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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

वृत्तिके निर्गमकी आवश्यकताका विचार ] भाषानुवादसहित २४७


ननु हेतुनियम्यत्वात् परोक्षत्वापरोक्षयोः ।
वृत्तेर्निर्गमनं व्यर्थमेवं केचित् समादधुः ॥११५॥

परोक्षत्व और अपरोक्षत्वकी विलक्षणताके करणविशेषके अधीन हो सकनेसे वृत्तिका निर्गमन व्यर्थ है, इस प्रकारकी शङ्का होनेपर कोई लोग इस प्रकार समाधान करते हैं ॥११५॥

ननु सर्वपदार्थानां साक्षिप्रसादादेव प्रकाशोपपत्तेः किं वृत्त्या ? घटादिविषयकसंस्काराधानाद्युपपत्तये तदपेक्षेऽपि तन्निर्गमाभ्युपगमो व्यर्थः; परोक्षस्थल इवाऽनिर्गतवृत्त्यवच्छिन्नसाक्षिणैव घटादेरपि प्रकाशोपपत्तेः।

न च तथा सति परोक्षापरोक्षवैलक्षण्यानुपपत्तिः; शाब्दानुमित्योरिव करणविशेषप्रयुक्तवृत्तिवैजात्यादेव तदुपपत्तेः ।


अत्र शङ्का होती है कि सम्पूर्ण पदार्थोंका साक्षीसे ही प्रकाश हो सकता है, तो फिर वृत्तिको मानना व्यर्थ ही है। घटादि विषयोंके* संस्कारके आधानके लिए वृत्तिकी उत्पत्ति यदि मान भी ली जाय, तो भी वृत्तिका बहिर्निर्गम अर्थात् चक्षु आदि द्वारा घटाकार अन्तःकरणकी वृत्ति बाहर निकलती है, यह मानना व्यर्थ है, क्योंकि परोक्षस्थलके समान अनिर्गतवृत्तिसे युक्त साक्षीसे ही घट आदिका भी प्रकाश हो सकता है [ तात्पर्यार्थ यह है—जैसे 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' ( पर्वत वह्निमान् है, धूम होनेसे ) इस अनुमितिस्थलमें वह्निदेशमें वृत्तिके न जानेपर भी साक्षीसे उसका प्रकाश होता है, वैसे ही घट आदि देशमें अन्तःकरणकी वृत्तिके न जानेपर भी उसका प्रकाश हो सकता है, अतः वृत्तिका बाहर निकलना सर्वथा अनुपयुक्त है ] ।

इसपर यदि शङ्का हो कि वृत्तिका बहिर्गमन न माना जाय, तो परोक्ष और अपरोक्षस्थलमें कोई विशेष नहीं होगा, [ अतः वृत्तिका अपरोक्षस्थलमें बाहर निकलना जरूरी है, अन्यथा परोक्ष ज्ञान और अपरोक्ष ज्ञानमें वैलक्षण्यका वृत्तिके निकलनेसे और न निकलनेसे जो स्वीकार किया † गया है, वह न होगा ]


* तात्पर्य यह है कि यदि वृत्ति न मानी जाय, तो कालान्तरमें किसी भी पदार्थका स्मरण नहीं होगा क्योंकि तत्-तत् विषयोंके अनुभव साक्षीरूप होनेके कारण नित्य होंगे, अतः अनुभवके विनाशरूप संस्कार नहीं होंगे, और संस्कारके न होनेसे स्मरण नहीं होगा, इसलिए अवश्य वृत्ति माननी होगी, अतः 'किं वृत्त्या?' इसको छोड़कर दूसरा प्रश्न किया गया कि वृत्तिका बहिर्निर्गम क्यों माना जाता है ?

† बहिर्निर्गतवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य अपरोक्षज्ञान है, अनिर्गतवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य परोक्षज्ञान है, इस प्रकारका प्रत्यक्ष और परोक्षमें वैलक्षण्य केवल वृत्तिप्रयुक्त है, अतः वृत्तिनिर्गमन

२५८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अर्थेष्वाश्रयवृत्तिस्थचिद्भास्येष्वेवापरोक्षतः ॥
कल्प्यते निर्गमो वृत्तेः परोक्षेऽगतिकल्पना ॥११६॥

आश्रय (विषयाकार) वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे भासित होनेवाले अर्थोंमें अपरोक्षता होनेसे प्रत्यक्ष स्थलमें वृत्तिका निर्गम माना जाता है, और परोक्षस्थलमें वृत्तिनिर्गमकी कल्पना नहीं करते हैं ॥११६॥

अत्र केचिदाहुः—प्रत्यक्षस्थले विषयाधिष्ठानतया तदवच्छिन्नमेव चैतन्यं विषयप्रकाशः। साक्षात्तादात्म्यरूपसम्बन्धसम्भवे स्वरूपसम्बन्धस्य वाऽन्यस्य वा कल्पनायोगादिति तदभिव्यक्त्यर्थं युक्तो वृत्तिनिर्गमाभ्युपगमः।
परोक्षस्थले व्यवहिते वह्नयादौ वृत्तिसंसर्गायोगादिन्द्रियवदन्वयव्यति-


तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शाब्दबोध और अनुमितिमें जैसे करणविशेषसे वैलक्षण्यका प्रतिपादन किया गया है, वैसे ही प्रत्यक्ष, अनुमान आदिमें करणविशेषके आधारपर ही वैलक्षण्यकी उपपत्ति हो सकती है।

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं—प्रत्यक्षस्थलमें विषयावच्छिन्न चैतन्य ही विषयका अधिष्ठान है, अतः वही विषयावच्छिन्न चैतन्य विषयका प्रकाश है, [जीवचैतन्य नहीं है, क्योंकि जीवचैतन्य विषयके प्रति उपादान नहीं है, अतः उसके साथ विषयका तादात्म्य नहीं हो सकता] क्योंकि साक्षात्तादात्म्यसम्बन्धका सम्भव होनेपर स्वरूपसम्बन्धकी अन्य परम्परासम्बन्धकी कल्पना नहीं की जाती है, अतः विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यके ही विषयप्रकाशक होनेसे उसके आवरणके अभिभवके लिए वृत्तिका बाहर निकलना आवश्यक है।

अनुमिति आदि परोक्षस्थलमें व्यवहित वह्नि आदि विषयमें वृत्तिसंसर्गके न होनेसे और इन्द्रियके समान अन्वय और व्यतिरेकसे युक्त वृत्तिके निकलनेके लिए किसी द्वारकी उपलब्धि न होनेसे अनिर्गत-


नहीं मानना चाहिए, यह वृत्तिनिर्गमवादीका कहना है, इसपर उत्तर दिया कि 'इन्द्रियजन्यं ज्ञानं प्रत्यक्षम्, और इन्द्रियाजन्यम् ज्ञानं परोक्षम्' इस प्रकारसे अपरोक्ष और परोक्षके वैलक्षण्यका उपपादन हो सकता है, क्योंकि अनुमिति और शाब्दमें भी अनुमानादिप्रयुक्त वैलक्षण्य ही है, अतः वृत्तिनिर्गमनकी कोई आवश्यकता नहीं है, यह भाव है।

वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भाषानुवादसहित २४९

रेकशालिनो वृत्तिनिर्गमद्वारस्यानुपलम्भाच्चाऽनिर्गतवृत्त्यवच्छिन्नचैतन्यमेव स्वरूपसम्बन्धेन विषयगोचरमगल्याऽर्थादभ्युपगम्यते इति ।

साक्षात् प्रमातृसम्पर्के सुखादेरापरोक्ष्यतः ॥
अन्यत्राऽपि तथेत्याहुर्वृत्तेर्निर्गमनात् परे ॥११७॥

सुख आदिका अपरोक्षानुभव चैतन्यके साथ साक्षात् सम्बन्ध होनेके कारण ही होता है, अतः अन्यत्र घट आदि प्रत्यक्षस्थलमें भी चैतन्यके साथ वैसा ही सम्बन्ध होनेसे अपरोक्षानुभव होता है, इसलिए वृत्तिनिर्गमन है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥११७॥

अन्ये तु—अहङ्कारसुखदुःखादिष्वापरोक्ष्यं साक्षाच्चैतन्यसंसर्गेषु क्लृप्तमिति घटादावपि विषयसंसृष्टमेव चैतन्यमापरोक्ष्यहेतुरिति तदभिव्यक्तये वृत्तिनिर्गमं समर्थयन्ते ।

इतरे स्पष्टताहेतुमाचख्युर्वृत्तिनिर्गमम् ।
न चानुमितमाधुर्यं स्पष्टमास्वादिते यथा ॥११८॥

स्पष्ट ज्ञानके लिए वृत्तिका निर्गमन अवश्य होना चाहिए, क्योंकि अनुमानगम्य माधुर्य प्रत्यक्ष आस्वादित माधुर्यके समान स्पष्ट नहीं होता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥११८॥

इतरे तु—शब्दानुमानावगतेभ्यः प्रत्यक्षावगते स्पष्टता तावदनुभूयते । नहि रसालपरिमलादिविशेषे शतवारमाप्तोपदिष्टेऽपि प्रत्यक्षाव-


वृत्तिसे युक्त चैतन्य ही स्वरूपसम्बन्धसे विषयका प्रकाशक है, ऐसा अर्थतः अगत्त्या स्वीकार किया जाता है ।

