सामग्री प्रतिबद्ध हो गई है और जलत्वके व्यञ्जक तरङ्ग आदिके ग्रहणका भी दूरत्व दोषसे सन्निधान नहीं है, इसलिए जलत्वका भी ग्रहण नहीं होता है, अतः उक्त प्रतिबन्धक दो ज्ञानोंकी सामग्रीका अभाव होनेसे समुद्रजलमें नीलशीलातलत्वका अध्यास हो सकता है, यह भाव है।

† यहाँपर धर्मिज्ञानमें कारणत्ववादियोंका मत यह है कि समुद्रके जलमें उक्त प्रकारसे विशेषदर्शनसामग्रीका अभाव अपेक्षित है, तथापि उतनेसे ही उसमें वह अध्यास नहीं हो सकता, किन्तु प्रथम जलमें नीलरूपके अध्याससे नीलशिलातलके सादृश्यकी प्रसक्ति होगी और उसके बाद जलमें नीलशिलातलत्वका अध्यास होगा, इसलिए दूरसे समुद्रजलमें उक्त अध्यास करनेवाले समुद्रके पास जाकर कहते हैं कि इस समुद्रके जलमें दूरसे नीलत्व, निश्चलत्व आदिकी समानतासे नीलशिलातलत्वका अध्यास हमें हुआ था, परन्तु अब वह निवृत्त हो गया, इस प्रकारके लोकव्यवहारके देखनेसे सादृश्यज्ञान ही दोषरूपसे अध्यासके प्रति कारण होता है, केवल विशेषदर्शनकी सामग्रीका अभाव नहीं।

‡ अध्यासके प्रति विशेषदर्शनकी सामग्रीके अभावको जो कारण मानते हैं, उनके प्रति ‘स्वतः पद्मपुटे’ (पृ० २२५) इत्यादिसे सादृश्यज्ञानके कारणत्वकी सिद्धिके लिए अन्वय और


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३३०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

नन्वेवं करस्पृष्टे लोहशकले तदीयनीलरूपविशेषदर्शनसामग्र्यभावात् रजताध्यासः किं न भवेत्? सादृश्यज्ञानानपेक्षणादिति चेद्; भवत्येव; किन्तु ताम्रादिन्यावर्तकविशेषदर्शनसामग्र्यभावात् तदध्यासेनाऽपि भाव्यमिति क्वचिदनेकाध्यासे संशयगोचरो भवति। क्वचित्तु रजतप्राये कोशगृहादौ रजताध्यास एव भवति। क्वचित् सत्यपि सादृश्यज्ञाने शुक्तिकादौ कदाचित् करणदोषाद्यभावेनाऽध्यासानुदयवदध्यासानुदयेऽपि न हानिः।

इस विषयमें एक शङ्का होती है वह यह कि यदि सादृश्यज्ञानके विना केवल विशेषदर्शनकी सामग्रीके अभावसे ही अध्यासकी उत्पत्ति होती है, ऐसा माना जाय, तो लोहेके टुकड़ेको हाथसे छूनेपर उसमें रजतका अध्यास क्यों नहीं होता है? क्योंकि लोहेके नीलरूपविशेषके दर्शनकी सामग्रीका अभाव उस स्थलमें है, परन्तु यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसे स्थलमें लोहेके टुकड़ेमें रजतका अध्यास होता ही है। किन्तु ताम्र आदिकी व्यावृत्ति करने-वाली विशेषदर्शनकी सामग्रीका अभाव होनेसे ताम्र आदिका अध्यास भी हो सकता है, इस प्रकार हाथोंसे स्पृष्ट लोहेके टुकड़ेमें अनेक अध्यास—अध्यस्त वस्तुएँ—संशयके विषय होते हैं, [अर्थात् यह रजत है या ताम्र है अथवा सुवर्ण है, इस तरह संशय होता है]। किसी स्थलमें अर्थात् जिस खजानेमें † रजतका ही आधिक्य है, ऐसे स्थानमें तो लोहेमें रजतका ही अध्यास होता है। जैसे सादृश्यज्ञानके रहनेपर भी शुक्ति आदिमें—कदाचित् करण-दोषके अभावसे—रजतका अध्यास नहीं होता है, वैसे ही हमारे मतमें भी कदाचित् अध्यास नहीं हो, तो भी हानि नहीं है।


