सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 289, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंवृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार] भाषानुवादसहित २५९
न चैवं सति नाडीहृदयस्वरूपगोचरशब्दज्ञानस्याऽप्यज्ञाननिवर्तकत्व- प्रसङ्गः, तस्य कदाचिदर्थसम्पन्ननाडीहृदयान्यतरवस्तुसंसर्गसम्भवेऽपि विषयसंसर्गं विनाऽपि शाब्दज्ञानसम्भवेन तत्संसर्गनियतात्मलाभत्वाभावात् । तस्माज्ज्ञानाज्ञानविरोधनिर्वाहाय वृत्तिनिर्गमो वक्तव्य इति ।
ऐसा होनेपर 'हृदयपुण्डरीकमें नाडियाँ हैं' इस प्रकार शब्दसे उत्पन्न हुए नाडी और हृदयके स्वरूपावगाही ज्ञानमें अज्ञाननिवर्तकत्वका प्रसङ्ग नहीं है, क्योंकि दैववशसे उक्त शब्दजन्यज्ञानका (वृत्तिका) नाडी और हृदयसे अवच्छिन्न चैतन्यके साथ सम्बन्ध होनेपर भी (किसी समय) विषयावच्छिन्न चैतन्यके साथ सम्बन्धके बिना भी उक्त शब्दजन्यवृत्तिकी उत्पत्ति हो सकती है, अतः चैतन्यसंसर्गसे नियतात्मलाभवाला ज्ञान नहीं है । [तात्पर्यार्थ यह है कि 'यदज्ञानं यं पुरुषं प्रति' इत्यादि विरोध प्रयोजकको नियमगर्भित माननेसे परोक्षवृत्तियोंका विषयावच्छिन्न चैतन्यके साथ संसर्ग न होनेके कारण उनमें अज्ञान निवर्तकत्वकी प्रसक्ति नहीं है, ऐसा कहा जा चुका है, इसपर शङ्का होती है कि यह कहना असङ्गत है, क्योंकि परोक्षवृत्तिका भी किसी स्थलमें विषयावच्छिन्न चैतन्यके साथ संसर्ग देखा जाता है, जैसे कि 'हृदयपुण्डरीकमें नाड़ियाँ हैं' इस वाक्यसे उत्पन्न हुई वृत्तिके दैवयोगसे हृदयपुण्डरीकस्थ अन्तःकरणमें नाड़ी या हृदय दोनोंमें से किसी एकसे अवच्छिन्नरूपसे उत्पन्न होनेपर उस वृत्तिका नाड़ी या हृदयसे युक्त चैतन्यमें संसर्ग होनेके कारण उस वृत्तिमें भी अज्ञानके निवर्तकत्वकी प्रसक्ति आवेगी ? इस प्रश्नका उत्तर देते हैं कि नहीं, उक्त प्रसक्ति नहीं आ सकती है, कारण कि विरोधका प्रयोजक जो तथाकथित नियम है, वह नियम व्यापकता से घटित है । भाव यह है कि जब जब नाड़ी, हृदयादिविषयक शब्दजन्य वृत्तिका उदय होता है, तब तब उस वृत्तिका नाड़ी आदिसे युक्त चैतन्यमें संसर्ग होता है, यह नियम नहीं है, कारण कि इन्द्रिय-
आश्रयीभूत जो घटावच्छिन्न चैतन्य है, उसमें संसर्गसे नियत है उत्पत्ति जिसकी, ऐसे ज्ञानसे उक्त अज्ञान निवर्त्य है । जब-जब घटेन्द्रियसन्निकर्षसे घटविषयक वृत्तिज्ञान की उत्पत्ति होती है, तब-तब घटावच्छिन्न चैतन्यमें घटविषयक वृत्तिज्ञानकी उत्पत्ति होती है, यह नियम है । इसीलिए 'ऐन्द्रियवृत्तयः तत्तद्विषयावच्छिन्नसंसृष्टा एव उत्पद्यन्ते, इति नियममुपेत्य' अर्थात् जब इन्द्रियजन्यवृत्तियोंकी उत्पत्ति होती है, तब उन वृत्तियोंका विषयावच्छिन्न चैतन्यमें संसर्ग है, ऐसा कहा गया है इसी प्रकार इस नियमका अन्यत्र भी उपयोग जानना चाहिए ।