अहंकार, सुख, दुःख आदि विषयोंमें, जिनका कि साक्षात् चैतन्यके साथ तादात्म्य है, अपरोक्षता क्लृप्त है, अतः घट आदिमें भी विषयतादात्म्यापन्न चैतन्य ही अपरोक्षत्वका कारण होगा, इसलिए विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यकी अभिव्यक्तिके लिए ही वृत्तिनिर्गमन अपेक्षित है, कुछ लोग ऐसा भी समर्थन करते हैं ।

अन्य लोग कहते हैं कि शब्द, अनुमान आदि प्रमाणोंसे ज्ञात अर्थोंकी अपेक्षा प्रत्यक्षसे अवगत पदार्थमें अधिक स्पष्टता अनुभूत होती है, क्योंकि आमके परिमल (सुगन्ध), रस आदिके विषयमें आप्त पुरुष यदि सौ वार उपदेश करे, तो भी प्रत्यक्षसे ज्ञात वस्तुके समान उसमें स्पष्टता नहीं भासती है, क्योंकि

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२५०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

गत इव स्पष्टताऽस्ति । तदनन्तरमपि 'कथं तद् ?' इति जिज्ञासाऽनुवृत्तेः ।

न च शब्दान्माधुर्यमात्रावगमेऽपि रसालमाधुर्यादिवृत्त्यवान्तरजाति-विशेषवाचिशब्दाभावात्, तत्सत्त्वेऽपि श्रोत्रात्तस्याऽगृहीतसङ्गतिकत्वात् शब्दादसाधारणजातिविशेषावच्छिन्नमाधुर्यावगमो नास्तीति जिज्ञासाऽनु-वृत्तिर्युक्तेति शङ्क्यम्, 'रसाले सर्वातिशायी माधुर्यविशेषोऽस्ति' इत्य-स्माच्छब्दात्तद्गतावान्तरजातिविशेषस्याऽप्यवगमात् । नह्ययं विशेषशब्द-स्तद्गतविशेषं विहायान्यगतं विशेषं तत्र बोधयति, अप्रामाण्यापत्तेः । न च तद्गतमेव विशेषं विशेषत्वेन सामान्येन रूपेण बोधयति, न

उपदेशके अनन्तर भी वह कैसा है ? या वह किस प्रकारका है ? ऐसी जिज्ञासा बनी रहती है *।

यदि शङ्का हो कि 'आम्र-फलमें मधुर रस आदि हैं' इस प्रकारके सौ बार उपदिष्ट आप्तवाक्यसे केवल मधुर रसके ज्ञात होनेपर भी आमके माधुर्य आदिमें रहनेवाली अवान्तर जातिके बोधक शब्दका अभाव होनेसे और उसके बोधक शब्दके अस्तित्वमें भी श्रोत्रसे ( कानसे ) अवान्तर जाति-विशेषके वाचकशब्दकी शक्तिका ग्रहण न होनेसे उक्तशब्दसे (वाक्यसे) असाधारण जातिविशेषसे युक्त माधुर्यका ज्ञान नहीं होता, इसलिए उक्त स्थलमें जिज्ञासाकी अनुवृत्ति हुआ करती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'रसाले सर्वातिशायी माधुर्यविशेषोऽस्ति' ( आममें सबको मात करनेवाला माधुर्यविशेष है ) इस शब्दसे माधुर्यगत अवान्तरजातिविशेषका भी अवगम होता है, [ परन्तु प्रत्यक्षके समान स्पष्टता नहीं भासती है और जिज्ञासा रहती है ] क्योंकि यह वाक्यविशेष माधुर्यगत विशेषका बोधन न कर अन्यगत विशेषका बोधन करता है, ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसा माननेसे वाक्यमें अप्रामाण्यापत्ति होगी और यह भी शङ्का नहीं कर सकते हैं कि माधुर्यगत जो विशेष है, उसका उक्त शब्द ⁑ सामान्यतः विशेषरूपसे बोध करता है,


* 'आममें बड़ी सुगन्ध और अत्यन्त मीठा रस है, इस विषयके किसी प्रामाणिक पुरुषके हजार बार कहनेपर भी निःसंशय रसादिका ज्ञान नहीं होता है, क्योंकि 'वह मीठा रस कैसा है ?' यह जिज्ञासा उपदेशके बाद भी बनी रहती है, यह भाव है।

† तात्पर्य यह है कि उक्त आप्तशब्दसे आमके माधुर्यका विशेषत्व विशेषरूप सामान्यधर्मसे गृहीत होता है, विशेषवृत्ति विशेषरूपसे गृहीत नहीं होता है, अतः जिज्ञासा होती है, यह शङ्काका

वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार ] भाषानुवादसहित २५१


विशिष्येति जिज्ञासेति वाच्यम्, प्रत्यक्षेणापि मधुररसविशेषणस्य जाति- विशेषस्य स्वरूपत एव विषयीकरणेन जातिविशेषगतविशेपान्तराविषयी- करणाद् जिज्ञासाऽनुवृत्तिप्रसङ्गात् । तस्मात् प्रत्यक्षग्राह्येऽभिव्यक्तापरोक्ष्यैकरसचैतन्यावगुण्ठनात् स्पष्टता जिज्ञासानिवर्तनक्षमा, शब्दादिगम्ये तु तदभावादस्पष्टेति व्यवस्थाऽभ्यु- पगन्तव्या । अत एव साक्षिवेद्यस्य सुखादेः स्पष्टता । शाब्दवृत्तिवेद्यस्याऽपि

विशेषतः विशेषरूपसे बोध नहीं करता है, इसलिए जिज्ञासा होती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्षस्थलमें भी मधुर रसमें विशेषणरूपसे रहनेवाले जातिविशेषका प्रत्यक्षसे स्वरूपतः ग्रहण होनेके कारण जातिविशेषमें रहनेवाले विशेषान्तरका ग्रहण न होनेसे जिज्ञासाकी निवृत्ति नहीं होगी ।

इससे अर्थात् प्रत्यक्षसे अवगत पदार्थकी अपेक्षा शब्द आदिगम्य पदार्थोंमें स्पष्टत्वके न होनेसे प्रत्यक्षसे गृहीत पदार्थमें अभिव्यक्त स्वप्रकाश और एकरूप ब्रह्मचैतन्यके साथ तादात्म्य होनेसे जिज्ञासाकी निवृत्ति करनेमें समर्थ विषयताविशेषरूप स्पष्टता होती है, और शब्द आदि द्वारा गृहीत पदार्थमें अभिव्यक्त चैतन्यके साथ तादात्म्य न होनेके कारण स्पष्टत्व नहीं प्रतीत होता है, इस प्रकारकी व्यवस्था करनी चाहिए, अभिव्यक्त चैतन्यका सम्बन्ध होनेसे ही साक्षीसे वेद्य सुख आदिमें स्पष्टता प्रतीत होती है । शब्द- जन्यवृत्तिसे वेद्य ब्रह्ममें भी मनन आदिसे पूर्व अज्ञानकी निवृत्तिके न होनेसे


भाव है, इसपर उत्तरदाताका कहना है कि माधुर्यगत जातिविशेषमें रहनेवाला असाधारण धर्म जातिरूप है या उपाधिरूप है ? जातिरूप तो नहीं हो सकता है, क्योंकि उसकी जातितामें प्रमाण नहीं है और जातिमें उसका अंगीकार भी नहीं है, यदि उपाधिरूप मानेंगे, तो वह उपाधि होगी—जातिविशेषाश्रयातिरिक्तवृत्तित्वे सति जातिविशेषाश्रयवृत्तित्वम्, अर्थात् जाति विशेषके आश्रयसे भिन्नमें न रहकर जातिविशेषके आश्रयमें रहे । परन्तु यह भी युक्त नहीं होगा, क्योंकि प्रत्यक्ष स्थलमें भी आमके माधुर्यके जातिविशेषमें प्रत्यक्षसे उसका ग्रहण न होनेके कारण जिज्ञासाकी अनुवृत्ति होगी ।

* अर्थात् वृत्ति द्वारा अभिव्यक्त चैतन्यके साथ तादात्म्य होनेसे प्रत्यक्ष ग्राह्य पदार्थोंमें स्पष्टत्वकी प्रतीति होती है, इसके विना नहीं होती । इससे विषयमें रहनेवाली स्पष्टताका प्रयोजक जो आवरणनिवृत्तिरूप विषयचैतन्याभिव्यक्ति है, उसकी सिद्धिके लिए वृत्तिका निर्गमन अपेक्षित है, यह सूचित हुआ ।

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३५२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

ब्रह्मणो मननादेः प्रागज्ञानानिवृत्तावस्पष्टता, तदनन्तरं तन्निवृत्तौ स्पष्टतेति वृत्तिनिर्गममुपपादयन्ति ।

न चावरणविच्छेदः स्पष्टता तामनिर्गता ।
करोतु तुल्यविषयतत्तदज्ञाननाशिनी ॥११९॥

यदि शङ्का हो कि आवरणविच्छेदस्वरूप स्पष्टता अनिर्गत वृत्तिसे ही होगी, क्योंकि समानविषयक अज्ञानका समानविषयक वृत्तिज्ञान विनाश करता है ॥११९॥