व्यतिरेक दिखाये गये हैं, उसीका 'विस्तृते पटे' इत्यादिसे खण्डन किया गया है, अर्थात् लम्बे घटमें जो पटका विस्तार देखा जाता है वही अध्यासमें प्रतिबन्धक है और कैंचीसे ठीक उसकी कमलाकृति बना लेनेपर उसमें उक्त सामग्रीके अभावसे कमलकी मुकुलावस्थाका अध्यास हो सकता है, अतः सादृश्यज्ञान अपेक्षित नहीं है, यह प्रकृतमें भाव है।

† जिसमें सदा रजत ही रखा जाता है, ऐसे कोशगृहमें प्राप्त पुरुष को, दैवसे किसी लोहेके टुकड़ेको छूनेपर भी उसमें उसे रजतका ही अध्यास होता है, क्योंकि उस कोशगृहमें लोहेकी सम्भावना ही उसे नहीं है, इसलिए ऐसे स्थलमें रजत है, या ताम्र है, ऐसा संशयात्मक अध्यास नहीं होता है। और जहाँ ऐसी स्थिति नहीं है वहाँ तो मूलोक्त रीतिसे संशय होता ही है, यह भाव है।

सकारण अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित १३१

तस्मान्न कार्यकल्प्या इदमाकारवृत्तिः, नाऽप्यप्रतिबद्देदमर्थसम्प्रयोग- कारणकल्प्या; ततो भवन्त्या एवेदंवृत्तेर्दुष्टेन्द्रियसम्प्रयोगक्षुभिताविद्या- परिणामभूतस्वसमानकालरजतविषयत्वस्याऽस्माभिरुच्यमानत्वात् । तत्र च ज्ञानसमानकालोत्पत्तिके प्रतिभासमात्रविपरिवर्तिनि रजते तत्प्राचीन- सम्प्रयोगाभावेऽपि तत्तादात्म्याश्रयेदमर्थसम्प्रयोगादेव तस्याऽपि चक्षुर्ग्राह्य- त्वोपपत्तेः । ‘चक्षुषा रजतं पश्यामि’ इति प्रातिभासिकरजतस्य स्वसम्प्र- योगाभावेऽपि चाक्षुषत्वानुभवात् ।

उक्त रीतिसे धर्मिज्ञानके अध्यासके प्रति हेतु न होनेके कारण इदमा- कारवृत्तिकी ( अध्यासस्वरूप ) कार्यसे कल्पना नहीं करनी चाहिए और प्रति- बन्धसे शून्य इदमर्थके साथ इन्द्रिय संयोगरूप कारणसे भी उसकी कल्पना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इन्द्रियसम्प्रयोगसे उत्पन्न होनेवाली इदमाकार वृत्तिका ही—दुष्ट इन्द्रियके सम्प्रयोगसे क्षुभित अविद्याका परिणामभूत तथा इदमाकारवृत्तिके समानकालमें उत्पन्न हुआ रजत विषय होता है, ऐसा हम कहते हैं । [ तात्पर्य यह है कि इदमर्थावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाली रजताकारमें परिणम्यमान अविद्या—अध्यासमें निमित्तभूत दोषसे युक्त चक्षु आदिके सम्प्रयोगसे क्षोभको अर्थात् कार्योन्मुखताको प्राप्त होती है, इसके बाद रजतरूपसे परिणत होती है, इसी प्रकार दुष्ट इन्द्रियके सम्प्रयोगसे वृत्ति भी उसी कालमें होती है, इसलिए अप्रतिबद्ध इन्द्रियके सम्प्रयोगसे होनेवाली इदंवृत्ति अपने समानकालमें उत्पन्न हुए रजतसे विशिष्ट इदमर्थको विषय करती है ] । भ्रमस्थलमें ज्ञानके समानकालमें उत्पन्न तथा प्रतीतिकालमें ही जिसकी* सत्ता है, ऐसे रजतमें, रजतप्रतिभाससे पूर्व, सम्प्रयोग न होनेपर भी रजततादात्म्यके आश्रय इदमर्थके सम्प्रयोगसे ही रजत चक्षुसे गृहीत होता है, क्योंकि ‘आँखसे रजतको देखता हूँ’ इस प्रकार अपने साथ इन्द्रियसम्प्रयोगके न रहते भी प्रातिभासिक रजतका चक्षुसे प्रत्यक्ष देखा जाता है ।


