सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
१९८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
श्रुतिर्वदतीति चेत् ? । को वा ब्रूते श्रुतिर्न वदतीति । किन्तु अद्वैतवादे तदुपपादनमशक्यमित्युच्यते ।
नन्वेकस्यैव सौरालोकस्य करतलस्फटिकदर्पणाद्यभिव्यञ्जकविशेषोपधानेनाऽभिव्यक्तितारतम्यदर्शनादेकत्वेऽप्यानन्दस्याऽभिव्यञ्जकसुखवृत्तिभेदोपधानेनाऽभिव्यक्तितारतम्यरूपमुत्कर्षापकर्षवत्त्वं युक्तमिति चेत्, न; दृष्टान्तासंप्रतिपत्तेः । सर्वतः प्रसृमरस्य सौरालोकस्य गगने विना करतलादिसम्बन्धमस्पष्टं प्रकाशमानस्य निम्नतले प्रसृमरस्य जलस्येव करतलसम्बन्धेन
आनन्दका उत्तरोत्तर उत्कर्ष श्रुति कहती है, तो यह कौन कहता है कि श्रुति नहीं कहती है ? अर्थात् श्रुति आनन्दका उत्कर्ष कहती तो अवश्य है, परन्तु अद्वैतवादमें उसका उपपादन करना असम्भव है, यह हमारा ( पूर्वपक्षी का ) अभिप्राय है । यदि यह कहा जाय कि जैसे सूर्यके तेजके एक होनेपर भी करतल, स्फटिक और दर्पण आदि विशेष अभिव्यञ्जक पदार्थोंके * उपधान से आलोकाभिव्यक्तिमें कुछ तारतम्य देखा जाता है, वैसे ही यद्यपि स्वतः आनन्द एकरूप है, तथापि अभिव्यञ्जक सुखवृत्तिविशेषके उपधानसे आनन्दकी अभिव्यक्तिमें तारतम्यरूप उत्कर्ष और अपकर्ष हो सकते हैं ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि आपका दिया हुआ जो दृष्टान्त है, उसमें हमारी सम्प्रतिपत्ति—सम्मति नहीं † है, क्योंकि जैसे स्वभावतः निम्नभू-भागमें गमनशील जलकी करतलके सम्बन्धसे गतिका प्रतिबन्ध होनेपर एकस्थानमें उसका अधिक जमाव हो जाता है, वैसे ही सर्वत्र गमनशील सूर्यका तेज, जो गगनमें किसी करतल आदिके सम्बन्धके बिना
* तात्पर्य यह है कि करतल आदिके सम्बन्धके बिना तेजकी जो आकाशमें अभिव्यक्ति होती है, उसकी अपेक्षासे करतलमें अधिक अभिव्यक्ति होती है, करतलकी अपेक्षा स्फटिकमें अधिक होती है, उसकी अपेक्षा दर्पणमें अधिक होती है, यह अनुभवसिद्ध है, इसीके अनुसार आनन्दकी अभिव्यञ्जक वृत्तियोंके प्रभावसे साक्षीरूप आनन्दमें भी उत्कर्ष और अपकर्ष हो सकता है, यह पूर्वपक्षकर्ता ( सिद्धान्ती )-का वक्तव्य है ।
† उत्तर देनेवाले पूर्ववादीका भाव यह है कि आपका आनन्दके विषयमें आलोकदृष्टान्त तभी हमें मंजूर हो सकता है, जब कि स्वतः तेज एक व्यक्ति हो, परन्तु आलोक एक व्यक्ति तो है नहीं, क्योंकि वह अनेक किरणोंका समूहरूप है और एक स्वरूप भी नहीं है, कारण कि तत्-तत् स्थानोंमें किरणोंकी अल्पता और बाहुल्य आदि नाना स्वरूप उपलब्ध होते हैं, अतः आलोकके दृष्टान्तसे साक्षीरूप आनन्दका तारतम्य नहीं सिद्ध कर सकते हैं ।
साक्षीरूप आनन्दका अनावृतत्व-विचार] भाषानुवादसहित १९९
गतिप्रतिहतौ बहुलीभावादधिकप्रकाशः, भास्वरदर्पणादिसम्बन्धेन गतिप्रतिहतौ बहुलीभावात् तदीयदीप्तिसंवलनाच्च ततोऽप्यधिकप्रकाश इति तत्राऽभिव्यञ्जकोपाधिकाभिव्यक्तितारतम्यानभ्युपगमात् । दृष्टान्तसम्प्रतिपत्तौ च गगनप्रसृतसौरालोकवत् अनवच्छिन्नानन्दस्याऽस्पष्टता, करतलाद्यवच्छिन्नसौरालोकवत् सुखवृत्त्यवच्छिन्नानन्दस्याऽधिकाभिव्यक्तिरिति मुक्तितः संसारस्यैवाऽभ्यर्हितत्वापत्तेश्च । एतेन 'संसारदशायां प्रकाशमानोऽप्यानन्दो मिथ्याज्ञानतत्संस्कारविक्षिप्ततया तीव्रवायुविक्षिप्तप्रदीपप्रभावदस्पष्टं प्रकाशते, मुक्तौ तदभावात् यथावदवभासते' इत्यपि निरस्तम् । निर्विशेषस्वरूपानन्दे
अस्पष्ट प्रकाशमान है, उसकी करतलके सम्बन्धसे गति रुक जाती है, इस अवस्थामें वह (तेज) एकत्र जमा होकर अधिक प्रकाश करता है और अति निर्मल दर्पण आदिके सम्बन्धसे तेजकी गतिका प्रतिरोध होनेपर तेजकी जमावटसे और दर्पणकी प्रभाके सम्मिश्रणसे करतलगत प्रकाशसे भी अधिक प्रकाश होता है, अतः तेजस्थलमें अभिव्यञ्जक उपाधिके तारतम्यसे अभिव्यक्तिमें तारतम्य नहीं माना जाता है। किन्तु जमावट प्रयुक्त ही तारतम्य है ] यदि कथञ्चित् दृष्टान्तको मान लें, तो गगनमें गतिशील सूर्यके आलोकके समान अनवच्छिन्न आनन्दमें अस्पष्टता होगी और करतल आदिसे युक्त सूर्यके आलोकके समान सुखाकार वृत्तिसे युक्त आनन्दकी अधिक अभिव्यक्ति होगी, इसलिए मुक्तिकी अपेक्षासे संसार ही अभ्यर्हित—सभीका अभीष्ट प्रसक्त होगा * । इससे यह भी निरस्त हुआ समझना चाहिए कि संसारकालमें आनन्द प्रकाशमान है, तो भी मिथ्याज्ञान † और मिथ्याज्ञानके संस्कारसे विक्षिप्त होनेके कारण तीव्र वायुसे संचालित दीपकी प्रभाके समान वह अस्पष्ट-सा प्रकाशित होता है, और मुक्तिमें तो मिथ्याज्ञान
* अर्थात् सांसारिक सुख ही मुक्ति सुखकी अपेक्षासे अधिक उत्कृष्ट और स्थायी सिद्ध होंगे, अतः मुक्तिके उद्देश्यसे मुक्तिके साधनोंमें किसीकी प्रवृत्ति नहीं होगी, यह भाव है ।
† देहादि अनात्म पदार्थोंमें आत्मत्वग्रह और वस्तुतः आत्माके सम्बन्धसे वञ्चित पुत्रादिमें आत्मीयत्वग्रह ही मिथ्याज्ञान है, यही मिथ्याज्ञान जाग्रत् अवस्थामें स्वरूपानन्दके प्रकाशनमें विक्षेपक और उसकी अस्पष्टताका आपादक है, और इसी मिथ्याज्ञानसे उत्पन्न हुए संस्कारके सुषुप्तिकालमें प्रकाशमान आनन्दके विक्षेपक और पुरुषार्थत्वका विनाशक हैं, क्योंकि प्रारब्धकर्मके बलसे सभी जीव सौषुप्त आनन्दका त्यागकर जाग्रत्में आ जाते हैं, अतः मुमुक्षु लोग सौषुप्त आनन्दकी अभिलाषा नहीं करते हैं, यह शङ्काका भाव है, और दीपप्रभा दृष्टान्त है ।
| २०० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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प्रकाशमाने तत्र विक्षेपदोषादप्रकाशमानस्य मुक्त्यन्वयिनोऽतिशयस्याऽ-
सम्भवात् । तस्मात् साक्ष्यानन्दस्याऽनावृतत्वकल्पनमयुक्तम् ।
साक्षिण्युपाधिमालिन्यादध्यस्तादपकर्षतः ।
सुखापकर्षमद्वैतविद्याचार्याः प्रचक्षते ॥ ९९ ॥
अद्वैताचार्य कहते हैं कि संसारावस्थामें साक्षीमें अध्यस्त उपाधिके मालिन्यरूप अपकर्षसे सुखका अपकर्ष अर्थात् तारतम्य है ॥९९॥
अत्राहुरद्वैतविद्याचार्याः—यथाऽत्युत्कृष्टस्यैकस्यैव धवलरूपस्य मालि-
आदिके न रहनेसे पूर्णरूपसे आनन्द प्रकाशित होता है, अतः संसार और मुक्तिदशामें विशेष है, क्योंकि जब निर्विशेष आत्मस्वरूप आनन्द प्रकाशमान है, तो उस दशामें विक्षेपदोषसे अप्रकाशमान और मुक्तिदशामें* प्रकाशमान आनन्दका दृष्टान्तके समान कोई जातिरूप या अवयवरूप विशेष हो ही नहीं सकता है, इससे साक्षीरूप आनन्दको अनावृत मानना अयुक्त है ।
इस आक्षेपके समाधानमें अद्वैत विद्याचार्य† कहते हैं कि जैसे अत्यन्त
* दीपप्रभाके सावयव होनेसे प्रबल वायुके प्रभावसे उसके कुछ अवयवोंके विनाशरूप विक्षेपसे अथवा प्रभागत भास्वरत्वके वायु द्वारा प्रतिबन्धरूप विक्षेपसे दीपप्रभाके प्रकाशमान होनेपर भी उसमें अस्पष्ट प्रकाशता उपपन्न हो सकती है, परन्तु अवयव, गुण आदि विशेषसे रहित ब्रह्मानन्दके—न तो संस्कार या मिथ्याज्ञानसे—अवयवका विनाश या किसी गुणविशेषका प्रतिबन्ध हो सकता है, अतः तत्प्रयुक्त अस्पष्ट प्रकाशता साक्ष्यानन्दमें नहीं आ सकती है, अतः पूर्वोक्त पक्ष असङ्गत है अर्थात् इस रीतिसे भी मुक्ति और संसारमें वैलक्षण्यकी सिद्धि नहीं हो सकती है, यह पूर्वपक्षीका भाव है ।
