भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २३७

तिक्तरसाध्यासः तन्मात्रविषयरासनवृत्तिश्च समकालमुदेतीति तिक्तरसस्य रासनत्वमप्यभ्युपगन्तव्यम् । त्वगिन्द्रियजन्याधिष्ठानगोचरवृत्त्यभिव्यक्तचैतन्यभास्ये तिक्तरसे परम्परयाऽपि रसनोपयोगाभावेन तत्र कथमपि प्रकारान्तरेण रासनत्वानुभवसमर्थनासम्भवात् । तथैव रजतस्याऽपि चाक्षुषत्वोपपत्तेः ‘पश्यामि’ इत्यनुभवो न बाधनीयः । न चाऽसम्पयुक्तस्य रजतस्य चाक्षुषत्वे ‘प्रत्यक्षमात्रे विषयेन्द्रियसन्निकर्षः कारणम्,’ ‘द्रव्यप्रत्यक्षे

अध्यस्त तिक्तरसका और तिक्तमात्रको विषय करनेवाली रासनवृत्तिका एक कालमें * उदय होता है, अतः तिक्त रसका रसनासे प्रत्यक्ष होता है, यह मानना चाहिए, क्योंकि त्वगिन्द्रियसे उत्पन्न होनेवाली अधिष्ठानविषयकवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यसे भास्य तिक्तरसमें रसनाका परम्परा भी उपयोग नहीं होता है, इसलिए अन्य किसी प्रकारसे भी तिक्तरसका रसनासे प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । वैसे ही अर्थात् जैसे रसना (जिह्वा) इन्द्रियकी वृत्तिको लेकर तिक्तरसमें रासनत्वका अनुभव माना गया, वैसे ही चक्षुकी वृत्तिके आधारपर रजत आदिमें चाक्षुषत्वानुभवका समर्थन हो सकता है, अतः ‘रजतं पश्यामि’ (रजतको देखता हूँ) इस प्रकार चाक्षुषानुभवका † बाध मानना युक्तियुक्त नहीं है। यदि शङ्का हो कि इन्द्रियसे असम्प्रयुक्त रजतका प्रत्यक्ष माननेपर ‘प्रत्यक्षमात्रमें विषय और इन्द्रियका संसर्ग कारण है, ‘द्रव्यके प्रत्यक्षमें


* तात्पर्य यह है कि पित्तरूप दोषसे तिरस्कृत जो रसनेन्द्रिय है, उसके साथ मधुर द्रव्य-रूप अधिष्ठानका सम्बन्ध होनेसे मधुरद्रव्यावच्छिन्न चैतन्यमें तिक्तरसाध्यास उत्पन्न होता है, इसीके साथ-साथ अध्यस्यमान तिक्तरसको ही विषय करनेवाली रासनवृत्ति भी उत्पन्न होती है, इसलिए तिक्तरसका रसनासे अनुभव होता है, चाक्षुष स्थलमें जैसे अधिष्ठान और आरोप्यके एकवृत्तित्वयोग्यत्व होनेसे इन्द्रियजन्यज्ञान विषयता है, वैसे प्रकृत में नहीं है ।
† अर्थात् जैसे रजत आदिके अध्यासस्थलमें धर्मिविषयक वृत्तिके उत्पादनद्वारा चाक्षुषत्वका समर्थन किया जाता है, वैसे प्रकृतमें मधुरद्रव्यरूप धर्मिविषयक वृत्तिके उत्पादनद्वारा रासनत्वका समर्थन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि मधुरद्रव्यरूप धर्मी सर्वथा रसनाके अयोग्य है—द्रव्यके ग्रहणमें रसनाकी सामर्थ्य नहीं है । इसलिए परम्परासे भी तिक्त रसका रसनासे ग्रहण नहीं हो सकता है, अतः रासनवृत्तिकी समकालमें उत्पत्ति माननी पड़ती है । यद्यपि साक्षीसे भासित स्वाप्निक पदार्थोंमें रासनत्व, चाक्षुषत्व आदिके आरोपका जैसे आगे प्रतिपादन किया जायगा, वैसे ही प्रकृतस्थलमें रासनत्व आदिकी उपपत्ति कर सकते हैं, तथापि उस विषयके ऊपर दृष्टि न देकर ही यह कहा गया है ।

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