नन्वेतावताऽपि विषयावरकाज्ञाननिवृत्त्यर्थं वृत्तिनिर्गम इत्युक्तम् । तदयुक्तम् । विषयावच्छिन्नचैतन्यगतस्य तदावरकाज्ञानस्यानिर्गतवृत्त्या निवृत्त्यभ्युपगमेऽप्यनतिप्रसङ्गात् । न च तथा सति देवदत्तीयघटज्ञानेन यज्ञदत्तीयघटाज्ञानस्यापि निवृत्तिप्रसङ्गः, समानविषयकत्वस्य सत्त्वात् ।


अस्पष्टता ही है और मनन आदिके बाद अज्ञानकी † निवृत्ति हो जानेसे ब्रह्ममें स्पष्टता प्रतीत होती है, अतः वृत्तिका बाहर निकलना अत्यन्त अपेक्षित है ।

शङ्का होती है कि इतने ग्रन्थसे अर्थात् 'अत्र केचिदाहुः' इत्यादि ग्रन्थसे भी यही कहा गया है—विषयको आवृत करनेवाले अज्ञानकी निवृत्तिके लिए वृत्तिकी आवश्यकता है, परन्तु यह अयुक्त है, क्योंकि विषयावच्छिन्न चैतन्यमें रहनेवाले विषयावरक अज्ञानकी अनिर्गतवृत्तिसे यदि निवृत्ति मानी जाय, तो भी कोई हानि नहीं है । यदि शङ्का हो कि ऐसा होनेपर देवदत्तके घटज्ञानसे यज्ञदत्तके भी घटाज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी, क्योंकि उनमें समानविषयकत्व ⁜


† 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यजन्य वृत्ति मनन आदिके अनुष्ठानके पूर्वमें असम्भावना और विपरीतभावनासे सर्वथा प्रतिबद्ध है, अतः वह मनन आदिके पूर्वमें अज्ञानकी निवर्तक नहीं है, और उसके बाद तो असम्भावना और विपरीतभावनाके निवृत्त होनेसे वह वृत्ति अज्ञानकी निवर्तक होगी और ब्रह्ममें स्पष्टत्वका अवगम करावेगी, यह भाव है ।

⁜ विषयको आवृत करनेवाला अज्ञान किसीके मतसे विषयमें रहता है और किसीके मतसे पुरुषमें रहता है, जो लोग पुरुषमें अज्ञान मानते हैं, उनके मतसे वृत्तिके निर्गमके बिना भी—अनिर्गत वृत्तिसे भी, अज्ञानकी निवृत्ति हो सकती है, परन्तु जिनके मतसे विषयगत-अज्ञान अर्थात् विषयावच्छिन्नचैतन्यनिष्ठ अज्ञान है, उनके मतमें भी अनिर्गत वृत्तिसे अज्ञान-की निवृत्ति यदि मानी जाय, तो भी कोई हानि नहीं है, यदि इसपर शङ्का हो कि ज्ञान और अज्ञानके निवर्त्य-निवर्तकरूप विरोधमें समानाश्रयत्व होकर समानविषयकत्व प्रयोजक है। यदि वृत्तिका निर्गमन नहीं माना जायगा, तो केवल ज्ञान और अज्ञानमें समानाश्रयत्वके लब्ध न होनेसे केवल समानविषयकत्व ही प्रयोजक होगा, अतः देवदत्तीय घटज्ञानसे यज्ञदत्तीय

वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भाषानुवादसहित २५३

अहमर्थविषयचैतन्यनिष्ठयोर्ज्ञानाज्ञानयोर्भिन्नाश्रयत्वेन तयोर्विरोधे समानाश्रयत्वस्याऽतन्त्रत्वादिति वाच्यम्। समानाश्रयविषयत्वं ज्ञानाज्ञानयोर्विरोधप्रयोजकमङ्गीकृत्य वृत्तिनिर्गमनाभ्युपगमेऽपि देवदत्तीयघटवृत्तेः यज्ञदत्तीयघटाज्ञानस्य च घटावच्छिन्नचैतन्यैकाश्रयत्वप्राप्त्याऽतिप्रसङ्गतादवस्थ्येन 'यदज्ञानं यं पुरुषं प्रति यद्विषयावरकं, तत् तदीयन्तद्विषयकज्ञाननिवर्त्यम्' इति पृथगेव विरोधप्रयोजकस्य वक्तव्यतया समानाश्रयत्वस्याऽनपेक्षणात् । मैवं, परोक्षवृत्त्याऽपि मोहोच्छेदप्रसङ्गतः। आपरोक्ष्यं तु नो जातिरांशिकत्वाच्च सङ्करात् ॥१२०॥

तो उक्त शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि परोक्षवृत्तिसे भी अज्ञानका विनाश प्रसक्त होगा और अपरोक्षत्व जाति भी नहीं है, क्योंकि आंशिक होनेसे सङ्करदोषसे दुष्ट है ॥१२०॥

अत्राहूः—वृत्तिनिर्गमनानभ्युपगमे ज्ञानाज्ञानयोर्विरोधप्रयोजकमेव दुर्निरूपम्। 'यदज्ञानं यं पुरुषं प्रति' इत्याद्युक्तमिति चेत्, न; परोक्षज्ञानेनाऽपि विषयगताज्ञाननिवृत्तिप्रसङ्गात् ।

हैं। कारण कि वृत्तिनिर्गमके न होनेसे अहमर्थ और विषयचैतन्यमें रहनेवाले क्रमशः ज्ञान और अज्ञानका असमानाश्रय होनेसे ज्ञान और अज्ञानके विरोधमें समानाश्वत्व प्रयोजक नहीं है, किन्तु समानविषयत्व ही प्रयोजक है तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि ज्ञान और अज्ञानके विरोधमें समानाश्रयत्वविशिष्ट समानविषयकत्वको प्रयोजक मान कर वृत्तिके निर्गमका अङ्गीकार करनेपर भी देवदत्तकी घटवृत्तिका और यज्ञदत्तके घटाज्ञानका घटावच्छिन्न चैतन्यरूप एक आश्रय होनेसे वृत्तिनिर्गमनपक्षमें भी अतिप्रसक्तिके तदवस्थ होनेसे 'यदज्ञानम्' (जो अज्ञान जिस पुरुषके प्रति जिस विषयका आवारक हो, वह अज्ञान उस पुरुषके उस विषयके ज्ञानसे निवृत्त होता है) इस प्रकार अलग ही विरोधका प्रयोजक मानना होगा, इससे समानाश्रयत्वकी अपेक्षा ही नहीं है, [इससे वृत्तिनिर्गम व्यर्थ है, यह शङ्काका स्वरूप है]।

इस आक्षेपके समाधानमें कोई लोग कहते हैं—वृत्तिका बहिर्निर्गमन न माना जाय, तो ज्ञान और अज्ञानके परस्पर विरोधके प्रयोजकका निरूपण ही नहीं हो सकेगा। यदि कहो कि 'यदज्ञानम्' इत्यादिसे विरोधके हेतुका


घटाज्ञान नष्ट होना चाहिए ? परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि इसका उत्तर 'समानाश्रय' इत्यादि ग्रन्थसे दिया गया है।

२५४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अपरोक्षत्वमपि निवर्तकज्ञानविशेषणमिति चेत्, किं तदपरोक्षत्वम् ? न तावज्जातिः । 'दण्ड्ययमासीत्' इति संस्कारोपनीतदण्डविशिष्टपुरुषविषयकस्य चाक्षुषज्ञानस्य दण्डांशेऽपि तत्सत्त्वे तत्रापि विषयगताज्ञाननिवृत्त्यापातात् । 'दण्डं साक्षात्करोमि' इति तदंशेऽप्यापरोक्ष्यानुभवापत्तेश्च । अननुभवेऽपि संस्कारं सन्निकर्षं परिकल्प्य इन्द्रियसन्निकर्षजन्यतया तत्र काल्पनिकापरोक्ष्याभ्युपगमे अनुमित्यादावपि लिङ्गज्ञानादिकं सन्निकर्षं परिकल्प्य तदङ्गीकारापत्तेः । दण्डांशे आपरोक्ष्यासत्त्वे तु तस्य

निरूपण किया ही जा चुका है, यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे परोक्षज्ञानसे भी विषयके अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी ।

यदि शङ्का हो कि अज्ञानके निवर्तक ज्ञानमें अपरोक्षत्व विशेषण देंगे, [ अर्थात् अपरोक्षज्ञान ही अज्ञानका निवर्तक होता है अन्य नहीं, अतः अपरोक्ष ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है ] यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अपरोक्षत्व क्या है ? [ उसका निर्वचन करना होगा, तात्पर्य यह है कि ज्ञानमें जो अपरोक्षत्व विशेषण देते हैं, वह जातिरूप है या उपाधिरूप है ? ] जातिरूप नहीं हो सकता है, क्योंकि 'अयं दण्डी आसीत्' ( यह दण्डी था ) इस प्रकार संस्कारसे उपनीत दण्डसे युक्त पुरुषविषयक चाक्षुष ज्ञानके दण्ड अंशमें यदि अपरोक्षत्व जाति है, तो उसमें भी विषयके अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी * । अनुभव न होनेपर भी यदि दण्डांशमें संस्काररूप सन्निकर्षकी कल्पना करके इन्द्रियसन्निकर्षसे जन्य होनेके कारण उसमें काल्पनिक अपरोक्षत्वकी कल्पना की जाय, तो अनुमिति आदिमें भी लिङ्गज्ञान आदि सन्निकर्षकी† कल्पना करके—अपरोक्षत्वप्रसक्ति होगी । दण्ड अंशमें अपरोक्षत्व