* इस शब्दका अर्थ है—प्रतिभासकालमात्रे विपरिवर्तनम्—सत्त्वं यस्य तत् प्रतिभासमात्र- विपरिवर्ति, तस्मिन् प्रतिभासमात्रनिपरिवर्तिनि अर्थात् जिसका अस्तित्व केवल प्रतीतिकालमें ही है—प्रतीतिसे व्याप्त है सत्ता जिसकी ऐसा रजत, यह भाव है ।

२३२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद

'न च स्वसम्प्रयोगाभावादेव बाधकान्न तच्चाक्षुषम्, नाऽपि दुष्टेन्द्रिय- सम्प्रयोगजन्यम् इदंवृत्तिसमकालम्, ज्ञानकारणस्येन्द्रियसम्प्रयोगस्याऽर्थका- रणत्वाक्लप्तेः । किन्त्विदंवृत्यनन्तरभावि तज्जन्यं तदभिव्यक्ते साक्षिण्य- ध्यासात् तद्भास्यम् ।' चाक्षुषत्वानुभवस्तु स्वभासकचैतन्याभिव्यञ्जकेदं- वृत्तिजनकत्वेन परम्परया चक्षुरपेक्षामात्रेणेति वाच्यम्, तथा सति पीत-

शङ्का होती है—'इदं रजतम्' इसमें रजतका चाक्षुष प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकता है, क्योंकि उसके साथ इन्द्रियसम्प्रयोग ही नहीं है, यह बाधक है। और इदंवृत्तिके समानकालमें वह रजत दुष्ट इन्द्रियके सम्प्रयोगसे उत्पन्न भी नहीं हो सकता है, क्योंकि जो इन्द्रियसंयोग ज्ञानके प्रति कारणरूपसे क्लृप्त है, वह अर्थके प्रति कहींपर भी कारणरूपसे निश्चित नहीं है। किन्तु वृत्तिके उत्तर कालमें वृत्तिसे ही उत्पन्न होता है और वृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यमें उसका अध्यास होनेसे साक्षीसे ही वह रजत भास्य * है, और रजतमें जो चाक्षुषत्वका अनुभव होता है, वह तो शुक्तिरजतके अवभासक इदमवच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यञ्जक इदंवृत्तिके प्रति [ चक्षुके कारण होनेसे ] परम्परया † चक्षुकी अपेक्षा है, इसलिए होता है, परन्तु यह शङ्का युक्त


* पहले इन्द्रियके सम्प्रयोगसे केवल 'इदम्' अर्थको विषय करनेवाली वृत्ति उदित होती है, और अध्यासकी निमित्तकारण इस इदंवृत्तिसे अविद्या कार्योन्मुखताको प्राप्त कर रजताकारसे परिणत होती है, परिणत रजतका अधिष्ठान होगा—इदमाकारवृत्तिसे अभिव्यक्त इदमवच्छिन्न चैतन्य, इसलिए अहङ्कार आदिके समान वृत्तिके बिना ही अध्यस्त रजत आदिका अवभास होगा, इदमाकार वृत्तिकादाचित्कत्व होनेसे रजताध्यासकी सर्वदा प्रसक्ति नहीं हो सकती है, यदि इस विषयमें शङ्का हो कि शुक्तिरूप्य, जो बाह्यचैतन्यसे ही भास्य है, अहङ्कारके समान साक्षीसे भास्य कैसे होगा ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि साक्षिभास्य शब्दका अर्थ है—विषयकी ज्ञानरूप वृत्तिसे अनुपहित चैतन्यसे जिसका अवभास होता हो, इसलिए अहङ्कार आदिका अवभासक चैतन्य अविद्या विषयके अज्ञानात्मक वृत्तिसे उपहित नहीं होता है, वैसे शुक्तिरजतका अवभासक चैतन्य भी शुक्तिरजत आदि विषयक ज्ञानात्मक वृत्तिसे उपहित नहीं होता है, अतः वह साक्षिभास्य है, इसलिए उक्त शङ्काका अवसर नहीं है, यह भाव है।

