भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 284
२५४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

अपरोक्षत्वमपि निवर्तकज्ञानविशेषणमिति चेत्, किं तदपरोक्षत्वम् ? न तावज्जातिः । 'दण्ड्ययमासीत्' इति संस्कारोपनीतदण्डविशिष्टपुरुषविषयकस्य चाक्षुषज्ञानस्य दण्डांशेऽपि तत्सत्त्वे तत्रापि विषयगताज्ञाननिवृत्त्यापातात् । 'दण्डं साक्षात्करोमि' इति तदंशेऽप्यापरोक्ष्यानुभवापत्तेश्च । अननुभवेऽपि संस्कारं सन्निकर्षं परिकल्प्य इन्द्रियसन्निकर्षजन्यतया तत्र काल्पनिकापरोक्ष्याभ्युपगमे अनुमित्यादावपि लिङ्गज्ञानादिकं सन्निकर्षं परिकल्प्य तदङ्गीकारापत्तेः । दण्डांशे आपरोक्ष्यासत्त्वे तु तस्य

निरूपण किया ही जा चुका है, यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे परोक्षज्ञानसे भी विषयके अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी ।

यदि शङ्का हो कि अज्ञानके निवर्तक ज्ञानमें अपरोक्षत्व विशेषण देंगे, [ अर्थात् अपरोक्षज्ञान ही अज्ञानका निवर्तक होता है अन्य नहीं, अतः अपरोक्ष ज्ञानसे अज्ञानकी निवृत्ति नहीं हो सकती है ] यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि अपरोक्षत्व क्या है ? [ उसका निर्वचन करना होगा, तात्पर्य यह है कि ज्ञानमें जो अपरोक्षत्व विशेषण देते हैं, वह जातिरूप है या उपाधिरूप है ? ] जातिरूप नहीं हो सकता है, क्योंकि 'अयं दण्डी आसीत्' ( यह दण्डी था ) इस प्रकार संस्कारसे उपनीत दण्डसे युक्त पुरुषविषयक चाक्षुष ज्ञानके दण्ड अंशमें यदि अपरोक्षत्व जाति है, तो उसमें भी विषयके अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी * । अनुभव न होनेपर भी यदि दण्डांशमें संस्काररूप सन्निकर्षकी कल्पना करके इन्द्रियसन्निकर्षसे जन्य होनेके कारण उसमें काल्पनिक अपरोक्षत्वकी कल्पना की जाय, तो अनुमिति आदिमें भी लिङ्गज्ञान आदि सन्निकर्षकी† कल्पना करके—अपरोक्षत्वप्रसक्ति होगी । दण्ड अंशमें अपरोक्षत्व


* तात्पर्य यह है कि किसी समयमें दण्डसे युक्त विष्णुमित्रका ग्रहण हुआ था, कालान्तरमें दण्डरहित विष्णुमित्रको देखकर संस्कार और इन्द्रियसे ज्ञान होता है कि 'यह विष्णुमित्र दण्डी था'। यहां पर शङ्का होती है—इसमें दण्डांशमें प्रत्यक्षत्व है, या नहीं है। यदि प्रत्यक्षत्व माना जाय, तो दण्डांशमें अज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त होगी । इष्टापत्ति नहीं कर सकते हैं, क्योंकि वह दण्ड कैसा था, इस प्रकार जिज्ञासा होती है, यदि तद्गत अज्ञानकी निवृत्ति होती, तो यह जिज्ञासा उदित नहीं होती ।

† तात्पर्य यह है कि 'स्वविषयप्रत्यासत्तिः सन्निकर्षः' ( स्वविषयके साथ सम्बन्ध सन्निकर्ष है ) इस मतका अङ्गीकार करके संस्कारकी कल्पनाकर इन्द्रियसन्निकर्षजन्यत्वरूप कल्पनाके

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