* तात्पर्य यह है कि किसी समयमें दण्डसे युक्त विष्णुमित्रका ग्रहण हुआ था, कालान्तरमें दण्डरहित विष्णुमित्रको देखकर संस्कार और इन्द्रियसे ज्ञान होता है कि 'यह विष्णुमित्र दण्डी था'। यहां पर शङ्का होती है—इसमें दण्डांशमें प्रत्यक्षत्व है, या नहीं है। यदि प्रत्यक्षत्व माना जाय, तो दण्डांशमें अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी । इष्टापत्ति नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वह दण्ड कैसा था, इस प्रकार जिज्ञासा होती है, यदि तद्गत अज्ञानकी निवृत्ति होती, तो यह जिज्ञासा उदित नहीं होती ।

† तात्पर्य यह है कि 'स्वविषयप्रत्यासत्तिः सन्निकर्षः' ( स्वविषयके साथ सम्बन्ध सन्निकर्ष है ) इस मतका अङ्गीकार करके संस्कारकी कल्पनाकर इन्द्रियसन्निकर्षजन्यत्वरूप कल्पनाके

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वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार ] भाषानुवादसहित २५५


जातित्वायोगाद्, जातेर्व्याप्यवृत्तित्वनियमात् । तदनियमेऽप्यवच्छेदकोपा- धिभेदानिरूपणेन तस्याव्याप्यवृत्तिजातित्वायोगाच्च ।

नाप्युपाधिः, तदनिर्वचनात् । इन्द्रियजन्यत्वमिति चेत्, न; साक्षि- प्रत्यक्षाव्यापनात् । अनुमितिशाब्दज्ञानोपनीतगुरुत्वादि विशिष्टघटप्रत्यक्षे विशेषणांशातिव्यापनाच्च । करणान्तराभावेन तदंशे परोक्षेऽप्युपनयसहकारि-


न माना जाय, तो अपरोक्षत्व जाति नहीं होगी, क्योंकि जाति सर्वदा व्याप्य- वृत्ति हुआ करती है, यह नियम है, यदि 'जाति व्याप्यवृत्ति होती है' यह नियम न माना जाय, तो भी अवच्छेदक उपाधियोंका निरूपण न हो सकनेसे अपरोक्षत्व जाति अव्याप्यवृत्ति नहीं हो सकती है* ।

अपरोक्षत्व उपाधि भी नहीं है, क्योंकि उसका निर्वचन ही नहीं हो सकता, यदि कहो कि इन्द्रियजन्यत्व ( इन्द्रियसे उत्पन्न होना ) अपरोक्षत्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सुख आदिकी नित्यसाक्षीरूप प्रत्यक्षमें अव्याप्ति हो जायगी । और अनुमितिसे एवं शब्दजन्य ज्ञानसे उपनीत गुरुता आदिसे विशिष्ट घटके प्रत्यक्षमें विशेषणीभूत गुरुत्वमें उक्त लक्षणकी अतिव्याप्ति हो जायगी † । क्योंकि गुरुत्वमें प्रत्यक्षत्वसम्पादक अन्य करणके न होनेसे गुरुत्वांशके परोक्ष होनेपर भी उपनयकी सहकारितासे


आधारपर दण्डांशमें अपरोक्षत्वकी कल्पना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि लिङ्गज्ञान आदि सन्निकर्षकी कल्पना करके अनुमिति आदिमें अपरोक्षत्वका अङ्गीकार प्रसक्त होगा, यदि दण्डांशमें अपरोक्षत्व न माना जाय, तो 'दण्डी विष्णुमित्र आसीत्' इत्यादि प्रत्यभिज्ञानात्मक एक ज्ञानमें स्मृतित्व और अपरोक्षत्वके रहनेसे सङ्कर हो जायगा, इसलिए अपरोक्षत्व जाति नहीं हो सकती, क्योंकि जो जाति होती है, वह व्याप्यवृत्ति होती है, यह नियम है।

* भाव यह है कि यदि जाति व्याप्यवृत्ति न मानी जाय, तो भी प्रत्यभिज्ञामें विष्णुमित्र अंशमें प्रत्यक्षत्व और दण्ड अंशमें तदभाव मानना चाहिए, परन्तु वह तभी उपपन्न हो सकता है, जब कि उपाधिभेद माना जाय, क्योंकि अवच्छेदकके भेदसे ही प्रतियोगी और तदभावकी अवस्थिति एकत्र रहती है, प्रकृतमें उपाधिभेदका निरूपण अशक्य है, इसलिए अपरोक्षत्वमें ( समानाधिकरणात्यन्ताभावप्रतियोगित्वरूप, स्व के आश्रयमें ही स्व का अभाव हो ) अव्याप्य वृत्तित्वके असम्भव होनेसे व्याप्यवृत्ति ही जाति होगी, अतः पूर्वोक्त दोष तदवस्थ ही रहेगा।

† अर्थात् जिस घटमें शब्दसे या अनुमानसे गुरुत्वका अनुभव किया गया है, उस घटके साथ इन्द्रियसम्बन्ध होनेपर 'घटोऽयं गुरुः' ( यह घड़ा वजनदार है ), ऐसा प्रत्यक्ष होता है। इसमें विशेषणीभूत गुरुत्वमें अतिव्याप्ति होगी, अतः इन्द्रियजन्यत्व प्रत्यक्षका लक्षण युक्त नहीं है।

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२५६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

सामर्थ्यादिन्द्रियस्यैव जनकत्वात्, अनुगतजन्यतावच्छेदकाग्रहेणाऽनेकेष्वि-
न्द्रियजन्यत्वस्य दुर्ग्रहत्वाच्च । तद्ग्रहे च तस्यैव प्रथमप्रतीतस्याऽपरोक्षरूप-
त्वोपपत्तौ प्रत्यक्षानुभवायोज्यस्य इन्द्रियजन्यत्वस्य तद्योग्यापरोक्षरूपत्व-
कल्पनायोगात् ।
एतेन 'इन्द्रियसन्निकर्षजन्यत्वमापरोक्ष्यम् । उपनयसहकृतेन्द्रियजन्य-
परोक्षांशे च न सन्निकर्षजन्यत्वम् । अनुमितावप्युपनीतभानसत्त्वेन प्रमा-


अनुमितिमें जैसे मन करण है, वैसे ही प्रकृतमें इन्द्रियाँ करण हैं । और अनुगत इन्द्रियजन्यतावच्छेदकका ग्रह न होनेके कारण अनेक अपरोक्ष ज्ञानोंमें इन्द्रिय-जन्यत्वका ग्रह भी नहीं हो सकता है । यदि 'अहं साक्षात्करोमि' ( मैं साक्षात्कार करता हूँ ) इत्यादि अनुभवसे सिद्ध कोई अनुगत जन्यतावच्छेदक माना जाय, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रथमतः प्रतीयमान वही धर्म* अपरोक्षत्व हो सकेगा तो प्रत्यक्ष अनुभवके अयोग्य इन्द्रियजन्यत्वमें उस अनुभवके योग्य अपरोक्षत्वकी कल्पना असङ्गत होगी ।

अव्याप्ति आदि दोषोंके होनेसे यह भी निरस्त हुआ समझना चाहिए कि इन्द्रिय-सन्निकर्षजन्यत्वरूप अपरोक्षत्व† है, उपनयसहित इन्द्रियसे जन्य परोक्ष-अंशमें सन्निकर्षजन्यता नहीं है, अतः गुरुत्व आदिमें दोष नहीं है, अनुमिति


* अवच्छेदकरूप जन्यत्वके ज्ञानके पूर्व अवच्छेदकका ज्ञान अपेक्षित होता है, अतः 'साक्षात्कार करता हूँ' इत्यादि प्रतीतिरूप अनुभवके योग्य जन्यतावच्छेदकरूपसे स्वीकृत जो धर्म है, उसीमें अपरोक्षत्वकी उपपत्ति हो सकती है, फिर अयोग्य इन्द्रियजन्यत्वको अपरोक्षत्वरूप माननेकी आवश्यकता नहीं है । यदि शङ्का हो कि वही जन्यतावच्छेदक उपाधि अपरोक्षत्वरूप हो, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि वह उपाधि व्याप्यवृत्ति है या अव्याप्यवृत्ति ? यदि प्रथम पक्ष माना जाय, तो 'दण्डी अयम् आसीत्' इत्यादिमें दण्डादि अंशमें व्यभिचार होगा, यदि द्वितीयपक्षका अवलम्बन किया जाय, तो अवच्छेदक उपाधिका निरूपण दुर्घट होनेसे अव्याप्य-वृत्तित्व ही नहीं होगा, अतः उस जन्यतावच्छेदकको अपरोक्षत्व नहीं कह सकते हैं ।