† परम्परयाका तात्पर्य यह है कि यद्यपि 'इदं रजतम्' इसमें रजतांशका चक्षुसे ज्ञान होता है, यह अनुभव है, तथापि वह गौण है, प्राधान्यसे नहीं है क्योंकि उस स्थलमें इदमर्थ रूप अधिष्ठानकी वृत्तिकाके लिए चक्षुकी अपेक्षा होती है। रजतगोचर वृत्तिके लिए नहीं, इसलिए किसी अंशमें चक्षुकी अपेक्षा होनेके कारण चाक्षुषत्वकी रजतांशमें परम्परया उपपत्ति होती है।

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सकारण अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित २३३


शङ्खभ्रमे चक्षुरनपेक्षाप्रसङ्गात् । नहि तत्र शङ्खग्रहणे चक्षुरपेक्षा; रूपं विना केवलशङ्खस्य चक्षुर्ग्राह्यत्वायोगात् । नाऽपि पीतिमग्रहणे, आरोप्ये ऐन्द्रियकत्वानभ्युपगमात् ।

न च पीतिमा स्वरूपतो नाऽध्यस्यते, किन्तु नयनगतपित्तपीतिम्नोऽनुभूयमानस्य शङ्खसंसर्गमात्रमध्यस्यत इति पीतिमाऽनुभवार्थमेव चक्षुरपेक्षेति वाच्यम्; तथा सति शङ्खतत्संसर्गयोरप्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात् । नयनप्रदेशगतपित्तपीतिमाऽऽकारवृत्त्यभिव्यक्तसाक्ष्यसंसर्गेण तयोस्तद्भास्यत्वाभावात् । पीतिमसंसृष्टशङ्खगोचरैकवृत्त्यनभ्युपगमाच्च ।


नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे अर्थात् अधिष्ठानके इन्द्रियजन्यज्ञानके लिए ही इन्द्रियकी अपेक्षा है और आरोप्यके इन्द्रियजन्यज्ञानके लिए इन्द्रियकी अपेक्षा नहीं है, ऐसा स्वीकार करनेसे पीत शङ्खके भ्रमस्थलमें चक्षुकी अपेक्षा नहीं होगी, क्योंकि वहाँ शङ्खके ग्रहणमें चक्षुकी अपेक्षा ही नहीं है, कारण कि रूपके बिना शुद्ध शङ्खका चक्षुसे प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, और पीतिमाके ग्रहणमें भी चक्षुकी अपेक्षा नहीं है, क्योंकि आरोप्य पदार्थका इन्द्रियजन्यज्ञान माना ही नहीं गया है ।

शङ्का होती है कि शङ्खमें स्वरूपतः * पीतरूपका अध्यास नहीं होता किन्तु अनुभूयमान चक्षुमें रहनेवाले पित्तदोषके पीतरूपका शङ्खमें सम्बन्धमात्र अध्यस्त होता है, इसलिए पीतिमाके अनुभवके लिए चक्षुकी अपेक्षा है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि यदि नेत्रगत पित्तद्रव्यके ही पीतरूपका अनुभवस्वीकार किया जाय, तो शङ्ख और पीतके संसर्गका प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा, क्योंकि नेत्रप्रदेशमें रहनेवाले पित्तद्रव्यका जो पीतरूप है, उस पीताकारवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यरूप साक्षीके साथ शङ्ख और शङ्खमें आरोपित पीतसंसर्गका सम्बन्ध न होनेके कारण शङ्ख और पीतसंसर्गका


