भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 277

वृत्तिके निर्गमकी आवश्यकताका विचार ] भाषानुवादसहित २४७


ननु हेतुनियम्यत्वात् परोक्षत्वापरोक्षयोः ।
वृत्तेर्निर्गमनं व्यर्थमेवं केचित् समादधुः ॥११५॥

परोक्षत्व और अपरोक्षत्वकी विलक्षणताके करणविशेषके अधीन हो सकनेसे वृत्तिका निर्गमन व्यर्थ है, इस प्रकारकी शङ्का होनेपर कोई लोग इस प्रकार समाधान करते हैं ॥११५॥

ननु सर्वपदार्थानां साक्षिप्रसादादेव प्रकाशोपपत्तेः किं वृत्त्या ? घटादिविषयकसंस्काराधानाद्युपपत्तये तदपेक्षेऽपि तन्निर्गमाभ्युपगमो व्यर्थः; परोक्षस्थल इवाऽनिर्गतवृत्त्यवच्छिन्नसाक्षिणैव घटादेरपि प्रकाशोपपत्तेः।

न च तथा सति परोक्षापरोक्षवैलक्षण्यानुपपत्तिः; शाब्दानुमित्योरिव करणविशेषप्रयुक्तवृत्तिवैजात्यादेव तदुपपत्तेः ।


अत्र शङ्का होती है कि सम्पूर्ण पदार्थोंका साक्षीसे ही प्रकाश हो सकता है, तो फिर वृत्तिको मानना व्यर्थ ही है। घटादि विषयोंके* संस्कारके आधानके लिए वृत्तिकी उत्पत्ति यदि मान भी ली जाय, तो भी वृत्तिका बहिर्निर्गम अर्थात् चक्षु आदि द्वारा घटाकार अन्तःकरणकी वृत्ति बाहर निकलती है, यह मानना व्यर्थ है, क्योंकि परोक्षस्थलके समान अनिर्गतवृत्तिसे युक्त साक्षीसे ही घट आदिका भी प्रकाश हो सकता है [ तात्पर्यार्थ यह है—जैसे 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' ( पर्वत वह्निमान् है, धूम होनेसे ) इस अनुमितिस्थलमें वह्निदेशमें वृत्तिके न जानेपर भी साक्षीसे उसका प्रकाश होता है, वैसे ही घट आदि देशमें अन्तःकरणकी वृत्तिके न जानेपर भी उसका प्रकाश हो सकता है, अतः वृत्तिका बाहर निकलना सर्वथा अनुपयुक्त है ] ।

इसपर यदि शङ्का हो कि वृत्तिका बहिर्गमन न माना जाय, तो परोक्ष और अपरोक्षस्थलमें कोई विशेष नहीं होगा, [ अतः वृत्तिका अपरोक्षस्थलमें बाहर निकलना जरूरी है, अन्यथा परोक्ष ज्ञान और अपरोक्ष ज्ञानमें वैलक्षण्यका वृत्तिके निकलनेसे और न निकलनेसे जो स्वीकार किया † गया है, वह न होगा ]


* तात्पर्य यह है कि यदि वृत्ति न मानी जाय, तो कालान्तरमें किसी भी पदार्थका स्मरण नहीं होगा क्योंकि तत्-तत् विषयोंके अनुभव साक्षीरूप होनेके कारण नित्य होंगे, अतः अनुभवके विनाशरूप संस्कार नहीं होंगे, और संस्कारके न होनेसे स्मरण नहीं होगा, इसलिए अवश्य वृत्ति माननी होगी, अतः 'किं वृत्त्या?' इसको छोड़कर दूसरा प्रश्न किया गया कि वृत्तिका बहिर्निर्गम क्यों माना जाता है ?

† बहिर्निर्गतवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य अपरोक्षज्ञान है, अनिर्गतवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य परोक्षज्ञान है, इस प्रकारका प्रत्यक्ष और परोक्षमें वैलक्षण्य केवल वृत्तिप्रयुक्त है, अतः वृत्तिनिर्गमन