भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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२६०सिद्धान्तलेशसंग्रहं[ प्रथम परिच्छेद

अन्ये विषयसम्मोहभेदनाय तमास्थिताः ।
परे चिदुपरागार्थम् अभेदव्यक्तयेऽपरे ॥१२१॥

कोई लोग कहते हैं किं विषयगत अज्ञानकी निवृत्तिके लिए वृत्तिका निर्गमन है, कुछ लोग कहते हैं कि चैतन्यके साथ सम्बन्धके लिए वृत्तिका निर्गमन अपेक्षित है और कोई लोग अभेदाभिव्यक्तिके लिए वृत्तिका निर्गमन मानते हैं ॥१२१॥

अन्ये तु—विषयगताज्ञानस्य लाघवात् समानाधिकरणाज्ञाननिवर्त्यत्वसिद्धौ वृत्तिनिर्गमः फलतीत्याहुः ।

अपरे तु—बाह्यप्रकाशस्य बाह्यतमोनिवर्तकत्वं सामानाधिकरण्ये सत्येव

जन्य वृत्तियाँ तो तत्-तत् इन्द्रियगोलकसे युक्त अन्तःकरणप्रदेशमें होती हैं, अतः उनमें उक्त नियम घटता है, परन्तु अन्तःकरणमें उत्पन्न होनेवाली इन्द्रियनिरपेक्ष-वृत्तियोंके प्रदेशनियममें कारण न होनेसे हृदयादिविषयक शाब्दवृत्ति कदाचित् हृदयादिदेशस्थ अन्तःकरणमें उत्पन्न होती है और कदाचित् पैर आदि देशसे युक्त अन्तःकरणमें उत्पन्न होती है । अतः उक्त नियम नहीं हो सकता है, कारण कि पैरमें जब उक्त वृत्ति होगी तब नाड़ीसे ऽवच्छिन्न चैतन्य ही नहीं है, अतः उसका संसर्ग भी नाड़ीयुक्त चैतन्यमें नहीं होगा ] । इससे—वृत्तिज्ञानमें अज्ञानाश्रयीभूत चैतन्यके साथ सम्बन्धके विना अज्ञान निवर्तकत्व न होनेके कारण—ज्ञान और अज्ञानके विरोधके निर्वाहके लिए वृत्तिका निर्गम मानना चाहिए ।

कोई लोग कहते हैं कि विषयगत अज्ञानकी निवृत्ति लाघवसे* समानाधिकरण ज्ञानसे ही सिद्ध होती है, अतः वृत्तिनिर्गमन अर्थतः प्राप्त होता है ।

कुछ लोग कहते हैं किं सामानाधिकरण्यके रहनेपर ही बाह्य प्रकाश बाह्य


* अन्वय और व्यतिरेकसे विषयगत अज्ञानके ज्ञाननिवर्त्यत्वपरिज्ञानदशामें प्रथमतः समानाधिकरणज्ञाननिवर्त्यत्व ही अज्ञानमें लाघवसे गृहीत होता है व्यधिकरणज्ञाननिवर्त्यत्व गृहीत नहीं होता है, अतः वृत्तिनिर्गमनके विना ज्ञान और अज्ञानका सामानाधिकरण्य ( एकाधिकरणवृत्तिता ) हो ही नहीं सकता है, इसलिए वृत्तिनिर्गम मानना चाहिए । तात्पर्य यह है कि घटावच्छिन्न चैतन्यमें, घटका आवारक अज्ञान है इसलिए अज्ञाननिवृत्तिरूप ज्ञानका कार्य भी विषयावच्छिन्न चैतन्यमें ही होगा । इसलिए अज्ञाननिवृत्तिरूप कार्यका, अपने कारण ज्ञानके साथ इन्द्रियसन्निकर्षकी सामर्थ्यसे, सामानाधिकरण्यरूप सम्बन्धके सम्भव होनेपर उसका परित्याग नहीं कर सकते हैं, क्योंकि कार्य और कारणका सामानाधिकरण्य औत्सर्गिक है ।

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