* जैसे शुक्तिमें रजतका स्वरूपसे अध्यास होता है, वैसे ही शङ्खमें पीतरूपका स्वरूपसे अध्यास नहीं होता, किन्तु नेत्रमें विद्यमान पीतरूपसे युक्त जो पित्तलक्षण द्रव्य है, उसकी जो पीतिमा है, जिसका कि उस पित्तद्रव्यमें अनुभव होता है, उसका शङ्खमें सम्बन्धमात्र प्रतीत होता है, जैसे लोहित कुसुममें अनुभूयमान रक्तरूपके संसर्गका समीपवर्ती स्फटिकमें अध्यास होता है, इस विषयमें किसीको यदि शङ्का हो कि अन्यके रूपका अन्यत्र आरोप करेंगे, तो अन्यथाख्यातिका प्रवृत्ति होगी ? तो कहिए कि अन्यथाख्यातिका

३०

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२३४ सिद्धान्तलेशसङ्ग्रह [ प्रथम परिच्छेद

न च नयनप्रदेशस्थितस्य पित्तपीतिम्नो दोषाच्छङ्खे संसर्गाध्यासो नोपेयते; किन्तु नयनरश्मिभिः सह निर्गतस्य विषयव्यापिनस्तस्य तत्र संसर्गाध्यासः । कुसुम्भारुणित इव कौसुम्भ इति सम्भवति तदाकारवृत्त्यभिव्यक्तसाक्षिसंसर्ग इति वाच्यम् ; तथा सति सुवर्णलिप्त इव पित्तोपहतनयनेन वीक्ष्यमाणे शङ्खे तदितरेषामपि पीतिमधीप्रसङ्गात् ।

न च स पीतिमा समीपे गृहीत एव दूरे ग्रहीतुं शक्यः, विहायसि उपर्युत्पतन्विहङ्गम इव इतरेषां च समीपे न ग्रहणमिति वाच्यम् ;


साक्षीसे भान ही नहीं होगा और पीतिमासे सम्बद्ध शङ्खविषयक एक वृत्तिका अङ्गीकार भी नहीं है, [ जिससे कि उसके द्वारा भी उनका प्रत्यक्ष हो ] ।

यदि कहो कि नेत्रप्रदेशमें स्थित पित्तद्रव्यकी पीतिमाके दोषसे शङ्खमें संसर्गाध्यास नहीं होता है, किन्तु नयनरश्मियोंके साथ निकलकर विषय-देशको अर्थात् शङ्खरूप अधिष्ठानको व्याप्त पित्तद्रव्यकी पीतिमाका ही शङ्खमें संसर्गाध्यास होता है, जैसे रक्तरङ्गसे व्याप्त पटमें रक्तरङ्गमें अनुभूयमान रक्तरूपके ही संसर्गका भान होता है, इसलिए पित्तपीतमाकारवृत्तिसे शङ्खदेशमें चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेसे शङ्खपित्तपीतिमाके संसर्गका अपरोक्षानुभव हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे सुवर्णसे लिप्त पदार्थ सभी को पीत भासता है, वैसे ही पित्तदोषसे दुष्ट नेत्र द्वारा देखे गये शङ्खमें सभीको पीतिमबुद्धिकी प्रसक्ति होगी [ कारण कि नयनगत पित्तपीतिमाका, जिसका कि अन्य भी अनुभव कर रहे हैं, उनको भी शङ्खके साथ उसका सम्बन्ध होनेसे 'पीतः शङ्खः' इस ज्ञानकी प्रसक्ति होगी, यह भाव है ] ।

यदि कहो कि उस पीतिमाका दूरमें तभी ग्रहण हो सकता है, जब कि उसका समीपमें ग्रहण हुआ हो, जैसे आकाशमें ऊपर उड़े हुए पक्षीका तभी ग्रहण हो सकता है, जब कि उसका समीपमें ग्रहण हुआ हो, वैसे ही उस पित्तद्रव्यकी पीतिमाका समीपमें दूसरोंने ग्रहण नहीं किया, अतः उसका दूसरोंको अनुभव


प्रसक्ति नहीं होगी, क्योंकि वहांपर अध्यस्यमान अनिर्वचनीय संसर्गकी ही उत्पत्ति मानते हैं, इसलिए अन्यथाख्यातिवादकी प्रसक्ति नहीं है, अन्यथाख्यातिवादी अनिर्वचनीय पदार्थकी उत्पत्ति नहीं मानते हैं, इसलिए अन्यथाख्यातिवादसे संसर्गाध्यास अवश्य विलक्षण है, यह भाव है ।