† जैसे साधारण मलिन दर्पणमें पड़े हुए धवलरूपके प्रतिबिम्बमें साधारण अपकर्ष अध्यस्त होता है, और मध्यम रीतिसे मलिन दर्पणमें प्रतिबिम्बित धवलरूपमें पूर्वकी अपेक्षासे अधिक अपकर्ष अध्यस्त होता है इसी रीतिसे अत्यन्त मलिन दर्पणमें प्रतिबिम्बित धावल्यमें पूर्वकी अपेक्षा अत्यन्त निकृष्ट अपकर्ष अध्यस्त होता है, वैसे ही अन्तःकरणमें जब निरतिशय और अद्वितीय आनन्दका प्रतिबिम्ब होता है, तब साक्षीरूप आनन्द कहा जाता है अर्थात् साक्षी-रूप आनन्दभावको प्राप्त होता है और पूर्व जन्मके किसी विशेष पुण्यकर्मके परिपाकसे स्रक्, चन्दन आदि सुन्दर विषयोंके आकारमें अन्तःकरणकी वृत्ति होती है, तब उस वृत्तिमें प्रति-बिम्बित आनन्द विषयानन्दके नामसे प्रसिद्ध होता है । यहांपर यह विशेषरूपसे जानने लायक वार्ता है—अन्तःकरणका—वृत्ति द्वारा यदि उत्कृष्ट विषय-विशेषोंके साथ—सम्पर्क हुआ है, तो उन उत्कृष्ट विषयोंके साथ अन्तःकरणके सत्त्वगुणका सम्बन्ध होनेसे उत्कर्ष होगा, यदि निकृष्ट विषयोंके साथ सम्बन्ध होगा, तो अकर्ष होगा । इसके अनन्तर अन्तःकरणके सत्त्वांशके
साक्षीकी अनावृतताका विचार ] भाषानुवादसहित २०१
न्यतारतम्ययुक्तेष्वनेकेषु दर्पणेषु प्रतिबिम्बे सत्युपाधिमालिन्यतारतम्यात् तत्र तत्र प्रतिबिम्बे धावल्यापकर्षस्तारतम्येनाऽध्यस्यते, एवं वस्तुतो निरतिशयस्यैकस्यैव स्वरूपानन्दस्याऽन्तःकरणप्रतिबिम्बिततया साक्ष्यानन्दभावे प्राक्तनसुकृतसंपत्त्यधीनविषयविशेषसंपर्कप्रयुक्तसत्त्वोत्कर्षापकर्षरूपशुद्धितारतम्ययुक्तसुखरूपान्तःकरणवृत्तिप्रतिबिम्बिततया विषयानन्दभावे च तमोगुणरूपोपाधिमालिन्यतारतम्यदोषादपकर्षस्तारतम्येनाऽध्यस्यते इति संसारदशायां प्रकाशमानेऽप्यानन्दे अध्यस्तापकर्षतारतम्येन सातिशयत्वादतृप्तिः। विद्यो-
त्कृष्ट एक ही श्वेत रूपके—मालिन्यके तारतम्यसे युक्त अनेक दर्पणोंमें—प्रतिबिम्बित होनेपर उपाधिकी मलिनताके तारतम्यसे तत्-तत् प्रतिबिम्बमें धवलताका अपकर्ष तारतम्यसे अध्यस्त होता है, वैसे ही वस्तुतः निरतिशय एक ही स्वरूपानन्दके अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बित होनेके कारण साक्षीरूप आनन्दभावके प्राप्त होनेपर और पूर्व पुण्यके परिपाकके अधीन विषयविशेषके सम्पर्कसे हुए सत्त्वके उत्कर्ष और अपकर्षसे शुद्धिके तारतम्यसे युक्त सुखाकार वृत्तियोंमें प्रतिबिम्बित होनेके कारण विषयानन्दत्वके प्राप्त होनेपर † तमोगुणरूप उपाधिकी मलिनताके तारतम्यदोषसे अपकर्ष भी तारतम्यसे अध्यस्त होता है। इसलिए संसारदशामें * आनन्दके प्रकाशित होनेपर भी अध्यस्त अपकर्षके तारतम्यसे
परिणामरूप वृत्तियाँ स्वरूपानन्दविषयक होंगी, तो अवश्य उत्कर्ष और अपकर्षसे युक्त होंगी, अतः उनमें पड़ा हुआ आनन्दका प्रतिबिम्ब भी उत्कृष्ट और अपकृष्ट अवश्य होगा। इसलिए संसारदशामें प्रकाशमान आनन्दके उत्कर्षापकर्षसे युक्त होनेसे सातिशय होनेके कारण तृप्ति नहीं होती है। और मुक्तिदशामें इस प्रकार सातिशयत्व न होनेसे तृप्ति ही रहती है, अतः विशेषकी उपपत्ति हो सकती है, यह तात्पर्य है।
† अन्तःकरणके सत्त्व, रज और तम स्वरूप होनेसे उसकी वृत्तिमें भी तमोगुणकी अनुवृत्ति अवश्य होगी, और उसी तमोगुणसे अपकर्षतारतम्यात्मक मालिन्यतारतम्यदोष वृत्तिनिष्ठ भी होगा, इसी दोषके बलसे सत्त्ववृत्तिके प्रतिबिम्बमें भी अर्थात् विषयानन्दमें भी तारतम्य अध्यस्त होता है, यह भाव है।
- संसारदशामें जो प्रकाशमान आनन्दमें अपकर्षतारतम्य अध्यस्त होता है, उससे वह आनन्द सातिशय होगा, इस अवस्थामें जो अत्यन्त साधारण आनन्दका अनुभव कर रहा है, वह अवश्य उत्कृष्ट आनन्दकी अभिलाषा करेगा और उसके सम्पादन करनेमें जीतोड़ यत्न करता हुआ आनन्दसाधनत्वकी भ्रान्तिसे कदाचित् दुःखके साधनोंमें भी प्रवृत्त होकर अनेक योनिमें जन्मप्रयुक्त दुःखकी—अनर्थकी—ही प्राप्ति करेगा, अतः कभी भी दुःखके निवृत्त न होनेसे उसे तृप्ति नहीं होगी, यह भाव है।
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| २०२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह . | [ प्रथम परिच्छेद |
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दये निखिलापकर्षाध्यासनिवृत्तेरारोपितसातिशयत्वापायात् कृतकृत्यतेति विशेषोपपत्तेः निरूपाधिकप्रेमगोचरतया प्रकाशमानस्साक्ष्यानन्दोऽनावृत एवेति ।
सुखांशोऽस्यावृतो नास्ति न भातीत्यनुभूतितः ।
चिदंशोनावृतो वृत्त्या सौख्यव्यक्तिरितीतरे ॥१००॥
साक्षीका सुखांश आवृत रहता है, क्योंकि 'हमें आनन्द नहीं है, आनन्द नहीं भासता है' ऐसा अनुभव होता है । और साक्षीका चिदंश तो अनावृत है । सुखकी अभिव्यक्ति—प्रकाश—अन्तःकरणकी वृत्तिसे होती है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १०० ॥
अन्ये तु—प्रकाशमानोऽप्यानन्दो 'मयि नास्ति, न प्रकाशते' इत्या-
सातिशयता होनेके कारण तृप्ति नहीं होती है । विद्याका आविर्भाव होनेके पीछे, तो सम्पूर्ण अपकर्षाध्यासकी निवृत्ति होनेसे आरोपित सातिशयत्वका निरास होनेसे कृतकृत्यता † होती है, इस प्रकार संसार और मुक्तिमें विशेष हो सकता है, अतः निरुपाधिक प्रेमकी विषयता होनेसे प्रकाशमान साक्षीरूप आनन्द अनावृत ही है ।
✱ कुछ लोग यह कहते हैं कि यद्यपि आनन्द प्रकाशमान है, तथापि
† ज्ञानसे मूलाज्ञानकी निवृत्ति होनेसे मूलाज्ञानके कार्यकी भी अवश्य निवृत्ति होगी, इससे तत्कृत अपकर्ष आदि अध्यासकी निवृत्ति हो जानेसे मुक्तिदशामें कृतकृत्यता है । कृतकृत्यता-शब्दका अर्थ है—कृत्यम्—कर्त्तव्यजातम्, कृतम्—सम्पादितं येन, इस प्रकारकी व्युत्पत्तिसे—जिसने अपना वास्तविक कर्तव्य सम्पादन कर लिया है, ऐसा पुरुष । तात्पर्य यह है कि पुरुषको जब तक ज्ञान नहीं हुआ है, तब तक दुःखकी निवृत्ति या सुखकी प्राप्तिके लिए अनेक प्रकारके यत्न करने पड़ते हैं और विद्याके उदित होनेपर तो सम्पूर्ण दुःखोंके विनष्ट होनेसे उत्कृष्ट धवल रूपका जैसे निर्मल दर्पणमें आविर्भाव होता है, वैसे ही—निरतिशय ब्रह्मस्वरूप आनन्दका आविर्भाव होता है, अतः दुःखकी निवृत्ति या सुखकी प्राप्तिके लिए कोई यत्नकी आवश्यकता नहीं रहती है । इसीलिए भगवान् पूर्णावतार श्रीकृष्णचन्द्रने गीतामें कहा है कि—
'एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ।'
अर्थात् हे अर्जुन ! निरतिशय ब्रह्मस्वरूप आनन्दको अपरोक्षरूपसे जानकर बुद्धिमान् (पण्डित) और कृतकृत्य हो जाता है, यह इसका भाव है ।
✱ इन लोगोंके मतमें पूर्वमतसे यह भेद है—साक्षीरूप चैतन्यको अनावृत माननेपर तदभिन्न आनन्द भी प्रकाशित होगा, अतः संसार और मुक्तिमें कोई विशेष नहीं होगा, इस आक्षेपके समाधानमें अद्वैतविद्याचार्यने कहा है कि साक्षीरूप आनन्दको अनावृत मानें, तो.