† इन्द्रिय और अर्थके सम्बन्धसे होनेवाला ज्ञान अपरोक्ष है, जैसे—घटविषय—अर्थ है उसके साथ इन्द्रियका सम्बन्ध होनेसे अर्थात् संयोगसम्बन्ध होनेसे 'घटं साक्षात्करोमि' ( घटका साक्षात्कार करता हूँ ) ऐसा अनुभव होता है । ये सन्निकर्ष संयोग, संयुक्तसमवाय, संयुक्तसमवेतसमवाय, समवाय, समवेतसमवाय और स्वरूपसम्बन्ध, इस प्रकारसे छः हैं, इनका द्रव्य, गुण, गुणत्व, शब्द, शब्दत्व और अभाव आदिके प्रत्यक्षमें क्रमशः उपयोग न्यायमतमें माना गया है । इसलिए इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्यत्व अपरोक्षत्व हो सकता है, यह पूर्वपक्षीका अभिप्राय है ।


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वृत्ति के निर्गमन की आवश्यकता का विचार] भाषानुवादसहित २५७

णान्तरसाधारणस्योपनयस्याऽसन्निकर्षत्वात्' इत्यपि शङ्का निरस्ता। संयोगा- दिसन्निकर्षाणामननुगमेनाऽननुगमाच्च।

यत्तत्राऽभिमतमापरोक्ष्यम्, तदेव ममाऽप्यस्त्विति चेत्, न; तस्य शब्दा- परोक्षनिरूपणप्रस्तावे प्रतिपादनीयस्य तत्रैव दर्शनीयया रीत्या अज्ञान- निवृत्तिप्रयोज्यत्वेन तन्निवृत्तिप्रयोजकविशेषणभावायोगात्। तस्मात् 'तरति

आदिमें भी उपनीत भानके होनेसे अन्य प्रमाण साधारण उपनयमें सन्निकर्षत्व नहीं है। और दूसरी बात यह भी है कि संयोग आदि सन्निकर्षोंका अनुगम न होनेके कारण इन्द्रियसन्निकर्षजन्यत्वरूप अपरोक्षत्व भी अनुगत नहीं होगा।

यदि कहो कि जो तुम (सिद्धान्ती) अपरोक्षत्व मानते हो, वही हमारे मतमें भी होगा। [इसलिए अज्ञाननिवर्तक ज्ञानमें अपरोक्षत्व विशेषण देनेसे परोक्षज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त नहीं होगी], तो यह कथन भी युक्त नहीं है, क्योंकि शाब्दज्ञानके अपरोक्षत्वनिरूपणके प्रकरणमें प्रतिपादनीय सिद्धान्तीका अपरोक्षत्व, उसी प्रकरणमें* प्रदर्शित रीतिसे, अज्ञाननिवृत्तिसे प्रयोज्य है, अतः वह अज्ञान- निवृत्तिके प्रति प्रयोजक (कारण) रूपसे निवर्तक ज्ञानमें विशेषण नहीं हो सकता है।


* ज्ञानमें जो अपरोक्षत्व है, वह करणविशेषसे प्रयुक्त नहीं है, किन्तु अपरोक्ष अर्थसे अभिन्नत्वरूप है, और वह जो अपरोक्षार्थाभिन्नत्वरूप अपरोक्षत्व है, वह विषयावभासक चैतन्यसमाननिष्ठ है, वृत्तिनिष्ठ नहीं है, इसलिए साक्षिप्रत्यक्षमें अव्याप्ति नहीं है, और अर्थमें अपरोक्षत्व अर्थव्यवहारके अनुकूल चैतन्याभिन्नत्व है अर्थात् विषयके व्यवहारमें उपयुक्त चैतन्यसे अभिन्नत्व है। विषयव्यवहारमें अनुकूल चैतन्य है—जिसका कि आवरण नष्ट हुआ है—ऐसा उस विषयका अधिष्ठानभूत चैतन्य, इसीलिए अपने व्यवहारमें अनु- कूल स्वगोचर वृत्तिसे अभिव्यक्त अधिष्ठानचैतन्यके साथ घटादि विषयोंका तादात्म्यरूप— अभेद होनेके कारण उनमें अपने व्यवहारमें अनुकूल चैतन्याभिन्नत्व है। अहङ्कार आदि स्थलोंमें भी अहङ्कारके अधिष्ठानभूत साक्षिरूप ज्ञानकी और बाह्य घट आदिमें तत्-तत् वृत्त्यु- पहित घटादि प्रत्यक्षज्ञानात्मक जो घट आदिका अधिष्ठानभूत चैतन्य है, उसकी उन-उन विषयोंके साथ तादात्म्यापत्ति होनेसे अपरोक्षार्थाभिन्नत्वरूप अपरोक्षत्व उपपन्न है। यह रीति शाब्दापरोक्षप्रकरणमें बतलाई गई है। इस अवस्थामें विषयावच्छिन्न चैतन्यगत अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर ही घटादिव्यवहारके अनुकूल चैतन्यके साथ घटादिविषयका अभेदरूप अपरोक्षत्व प्राप्त हो सकता है, विषय जब अपरोक्ष होगा, तब विषयके ज्ञानमें भी अपरोक्षार्था- भिन्नत्व होगा, इसलिए विषयचैतन्यमें रहनेवाले अज्ञानकी निवृत्तिके पूर्वमें ज्ञानमें अपरो- क्षत्वकी सिद्धि नहीं हो सकती है, अतः सिद्धान्तीका अभिमत ज्ञानगत अपरोक्षत्व, जो

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२५८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

शोकमात्मविद्' इति श्रुतस्य ब्रह्मज्ञानस्य मूलाज्ञानाश्रयभूतसर्वोपादान- ब्रह्मसंसर्गनियतस्य मूलाज्ञाननिवर्तकत्वात् । 'ऐन्द्रियकवृत्तयस्तत्तदिन्द्रिय- सन्निकर्षसामर्थ्यात् तत्तद्विषयावच्छिन्नचैतन्यसंसृष्टा एव उत्पद्यन्ते' इति नियममुपेत्याऽज्ञानाश्रयचैतन्यसंसर्गनियतत्वं निवर्तकज्ञानविशेषणं वाच्यम् । तथा च 'यद् अज्ञानं यं पुरुषं प्रति यद्विषयावरकम्, तत् तदीय तद्विषयतद्- ज्ञानाश्रयचैतन्यसंसर्गनियतात्मलाभज्ञाननिवर्त्यम्' इति ज्ञानाज्ञानयोर्विरोध- प्रयोजकं निरूपितं भवति ।

इससे अर्थात् 'यदज्ञानं यं पुरुषं प्रति' इत्यादि नियममें अपरोक्षत्वका निवर्तकज्ञानके विशेषणरूपसे प्रवेश नहीं हो सकनेसे 'तरति०' (आत्मज्ञानी अज्ञानको तैर जाता है अर्थात् ज्ञानीका अज्ञान निवृत्त हो जाता है) यह श्रुत ब्रह्मज्ञान, जो कि मूलाज्ञानके आश्रयभूत तथा सम्पूर्ण जगत्‌के प्रति उपादानभूत ब्रह्ममें नियमतः संसृष्ट है*, मूलाज्ञानका निवर्तक है। अतः तत्- तत् इन्द्रियोंकी सामर्थ्यसे इन्द्रियजन्य वृत्तियाँ भी तत्-तत् विषयोंसे युक्त चैतन्यसे संसृष्ट ही उत्पन्न होती हैं, ऐसा नियम मानकर अज्ञानाश्रय चैतन्यके संसर्गसे नियतत्व निवर्तक ज्ञानमें विशेषण देना चाहिए । इससे 'जो अज्ञान जिस पुरुषके प्रति जिस विषयका आवरक होता है, वह † तदीय और तद्विषयक तदज्ञानके आश्रय चैतन्यके संसर्गसे नियतात्मलाभवाले ज्ञानसे निवर्त्य है', इस प्रकार ज्ञान और अज्ञानके विरोधके प्रयोजकका स्वरूप निरूपित होता है ।


विषयचैतन्यगत अज्ञानकी निवृत्तिसे प्रयोज्य है, अज्ञानकी निवृत्तिमें कारण कैसे होगा, अर्थात् कदापि नहीं हो सकता है, इसलिए वह अज्ञाननिवृत्तिके प्रति निवर्तकज्ञानका प्रयोजकत्वरूपसे विशेषण नहीं हो सकता है, यह भाव है ।

* तात्पर्य यह है कि जब ब्रह्मविषयक ज्ञानकी (वृत्तिकी) उत्पत्ति होती है, तब नियमतः वह ब्रह्मसंसृष्ट ही उत्पन्न होती है, क्योंकि ब्रह्म सभीका उपादान है, कार्यमात्र जन्मसे लेकर उपादानभूत ब्रह्मके साथ संसृष्ट होता है, इसीलिए ब्रह्मविषयक वृत्तिज्ञानका भी स्वनिवर्त्य मूलाज्ञानके आश्रयीभूत ब्रह्ममें संसर्गनियम अर्थसिद्ध है।

† घटावच्छिन्न चैतन्यमें घटको आवृत्त करनेवाले अनेक अज्ञान हैं, उनमें से कोई देवदत्तके प्रति आवरक हैं, तो कोई यज्ञदत्तके प्रति, इस प्रकारसे प्रतिविषय पुरुषके भेदसे अनेक अज्ञान हैं, इसलिए विषयावारक अज्ञानोंमें से जो अज्ञान जिस देवदत्तके प्रति जिस विषयको आवृत्त करता है, वह अज्ञान उसी देवदत्तके घटविषयक उस अज्ञानके आश्रयभूत चैतन्यके संसर्गसे नियतात्मलाभवाले (नियत है उत्पत्ति जिसकी, ऐसे) ज्ञानसे निवर्त्य है, अर्थात् देवदत्तके प्रति घटावारक जो अज्ञान है, उसका