संकारणे अध्यासका विचारं ] भाषानुवादसहितं २३५


इतरेषामपि तच्चक्षुर्निकटन्यस्तचक्षुषां पीतिमसामीप्यसत्त्वेन तद्ग्रहणस्य दुर्वारत्वात् । एवमप्यतिधवलसिकतामयतलप्रवहदच्छनदीजले नैल्यध्यासे गगननैल्यध्यासे च रक्तवस्त्रेषु निशि चन्द्रिकायां नैल्यध्यासे चाऽनुभूयमानारोपस्य वक्तुमशक्यत्वेन तत्र नैल्यसंसृष्टाधिष्ठानगोचरचाक्षुषवृत्त्यनभ्युपगमे चक्षुरनुपयोगस्य दुष्परिहरत्वाच्च ।

'अनास्वादिततिक्तरसस्य बालस्य मधुरे तिक्तावभासो जन्मान्तरानुभवजन्यसंस्कारहेतुकः' इति प्रतिपादयता पञ्चपादिकाग्रन्थेन


नहीं * होता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस पुरुषके पाण्डुरोगी चक्षुकी सन्निधिमें चक्षुओंको ले जानेवाले अन्य पुरुषोंको भी पीतिमाका सामीप्य होनेसे 'पीतः शङ्खः' यह ज्ञान दुर्वार हो जायगा † । ऐसे ही अत्यन्त श्वेत बालुकामय तलमें बहनेवाले स्वच्छ नदी जलमें नीलत्वके अध्यासमें, गगनमें नैल्यके अध्यासमें तथा चाँदनी रातमें रक्त वस्त्रमें नैल्यके अध्यासमें आरोप्यके सर्वथा अनुभूयमान न होनेसे वहाँ नीलतासे संयुक्त अधिष्ठानविषयक नेत्रवृत्तिका स्वीकार न होनेके कारण चक्षुकी अनुपयोगिताका परिहार किया ही नहीं जा सकता ।

'इस जन्ममें जिसने अपनी रसनासे तिक्तताका (तीतेपनका) अनुभव नहीं किया है, ऐसे बालकको मधुर दूधमें तिक्तताका ‡अवभास—साक्षात्कार—जन्मान्तरके अनुभूत तिक्तरसके संस्कारसे होता है, इस प्रकारसे प्रतिपादन करने-


* तात्पर्य यह है कि नेत्रदेशसे विषयके प्रति पित्तद्रव्यके जानेके समय जैसे पित्तसे युक्त पुरुष नयनदेशसे लेकर विषयदेशतक पीतिमाका ग्रहण करता है, वैसे ही अन्य-पुरुष भी नेत्रदेशसे लेकर विषयदेशतक यदि उसका ग्रहण करें, तो उनको 'पीतः शङ्खः' यह प्रतीति हो, परन्तु ग्रहण नहीं करते हैं, अतः उसका ग्रहण नहीं होता है, जैसे आकाशमें उड़नेके समयमें पक्षीका भूम्यदेशसे लेकर ऊपर तक जो पुरुष ग्रहण करता है वही पुरुष आकाशमें दूर जानेपर भी पक्षीका ग्रहण करता है, अन्य ग्रहण नहीं कर सकते हैं, वैसे प्रकृतमें भी है।

† आशय यह है—आकाशमें ऊपरको गये हुए पक्षीको देखता हुआ कोई पुरुष अन्यके प्रति यदि कहे कि जिधर मेरी आँखें गई हैं उधर ही तुम भी अपनी आँखें लगाओ तो तुम्हें भी वह पक्षी दिखाई पड़ेगा, ऐसा करनेपर अन्य पुरुष भी उस पक्षीको देखता है, वैसे प्रकृतमें नहीं है ।

‡ इस ग्रन्थमें तिक्तताका अवभास संस्कारसे सहकृत रसनाजन्य है, ऐसा प्रतीत होता है, क्योंकि उसको केवल संस्कारजन्य माननेसे स्मृतित्वकी प्रसक्ति होगी । इसलिए तिक्तताके अध्यासके