साक्षीरूप आनन्दका अनावृतत्व-विचार] भाषानुवादसहित २०३
वरणानुभवात् आवृत एव। एकस्मिन्नपि साक्षिण्यविद्याकल्पितरूपभेद- सम्भवेन चैतन्यरूपेणाऽनावरणस्याऽऽनन्दरूपेणाऽऽवरणस्य चाऽविरोधात्। स्वरूपप्रकाशस्याऽऽवरणनिवर्तकतया प्रकाशमाने आवरणस्याऽविरोधाच्च। 'त्वदु-
'मयि नास्ति, न प्रकाशते' (मेरेमें वेदान्तप्रतिपाद्य ब्रह्मस्वरूप आनन्द नहीं है, हमें उस आनन्दका प्रकाश नहीं होता है) इस प्रकारसे आवरणका अनुभव होनेसे आवृत ही है। यद्यपि साक्षी एक है, तो भी अविद्यासे कल्पित रूपभेदके होनेसे चैतन्यरूपसे अनावरण और आनन्दरूपसे आवरणके होनेमें कोई विरोध नहीं है। और [आगन्तुक वृत्तिरूप प्रकाशके ही आवरणका विरोधी होनेसे] स्वरूपप्रकाश आवरणका निवर्तक नहीं है, अतः स्वरूपके प्रकाश- मान होनेपर भी आवरणका विरोध† नहीं है। 'त्वदुक्तमर्थं न जानामि'
भी संसार और मुक्तिमें विशेषता हो सकती है, इस मतमें साक्षीरूप आनन्दको आवृत मानकर पूर्वोक्त आक्षेपका परिहार करके संसार और मोक्षमें भिन्नताका प्रतिपादन किया गया है, साक्षीरूप आनन्दको आवृत माननेसे ही यह प्रतीति उपपन्न होती है—'वेदान्तप्रतिपाद्य स्वरूपानन्द मुझमें नहीं है और प्रकाशित नहीं होता है', यदि उसे आवृत न मानें, तो व्यवहारमें अतिप्रसिद्ध इस प्रतीतिका लोप प्राप्त होगा, इसलिए आनन्दके प्रकाशमान होनेपर भी संसारदशामें उसे आवृत मानना और मुक्तिमें आवरणके विध्वस्त होनेसे उस-परिपूर्णानन्दका स्फुरण मानना चाहिए। इसमें यह शङ्का अवश्य होती है कि यदि उसे आवृत मानें तो अनौपाधिक प्रेमविषयत्व आत्मामें सदा नहीं होगा, क्योंकि वृत्ति द्वारा हुआ आनन्दका स्फुरण कादाचित्क हुआ करता है, परन्तु यह शङ्का अयुक्त है, क्योंकि आवृत्त और प्रकाशमान आनन्दमें फलबलसे निरुपाधिक प्रेमविषयत्वकी कल्पना करते हैं। इसीसे 'भासते एव परमप्रेमास्पदत्वलक्षणं सुखम्' (परम प्रेमास्पदत्वरूप सुख भासता है) इस विवरणके वचनका भी इसीमें तात्पर्य है। इसी अभिप्रायसे 'प्रकाशमान' यह आनन्दका विशेषण दिया गया है, अन्यथा प्रकाशमान आनन्दको आवृत मानना अतिविरुद्ध होगा यह भाव है।
† तात्पर्य यह है कि जैसे वस्तुस्थितिमें एक ही चैतन्यमें जीवत्व और ईश्वरत्व रूप दो धर्म माने जाते हैं, क्योंकि 'मैं ईश्वर नहीं हूँ, किन्तु संसारी हूँ' और 'मैं साक्षात् परमात्मा हूँ संसारी नहीं हूँ' ऐसा अवस्थाभेदसे व्यवहार होता है, वैसे ही 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि ज्ञान आनन्द नहीं है, इस रूपसे अहङ्कारके अवभासके ज्ञानका आनन्दसे भेद-व्यवहार होता है, इसलिए चित्त्व और आनन्दत्व दो स्वरूप चैतन्यमें मानने ही चाहिएँ। इसी प्रकार जैसे एक ही चैतन्यमें जीवत्वावच्छेदेन अज्ञान और ईश्वरत्वावच्छेदेन अज्ञानके अभावकी कल्पना की जाती है, वैसे ही अहंकारके अवगाहक चित्में आनन्दावच्छेदेन आवृतत्व और चित्त्वावच्छेदेन अनावृतत्वकी कल्पना फलके अनुसार करनी चाहिए।
२६४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
क्तमर्थं न जानामि' इति प्रकाशमाने एवाऽऽवरणदर्शनाच्च । न च तत्राऽनावृत-सामान्याकारावच्छेदेन विशेषावरणमेवाऽनुभूयते इति वाच्यम्, अन्यावरणस्याऽन्यावच्छेदेन भानेऽतिप्रसङ्गात् । न च सामान्यविशेषभावो नियामक इति नाऽतिप्रसङ्ग इति वाच्यम्, व्याप्यव्यापकभावातिरिक्तसामान्यविशेषभावाभावेन 'वह्निं न जानामि' इति धूमावरकाज्ञानानुभवप्रसङ्गात् । तस्माद्यदवच्छिन्नमज्ञानं प्रकाशते, तदेवाऽऽवृतमिति प्रकाशमानेऽप्यज्ञानं
( तुमसे कथित अर्थको मैं नहीं जानता हूँ ) इत्यादि स्थलमें सामान्यरूपसे आत्माके प्रकाश होनेपर भी आवरण देखा जाता है । इस विषयमें शङ्का होती है कि * 'त्वदुक्तमर्थं०' इत्यादि स्थलमें आवरणरहित जो सामान्य आकार है, तदवच्छेदेन विशेषके आवरणका अनुभव होता है, प्रकाशमान सामान्यमें सामान्यका आवरण अनुभूत नहीं होता है, परन्तु यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अन्यके आवरणका अन्यावच्छेदेन भान नहीं होता है । इसपर यदि यह शङ्का की जाय कि सामान्यविशेषभाव नियामक है, अतः दोष नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इस विषयमें यह प्रष्टव्य होता है कि सामान्य-विशेषभाव, क्या व्याप्य-व्यापकभावरूप है, या उससे अतिरिक्त है । द्वितीय पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि व्याप्यव्यापकभावसे अतिरिक्त सामान्यविशेषभावका निरूपण ही नहीं कर सकते हैं, यदि व्याप्यव्यापकभावरूप ही सामान्यविशेष भाव माना जाय, तो 'वह्निको मैं नहीं जानता हूँ' इस प्रकार वह्निके आवारक अज्ञानके अनुभवस्थलमें धूमके आवारक अज्ञानका भी अनुभव प्राप्त होगा । इससे यदवच्छिन्न ( जिस वस्तुसे विशेषित ) अज्ञान प्रकाशित होता हो, वही वस्तु आवृत होती है, ऐसा मानना चाहिए, अतः वस्तुके प्रकाशमान होनेपर भी
* गुरुने किसी एक शिष्यको उपदेश दिया—'आनन्दकन्द श्रीकृष्णचन्द्र परमात्मा ही वेदान्तोंसे ज्ञातव्य है और वह परमात्मा दुर्जनोंसे नहीं जाना जाता है ।' परन्तु इसपर भी मन्द शिष्यको अज्ञान रहता है कि आपने जिस परमात्माके विषयमें उपदेश दिया है, उसे मैं नहीं जानता । शिष्यका तात्पर्य यह है कि महाराज ! आप्त वाक्य होनेसे आपके वाक्यका सामान्यतः कुछ अर्थ तो है, किन्तु वह विशेष रूपसे प्रतीत नहीं होता है, इससे उक्त वाक्यसे वाक्यार्थत्वरूपसे सामान्य आकारके ज्ञात होनेपर भी वही सामान्य आकार विशेष वस्तुके आवारक अज्ञानके विषयरूपसे प्रकाशित होता है । इसलिए 'त्वदुक्तमर्थं न जानामि' इत्यादिमें, जो आवरणका विषय है, वह प्रकाशमान नहीं है और जो प्रकाशमान है, वह आवरणका विषय नहीं है, अतः उक्त अनुभव प्रकाशमान वस्तुके आवृतत्वमें प्रमाण नहीं है, यह शङ्का करनेवालेका भाव है ।
साक्षीरूप आनन्दका अनावृतत्व-विचार] भाषानुवादसहित २०५
युज्यते । अज्ञानं च यथा साक्ष्यंशं विहाय चैतन्यमावृणोति, एवमा- नन्दमपि तत्तत्सुखरूपवृत्तिकवलीकृतं विहायैवाऽऽवृणोति । स एव वैषयिका- नन्दस्याऽऽवरणाभिभवः। स चाऽऽवरणाभिभवः प्रत्यूषसमये बाह्याऽऽवरणा ऽभिभववत् कारणविशेषप्रयुक्तवृत्तिविशेषवशात्तरतमभावेन भवति । अतः स्वरूपानन्दविषयानन्दयोः विषयानन्दानां च परस्परभेदसिद्धिरिति वदन्ति । सर्वथाऽपि साक्षिचैतन्यस्याऽनावृतत्वेनाऽऽवरणाभिभवार्थं वृत्तिमपेक्ष्यैव तेनाऽहङ्कारादिप्रकाशनमिति तुल्यमेव ॥१६॥
अहङ्कारादिनः साक्षिभास्यस्य स्मरणं कथम् । सूक्ष्मावस्था हि संस्कारो वृत्तीनां स्यान्न साक्षिणः ॥१०१॥