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वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भाषानुवादसहित २५९

न चैवं सति नाडीहृदयस्वरूपगोचरशब्दज्ञानस्याऽप्यज्ञाननिवर्तकत्व- प्रसङ्गः, तस्य कदाचिदर्थसम्पन्ननाडीहृदयान्यतरवस्तुसंसर्गसम्भवेऽपि विषयसंसर्गं विनाऽपि शाब्दज्ञानसम्भवेन तत्संसर्गनियतात्मलाभत्वाभावात् । तस्माज्ज्ञानाज्ञानविरोधनिर्वाहाय वृत्तिनिर्गमो वक्तव्य इति ।

ऐसा होनेपर 'हृदयपुण्डरीकमें नाडियाँ हैं' इस प्रकार शब्दसे उत्पन्न हुए नाडी और हृदयके स्वरूपावगाही ज्ञानमें अज्ञाननिवर्तकत्वका प्रसङ्ग नहीं है, क्योंकि दैववशसे उक्त शब्दजन्यज्ञानका (वृत्तिका) नाडी और हृदयसे अवच्छिन्न चैतन्यके साथ सम्बन्ध होनेपर भी (किसी समय) विषयावच्छिन्न चैतन्यके साथ सम्बन्धके बिना भी उक्त शब्दजन्यवृत्तिकी उत्पत्ति हो सकती है, अतः चैतन्यसंसर्गसे नियतात्मलाभवाला ज्ञान नहीं है । [तात्पर्यार्थ यह है कि 'यदज्ञानं यं पुरुषं प्रति' इत्यादि विरोध प्रयोजकको नियमगर्भित माननेसे परोक्षवृत्तियोंका विषयावच्छिन्न चैतन्यके साथ संसर्ग न होनेके कारण उनमें अज्ञान निवर्तकत्वकी प्रसक्ति नहीं है, ऐसा कहा जा चुका है, इसपर शङ्का होती है कि यह कहना असङ्गत है, क्योंकि परोक्षवृत्तिका भी किसी स्थलमें विषयावच्छिन्न चैतन्यके साथ संसर्ग देखा जाता है, जैसे कि 'हृदयपुण्डरीकमें नाड़ियाँ हैं' इस वाक्यसे उत्पन्न हुई वृत्तिके दैवयोगसे हृदयपुण्डरीकस्थ अन्तःकरणमें नाड़ी या हृदय दोनोंमें से किसी एकसे अवच्छिन्नरूपसे उत्पन्न होनेपर उस वृत्तिका नाड़ी या हृदयसे युक्त चैतन्यमें संसर्ग होनेके कारण उस वृत्तिमें भी अज्ञानके निवर्तकत्वकी प्रसक्ति आवेगी ? इस प्रश्नका उत्तर देते हैं कि नहीं, उक्त प्रसक्ति नहीं आ सकती है, कारण कि विरोधका प्रयोजक जो तथाकथित नियम है, वह नियम व्यापकता से घटित है । भाव यह है कि जब जब नाड़ी, हृदयादिविषयक शब्दजन्य वृत्तिका उदय होता है, तब तब उस वृत्तिका नाड़ी आदिसे युक्त चैतन्यमें संसर्ग होता है, यह नियम नहीं है, कारण कि इन्द्रिय-


आश्रयीभूत जो घटावच्छिन्न चैतन्य है, उसमें संसर्गसे नियत है उत्पत्ति जिसकी, ऐसे ज्ञानसे उक्त अज्ञान निवर्त्य है । जब-जब घटेन्द्रियसन्निकर्षसे घटविषयक वृत्तिज्ञान की उत्पत्ति होती है, तब-तब घटावच्छिन्न चैतन्यमें घटविषयक वृत्तिज्ञानकी उत्पत्ति होती है, यह नियम है । इसीलिए 'ऐन्द्रियवृत्तयः तत्तद्विषयावच्छिन्नसंसृष्टा एव उत्पद्यन्ते, इति नियममुपेत्य' अर्थात् जब इन्द्रियजन्यवृत्तियोंकी उत्पत्ति होती है, तब उन वृत्तियोंका विषयावच्छिन्न चैतन्यमें संसर्ग है, ऐसा कहा गया है इसी प्रकार इस नियमका अन्यत्र भी उपयोग जानना चाहिए ।

२६०सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ प्रथम परिच्छेद

अन्ये विषयसम्मोहभेदनाय तमास्थिताः ।
परे चिदुपरागार्थम् अभेदव्यक्तयेऽपरे ॥१२१॥

कोई लोग कहते हैं किं विषयगत अज्ञानकी निवृत्तिके लिए वृत्तिका निर्गमन है, कुछ लोग कहते हैं कि चैतन्यके साथ सम्बन्धके लिए वृत्तिका निर्गमन अपेक्षित है और कोई लोग अभेदाभिव्यक्तिके लिए वृत्तिका निर्गमन मानते हैं ॥१२१॥

अन्ये तु—विषयगताज्ञानस्य लाघवात् समानाधिकरणाज्ञाननिवर्त्यत्वसिद्धौ वृत्तिनिर्गमः फलतीत्याहुः ।

अपरे तु—बाह्यप्रकाशस्य बाह्यतमोनिवर्तकत्वं सामानाधिकरण्ये सत्येव

जन्य वृत्तियाँ तो तत्-तत् इन्द्रियगोलकसे युक्त अन्तःकरणप्रदेशमें होती हैं, अतः उनमें उक्त नियम घटता है, परन्तु अन्तःकरणमें उत्पन्न होनेवाली इन्द्रियनिरपेक्ष-वृत्तियोंके प्रदेशनियममें कारण न होनेसे हृदयादिविषयक शाब्दवृत्ति कदाचित् हृदयादिदेशस्थ अन्तःकरणमें उत्पन्न होती है और कदाचित् पैर आदि देशसे युक्त अन्तःकरणमें उत्पन्न होती है । अतः उक्त नियम नहीं हो सकता है, कारण कि पैरमें जब उक्त वृत्ति होगी तब नाड़ीसे ऽवच्छिन्न चैतन्य ही नहीं है, अतः उसका संसर्ग भी नाड़ीयुक्त चैतन्यमें नहीं होगा ] । इससे—वृत्तिज्ञानमें अज्ञानाश्रयीभूत चैतन्यके साथ सम्बन्धके विना अज्ञान निवर्तकत्व न होनेके कारण—ज्ञान और अज्ञानके विरोधके निर्वाहके लिए वृत्तिका निर्गम मानना चाहिए ।

कोई लोग कहते हैं कि विषयगत अज्ञानकी निवृत्ति लाघवसे* समानाधिकरण ज्ञानसे ही सिद्ध होती है, अतः वृत्तिनिर्गमन अर्थतः प्राप्त होता है ।

कुछ लोग कहते हैं किं सामानाधिकरण्यके रहनेपर ही बाह्य प्रकाश बाह्य


* अन्वय और व्यतिरेकसे विषयगत अज्ञानके ज्ञाननिवर्त्यत्वपरिज्ञानदशामें प्रथमतः समानाधिकरणज्ञाननिवर्त्यत्व ही अज्ञानमें लाघवसे गृहीत होता है व्यधिकरणज्ञाननिवर्त्यत्व गृहीत नहीं होता है, अतः वृत्तिनिर्गमनके विना ज्ञान और अज्ञानका सामानाधिकरण्य ( एकाधिकरणवृत्तिता ) हो ही नहीं सकता है, इसलिए वृत्तिनिर्गम मानना चाहिए । तात्पर्य यह है कि घटावच्छिन्न चैतन्यमें, घटका आवारक अज्ञान है इसलिए अज्ञाननिवृत्तिरूप ज्ञानका कार्य भी विषयावच्छिन्न चैतन्यमें ही होगा । इसलिए अज्ञाननिवृत्तिरूप कार्यका, अपने कारण ज्ञानके साथ इन्द्रियसन्निकर्षकी सामर्थ्यसे, सामानाधिकरण्यरूप सम्बन्धके सम्भव होनेपर उसका परित्याग नहीं कर सकते हैं, क्योंकि कार्य और कारणका सामानाधिकरण्य औत्सर्गिक है ।

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वृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भाषानुवादसहित २६१

दृष्टमिति दृष्टान्तानुरोधाद् वृत्तिनिर्गमः सिद्ध्यतीत्याहुः ।

केचित्तु—आवरणाभिभवार्थं वृत्तिनिर्गमानपेक्षायामपि चिदुपरागार्थं प्रमातृचैतन्यस्य विषयप्रकाशकब्रह्मचैतन्याभेदाभिव्यक्त्यर्थं वा तदपेक्षेत्याहुः ।

अभेदो जीवपरयोः सिद्धो वेदान्तमानकः ।
यतोऽत्र सर्ववेदान्तास्तात्पर्येण समन्वियुः ॥१२२॥

जीव और ब्रह्मका अभेद वेदान्तप्रमाणसे सिद्ध है, क्योंकि सभी वेदान्तोंका तात्पर्य अद्वैत ब्रह्मके बोधनमें ही है ॥१२२॥

इति श्रीमद्गङ्गाधरसरस्वतीविरचितवेदान्तसिद्धान्तसूक्तिमञ्जर्यां प्रथमपरिच्छेदः समाप्तः ।

अथ किं प्रमाणकोऽयं जीवब्रह्मणोरभेदः, यो वृत्त्याऽभिव्यज्यते ?


