सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 285, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंवृत्तिके निर्गमनकी आवश्यकताका विचार ] भाषानुवादसहित २५५
जातित्वायोगाद्, जातेर्व्याप्यवृत्तित्वनियमात् । तदनियमेऽप्यवच्छेदकोपा- धिभेदानिरूपणेन तस्याव्याप्यवृत्तिजातित्वायोगाच्च ।
नाप्युपाधिः, तदनिर्वचनात् । इन्द्रियजन्यत्वमिति चेत्, न; साक्षि- प्रत्यक्षाव्यापनात् । अनुमितिशाब्दज्ञानोपनीतगुरुत्वादि विशिष्टघटप्रत्यक्षे विशेषणांशातिव्यापनाच्च । करणान्तराभावेन तदंशे परोक्षेऽप्युपनयसहकारि-
न माना जाय, तो अपरोक्षत्व जाति नहीं होगी, क्योंकि जाति सर्वदा व्याप्य- वृत्ति हुआ करती है, यह नियम है, यदि 'जाति व्याप्यवृत्ति होती है' यह नियम न माना जाय, तो भी अवच्छेदक उपाधियोंका निरूपण न हो सकनेसे अपरोक्षत्व जाति अव्याप्यवृत्ति नहीं हो सकती है* ।
अपरोक्षत्व उपाधि भी नहीं है, क्योंकि उसका निर्वचन ही नहीं हो सकता, यदि कहो कि इन्द्रियजन्यत्व ( इन्द्रियसे उत्पन्न होना ) अपरोक्षत्व है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सुख आदिकी नित्यसाक्षीरूप प्रत्यक्षमें अव्याप्ति हो जायगी । और अनुमितिसे एवं शब्दजन्य ज्ञानसे उपनीत गुरुता आदिसे विशिष्ट घटके प्रत्यक्षमें विशेषणीभूत गुरुत्वमें उक्त लक्षणकी अतिव्याप्ति हो जायगी † । क्योंकि गुरुत्वमें प्रत्यक्षत्वसम्पादक अन्य करणके न होनेसे गुरुत्वांशके परोक्ष होनेपर भी उपनयकी सहकारितासे
आधारपर दण्डांशमें अपरोक्षत्वकी कल्पना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि लिङ्गज्ञान आदि सन्निकर्षकी कल्पना करके अनुमिति आदिमें अपरोक्षत्वका अङ्गीकार प्रसक्त होगा, यदि दण्डांशमें अपरोक्षत्व न माना जाय, तो 'दण्डी विष्णुमित्र आसीत्' इत्यादि प्रत्यभिज्ञानात्मक एक ज्ञानमें स्मृतित्व और अपरोक्षत्वके रहनेसे सङ्कर हो जायगा, इसलिए अपरोक्षत्व जाति नहीं हो सकती, क्योंकि जो जाति होती है, वह व्याप्यवृत्ति होती है, यह नियम है।
* भाव यह है कि यदि जाति व्याप्यवृत्ति न मानी जाय, तो भी प्रत्यभिज्ञामें विष्णुमित्र अंशमें प्रत्यक्षत्व और दण्ड अंशमें तदभाव मानना चाहिए, परन्तु वह तभी उपपन्न हो सकता है, जब कि उपाधिभेद माना जाय, क्योंकि अवच्छेदकके भेदसे ही प्रतियोगी और तदभावकी अवस्थिति एकत्र रहती है, प्रकृतमें उपाधिभेदका निरूपण अशक्य है, इसलिए अपरोक्षत्वमें ( समानाधिकरणात्यन्ताभावप्रतियोगित्वरूप, स्व के आश्रयमें ही स्व का अभाव हो ) अव्याप्य वृत्तित्वके असम्भव होनेसे व्याप्यवृत्ति ही जाति होगी, अतः पूर्वोक्त दोष तदवस्थ ही रहेगा।
† अर्थात् जिस घटमें शब्दसे या अनुमानसे गुरुत्वका अनुभव किया गया है, उस घटके साथ इन्द्रियसम्बन्ध होनेपर 'घटोऽयं गुरुः' ( यह घड़ा वजनदार है ), ऐसा प्रत्यक्ष होता है। इसमें विशेषणीभूत गुरुत्वमें अतिव्याप्ति होगी, अतः इन्द्रियजन्यत्व प्रत्यक्षका लक्षण युक्त नहीं है।