साक्षीसे प्रकाशित होनेवाले अहंकार आदिका स्मरण कैसे होगा ? सूक्ष्मावस्थारूप संस्कार वृत्तियोंका हो सकता है, साक्षीरूप नित्य चैतन्यका नहीं हो सकता है [ और संस्कारके बिना स्मरण नहीं होता है ] ॥१०१॥
तद्विषयक अज्ञान रहता है, यह युक्त है। जैसे अज्ञान साक्षी अंशका त्यागकर अन्य चैतन्यका आवरण करता है, वैसे ही तत्-तत् सुखरूप वृत्तिके विषयी- भूत आनन्दका परित्यागकर अन्य आनन्दको ही आवृत करता है। यही अर्थात् सुखवृत्तिविषयत्वनिबन्धन अनावरकत्वस्वभाव ही—विषयप्रयुक्त आनन्दका ( वृत्तिकृत ) आवरणाभिभव है। जैसे उषाकालमें सूर्यके प्रकाशके तारतम्यसे बाह्य अन्धकारका अभिभव होता है, वैसे ही वृत्तिकृत वह आवरणा- भिभव भी विषयविशेषरूप कारणविशेषसे जन्य वृत्तिविशेषके आधारपर ही उत्कर्ष और अपकर्षरूप तारतम्यसे युक्त होता है। इसीसे * स्वरूपानन्द, विषयानन्दका एवं अनेक विषयानन्दोंका परस्पर भेद सिद्ध होता है, ऐसा कहा जाता है। साक्षीरूप चैतन्यके किसी अंशसे आवृत न होनेके कारण आवरणाभिभवके लिए वृत्तिकी अपेक्षा न करके ही उस साक्षीसे अहंकार आदिका प्रकाश होता है, यह तो दोनोंके † मतमें समान है ॥ १६ ॥
* दृष्टीसे अर्थात् वस्तुतः आनन्दके एक होनेपर भी उपाधियुक्त आनन्दका भेद माननेसे ही स्वरूपानन्द आदिका भेद होता है। तात्पर्य यह है कि विद्यासे आवरणकी निवृत्ति होनेसे प्रकाशमान आनन्द स्वरूपानन्द है, और अविद्याकी अनिवृत्तिदशामें वृत्तिके सम्बन्धसे प्रकाशमान आनन्द विषयानन्द कहा जाता है, इसी प्रकार वृत्तियोंके अनेक होनेसे विषयानन्द भी अनेक होते हैं, अतः विषयानन्दोंका भी परस्पर भेद है, यह जानना चाहिए ।
† स्वरूपानन्दके आवृतत्व पक्षमें अथवा अनावृतत्व पक्षमें, यह अर्थ है।
२०६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
नन्वेवं कथमहङ्कारादीनामनुसन्धानम्, ज्ञानसूक्ष्मावस्थारूपस्य संस्कारस्य ज्ञाने सत्ययोगेन नित्येन साक्षिणा तदाधानासम्भवात् ।
शृणु यद्वृत्त्यवच्छिन्नसाक्षिणा यत् प्रकाश्यते ।
तत्संस्कारे हि सा धत्ते न त्वाकारव्यवस्थया ॥ १०२ ॥
सुनो, जिस वृत्तिसे अवच्छिन्न साक्षीसे जिस वस्तुका प्रकाश होता है, वह वृत्ति उस विषयके संस्कारको पैदा करती है, आकारव्यवस्थासे संस्कारको पैदा नहीं करती है। अर्थात् जिसके आकारमें परिणत जो वृत्ति हो, वह उसका संस्कार उत्पन्न करे, ऐसा नियम नहीं है ॥ १०२ ॥
अन्ये तु विषयाकारवृत्तिस्थानित्यसाक्षिणा ।
त्रिपुटी भासिनाऽऽधानात् संस्कारस्य स्मृतिं जगुः ॥ १०३ ॥
इतर लोग कहते हैं कि विषयाकार वृत्तिमें प्रतिफलित त्रिपुटीको प्रकाशित करनेवाले अनित्य साक्षीसे ही संस्कारके आधानसे स्मृति उत्पन्न होती है ॥ १०३ ॥
यदि अहंकार आदिके अवभासमें अन्तःकरणकी अहङ्काराद्याकार वृत्ति न मानी जाय, तो अहङ्कार आदिका स्मरण कैसे होगा ? क्योंकि ज्ञानकी सूक्ष्म अवस्थारूप संस्कारके ज्ञानके अस्तित्वमें सम्भव न होनेसे नित्य साक्षीसे संस्कारकी उत्पत्ति नहीं हो सकती है। [तात्पर्यार्थ यह है कि वस्तुका अनुभव होनेसे उस अनुभवसे संस्कार उत्पन्न होते हैं, और उसी संस्कारसे कालान्तरमें उस वस्तुका स्मरण होता है। सिद्धान्तमें अनुभवके विनाशको अर्थात् अनुभवकी सूक्ष्मावस्थाको ही संस्कार माना है, इसलिए साक्षीकी जब तक अवस्थिति रहेगी तब तक उसका विनाश—सूक्ष्मावस्था—नहीं हो सकती है, और साक्षी तो स्वयं नित्य है, अतः उसकी किसी समयमें भी सूक्ष्मावस्था या विनाश होनेवाला ही नहीं, अतः संस्कारका अभाव होनेसे अहङ्कार आदिके स्मरणका सम्भव नहीं है। आवरणाभिभवके लिए अहङ्कार आदि गोचर अन्तःकरणकी वृत्ति भले ही न हो। परन्तु स्मरणकी उपपत्तिके लिए तो अवश्य अन्तःकरणकी वृत्ति माननी ही चाहिए]।
अहङ्कार आदिके अनुसन्धानका विचार] भाषानुवादसहित २०७
अत्र केचिदाहुः—स्वसंसृष्टेन साक्षिणा सदा भास्यमानोऽहङ्कारस्तत्तद्-
घटादिविषयवृत्त्याकारपरिणतस्वावच्छिन्नेनापि साक्षिणा भास्यते इति
तस्याऽनित्यत्वात् सम्भवति संस्काराधानं घटादौ विषये इव । नहि
स्वाकारवृत्त्यवच्छिन्नसाक्षिणैव स्वगोचरसंस्काराधानमिति नियमोऽस्ति ।
तथा सति वृत्तिगोचरसंस्कारासम्भवेन वृत्तेरस्मरणप्रसङ्गात् । अनवस्था-
इस आक्षेपके समाधानमें कुछ लोग कहते हैं कि अहङ्कारके साथ सम्बद्ध साक्षीसे सर्वदा भासमान अहङ्कार तत्-तत् घट आदि विषयक वृत्तिके आकारसे परिणत अहङ्कारावच्छिन्न साक्षीसे भी भासमान होता है, अतः घटादिविषयक वृत्तिसे अवच्छिन्न साक्षी चैतन्यके अनित्य होनेके कारण घटादि विषयमें संस्काराधानके समान अहङ्कारमें भी संस्कारका आधान होता है । [तात्पर्यार्थ यह है कि अहङ्कार आदिकी स्मरणोपपत्तिका लिए अहङ्कार आदि विषयक अन्तःकरणवृत्ति माननेकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसके बिना भी संस्कारकी उत्पत्ति द्वारा अहङ्कारादिका अनुसन्धान हो सकता है, कारण कि जैसे अहङ्कार साक्षीसे भासता है, वैसे ही घट, पट आदि विषयाकार वृत्ति प्रतिबिम्बित साक्षीसे भी भासता है, अतः वृत्त्यवच्छिन्न साक्षीरूप चैतन्यके वृत्तिप्रयुक्त अनित्य होनेसे उसकी सूक्ष्मावस्था हो सकती है, इसलिए सूक्ष्मावस्थारूप संस्कार द्वारा अहङ्कार आदिके स्मरण होनेमें कोई बाधक नहीं है, क्योंकि अनित्य होनेसे घटादिविषयक वृत्त्यवच्छिन्न साक्षीरूप चैतन्य जैसे घटादि विषयोंमें संस्कारोंका आधान करता है, वैसे ही उसी वृत्त्यवच्छिन्न साक्षी रूप चैतन्यसे अहङ्कार आदिमें भी संस्काराधान कर सकता है] । कारण कि यह नियम नहीं है—स्वाकारवृत्त्यवच्छिन्न साक्षीसे ही स्वविषयक संस्कारका आधान हो, क्योंकि ऐसा माननेसे वृत्तिगोचर संस्कारके असम्भव होनेसे वृत्तिका स्मरण भी* नहीं होगा,
* तात्पर्य यह है कि दृष्टके अनुसार ही किसी वस्तुकी कल्पना होती है, दृष्ट विरुद्ध नहीं होती, अतः अहङ्कारसे भिन्न घट आदि स्थलोंमें घटाकार वृत्तिसे युक्त चैतन्यसे ही घटका संस्कार उत्पन्न होता है, यह देखा जाता है । इसलिए यही नियम लब्ध होता है कि स्वगोचरवृत्तिसे ही स्वगोचर संस्कारोंका आधान होता है, स्वशब्द प्रकृतमें घटादिपरक है । इस परिस्थितिमें कैसे मान सकते हैं कि अहङ्कारमें अन्य वृत्तिसे संस्कार उत्पन्न होते हैं ? इस शङ्काके समाधानमें कहते हैं कि यद्यपि दृष्टानुसारी ही कल्पना होती है, तथापि इस नियममें कोई प्रमाण नहीं है, जिससे कि वह नियम माना जाय । यदि नियम मानो, तो वृत्तिकी स्मृतिके
| २०८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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पत्त्या वृत्तिगोचरवृत्त्यन्तरस्यानुव्यवसायनिरसनेन निरस्तत्वात् । किन्तु यद्वृत्त्यवच्छिन्नचैतन्येन यत् प्रकाशते, तद्वृत्त्या तद्गोचरसंस्काराधानमित्येव नियमः । एवं च ज्ञानसुखादयोऽप्यन्तःकरणवृत्तयः तन्मायः-