अन्धकारका निवर्तक देखा गया है, इसलिए दृष्टान्तके अनुसार वृत्तिका निर्गम सिद्ध होता है *।

कोई लोग कहते हैं कि यद्यपि आवरणके अभिभवके लिए वृत्तिके निर्गमनकी अपेक्षा नहीं है, तथापि चैतन्यके साथ सम्बन्धके लिए अथवा प्रमातृ-चैतन्य और विषयप्रकाशक ब्रह्मचैतन्यकी अभेदाभिव्यक्तिके लिए उसकी (वृत्तिनिर्गमकी) अपेक्षा है† ।

अब शङ्का होती है कि जीव और ब्रह्मके अभेदमें क्या प्रमाण है, जो वृत्तिसे अभिव्यक्त होता है।


* भाव यह है कि लोकमें दूसरे देशके प्रकाशसे दूसरे देशके अन्धकारकी निवृत्ति नहीं होती है, किन्तु समानदेशमें ही स्थित अंधकार और प्रकाशका परस्पर निवर्त्यनिवर्तक भाव होता है, इसी दृष्टान्तके अनुसार ज्ञान और अज्ञानका, जो कि प्रकाश और अन्धकाररूप हैं, निवर्त्य-निवर्तक भाव सामानाधिकरण्यसे ही होगा। उनका सामानाधिकरण्य अज्ञानके आश्रय विषयावच्छिन्नचैतन्यमें ही हो सकता है, अतः सामानाधिकरण्यके लिए अर्थात् विषयावच्छिन्न चैतन्यमें वृत्तिज्ञानके संसर्गके लिए वृत्तिका निर्गमन मानना ही चाहिए ।

† यदि विषयचैतन्यगत अज्ञानकी निवृत्तिके लिए वृत्तिका निर्गमन न भी माना जाय, तो भी वृत्तिका निर्गम मानना चाहिए, इस अभिप्रायसे 'केचित्तु'का मत है ।

३६२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

'वेदान्तप्रमाणकः' इति घण्टाघोषः। सर्वेऽपि वेदान्ता उपक्रमोप-संहारैकरूप्यादितात्पर्यलिङ्गैर्विमृश्यमानाः प्रत्यगभिन्ने ब्रह्मण्यद्वितीये समन्व-यन्ति। यथा चायमर्थः, तथा शास्त्रे एव समन्वयाध्याये प्रपञ्चितः। विस्तरभयान्नेह प्रदर्श्यते इति ॥१९॥

इति सिद्धान्तलेशसङ्ग्रहे प्रथमः परिच्छेदः समाप्तः।


इस शङ्काका परिहार करते हैं कि जीव और ब्रह्मके अभेदमें वेदान्त (उप-निषत्-वाक्य) ही प्रमाण हैं, यह घण्टाघोष है अर्थात् उक्त अभेदमें वेदान्त ही प्रमाण हैं, यह बात जगत्प्रसिद्ध है, क्योंकि सभी वेदान्तोंका उपक्रम, और उपसंहारके ऐक्यरूप* आदि तात्पर्यलिङ्गोंसे विचार करनेपर जीवाभिन्न अद्वितीय ब्रह्ममें ही पर्यवसान होता है। जिस प्रणालीसे वेदान्तोंका तात्पर्य-विषयीभूत जीवाभिन्न अद्वितीय ब्रह्म है, उसका शास्त्रमें—समन्वयाध्यायमें—विचार किया गया है। विस्तारके भयसे प्रकृतमें उसका प्रपञ्च नहीं किया जाता है।

इति श्रीसिद्धान्तलेशसंग्रहके वेदान्ताचार्य-श्रीपण्डितमूलशङ्करव्यासविरचित भाषानुवादमें प्रथम परिच्छेद समाप्त


* उपक्रम आदिका (३३ वें पेजकी) टिप्पणीमें विचार और लक्षण बतलाए गये हैं, अतः वहींसे उपक्रमादिके लक्षणोंका अवधान करना चाहिए।

प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिके अबाधितत्वका विचार] भाषानुवादसहित २६३


ॐ नमः परमात्मने द्वितीय परिच्छेद

ननूपजीव्यप्रत्यक्षाविरुद्धं श्रुतियुक्तिभिः ।
बोध्यते कथमद्वैतम्,

यहाँपर शङ्का होती है कि सभी प्रमाणोंके उपजीव्य—कारण—प्रत्यक्षप्रमाणसे विरोध होनेके कारण श्रुति और युक्तियोंसे अद्वैतका बोध कैसे हो सकता है ?

अथ कथमद्वितीये ब्रह्मणि वेदान्तानां समन्वयः, प्रत्यक्षादिविरोधाद् ? इति चेन्, न; आरम्भणाधिकरणो- ( उ० मी० अ० २ पा० १ अधि० ६ सू० १४ )-दाहृतश्रुतियुक्तिभिः प्रत्यक्षाद्यधिगम्यस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्मविवर्त-तया मिथ्यात्वावगमात् । ननु न श्रुतियुक्तिभिः प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वं

* यहां पर शङ्का होती है कि वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य अद्वैत ब्रह्ममें कैसे हो सकता है ? क्योंकि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे विरोध है, [ अर्थात् ब्रह्माभिन्न घटादि-प्रपञ्चके प्रत्यक्ष आदिसे सिद्ध होनेके कारण ब्रह्ममें अद्वितीयत्व बाधित है, अतः श्रुतिका बाधित अर्थमें तात्पर्य माना जायगा, तो अप्रामाण्य प्रसक्त होगा, इसलिए वेदान्तवाक्योंका तात्पर्य अद्वितीय ब्रह्ममें नहीं हो सकता है, यह शङ्काका भाव है ], नहीं, यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि आरम्भणा-धिकरणमें उदाहृत श्रुति और युक्तियोंसे प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे गृहीत पदार्थोंके ब्रह्मविवर्त होनेसे उनमें मिथ्यात्वका ही अनुमान होता है। यदि शङ्का हो कि श्रुति और युक्तियोंसे प्रपञ्चमें मिथ्यात्वका साधन ही


* प्रथमपरिच्छेदमें ब्रह्मलक्षणविचारके प्रसङ्गमें, मतभेदसे ज्ञेय ब्रह्ममें लक्षणकी वृत्तिता है और ईश्वररूप ब्रह्ममें भी है, ऐसा निरूपण करनेसे 'तत्त्वमसि' इस महावाक्यके 'तत्' शब्दके लक्ष्य और वाच्य अर्थका निरूपण किया गया है। उसके बाद जीव और जीव-साक्षीके निरूपणसे 'त्वम्' पदके वाच्यार्थ और लक्ष्यार्थका भी विवेचन किया गया है, और इनके निरूपणसे अभेदरूप वाक्यार्थका भी अर्थात् निरूपण किया गया है, इसलिए प्रथम परिच्छेदमें जीवाभिन्न निर्विशेष ब्रह्ममें वेदान्तसमन्वयरूप प्रथमाध्यायार्थका तात्पर्य निरूपण हो जाता है। अब द्वितीयाध्यायार्थरूप वेदान्तसमन्वयका मानान्तरसे विरोधके परिहारका निरूपण करनेके लिए द्वितीय परिच्छेदका आरम्भ करते हैं—"अथ" इत्यादिसे, यह भाव है।

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२६४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

प्रत्याययितुं शक्यते; 'घटः सन्' इत्यादिघटादिसत्त्वग्राहिप्रत्यक्षादिविरोधात् ।

तत्त्वशुद्धिकृतो विदुः ॥ १ ॥
शुक्तीदन्तेव सन्मात्रं सर्वाध्यक्षेषु गोचरः ।
रूप्यवद्घटभेदादिर्भ्रान्तेरित्याविरुद्धता ॥ २ ॥

उक्त शङ्काके परिहारमें तत्त्वशुद्धिकार कहते हैं कि शुक्तिमें इदन्त्वके समान सभी प्रत्यक्षोंमें सन्मात्रका अवगाहन होता है और शुक्तिमें रूप्यका ज्ञान भ्रान्तिसे ही होता है, वैसे ही सन्मात्रमें घट आदिका भ्रान्तिसे ही अवभास होता है, अतः विरोध नहीं है ॥ १ ॥ २ ॥

**अत्राहुस्तत्त्वशुद्धिकाराः—**न प्रत्यक्षं घटपटादि तत्सत्त्वं वा गृह्णाति, किन्तु अधिष्ठानत्वेन घटाद्यनुगतं सन्मात्रम् । तथा च प्रत्यक्षमपि सद्रूपब्रह्माद्वैतसिद्धयनुकूलमेव । तथा सति 'सद्' 'सद्' इत्येव प्रत्यक्षं स्यात्, न तु 'घटः सन्' इत्यादि प्रत्यक्षमिन्द्रियान्वयव्यतिरेकानुविधायीति चेत्, न; यथा भ्रमेष्विदमंशस्याऽधिष्ठानस्य प्रत्यक्षेण ग्रहणम्, इन्द्रियान्वयव्यतिरेकयोः तत्रैवोपक्षयः । रजतांशस्य त्वारोपितस्य भ्रान्त्या प्रतिभासः,


