सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 268, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें२३८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
तत्संयोगः कारणम्,' 'रजतप्रत्यक्षे रजतसंयोगः कारणम्' इति गृहीतानेक- कार्यकारणभावनियमभङ्गः स्यादिति वाच्यम्, सन्निकर्षत्वस्य संयोगाद्यनु- गतस्यैकस्याऽभावेन आद्यनियमासिद्धेः । द्वितीयनियमस्य नैयायिकरीत्या तमसीव संयोगायोग्ये क्वचिदद्रव्येऽपि द्रव्यत्वाध्याससम्भवाद् व्यवहारदृष्ट्या
द्रव्यके साथ इन्द्रियसयोग कारण है और 'रजतके प्रत्यक्षमें रजतका संयोग कारण है, इस प्रकार निश्चित किये गये अनेक कार्यकारणभावोंका भंग-त्याग होगा, तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि संयोग आदिमें अनुगत एक सन्निकर्ष- त्वके न होनेसे प्रत्यक्षमात्रमें * विषयेन्द्रियसन्निकर्ष कारण है, इस प्रकार प्रथम कार्यकारणभाव ही असिद्ध है । जैसे नैयायिकोंके मतमें † संयोगके सर्वथा अयोग्य तममें ( अन्धकारमें ) द्रव्यत्वका अध्यास होता है, वैसे ही संयोगके सर्वथा अयोग्य कहीं अद्रव्य ( गुण ) आदिमें भी ‡ द्रव्यत्वका अध्यास
* इस नियमका ठीक-ठीक आकार यह है—शाब्दभिन्न जन्यप्रत्यक्षमात्रमें विषय-इन्द्रियका सन्निकर्ष कारण है, शब्दजन्य ज्ञानको जो अपरोक्ष मानते हैं, उनके मतसे शब्दज्ञानमें व्यभिचारवारण करनेके लिए शाब्दभिन्न विशेषण है और साक्षिरूप प्रत्यक्षमें अतिव्याप्ति वारण करनेके लिए जन्यत्व विशेषण दिया गया है । यहाँपर यह ज्ञातव्य है कि सन्निकर्षत्वका संयोगाद्यन्यतमत्वरूपसे अनुगम हो सकता है, अथवा नैयायिकोंके मतमें अभावत्वको जैसे अखण्डोपाधि मानते हैं, वैसे ही सन्निकर्षत्वको अखण्डोपाधि मान करके अनुगम कर सकते हैं, अतः प्रथम नियमके साथ विरोध ही है ।
† तात्पर्य यह है कि 'द्रव्यप्रत्यक्षमें विषय और इन्द्रियसंयोग कारण है' इस नियमका अर्थ आपको करना होगा व्यवहारमें जो द्रव्यत्वका अधिकरण है उस विषय और इन्द्रियका संयोग कारण है, क्योंकि 'एकत्वम् एकम्' ( एकत्व एक है ) इस प्रकार गुणमें भी एकत्वका भ्रम होनेसे द्रव्यत्वका भ्रम हो सकता है, पर वहाँ द्रव्यके साथ संयोग न होनेके कारण उक्त नियमका व्यभिचार होगा, इसलिए व्यावहारिक दृष्टिसे द्रव्यत्वाधिकरणके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयोगको कारण मानना होगा । यदि इसे स्वीकार न किया जाय, तो तममें द्रव्यत्वका भ्रम होनेके अनन्तर उसका प्रत्यक्ष नहीं होगा, क्योंकि वहाँ द्रव्यसंयोग नहीं है, कारण कि तमके नैयायिकरीतिसे अभावरूप होनेके कारण उसके साथ इन्द्रियसंयोग ही नहीं हो सकता है, अतः नैयायिकोंको भी अगत्या व्यावहारिक द्रव्यत्वाधिकरणके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसयोग कारण है, यह मानना होगा और माननेपर विरोध नहीं है, कारण कि शुक्तिरजतके प्रत्यक्षमें उस नियमकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि शुक्तिरजत व्यावहारिक द्रव्यत्वका अधिकरण नहीं है, यह भाव है ।
‡ इस विषयमें कोई लोग शङ्का करते हैं कि घटादिके समान शुक्तिरजतमें भी स्वतः द्रव्यत्व रहता है, अन्यथा उस रजतमें रजतत्व भी नहीं रहेगा, इष्टापत्ति नहीं हो सकती, कारण कि प्रातिभासिक रजतमें रजतत्वका साधन किया गया है, इसलिए शुक्तिरजत भी