कारण कि अनवस्थाके भयसे वृत्तिगोचर अन्य वृत्तिका अनुव्यवसायके निराससे निरास किया गया है, किन्तु जिस वृत्तिसे युक्त चैतन्यसे जिसका प्रकाश होता हो, उस वृत्तिसे उस वस्तुके संस्कारोंका आधान होता है, ऐसा ही नियम है † । इससे तपे हुए लोहेके पिण्डसे निकलते हुए विस्फुलिङ्गका—जैसे
लिए अन्य वृत्ति माननी पड़ेगी, इस अवस्थामें अनवस्थासे अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगेगा, क्योंकि जैसे प्रथम वृत्तिके स्मरण आदिके लिए द्वितीय वृत्ति मानेंगे, वैसे ही द्वितीय वृत्तिके स्मरणके लिए तृतीय वृत्ति और तृतीय वृत्तिके स्मरणके लिए चतुर्थ वृत्ति, इस क्रमसे अनवस्था प्रसक्त होगी। अनवस्थाशब्दका अर्थ है अप्रामाणिक-अनन्तपदार्थकल्पनाप्रयुक्तअनिष्ट प्रसङ्ग अथवा क्लृप्त वस्तुसे सजातीय वस्तुओंकी परम्पराकी कल्पनाके विरामका अभाव, इसलिए वृत्तिगोचर अन्य वृत्ति नहीं मान सकते हैं, अतः प्रकृतमें उक्त शङ्काका स्थान है नहीं ।
† इस नियमका भाव यह है—यह बात पूर्वमें ही कही जा चुकी है कि अप्रयोजक होनेसे स्वाकार वृत्तिसे युक्त साक्षीसे ही स्वगोचर संस्कारोंका आधान होता है, यह नियम नहीं है, किन्तु जिस वस्तुके आकारमें परिणत वृत्तिमें प्रतिफलित चैतन्यमें जितनी वस्तुओंका आभास होता हो, उस वस्तुके आकारमें परिणत वृत्तिसे प्रकाशित सम्पूर्ण वस्तुओंमें संस्कारोंका आधान होता है। घटाकार वृत्तिसे अवच्छिन्न चैतन्यमें पटका प्रकाश नहीं होता है, अतः उस वृत्तिसे पटके संस्कारका आधान नहीं होता है, इसलिए पूर्वोक्त अतिसंकुचित नियम माननेकी आवश्यकता नहीं है। घटायाकार वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यमें अहङ्कारका भी प्रकाश होता है, इस विषयका निरूपण मूलमें ही 'स्वसंसृष्ट' इत्यादि ग्रन्थसे किया गया है, अतः अहङ्कारगोचर संस्कारका आधान होगा। प्रकृतमें और एक शङ्का होती है कि यद्यपि अहङ्कार आदिका उक्त वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे प्रकाश होनेसे तद्गोचर संस्कारका आधान हो सकता है, तथापि उक्त चैतन्यसे वृत्तिका तथा सुख और दुःख आदिका प्रकाशन नहीं होनेसे उससे वृत्ति आदिमें संस्कारका आधान कैसे होगा ? इस शङ्काके समाधानार्थ यदि वृत्ति आदि गोचर वृत्ति मानी जायगी, तो अनवस्था प्रसक्त होगी ? और यदि वृत्ति आदिकी वृत्तियोंको क्रियारूप न मानकर ज्ञानरूप स्वीकार करके अनवस्थाका परिहार किया जाय, तो भी युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानरूप वृत्तिका उत्पादक ही कोई नहीं है—मन ज्ञानका करण नहीं है, इसका आगे विचार किया जायगा, क्रियारूप मानेंगे, तो अनवस्थापिशाचिनी अवश्य उतरेगी, इससे वृत्ति आदिके संस्कारोंकी अनुपपत्तिका प्रसङ्ग कैसे हटेगा ? इसपर 'एवं च' इत्यादि ग्रन्थसे परिहार करते हैं। भाव यह है कि अन्तःकरणमें जिन-जिन वृत्तियोंका उद्भव होता है, वे चाहे ज्ञानरूप हों या ज्ञानरूप न हो, परन्तु वे सबकी-सब स्वसे ( अहङ्कार या ज्ञान ) और स्व
अहङ्कार आदिके अनुसन्धानका विचार] भाषानुवादसहित २०९
पिण्डाद् व्युच्चरन्तो विस्फुलिङ्गा इव स्वस्वावच्छिन्नेन वह्निनेव स्वस्वावच्छिन्ने- नाऽनित्येन साक्षिणा भास्यन्ते इति युक्तं तेष्वपि संस्काराधानम् । यस्तु— 'घटैकाकारधीस्था चिद् घटमेवाऽवभासयेत् । घटस्य ज्ञातता ब्रह्मचैतन्येनावभासते ॥ ४ ॥' इति कूटस्थदीपोक्तो विषयविशेषणस्य ज्ञानस्य विषयावच्छिन्नब्रह्म- चैतन्यावभास्यत्वपक्षः, यश्च तत्त्वप्रदीपिकोक्तो ज्ञानेच्छादीनामनवच्छिन्न- शुद्धचैतन्यरूपनित्यसाक्षिभास्यत्वपक्षः, तयोरपि चैतन्यस्य स्वसंसृष्टापरोक्ष- रूपत्वाद् वृत्तिसंसर्गोऽवश्यं वाच्य इति तत्संसृष्टानित्यरूपसद्भावान्न तेषु संस्काराधाने काचिदनुपपत्तिरिति ।
विस्फुलिङ्गसे युक्त वह्निसे प्रकाश होता है, वैसे ही ज्ञान, सुख आदि अन्तःकरण- वृत्तियोंका स्व-स्वावच्छिन्न ‡ अनित्य साक्षीसे प्रकाश होता है । अतः अहङ्कार आदिमें संस्कारोंका आधान युक्त ही है ।
जो कि—'घटैकाकारधीस्था०' ( घटाकारवृत्तिमें स्थित चिदाभास अर्थात् घटाकारवृत्तिप्रतिविम्बित घटज्ञान घटको ही प्रकाशित करता है और घटकी ज्ञातता [ घटमें रहनेवाली घटज्ञानकी विषयता अर्थात् विषयतासम्बन्धेन विषयनिष्ठ ज्ञान ] ब्रह्मचैतन्यसे ही प्रकाशित होती है ) इस प्रकार कूट- स्थदीपमें कहा गया—'विषयके विशेषणीभूत ज्ञानका विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यसे प्रकाश होता है'—यह पक्ष और तत्त्वप्रदीपिकामें कहा गया—'ज्ञान, इच्छा आदि अनवच्छिन्न-शुद्ध चैतन्यरूप नित्य साक्षीसे प्रकाशित होते हैं'—यह पक्ष—इन दोनों पक्षोंमें भी चैतन्यके स्वसंसृष्ट वस्तुके अपरोक्ष ज्ञानरूप होनेसे वृत्तिका सम्बन्ध अवश्य अपेक्षित है, इसलिए इच्छा आदि-वृत्तिसे संसृष्ट साक्षीका अनित्यरूप होनेसे इच्छा आदिमें संस्कारके आधानमें कोई अनुपपत्ति नहीं है* ।
(वृत्तिसे) अवच्छिन्न चैतन्य साक्षीसे प्रकाशित होती हैं । चैतन्यके सचमुच नित्य होनेपर भी भास्यरूपसे अवच्छेदकरूपसे उत्पद्यमान अहङ्कार आदि धर्मोंके अनित्य होनेसे उन धर्मोंसे विशिष्ट उनका अवभासक चैतन्य अनित्य है, अतः उसकी सूक्ष्मावस्थारूप उन धर्मोंका संस्कार उत्पन्न हो सकता है, इसलिए वृत्ति आदिका स्वगोचर संस्कार द्वारा स्मरण हो सकता है ।
‡ प्रकृतमें स्वपदसे अहङ्कारका और द्वितीय स्वपदसे वृत्तिका ग्रहण है। यद्यपि साक्षी वस्तुतः नित्य है, तथापि औपाधिक अनित्यत्व उसमें है, यह भाव है ।
* प्रकृतमें शङ्काका भाव यह है कि ऊपरके 'घटैकाकार' इत्यादि कहे गये दो पक्षोंमें यह
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२१० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
अन्ये त्वविद्यावृत्त्यैव सौषुप्तस्मृतिक्लृप्तया ।
अहङ्कारादिभानेन संस्कारं सम्प्रचक्षते ॥ १०४ ॥
कोई लोग कहते हैं कि सुषुप्तिकालीन अविद्याकी स्मृतिमें क्लृप्त अविद्या-वृत्तिसे ही अहंकार आदिका भान होनेसे उसीसे अहमर्थके संस्कारका आधान होता है ॥ १०४ ॥
अन्ये तु सुषुप्तावप्यविद्याद्यनुसन्धानसिद्धये कल्पितामविद्यावृत्तिमह-माकारामङ्गीकृत्याऽहमर्थे संस्कारमुपपादयन्ति ।
न चाऽस्मिन् पक्षे 'एतावन्तं कालमिदमहं पश्यन्नेवासम्' इति अन्य-ज्ञानधाराकालीनाहमर्थानुसन्धानानुपपत्तिः । अवच्छेदकभेदेन सुखदुःख-
❄ कुछ लोग—उठनेके बाद अविद्या आदिके स्मरणकी उपपत्तिकाके लिए सुषुप्ति अवस्थामें अहमाकार अविद्याकी वृत्तिको मान कर—अहमर्थमें संस्कारका उपपादन करते हैं। इसपर शङ्का होती है कि इस पक्षमें 'एतावन्तं कालम्' 'इतने समयतक मैं इसे देखता ही रहा' इस प्रकार अन्य वस्तुके ज्ञानकी धाराके कालके अहमर्थका अनुसन्धान ( स्मरण ) नहीं होगा ? क्योंकि एक