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२३६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

स्वरूपतोऽध्यस्यमानस्यैव तिक्तरसस्यैन्द्रियकत्वस्फुटीकरणाच्च । अन्यथा तत्र रसनाव्यापारापेक्षाऽनुपपत्तेः ।

तस्मादुदाहृतनैल्यध्यासस्थलेष्वधिष्ठानसम्प्रयोगादेव तद्गोचरचाक्षुषवृत्तिसमकालोदयोऽध्यासः तस्या वृत्तेर्विषय इति तस्य चाक्षुषत्वमभ्युपगन्तव्यम् । रूपं विना केवलाधिष्ठानगोचरवृत्त्यभावे च विषयचैतन्याभिव्यक्त्यभावेन जलतदध्यस्तनैल्य्यादीनां तद्भास्यत्वायोगात् । तिक्तरसाध्यासस्थले त्वधिष्ठानाध्यासयोरेकेन्द्रियग्राह्यत्वाभावात् त्वगिन्द्रियजन्याधिष्ठानगोचरवृत्त्या तदवच्छिन्नचैतन्याभिव्यक्तौ पित्तोपहतरसनसम्प्रयोगादेव तत्र

वाले पञ्चपादिकाग्रन्थसे स्वरूपतः अध्यस्यमान तिक्तरसमें ही इन्द्रियजन्यज्ञान-विषयत्वका स्पष्टीकरण किया गया है, अन्यथा अर्थात् आरोप्य तिक्तरस यदि इन्द्रियका विषय न माना जाय, तो बालकको तिक्तत्वके अवभासमें रसनाके व्यापारकी अपेक्षा ही नहीं † होगी ।

इससे * जिन नैल्य आदिके अध्यासोंका कथन किया गया है, उन अध्यास स्थलोंमें अधिष्ठानके सम्प्रयोगसे ही अधिष्ठानविषयक चाक्षुषवृत्तिके समकालमें उत्पन्न होनेवाले नीलरूप आदि अध्यास—अध्यस्त पदार्थ—उस वृत्तिके विषय होते हैं, इससे उस अध्यासको चक्षुसे जन्य मानना चाहिए। रूपके विना केवल अधिष्ठान-विषयक वृत्तिके न होनेपर अर्थात् आरोपित पीतरूप आदिसे विशिष्ट शङ्ख आदि अधिष्ठानविषयक वृत्तिका स्वीकार न होनेपर विषयावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति न होनेसे जल आदि तथा उससे अवच्छिन्न चैतन्यमें अध्यस्त नीलरूप आदिका चैतन्यसे अवभास ही नहीं होगा । तीतेपनका [ जिस स्थलमें बालकको दुग्धमें ] अध्यास होता है, उस स्थलमें, तो अधिष्ठान और अध्यासका एक इन्द्रियसे ग्रहण न होनेके कारण त्वक् इन्द्रियसे उत्पन्न अधिष्ठानको विषय करनेवाली वृत्तिसे मधुर आदि द्रव्यरूप अधिष्ठानावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेपर पित्तदोषसे दूषित रसनाके सम्प्रयोगसे ही अधिष्ठानावच्छिन्न चैतन्यमें


† अधिष्ठानभूत मधुर द्रव्यका रसनासे प्रत्यक्ष होनेके कारण परिशेषात् स्वरूपतः अध्यस्यमान तिक्त रसमें ही रसनेन्द्रियजन्यवृत्तिविषयत्व है, ऐसा स्पष्ट किया गया, अतः यह ग्रन्थ आरोप्यके ऐन्द्रियकत्व होनेमें प्रमाण है, यह भाव है।

* अर्थात् अध्यस्यमान पदार्थको जो साक्षिभास्य मानते हैं, उनके मतमें पीतशङ्ख आदि अध्यासोंमें चक्षुकी अनुपयोगिताके परिहारका असम्भव होनेसे, यह अर्थ है ।

सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २३७

तिक्तरसाध्यासः तन्मात्रविषयरासनवृत्तिश्च समकालमुदेतीति तिक्तरसस्य रासनत्वमप्यभ्युपगन्तव्यम् । त्वगिन्द्रियजन्याधिष्ठानगोचरवृत्त्यभिव्यक्तचैतन्यभास्ये तिक्तरसे परम्परयाऽपि रसनोपयोगाभावेन तत्र कथमपि प्रकारान्तरेण रासनत्वानुभवसमर्थनासम्भवात् । तथैव रजतस्याऽपि चाक्षुषत्वोपपत्तेः ‘पश्यामि’ इत्यनुभवो न बाधनीयः । न चाऽसम्पयुक्तस्य रजतस्य चाक्षुषत्वे ‘प्रत्यक्षमात्रे विषयेन्द्रियसन्निकर्षः कारणम्,’ ‘द्रव्यप्रत्यक्षे

अध्यस्त तिक्तरसका और तिक्तमात्रको विषय करनेवाली रासनवृत्तिका एक कालमें * उदय होता है, अतः तिक्त रसका रसनासे प्रत्यक्ष होता है, यह मानना चाहिए, क्योंकि त्वगिन्द्रियसे उत्पन्न होनेवाली अधिष्ठानविषयकवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यसे भास्य तिक्तरसमें रसनाका परम्परा भी उपयोग नहीं होता है, इसलिए अन्य किसी प्रकारसे भी तिक्तरसका रसनासे प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । वैसे ही अर्थात् जैसे रसना (जिह्वा) इन्द्रियकी वृत्तिको लेकर तिक्तरसमें रासनत्वका अनुभव माना गया, वैसे ही चक्षुकी वृत्तिके आधारपर रजत आदिमें चाक्षुषत्वानुभवका समर्थन हो सकता है, अतः ‘रजतं पश्यामि’ (रजतको देखता हूँ) इस प्रकार चाक्षुषानुभवका † बाध मानना युक्तियुक्त नहीं है। यदि शङ्का हो कि इन्द्रियसे असम्प्रयुक्त रजतका प्रत्यक्ष माननेपर ‘प्रत्यक्षमात्रमें विषय और इन्द्रियका संसर्ग कारण है, ‘द्रव्यके प्रत्यक्षमें


* तात्पर्य यह है कि पित्तरूप दोषसे तिरस्कृत जो रसनेन्द्रिय है, उसके साथ मधुर द्रव्य-रूप अधिष्ठानका सम्बन्ध होनेसे मधुरद्रव्यावच्छिन्न चैतन्यमें तिक्तरसाध्यास उत्पन्न होता है, इसीके साथ-साथ अध्यस्यमान तिक्तरसको ही विषय करनेवाली रासनवृत्ति भी उत्पन्न होती है, इसलिए तिक्तरसका रसनासे अनुभव होता है, चाक्षुष स्थलमें जैसे अधिष्ठान और आरोप्यके एकवृत्तित्वयोग्यत्व होनेसे इन्द्रियजन्यज्ञान विषयता है, वैसे प्रकृत में नहीं है ।
† अर्थात् जैसे रजत आदिके अध्यासस्थलमें धर्मिविषयक वृत्तिके उत्पादनद्वारा चाक्षुषत्वका समर्थन किया जाता है, वैसे प्रकृतमें मधुरद्रव्यरूप धर्मिविषयक वृत्तिके उत्पादनद्वारा रासनत्वका समर्थन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि मधुरद्रव्यरूप धर्मी सर्वथा रसनाके अयोग्य है—द्रव्यके ग्रहणमें रसनाकी सामर्थ्य नहीं है । इसलिए परम्परासे भी तिक्त रसका रसनासे ग्रहण नहीं हो सकता है, अतः रासनवृत्तिकी समकालमें उत्पत्ति माननी पड़ती है । यद्यपि साक्षीसे भासित स्वाप्निक पदार्थोंमें रासनत्व, चाक्षुषत्व आदिके आरोपका जैसे आगे प्रतिपादन किया जायगा, वैसे ही प्रकृतस्थलमें रासनत्व आदिकी उपपत्ति कर सकते हैं, तथापि उस विषयके ऊपर दृष्टि न देकर ही यह कहा गया है ।

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