भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 276, कुल 590 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 276
२४६सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ प्रथम परिच्छेदं

तत्प्रतियोगिन इदंत्वस्याऽपि तद्विषयत्वं वक्तव्यमिति वाच्यम्; स्वतादात्म्याश्रयस्य इदंत्वविषयत्वादेव तस्य तत्संसर्गविषयत्वे अतिप्रसङ्गाभावात् । न चाऽधिष्ठानाध्यासयोरेकस्मिन् ज्ञाने प्रकाशनियमस्य सम्भावनाभाष्यविवरणे प्रतिपादनाद् एकवृत्तिविषयत्वं वक्तव्यमिति वाच्यम्; वृत्तिभेदेऽपीदमाकारवृत्त्यभिव्यक्ते एकस्मिन् साक्षिणि तयोः प्रकाशोपगमादित्याहुः ॥१८॥

विषयता होनी चाहिए ? [ अन्यथा घटत्व आदिके संसर्गप्रत्यक्षमें घटत्वादिविषयताका भी अभाव प्रसक्त होनेसे अतिप्रसङ्ग होगा, तात्पर्य यह है कि पूर्वमें कहा गया है कि अध्यस्तरजतवृत्तिको इदंविषयक नहीं मानना चाहिए, क्योंकि अन्य रीतिसे उपपत्ति हो सकती है, इसपर शङ्का करनेवाला कहता है कि ज्ञानाभाससे रजतका ग्रहण करनेपर इदन्त्व संसर्गका यदि ग्रहण होता है, तो संसर्गका प्रतियोगिभूत इदन्त्व भी अवश्य गृहीत होगा, इस अवस्थामें अध्यस्त रजतज्ञानमें इदन्त्वविषयकत्व आनेसे अध्यस्तरजतविशिष्ट इदंविषयकत्व सिद्ध ही हुआ, फिर कैसे कह सकते हैं कि ज्ञानाभास रजतमात्रविषयक ही होता है ? ] तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञानाभासके साथ तादात्म्यापन्न इदमंशज्ञानके इदन्त्वविषयक होने ही से रजतज्ञानमें रजतेदन्त्वसंसर्गकी विषयता होनेसे अतिप्रसङ्ग नहीं है । [ भाव यह है कि यद्यपि प्रातिभासिक—अध्यस्त रजतज्ञानका इदन्त्वरूप संसर्गप्रतियोगी विषय नहीं है, तथापि ज्ञानाभासके प्रति अधिष्ठान होनेके कारण इदमंश ज्ञानके साथ रजतज्ञानाभासका तादात्म्य है, जो इदमंश ज्ञान है, उसमें इदन्त्वरूप प्रतियोगिविषयकत्व है, अतः ज्ञानाभासमें भी इदन्त्वसंसर्गविषयकत्वका अवगाहन होता है, ] पुनः यदि शङ्का हो कि अधिष्ठान और अध्यासका एक ज्ञानमें प्रकाश होता है, इसका सम्भावनाभाष्यके विवरणमें प्रतिपादन होनेके कारण उनमें एकवृत्तिविषयता होनी चाहिए, तो यह भी युक्त नहीं है, कारण कि अधिष्ठान और अध्यासकी भिन्न-भिन्न वृत्ति मानी जाय, तो भी इदमाकारवृत्तिमें अभिव्यक्त एक साक्षीमें ही उनका प्रकाश माना गया है, [ तात्पर्यार्थ यह है कि अध्यस्तमात्रको विषय करनेवाली वृत्तिका विवरणकारने ही अङ्गीकार किया है, इसलिए ‘एकस्मिन् ज्ञाने’ ( एक ज्ञानमें अधिष्ठान और अध्यासका प्रकाश होता है ) इत्यादि नियममें कथित ज्ञानशब्द साक्षीका ही वाची है, वृत्तिका वाची नहीं है, इसलिए दोष नहीं है ] ॥१८॥

ankurnagpal108@gmail.com