ज्ञात होता है कि ज्ञान, इच्छा आदिका अवभासक नित्य चैतन्य ही है, इसलिए उसकी सूक्ष्मावस्था न होनेके कारण उन ज्ञान आदिमें संस्कारोंका आधान नहीं हो सकेगा। यदि पूर्वोक्त रीतिसे ज्ञानादिको स्व-स्वावच्छिन्न साक्षिचैतन्यभास्य मानकर इन पक्षोंमें संस्कारोंका आधान माना जाय, तो 'ज्ञातताशब्दसे कहा जानेवाला घटादिगोचर वृत्तिप्रतिबिम्बित ज्ञान घटाकार वृत्तिसे अयुक्त विषयाधिष्ठानरूप ब्रह्मचैतन्यसे भास्य है' इस कथनसे विरोध होगा और ज्ञान, इच्छा आदि अनवच्छिन्न साक्षीसे भास्य हैं, इस द्वितीय पक्षके साथ भी विरोध होगा, अतः इन पक्षोंमें संस्कारोंका आधान कैसे होगा ? इसपर 'तयोरपि' इस ग्रन्थसे उत्तर देते हैं। सारांश यह है कि विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य ज्ञातताका अवभासक है, इस मतमें वह ब्रह्मचैतन्य ज्ञातताका अपरोक्षज्ञानरूप ही माना जाता है, क्योंकि 'यह घट ज्ञात है' इस प्रकार ज्ञातताका अपरोक्ष अवभास होता है। तथा अनवच्छिन्न शुद्ध चैतन्यको भी ज्ञान आदिका अपरोक्ष अवभासरूप मानना चाहिए, क्योंकि उन वृत्तियोंका भी अपरोक्ष भान होता है। इस परिस्थितिमें उक्त दो प्रकारके चैतन्यका स्वविषय ज्ञान, इच्छा आदिके साथ सम्बन्ध अवश्य होगा, क्योंकि जो अपरोक्ष ज्ञान होता है, वह अपने तादात्म्यापन्न विषयोंका अनुभवरूप है, ऐसा नियम है। इसलिए अपने विषयभूत ज्ञान, इच्छा आदिके विनाश समयमें ज्ञानादिसे विशिष्ट उक्त द्विविध चैतन्य भी अवश्य विनष्ट होगा, अतः चैतन्यविनाशरूप संस्कार-का आधान, इन पक्षोंमें भी उपपन्न हो सकता है।
* इस मत में पूर्वमतसे विशेष यह है कि यदि 'स्वाकारवृत्तिसे ही संस्कारोंका आधान
अहंकार आदिके अनुसंधानका विचार] भाषानुवादसहित २११
यौगपद्यवद् वृत्तिद्वययौगपद्यस्याप्यविरोधिनाऽन्यज्ञानधाराकालेऽपि अहमाकाराविद्यावृत्तिसन्तानसम्भवादिति ।
उपास्तित्वन्मनोवृत्तिरियं न ज्ञानमिष्यते ।
प्रत्यभिज्ञा स्मृतिज्ञानं तत्तांश इति चापरे ॥ १०५ ॥
यह अहमाकारवृत्ति मनोवृत्ति है और वह उपासनाके समान ज्ञान नहीं है, प्रत्यभिज्ञा भी तत्तांशमें ही स्मृतिज्ञान है, अहंशमें नहीं, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १०५ ॥
कालमें दो वृत्तियाँ नहीं हो सकतीं, नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अवच्छेदक † सिर, पैर आदि देशके भेदसे जैसे सुख और दुःख दोनों एक ही समयमें माने जाते हैं, वैसे ही एक कालमें दो वृत्तियोंका स्वीकार करनेमें किसी प्रकारके विरोधके न होनेसे ज्ञानान्तरकी धाराके समयमें भी अहमाकार अविद्याकी वृत्तिका प्रवाह हो ‡ सकता है ।
होता है' यह नियम माना जाय, तो भी कोई अनुपपत्ति नहीं है, क्योंकि अविद्यावृत्तियोंसे, जो कि अहङ्कार और तद्धर्मोंको विषय करती हैं, अहङ्कार आदिमें संस्कारोंक आधान होगा । अविद्यावृत्ति अनुभवके योग्य नहीं है, अतः ज्ञान या संस्कारके लिए अन्य वृत्ति माननी नहीं पड़ेगी, इसलिए पूर्वोक्त अनवस्था भी नहीं होगी । सुषुप्तिमें अज्ञान आदिका अनुभव होनेसे अविद्यावृत्ति माननी भी पड़ती है, अतः यह कल्पना नवीन भी नहीं होगी । अहङ्काराकार अविद्यावृत्तिके स्वीकार करनेसे अहङ्कार आदि केवल साक्षीसे वेद्य हैं, इस सिद्धान्तके साथ विरोध होगा ? नहीं, क्योंकि केवल साक्षीवेद्यत्वका अर्थ है—ज्ञानात्मकवृत्तिसे अनुपहित साक्षीसे वेद्य, फलतः ज्ञानकारणसे जन्य न होनेके कारण अविद्यावृत्तिको ज्ञानरूप नहीं मानते हैं ।
† अवच्छेदकशब्दका प्रकृतमें अर्थ है—सप्तमीविभक्तिसे निर्दिश्य विलक्षण विशेषण । प्रकृतमें 'शिरसि मे वेदना' 'पादे मे सुखम्' (माथेमें मुझे दर्द है, और पैरमें सुख है) । इसमें 'शिरसि' और 'पादे' इस सप्तमी विभक्तिसे विलक्षण अवच्छेदक—विशेषण—कहा जाता है, अतः इन अवच्छेदकोंके भेदसे जैसे एक कालमें सुख और दुःख दोनों माने जाते हैं, वैसे ही एक कालमें अर्थात् अन्य ज्ञानधाराकालमें अन्य वस्तुविषयक अन्तःकरणकी वृत्ति और अहमाकार अविद्याकी वृत्ति प्रमातामें अवच्छेदकभेदसे मानेंगे । इसमें कोई विरोध नहीं है, यह तात्पर्य है ।
‡ अर्थात् अन्तःकरणकी वृत्तियोंका जो प्रवाह है, वही धारा है, इसलिए तत्कालीन अविद्यावृत्ति भी सन्ततिरूप ही होगी, इस सम्भावनामात्रसे मूलमें 'अविद्यावृत्तिसन्तान' कहा गया है, यह भाव है ।
२१२ सिद्धान्तलेशसंग्रहे [ प्रथम परिच्छेद
अपरे तु—अहमाकारा वृत्तिरन्तःकरणवृत्तिरेव । किन्तु उपासनादिवृत्तिवन्न ज्ञानम्, क्लृप्ततत्करणाजन्यत्वात् । नहि तत्र चक्षुरादिप्रत्यक्षलक्षणं सम्भवति, न वा लिङ्गादिकम् । लिङ्गादिप्रतिसन्धानशून्यस्याऽप्यहङ्कारानुसन्धानदर्शनात् । नाऽपि मनः करणम्, तस्योपादानभूतस्य क्वचिदपि करणत्वाक्लृप्तेः । तर्हि अहमर्थप्रत्यभिज्ञाऽपि ज्ञानं न स्यादिति चेत्, न; तस्या अहमंशे ज्ञानत्वाभावेऽपि तत्तांशे स्मृतिकरणत्वेन क्लृप्तसंस्कार-
कुछ* लोग कहते हैं कि अहमाकार वृत्ति अन्तःकरणकी वृत्ति ही है, [ अविद्याकी वृत्ति नहीं है ] किन्तु अहमाकार अन्तःकरणकी वृत्ति उपासना आदि वृत्तियोंके समान ज्ञानरूप नहीं है, क्योंकि क्लृप्त जो ज्ञानके चक्षुरादि करण हैं, उनसे ( वह वृत्ति ) जन्य नहीं है । क्योंकि न तो उस वृत्तिमें चक्षु आदि इन्द्रियाँ प्रत्यक्ष प्रमाण हैं और न हेतु आदि अनुमानादि प्रमाण हैं । तथा लिङ्गादि-ज्ञानके विरहकालमें भी अहमर्थका अनुसंधान होता है, इससे भी लिंगादि अन्तःकरणवृत्तिके कारण नहीं हैं। और मन भी ज्ञानका करण नहीं है, क्योंकि उसके उपादान होनेके कारण † किसी भी वृत्तिज्ञानका वह करण नहीं हो सकता है । इस परिस्थितिमें शङ्का होती है कि अन्तःकरणसे होनेवाली अहमर्थकी प्रत्यभिज्ञा भी ज्ञानात्मक नहीं होगी ? नहीं, यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि उस प्रत्यभिज्ञाके 'अहम्' अंशमें ज्ञानत्व न होनेपर भी तत्ता अंशमें ज्ञानत्व है, कारण कि स्मृतिके कारणरूपसे
* इन लोगोंका कहना है कि जब अहमाकार अन्तःकरणकी वृत्तिसे ही अहमर्थमें संस्कारोंका आधान हो सकता है, तो अविद्याकी वृत्ति क्यों मानना ? यदि शङ्का हो कि सुख और दुःख तो एक कालमें हो सकते हैं, परन्तु एक कालमें दो ज्ञान नहीं हो सकते हैं, अतः अहमर्थगोचर अन्तःकरणवृत्ति अन्य ज्ञानकी धारा कालमें कैसे होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जो अन्तःकरणकी अहमाकारवृत्ति संस्कारार्थ है, वह ज्ञानरूप नहीं है, अतः दोष नहीं है ।
