भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 278
२५८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अर्थेष्वाश्रयवृत्तिस्थचिद्भास्येष्वेवापरोक्षतः ॥
कल्प्यते निर्गमो वृत्तेः परोक्षेऽगतिकल्पना ॥११६॥

आश्रय (विषयाकार) वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे भासित होनेवाले अर्थोंमें अपरोक्षता होनेसे प्रत्यक्ष स्थलमें वृत्तिका निर्गम माना जाता है, और परोक्षस्थलमें वृत्तिनिर्गमकी कल्पना नहीं करते हैं ॥११६॥

अत्र केचिदाहुः—प्रत्यक्षस्थले विषयाधिष्ठानतया तदवच्छिन्नमेव चैतन्यं विषयप्रकाशः। साक्षात्तादात्म्यरूपसम्बन्धसम्भवे स्वरूपसम्बन्धस्य वाऽन्यस्य वा कल्पनायोगादिति तदभिव्यक्त्यर्थं युक्तो वृत्तिनिर्गमाभ्युपगमः।
परोक्षस्थले व्यवहिते वह्नयादौ वृत्तिसंसर्गायोगादिन्द्रियवदन्वयव्यति-


तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शाब्दबोध और अनुमितिमें जैसे करणविशेषसे वैलक्षण्यका प्रतिपादन किया गया है, वैसे ही प्रत्यक्ष, अनुमान आदिमें करणविशेषके आधारपर ही वैलक्षण्यकी उपपत्ति हो सकती है।

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं—प्रत्यक्षस्थलमें विषयावच्छिन्न चैतन्य ही विषयका अधिष्ठान है, अतः वही विषयावच्छिन्न चैतन्य विषयका प्रकाश है, [जीवचैतन्य नहीं है, क्योंकि जीवचैतन्य विषयके प्रति उपादान नहीं है, अतः उसके साथ विषयका तादात्म्य नहीं हो सकता] क्योंकि साक्षात्तादात्म्यसम्बन्धका सम्भव होनेपर स्वरूपसम्बन्धकी अन्य परम्परासम्बन्धकी कल्पना नहीं की जाती है, अतः विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यके ही विषयप्रकाशक होनेसे उसके आवरणके अभिभवके लिए वृत्तिका बाहर निकलना आवश्यक है।

अनुमिति आदि परोक्षस्थलमें व्यवहित वह्नि आदि विषयमें वृत्तिसंसर्गके न होनेसे और इन्द्रियके समान अन्वय और व्यतिरेकसे युक्त वृत्तिके निकलनेके लिए किसी द्वारकी उपलब्धि न होनेसे अनिर्गत-


नहीं मानना चाहिए, यह वृत्तिनिर्गमवादीका कहना है, इसपर उत्तर दिया कि 'इन्द्रियजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्, और इन्द्रियाजन्यम् ज्ञानं परोक्षम्' इस प्रकारसे अपरोक्ष और परोक्षके वैलक्षण्यका उपपादन हो सकता है, क्योंकि अनुमिति और शाब्दमें भी अनुमानादिप्रयुक्त वैलक्षण्य ही है, अतः वृत्तिनिर्गमनकी कोई आवश्यकता नहीं है, यह भाव है।

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