सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 274, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५४४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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अन्ये त्वेकैव सामान्यवृत्तिर्वा भ्रान्तिकारणम् ।
तत्साक्षिभास्यमध्यस्तमलं वृत्त्येति मेनिरे ॥११२॥
कुछ लोग कहते हैं कि ( भ्रमस्थलमें ) इदमाकार सामान्य वृत्ति एक ही है, और वही अध्यासके प्रति कारण है अध्यस्तका उस वृत्तिसे अभिव्यक्त साक्षिचैतन्यसे भान होता है, अतः रजताकार द्वितीय वृत्ति निरर्थक है ॥११२॥
अन्ये तु—‘अधिष्ठानज्ञानमध्यासकारणम्’ इति इदमाकारां वृत्तिमुपेत्य तदभिव्यक्तेनैव साक्षिणा तदध्यस्तस्य रजतस्याऽवभाससम्भवात् तद्भासक-साक्ष्यभिव्यञ्जिकया तयैवेदंवृत्त्या रजतविषयसंस्काराधानोपपत्तेश्च रजताकार-वृत्तिर्व्यर्थेति मन्यन्ते ।
वृत्तिरेकैदमाकारा सामान्यज्ञानरूपिणी ।
इदंरजततादात्म्यगोचराऽन्येति केचन ॥११३॥
कोई लोग कहते हैं कि ( 'इदं रजतम्' इत्यादि स्थलमें ) सामान्य ज्ञानात्मक एक इदमाकार वृत्ति होती है, और दूसरी इदं और रजतके तादात्म्यका अवगाहन करनेवाली वृत्ति होती है ॥११३॥
ज्ञानद्वयपक्षे 'इदम्' इत्येका वृत्तिरध्यासकारणभूता । 'इदं रजतम्' इति
* कुछ लोग तो—अधिष्ठानज्ञान अध्यासके प्रति कारण है, इसलिए इदमाकार वृत्तिका अङ्गीकार करके, इदमाकार वृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्यरूप साक्षीसे ही उसमें (इदमवच्छिन्न चैतन्यमें) अध्यस्त रजतका अवभास होनेसे और अध्यस्त रजत आदिके अवभासक साक्षीरूप चैतन्यकी अभिव्यञ्जक इदमाकार वृत्तिसे ही रजत-विषयक संस्कारोंका आधान हो सकनेसे रजताकार वृत्ति व्यर्थ ही है—ऐसा मानते हैं।
† दो ज्ञान माननेवालोंके पक्षमें अर्थात् 'इदं रजतम्' इसमें
* पूर्व टिप्पणीमें कहा गया है कि धर्मिज्ञानमें अध्यासकी कारणताका जो खण्डन किया गया है, वह ऊपरी दृष्टिसे किया गया है, वस्तुतः नहीं, इसलिए धर्मिज्ञानवादीका मत कहते हैं—'अन्ये तु' इत्यादिसे ।
† जिस वृत्तिसे युक्त चैतन्यमें जितने पदार्थ भासते हों, उतने पदार्थोंमें उस वृत्तिसे संस्कारोंका आधान होता है, इस पूर्वोक्त नियमसे इदमाकार वृत्तिसे ही रजतका संस्कार हो सकता है, इसलिए रजताकार वृत्ति व्यर्थ है, यह 'अन्ये तु' मतका तात्पर्य है, और इस मतमें उक्त नियम न मानकर स्वगोचरवृत्तिसे ही स्वमें संस्कारोंका आधान होता है, यही नियम माना गया है, इसलिए इस मतमें अध्यस्त रजतविषयक भी वृत्ति मानी गई है, इसीका 'केचित्' और 'अन्ये तु' मतसे विचार हुआ है। इसमें भी पहले मतमें अध्यस्तरजतवृत्ति अध्यस्तरजतविशिष्टधर्मीको विषय करती है, और दूसरे मतमें अध्यस्तरजतमात्रको विषय करती है, यह भेद है ।