भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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प्रत्यक्षसे अद्वैत श्रुतिका अबाधितत्वविचार] भाषानुवादसहित २६७

त्माश्रयापत्तेः । पक्षसाध्यहेतुपक्षताद्यभेदभ्रमे सति सिद्धसाधनादिनाऽनुमानाप्रवृत्त्या तदभेदज्ञानविघटनीयस्य तद्द्भेदज्ञानस्याऽपेक्षितत्वात् ।

अस्तु तर्हि भेदांशे इव प्रतियोगिवैशिष्ट्यांशेऽपि प्रत्यक्षमिवि चेत्, न; प्रतियोगिनोऽप्रत्यक्षत्वे तद्वैशिष्ट्यप्रत्यक्षायोगात् सम्बन्धिद्वयप्रत्यक्षं विना सम्बन्धप्रत्यक्षासम्भवात् । तस्मात् प्रत्यक्षायोग्यस्य प्रतियोगिनो भ्रान्तिरूप एव प्रतिभास इति तदेकवित्तिवेद्यत्वनियतस्य भेदस्य भेदैकवित्तिवेद्यत्वनियतस्य घटादेश्च भ्रमैकविषयत्वात् प्रत्यक्षं निर्विशेषसन्मात्रग्राह्यद्वैतसिद्धयनुकूलमिति ।

प्रतियोगीके सम्बन्धके संस्कारका आधान हो सकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भेदज्ञानके विना अनुमितिके न होनेसे आत्माश्रय होगा, [ तात्पर्य यह है कि अनुमिति तभी हो सकती है जब पक्षादिके भेदका ज्ञान हो, और पक्षादिभेदज्ञान तभी हो सकता है जब अनुमिति हो, इससे अपने ज्ञानमें अपनी ही अपेक्षा होनेसे आत्माश्रय दोष होगा । अतः आत्माश्रयरूप दोषसे दुष्ट होनेके कारण उक्त अनुमिति नहीं हो सकती है और अनुमितिके न होनेसे भेदगत प्रतियोगीके वैशिष्ट्यका भान भी नहीं हो सकता है ], क्योंकि पक्ष, साध्य, हेतु और सपक्ष आदिका अभेदभ्रम होनेपर सिद्धसाधन आदिसे अनुमानकी प्रवृत्तिके न होनेके कारण उनके अभेदज्ञानके विघटनके लिए भेदज्ञानकी अपेक्षा है ।

यदि प्रतियोगिवैशिष्ट्यांशका स्मृतिरूप ज्ञान सम्भव नहीं है, तो भेदांशके समान वैशिष्ट्यांशमें भी प्रत्यक्षरूप ही हो ? तो यह भी नहीं हो सकता है, क्योंकि प्रतियोगीका प्रत्यक्ष न होनेके कारण प्रतियोगीके वैशिष्ट्यका भी प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, क्योंकि दो सम्बन्धियोंके ज्ञानके विना सम्बन्धका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । इससे प्रत्यक्षके लिए सर्वथा अयोग्य प्रतियोगीका प्रतिभास केवल भ्रान्तिसे ही होता है, अतः प्रतियोगीप्रत्यक्षवेद्यत्वसे नियत भेदमें और नियमतः भेदज्ञानमें विषयीभूत घट आदिमें केवल भ्रान्तिज्ञानकी विषयता होनेसे निर्विशेष संद्रूपका केवल ग्रहण करनेवाला प्रत्यक्ष प्रमाण भी अद्वैत सिद्धिमें अनुकूल ही है * ।


* प्रतियोगीका प्रत्यक्ष न होनेसे भेदका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, और भेदके प्रत्यक्ष के विना घट आदिका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, प्रतियोगी प्रत्यक्षयोग्य नहीं है, तथापि उसका जो प्रतिभास होता है, वह भ्रान्तिमात्र है, अतः भ्रमात्मक प्रतियोगीके ज्ञानका विषय भेद तथा


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