भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 269, कुल 590 में से

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पृष्ठ 269

सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २३९


यद् द्रव्यत्वाधिकरणं तद्विषयत्वेन प्रातिभासिकरजते द्रव्यत्वस्याऽधिष्ठानगतस्यैवेद्ंत्ववदध्यासात् प्रतीत्यभ्युपगमेन च द्वितीयनियमाविरोधात् । द्वितीयनियमरूपसामान्यकार्यकारणभावातिरेकेण विशिष्याऽपि कार्यकारणभावकल्पनाया गौरवपराहतत्वेन तृतीयनियमासिद्धेः । यत्सामान्ये यत्सामान्यं हेतुः, तद्विशेषे तद्विशेषो हेतुः' इति न्यायस्यापि यत्र बीजाङ्कुरादौ


हो सकता है, अतः द्वितीय नियमका यह अर्थ करना होगा कि व्यवहारकी दृष्टिसे जो द्रव्यत्वका अधिकरण हो, उसके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसयोग कारण है, अतः प्रातिभासिक रजतमें इदंत्वके समान अधिष्ठानमें रहनेवाले द्रव्यत्वका भी अध्यास होनेसे प्रतीति होती है, इसलिए द्वितीय नियमके साथ विरोध नहीं है। और 'रजतके प्रत्यक्षमें रजतका संयोग कारण है' इस प्रकारका जो तृतीय नियम है, वह भी असिद्ध है, क्योंकि सामान्य कार्यकारणभावात्मक द्वितीय नियमसे (द्रव्यप्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयोग कारण है, इससे) अतिरिक्त विशेष तृतीय कार्यकारणभावकी कल्पना करनेमें केवल गौरव ही है। जिस सामान्यमें * जो सामान्य कारण होता है उसके विशेषमें उसका विशेष कारण होता है इस न्यायसे तृतीय कार्यकारणभावकी कल्पना करेंगे ? इस प्रकार यदि शङ्का हो, तो वह


व्यावहारिक द्रव्यत्वका अधिकरण है, ऐसा मानना होगा, क्योंकि व्यवहारदशामें जैसे रजतका बाध देखा जाता है, वैसे शुक्तिरजतमें रजतत्वका या द्रव्यत्वका बाध नहीं देखा जाता । इस परिस्थितिमें इन्द्रियासंयुक्त रजतमें इन्द्रियवृत्ति म नी जायगी, तो द्वितीय नियमका विरोध निवृत्त कदापि नहीं होगा, इस पूर्वपक्षके उत्तरमें यह कहा जाता है कि शुक्तिरजत आदिमें शुक्तित्व, द्रव्यत्व आदि धर्म नहीं हैं, ऐसा स्वीकार करनेवालोंके मतसे यह कहा गया है अर्थात् व्यावहारिक दशाका द्रव्यत्व या शुक्तित्व नहीं है परन्तु प्रातीतिक है, अतः इसी अभिप्रायसे मूलमें 'प्रातिभासिकरजते' इत्यादि कहा है ।

* तात्पर्य यह है कि 'द्रव्यप्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयोग कारण है' इस सामान्य नियमके' माननेसे 'रजतप्रत्यक्षमें रजतेन्द्रियसंयोग कारण है' इस विशेष नियमका लाभ होता है, क्योंकि जिस सामान्यमें जो सामान्य कारण होता है उसके विशेषमें उसका विशेष कारण होता है, प्रकृतमें सामान्य द्रव्य प्रत्यक्षमें सामान्य-विषयसंयोग कारण है, अतः रजतरूप विशेषद्रव्यके प्रत्यक्षमें विशेष रजतसंयोग कारण होगा, अतः इन्द्रियसंयोगके बिना यदि रजतकी वृत्ति मानी जायगी, तो तृतीय नियमके साथ विरोध होगा, यह प्रश्न है, इसका उत्तर है कि उस विशेष नियमका तभी स्वीकार किया जाय, जब कि सामान्यमें बाध हो, परन्तु बाध है नहीं, अतः उसको नहीं मानते हैं ।

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