नहीं सकता है, क्योंकि 'घटः सन्' ( घट सत् है ) इस प्रकारके घट आदिमें सत्त्वके ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्ष आदिके साथ विरोध होगा ।

इस आक्षेपके समाधानमें तत्त्वशुद्धिकार कहते हैं—प्रत्यक्षसे घट, पट आदि विषयोंका अथवा उनमें रहनेवाले सत्त्वका ग्रहण नहीं होता है, किन्तु अधिष्ठानत्वरूपसे घट, पट आदिमें अनुगत सन्मात्रका ही ग्रहण होता है, इसलिए प्रत्यक्षप्रमाण भी सद्रूप, अद्वितीय ब्रह्मकी सिद्धिमें अनुकूल ही है । पुनः शङ्का होती है कि यदि प्रत्यक्ष सन्मात्रविषय ही है, तो 'सत्' 'सत्' इसी प्रकारसे प्रत्यक्ष होना चाहिए, 'घट सत् है, इस प्रकार इन्द्रियके साथ अन्वय और व्यतिरेकका अनुविधायी प्रत्यक्ष नहीं होना चाहिए, तो यह शङ्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे भ्रमात्मक ज्ञानमें इदमंशरूप अधिष्ठानका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है । इन्द्रियके अन्वय और व्यतिरेक अधिष्ठानप्रत्यक्षमें ही चरितार्थ हैं, और आरोपित रजतांशका प्रतिभास साक्षिरूप भ्रान्तिसे होता है, वैसे ही सर्वत्र इन्द्रियोंसे सन्मात्र अधिष्ठानका ही ग्रहण होता है, इन्द्रियोंका व्यापार उसीके प्रत्यक्षमें समाप्त होता है, और घट, पट आदि वस्तुका प्रतिभास भ्रान्तिसे होता है.

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प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्वविचार ] भाषानुवादसहित २६५


तथा सर्वत्र सन्मात्रस्य प्रत्यक्षेण ग्रहणम्, तत्रैवेन्द्रियव्यापारः । घटादि- भेदवस्तुप्रतिभासो भ्रान्त्येत्यभ्युपगमात् ।

ननु तद्वदिह बाधादर्शनात् तथाऽभ्युपगम एव निर्मूल इति चेत्, न; बाधादर्शनेऽपि देशकालव्यवहितवस्तुवद् घटादिभेदवस्तुनः प्रत्यक्षा- योग्यत्वस्यैव तत्र मूलत्वात् ।

तथाहि—इन्द्रियव्यापारानन्तरं प्रतीयमानो घटादिः सर्वतो भिन्न एव प्रतीयते । तदा तत्र घटादिभेदे संशयविपर्ययादर्शनात् । यत्राऽपि स्थाण्वादौ पुरुषत्वादिसंशयः, तत्राऽपि तद्व्यतिरिक्तेभ्यो भेदोऽसन्दिग्ध- विपर्यस्तत्वात् प्रकाशते एव । भेदस्य च प्रतियोगिसहोपलम्भनियमवतो


अर्थात् इन्द्रियजन्यवृत्तिसे अभिव्यक्त सन्मात्ररूप साक्षिचैतन्यरूप भ्रान्तिसे होता है, ऐसा स्वीकार किया गया है ।

यदि कहो कि शुक्तिरजत आदिके समान * घटादि द्वैतप्रपञ्चका बाध नहीं देखा जाता है, अतः घटादिप्रपञ्च भ्रान्तिसिद्ध है, यह कहना अनु- चित है ? यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि बाधका दर्शन न होनेपर भी देश, काल आदिसे व्यवहित वस्तुके समान घट आदिमें रहनेवाले भेदरूप वस्तुओंका प्रत्यक्षायोग्यत्व ही घटादिके भ्रान्तिसिद्धत्वमें प्रयोजक है ।

जैसे कि इन्द्रियव्यापारके अनन्तर प्रतीयमान घट आदि अन्य सभी से भिन्न ही प्रतीत होते हैं, क्योंकि उस समय घटादिमें रहनेवाले भेदमें संशय और विपर्ययका अवभास नहीं होता है । और जहांपर स्थाणुप्रभृतिमें पुरुषत्व आदिका सन्देह होता है, वहाँ भी पुरुषत्वादिसे अन्य पदार्थोंका असंदिग्ध


* तात्पर्य यह है कि शुक्तिमें रजतका भ्रम होनेके अनन्तर दोष आदिकी निवृत्ति होनेपर 'नेदं रजतम्' (यह रजत नहीं है) इस प्रकार बाधज्ञान होता है, इसी प्रकार घटादि द्वैतप्रपञ्चका बाध नहीं होता है, इसलिए घटादि द्वैतप्रपञ्चको भ्रान्तिसिद्ध कैसे मानना ? इस प्रकारका संशय होनेपर उत्तरदाता कहता है कि द्वैतप्रपञ्चका बाध नहीं देखा जाता है, इसका क्या अर्थ है, क्या श्रोतबाधका अदर्शन अर्थ है या प्रत्यक्षबाधका अदर्शन अर्थ है, अथवा यौक्तिकबाधका अदर्शन अर्थ है । प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि 'नेह नानास्ति किञ्चन' इत्यादि श्रुतिसे बाध देखा जाता है, द्वितीयपक्ष अङ्गीकार करके तृतीयका 'बाधादर्शनेऽपि' इत्यादिसे निषेध करते हैं ।

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२६६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

न प्रत्यक्षैण ग्रहणं सम्भवति । देशकालव्यवधानेनाऽसन्निकृष्टानापि प्रतियोगिनां सम्भवात् । भेदज्ञानं प्रतियोग्यंशे संस्कारापेक्षणात् स्मृतिरूपमस्तु प्रत्यभिज्ञानमिव तत्तांशे इति चेत्, न ; तथाऽपि भेदगतप्रतियोगिवैशिष्ट्यांशे तदभावात् ।

न च कनकाचलो भेदप्रतियोगी, वस्तुत्वादिति भेदे प्रतियोगिवैशिष्ट्यगोचरानुमित्या तत्संस्कारसम्भवः । भेदे ज्ञानं विनाऽनुमित्यभावेनाऽऽ-


और विपर्यासशून्य भेद प्रकाशित होता है, प्रतियोगीके साथ ही * जिसकी उपलब्धि नियत है, ऐसे भेदका प्रत्यक्षप्रमाणसे अर्थात् चक्षुरादिसे ग्रहण नहीं हो सकता, क्योंकि देश और कालके व्यवधानसे असम्बद्ध भी प्रतियोगी हो सकते हैं। यदि कहो कि प्रतियोगी अंशमें भेदका ज्ञान संस्कारकी अपेक्षा रखता है, अतः स्मृतिरूप ही प्रतियोगी अंशमें ज्ञान होगा, जैसे प्रत्यभिज्ञा तत्तांशमें स्मरणात्मक होती है, यह शङ्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर भी भेदप्रतियोगीके सम्बन्धांशमें स्मृतिरूप ज्ञान नहीं हो सकता है †।

यदि शङ्का हो कि कनकाचल भेदका प्रतियोगी है, वस्तु होनेसे, इस प्रकार की, भेदमें प्रतियोगीके वैशिष्ट्यको विषय करनेवाली, अनुमितिसे भेदगत


* सारांश यह है कि ससम्बन्धिक पदार्थके प्रत्यक्षमें सम्पूर्णसम्बन्धिविषयकत्व और सम्पूर्णसम्बन्धिप्रत्यक्षजन्यत्व, संयोग आदिके प्रत्यक्षमें कॢप्त है, अतः भेदप्रत्यक्षमें भी यावत्प्रतियोगिविषयकत्व और यावत्प्रतियोगिप्रत्यक्षजन्यत्व मानना पड़ेगा, क्योंकि भेदप्रत्यक्ष भी ससम्बन्धिकपदार्थप्रत्यक्ष है, इस परिस्थितिमें संसारभरके सारे प्रतियोगियोंका प्रत्यक्ष न हो सकनेके कारण कॢप्त सामग्रीके न होनेसे भेदप्रत्यक्ष प्रमाणके योग्य नहीं हो सकेगा, इसलिए उसको भ्रान्तिसिद्ध ही मानना पड़ेगा। सिद्धान्तमें भेद-प्रत्यक्षके नित्यसाक्षीरूप होनेसे कारणकी भी अपेक्षा नहीं है।

† वस्तुतस्तु भेदज्ञानमें प्रतियोगितावच्छेदकरूपसे प्रतियोगीके ज्ञानको भेदवादी कारण मानते हैं, और यहाँ प्रतियोगितावच्छेदकरूपसे सम्पूर्ण प्रतियोगियोंका अनुभव नहीं होनेसे संस्कारकी उत्पत्ति नहीं होगी, अतः असन्निकृष्ट पदार्थमें स्मृतिरूपत्वकी उपपत्ति कैसे होगी ? अर्थात् नहीं होगी। यदि कथंचित् मान भी लिया जाय कि स्मरण होता है, तो भी जो कनकाचलका भेद समीपस्थ घटमें अनुभूत होता है, वह नहीं होना चाहिए, क्योंकि कनकाचलका कदापि ग्रहण न होनेके कारण तज्जन्य संस्कार हो ही नहीं सकता। और उसमें स्मृतित्वकी उपपत्ति भी नहीं हो सकती है।