† जो जिस कार्यका उपादान होता है, वह उस कार्यका करण नहीं होता, क्योंकि करण वही होता है, जो व्यापारवान् होकर असाधारण कारण हो । घटकी उपादान कारण मृत्तिकामें घटकरणत्वका व्यवहार नहीं होता है, अतः अन्तःकरणवृत्तिके प्रति अन्तःकरण, जो उस वृत्तिका उपादान है, करण नहीं होगा, इस अभिमानसे मूलमें 'तस्योपादानभूतस्य' इत्यादिसे मनमें करणत्वका निरास करते हैं, यह भाव है ।
अहंकार आदिके अनुसन्धानका विचार] भाषानुवादसहित २१३
जन्यतया ज्ञानत्वात्। अंशभेदेन ज्ञाने परोक्षत्वापरोक्षत्ववत् प्रमात्वा- प्रमात्ववच्च ज्ञानत्वाज्ञानत्वयोरपि अविरोधादित्याहुः।
इतरे ज्ञानमेवेयं मनसोऽपीन्द्रियत्वतः। वाह्यार्थेष्वेव वृत्तीनामावृत्याभिभवः फलम् ॥ १०६ ॥
मन भी इन्द्रिय है, अतः अहमर्थाकार मनकी वृत्ति ज्ञान ही है। और आवरणका विनाश करना वृत्तियोंका फल बाह्य अर्थोंमें ही है ॥ १०६ ॥
इतरे तु—अहमाकाराऽपि वृत्तिर्ज्ञानमेव, ‘मामहं जानामि’ इत्यनुभवात्। न च करणासम्भवः, अनुभवानुसारेण मनस एवाऽन्तरिन्द्रियस्य करणत्वस्यापि कल्पनादित्याहुः ॥१०७॥
निश्चित संस्कारसे वह जन्य है। अंशके भेदसे † ज्ञानमें जैसे परोक्षत्व और अपरोक्षत्व माना है, और अंशके भेदसे प्रमात्व और अप्रमात्व माना जाता है, वैसे ही अंशके भेदसे ज्ञानत्व और अज्ञानत्वके एकत्र अवस्थानमें भी कोई विरोध नहीं है।
कुछ लोग तो यह कहते हैं कि अहमाकार अन्तःकरणकी वृत्ति ज्ञान ही है। कारण कि 'मामहम्०' (मैं अपनेको जानता हूँ) ऐसा अहमर्थाकार वृत्तिमें साक्षात् ज्ञानत्वका अनुभव होता है। परन्तु मनके करणत्वका तो निरास है? नहीं, क्योंकि अनुभवके अनुसार मनमें, जो कि अन्दरकी इन्द्रिय है, ज्ञान-करणत्वकी भी कल्पना की जा सकती है * ॥ १७ ॥
† जैसे 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यादि अनुमितिमें पर्वत अंशमें अपरोक्षत्व है और वह्नि अंशमें परोक्षत्व है, तथा 'इदं रजतम्' इसमें इदमंशमें प्रामाण्य है और रजत अंशमें अप्रामाण्य है, वैसे ही 'जिस मैंने स्वप्नमें श्रीकृष्णका अनुभव किया है, वही मैं इस समयमें उसका स्मरण करता हूँ' इस प्रत्यभिज्ञामें अहमंशमें ज्ञानत्वाभाव और तत्तांशमें ज्ञानत्वका स्वीकार किया जाता है, क्योंकि अनुभव ऐसा ही होता है। प्रत्यभिज्ञा—संस्कार और इन्द्रिय दोनोंसे होनेवाला ज्ञान, यह भाव है।
* इस मतानुयायियोंका कहना है कि पूर्वकी टिप्पणीमें जिस प्रत्यभिज्ञाका उल्लेख किया है, उसको अहमर्थमें भी ज्ञान ही मानना चाहिए। अन्यथा सूत्र और भाष्यमें अन्तःकरणोपहित चैतन्यात्मक अहमर्थ जीवकी प्रत्यभिज्ञाके बलसे जो स्थायिताका साधन किया गया है, वह विरुद्ध होगा। इस अर्थमें प्रमाणभूत ब्रह्मसूत्र भी है—'अनुस्मृतेश्च' [अ० २ पा० २ सू० २५] अनुस्मृति—प्रत्यभिज्ञा। इसी प्रकार इस सूत्रके भाष्यमें कहा है—'य एवाऽहं पूर्वेद्युरद्राक्षम्, स एवाऽद्यमद्य स्मरामि' (जिस मैंने प्रथम दिन देखा था, वही
| २१४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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एवं सति बाह्यविषयापरोक्षवृत्तीनामेवावरणाभिभावकत्वनियमः पर्यवसन्नः ।
शुक्त्यादौ नन्विदंवृत्त्याऽऽवरणाभिभवो नहि ।
रूप्याध्यासाद्यसंसिद्धेरत्र केचित् प्रचक्षते ॥ १०७ ॥
परन्तु बाह्यवृत्तियोंका भी आवरणका अभिभव फल नहीं हो सकता है, क्योंकि शुक्तिरजतादि स्थलमें इदमाकार बाह्यवृत्तिसे अज्ञानका अभिभव नहीं देखा जाता है, यदि उक्त स्थलमें आवरणाभिभव फलको हठात् मानोगे, तो शुक्तिमें रजतका अध्यास ही सिद्ध नहीं होगा, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १०७ ॥
ननु नाऽयमपि नियमः, शुक्तिरजतस्थले इदमाकारवृत्तेरज्ञानानभिभावकत्वात् । अन्यथोपादानाभावेन रजतोत्पत्त्ययोगादिति चेत् ,
इस अवस्थामें अर्थात् अहमाकार अपरोक्ष वृत्तिके स्वीकार करनेपर यही नियम प्राप्त होता है कि बाह्यके घट आदि विषयाकारोंमें परिणत वृत्तियां ही आवरणकी अभिभावक हैं—विनाशक हैं ।
परन्तु यह भी नियम नहीं हो सकता है—बाह्यविषयगोचर अपरोक्ष-वृत्ति अज्ञानकी विनाशक है, क्योंकि शुक्तिरजतभ्रमस्थलमें इदमाकार (बाह्यगोचर) अपरोक्षवृत्तिके होनेपर भी वहां अज्ञानका विनाश नहीं होता
मैं आज स्मरण करता हूँ) इसलिए प्रत्यभिज्ञाके अहमर्थमें ज्ञातत्वाभावका कथन अयुक्त ही है। 'मैं अपने को जानता हूँ' इसमें अहमर्थ वृत्तिमें अतिस्फुट ज्ञातत्वका अनुभव होता है। 'बुद्धेः करणत्वाभ्युपगमात्' (अन्तःकरण करण माना जाता है) इस (ब्र० सू० अ० २ पा० ३ सू० ४० के) भाष्यके अनुसार मनको करण माननेमें कोई हानि भी नहीं है। इसीसे भाष्यकारने मनमें प्राणपादमें इन्द्रियत्वका साधन भी किया है। इस मतमें 'अज्ञान आदि केवल साक्षीसे भास्य हैं, यह सिद्धान्त भी अहमर्थव्यतिरिक्त अज्ञान, सुख आदि विषयक है। यदि मन इन्द्रिय माना जाय, तो रूपके प्रत्यक्षमें जैसे चक्षु प्रमाण है, वैसे अहमर्थमें यह भी प्रमाण हो जायगा, और वह हो नहीं सकता, क्योंकि अज्ञातज्ञापकत्वरूप (अज्ञात वस्तुका ज्ञापन) प्रमाणका लक्षण मनमें नहीं घटता है, कारण कि अहमर्थके अनावृत साक्षीरूप चैतन्यमें अध्यस्त होनेके कारण अहमर्थ अज्ञात नहीं है? यह शङ्का नहीं हो सकती है, क्योंकि अबाधितानुभवत्व या तद्वति तत्प्रकारकज्ञानत्व ही प्रमात्व है, इस मतके अनुरोधसे मनको अहमाकार ज्ञानके प्रति करण माननेमें विरोध नहीं है, अतः अहमाकार ज्ञानको प्रमा और उसके करण मनको प्रमाण माननेमें हानि नहीं है।
सकारण अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित २१५
इदमाकारवृत्त्येदमंशे मोहक्षितावपि ।
शुक्त्याद्यंशेऽक्षितत्वेन. रजताद्युद्भवस्ततः ॥ १०८ ॥
अत एव स्फुरन् भ्रान्तावाधार इदमंशकः ।
शुक्तवाद्यंशस्त्वधिष्ठानं सकार्यज्ञानगोचरः ॥ १०९ ॥
इदमाकार वृत्तिसे इदमंशमें आवरणका नाश होनेपर भी शुक्ति आदि अंशमें आवरणका विनाश न होनेसे उस अज्ञानसे रजतका उद्भव होता है । इसीसे भ्रान्तिमें स्फुरनेवाला इदमंश आधार है और रजतादिविक्षेपके साथ अज्ञानका विषय शुक्ति आदि अंश अधिष्ठान है ॥ १०८ ॥ १०९ ॥
अत्राहुः--इदमाकारवृत्त्या इदमंशाज्ञाननिवृत्तावपि शुक्तित्वादिविशेषां-
शाज्ञानानिवृत्तेः तदेव रजतोपादानम्, शुक्तित्वाद्यज्ञाने रजताध्यासस्य
तद्भाने तदभावस्याऽनुभूयमानत्वात् । अध्यासभाष्यटीकाविवरणे अनुभूय-
मानान्ययव्यतिरेकस्यैवाऽज्ञानस्य रजताद्यध्यासोपादानत्वोक्तेः ।
है, [ अतः व्यभिचार है ] यदि इदमाकार वृत्तिको उक्त स्थलमें अज्ञानका अभिभावक मानेंगे, तो अज्ञानरूप रजतोपादानका अभाव होनेसे शुक्तिमें रजतकी उत्पत्ति ही नहीं हो सकेगी ?
