सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 273, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें[सकारण अध्यासका विचार] भाषानुवादसहित २४३
कुतो न स्यादिति वाच्यम्; रजताध्याससमये रङ्गरजतसाधारणचाकचक्यदर्शनाविशेषेऽपि यतो रागादिरूपपुरुषदोषाभावादितस्तत्र तदा न रङ्गाध्यासः, तत एव मया तद्विषयवृत्त्यनुदयस्याऽभ्युपगमात् । तस्मादिदंमंशसंभिन्नरजतगोचरैकैव वृत्तिरिन्द्रियजन्या । न ततः प्रागिदमाकारा वृत्तिरिति नाऽत्रेयमज्ञाननिवर्तकत्वसदसद्भावचिन्ता कार्येति ।
क्यों नहीं होता है †? यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि रजतके अध्यासके समयमें रङ्ग और रजतके साधारण चाकचक्य दर्शनके समान होनेपर भी जिस रागादि पुरुषदोषके अभावसे शुक्तिमें रजताध्यास कालमें रङ्गका अध्यास तुम नहीं मानते हो, उसी कारणसे हम रङ्गविषयक वृत्तिकी उत्पत्ति नहीं मानते हैं, इसलिए रङ्गका अध्यास रजताध्यासकालमें नहीं होता है । इससे अर्थात् धर्मिज्ञानको कारण न माननेसे 'इदं रजतम्' इसमें इदमंशसे सम्मिलित रजतविषयक एक ही वृत्ति इन्द्रियसे उत्पन्न होती है । उससे पूर्व इदमाकार वृत्ति उत्पन्न नहीं होती है, इसलिए प्रकृतमें अज्ञाननिवर्तकत्वके सद्भाव और असद्भावकी चिन्ता करना व्यर्थ है ।
† शङ्काका तात्पर्य यह है कि यदि अधिष्ठानके सम्प्रयोगमात्रसे ही प्रातिभासिक पदार्थोंका इन्द्रियज्ञान होता है, तो शुक्तिमें अन्य कालमें अध्यस्त होनेवाला रङ्ग रजतके अध्यासकालमें चाक्षुष वृत्तिका विषय क्यों न हो ? कारण कि वह चाक्षुषवृत्ति जैसे रजततादात्म्याश्रय इदमर्थसम्प्रयोगजन्य है, वैसे ही कालान्तरीय रङ्गतादात्म्याश्रय इदमर्थसम्प्रयोगजन्य भी है, इसलिए सम्प्रयोग वृत्तिका हेतु नहीं है, किन्तु सादृश्यविशिष्ट धर्मिज्ञानका हेतु है, और वही सादृश्यज्ञान दोषरूपसे और धर्मिज्ञानरूपसे रजताध्यासमें कारण है, इसी प्रकार रजत साक्षिभास्य है, वही मानना चाहिए। इसपर उत्तर देते हैं कि तुम्हारे मतमें भी रजताध्यासके समयमें रङ्ग आदिका अध्यास क्यों नहीं होता है, इसका उत्तर देना होगा, यदि कहोगे कि चाकचक्य आदि ज्ञानके समान होनेपर भी रजतके अध्याससमयमें रंगविषयक राग आदि, जो पुरुषदोष हैं, उनके न रहनेसे रजताध्यासकालमें रङ्गाध्यास नहीं होता है, तो इसी प्रकार हम (कविताार्किकमतानुयायी) भी कहते हैं कि रागादि पुरुषदोषोंके न होनेसे रजताध्यासकालमें रङ्गवृत्तिका उदय नहीं होता है, यह कविताार्किकमत ही युक्त है, ऐसा 'तस्मात्' इत्यादिसे उपसंहार किया है।