इस आक्षेपके समाधानमें कोई कहते हैं कि इदमाकार वृत्तिसे इदमंशके अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर भी शुक्तित्व आदि विशेष-अंशके अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होनेसे वही विशेष अंशका अज्ञान रजत आदिका उपादान है, क्योंकि शुक्तित्व आदिके अज्ञानके होनेपर रजतका अध्यास होता है और शुक्तित्व आदिके अज्ञानके न होनेपर रजतका अध्यास नहीं होता है, इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक देखे जाते हैं । और अध्यासभाष्यकी पञ्चपादिका नामकी टीकाके विवरणमें *—जिसके अन्वय और व्यतिरेक अनुभूयमान हैं,
* श्रीपद्मपादाचार्यकृत पञ्चपादिका शङ्करभाष्यकी टीका है, वह सम्पूर्ण भाष्यके ऊपर उपलब्ध नहीं होती । प्रकाशात्मयतिकृत विवरण इसकी टीका है, ये दोनों चतुःसूत्री तक मुद्रित हैं । इस विवरण में अन्वय और व्यतिरेकसे अज्ञान अध्यासका उपादान कारण माना गया है, यहाँकी कुछ पंक्तियां इस प्रकार हैं—
'ननु कथं मिथ्याऽज्ञानमध्यासस्योपादानम् ? तस्मिन् सति अध्यासस्योदयादसति चानुदया- दिति ब्रूमः । ननु अध्यासस्य प्रतिबन्धकं तत्त्वज्ञानं तदभावश्चाज्ञानमिति प्रतिबन्धकाभाव
२१६ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद
अत एव शुक्त्यंशोऽधिष्ठानम् , इदमंश आधारः । सविलासाज्ञानविषयोऽधिष्ठानम् , अतद्रूपोऽपि तद्रूपेणाऽऽरोप्यबुद्धौ स्फुरन्नाधार इति संक्षेपशारीरकेऽपि विवेचनादिति ।
ऐसा—अज्ञान ही रजत आदि अध्यासके प्रति उपादान कहा गया है ।
* इसीसे शुक्त्यंश अर्थात् शुक्तित्वरूप विशेषधर्मसे पुरोवर्ती पदार्थावच्छिन्न चैतन्य अधिष्ठान है और इदमंश आधार है । क्योंकि अधिष्ठानका अर्थ है—रजत आदि विक्षेपसे युक्त अज्ञानका विषय, और आधारशब्दका अर्थ है—तद्रूप न होनेपर भी तद्रूपसे आरोप्यबुद्धिमें स्फुरनेवाला अर्थात् सचमुच अध्यस्त रजत आदिरूप न होकर रजत आदिरूपसे रजतादि बुद्धिमें भासने-
विषयतयाऽज्ञानस्याऽध्यासेनाऽन्वयव्यतिरेकावन्यथासिद्धौ, नैतत्सारम्, पुष्कलकारणे हि सति कार्योत्पादविरोधि प्रतिबन्धकम् , न चाऽध्यासपुष्कलकारणे सति तत्त्वज्ञानोदयः, तस्माच्चान्वयव्यतिरेकौ प्रतिबन्धकाभावविषयौ, तथापि विरोधिसंसर्गाभाव इति चेत्.....................मिथ्याज्ञानमेवाध्यासोपादानम् , नात्मान्तःकरणकाचादिदोषा इति सूक्तम्, [ द्रष्टव्य—भामती आदि नवव्याख्यायुत शाङ्करभाष्य पृ० ८९ कलकत्ता मुद्रित ] शङ्का—मिथ्याज्ञान अध्यासका उपादान कैसे है ? समाधान—मिथ्याज्ञानके रहनेपर अध्यास होता है और न रहनेपर नहीं होता है, इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक ही प्रमाण हैं । शङ्का—अध्यासका प्रतिबन्धक तत्त्वज्ञान है और तत्त्वज्ञानका अभाव अज्ञान है, इस प्रकार प्रतिबन्धकाभावविषयक होनेसे अज्ञानके साथ अन्वय और व्यतिरेक अन्यथासिद्ध हैं ? समाधान—नहीं, क्योंकि प्रतिबन्धकका अर्थ है-पुष्कल (सब) कारणके रहते कार्यकी उत्पत्तिमें विरोधी । और अध्यासके कारणोंके रहते तत्त्वज्ञान नहीं होता है, इससे उक्त अन्वय और व्यतिरेक प्रतिबन्धकाभावविषयक नहीं हैं, शङ्का—तथापि विरोधिसंसर्गाभावविषयक होंगे ? नहीं.........इत्यादिसे अनेक प्रकारकी आशङ्का करके अन्तमें स्थिर किया गया है कि अध्यासका उपादान कारण मिथ्या अज्ञान ही है, आत्मा, अन्तःकरण या काचादि दोष नहीं हैं, यह उपर्युक्त पङ्क्तियोंका आशय है ।
* तात्पर्य यह है कि शुक्तित्व आदि धर्मोंसे विशिष्ट पुरोवर्ती पदार्थ ही यदि प्रातिभासिक रजतके कारण अज्ञानसे आवृत माना जाय, तो वह रजतत्वादि विशिष्ट द्रव्य अधिष्ठान होगा, इदन्त्वविशिष्ट इदमंश नहीं होगा, क्योंकि जो अज्ञानसे आवृत होता है, वही अधिष्ठान होता है, इस अवस्थामें अधिष्ठान और आरोप्यके एकज्ञानविषयत्व नियमसे 'शुक्ति रजत है' ऐसी प्रतीति होनी चाहिए, 'इदं रजतम्' यह प्रतीति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इदमंश अधिष्ठान नहीं है, इसलिए अधिष्ठान और आधारका लक्षण पृथक् पृथक् करते हैं, इस परिस्थितिमें इस मतके अनुकूल यही नियम होगा कि आधार और आरोप्य ( आरोपके विषय ) ही एक ज्ञानके विषय होंगे, अधिष्ठान और आरोप्य नहीं ।
सकारण अध्यासका विचार ] भाषानुवादसहित २१७
अन्ये वृत्त्येदमज्ञानावरणांशपरिक्षयात् ।
विक्षेपांशेन रजतं जीवन्मुक्तौ जगद्यथा ॥ ११० ॥
कुछ लोग कहते हैं कि वृत्तिसे इदमंशके अज्ञानके आवरणांशके नष्ट होनेपर भी उसके विक्षेप अंशसे रजतकी उत्पत्ति होती है, जैसे जीवन्मुक्तिमें जगत् ॥ ११० ॥
अपरे तु—'इदं रजतम्' इति इदमंशसम्भिन्नत्वेन प्रतीयमानस्य रजतस्य इदमंशाज्ञानमेवोपादानम् । तस्य चेदमाकारवृत्त्या आवरणशक्तिमात्रनिवृत्तावपि विक्षेपशक्त्या सह तदनुवृत्तेः नोपादानत्वासम्भवः । जलप्रतिबिम्बितवृक्षाधोऽग्रत्वाध्यासे जीवन्मुक्त्यनुवृत्ते प्रपञ्चाध्यासे च सर्वा-
वाला, इस प्रकार अधिष्ठान और आधारका संक्षेपशारीरकमें भी विवेचन † किया गया है ?
‡ 'इदं रजतम्' (यह रजत है) इस प्रकार इदमंशके तादात्म्यरूपसे प्रतीयमान रजतके प्रति इदम् अंशका अज्ञान ही उपादान कारण है । इदमाकार वृत्तिसे उस अज्ञानकी आवरणशक्तिका विनाश होनेपर भी विक्षेप-शक्तिके साथ उसकी निवृत्ति न होनेसे रजत आदिके प्रति वह उपादान माना जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, क्योंकि जलमें प्रतिबिम्बित वृक्षके अधोग्रत्वके (जिसका अग्रभाग नीचे है, ऐसे वृक्षके अधोग्रत्वके) अध्यासमें और जीवन्मुक्तिमें अनुवर्तमान प्रपञ्चके अध्यासमें सर्वांशसे ✻ अधिष्ठानका साक्षात्कार
† संक्षेपशारीरकमें अधिष्ठान और आधारकी भिन्नताका सूचक एक श्लोकार्द्ध है, वह इस प्रकार है—
'संविद्धा सविलासमोहविषये वस्तुन्यधिष्ठानगी-
र्नाधारेऽध्ययनस्य वस्तुनि ततोऽस्थाने महान् संभ्रमः' इत्यादि । [अ० १ श्लोक ३१]
अर्थात् कार्यके युक्त अज्ञानसे आवृत वस्तुमें ही अध्यासके अधिष्ठानका व्यवहार होता है, आधारमें—आरोप्य पदार्थके साथ तादात्म्यरूपसे प्रतीयमान वस्तुमें—नहीं होता है, यह इस श्लोकार्धका भाव है ।
‡ अधिष्ठान और आरोप्य दोनों ही एक ज्ञानके विषय होते हैं, यही मत भाष्यादि निबन्धोंसे ज्ञात होता है, इसलिए पूर्वोक्त मत सर्वसम्मत नहीं है, इस अरुचिसे 'अपरे तु' का मत कहते हैं ।
✻ रजत आदि भ्रमस्थलमें अधिष्ठानका सर्वात्मना साक्षात्कार नहीं होता है, क्योंकि शुक्तित्व आदि विशेषरूपसे शुक्तिका साक्षात्कार नहीं होता है, इसलिए शुक्तिरजतस्थलमें इदमंशके अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर भी विशेषांशके अज्ञानकी निवृत्ति न होनेसे उसमें अध्यासकी उपादानता
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