भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 298
२६८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

ब्रह्मसत्तानुविद्धं हि विश्वमिन्द्रियगोचरः ।
स्वतो नेत्यविरोधत्वमाहुर्न्यायसुधाकृतः ॥ ३ ॥

ब्रह्मसत्तासे अनुविद्ध ( युक्त ) ही सम्पूर्ण जगत् इन्द्रियका गोचर होता है, स्वतः नहीं, अतः प्रत्यक्षसे विरोध नहीं है, ऐसा न्यायसुधाकार कहते हैं ॥ ३ ॥

न्यायसुधाकृतस्त्वाहुः—घटादेरिन्द्रियकत्वेऽपि 'सन् घटः' इत्यादिरधिष्ठानसत्त्वानुवेध इति न विरोधः । एवं 'नीलो घटः' इत्यादिरधिष्ठाननैल्यानुवेधः किं न स्यादिति चेत्, न; श्रुत्या सद्रूपस्य वस्तुनो जगदुपादानत्वमुक्तमविरोधात् सर्वसम्मतमिति, तदनुवेधेनैव 'सन् घटः' इत्यादिप्रतिभासोपपत्तौ घटादावपि सत्ताकल्पने गौरवम् । तस्य रूपादिहीनत्वाद्, नैल्यादिकं घटादावेव कल्पनीयमिति वैषम्यादिति ।

* न्यायसुधाकार कहते हैं कि यद्यपि घट आदि पदार्थ इन्द्रियजन्य प्रत्यक्षके विषय अवश्य हैं, तथापि 'सन् घटः' इस प्रकार जो घट आदिमें सत्ताका प्रतिभास होता है, वह अधिष्ठानकी सत्ताके सम्बन्धको ही विषय करता है, अतः विरोध नहीं है । यदि शङ्का हो कि 'नीलो घटः' ( घट नीला है ) इस प्रत्यक्षसे घटादिमें भासमान नैल्यका प्रतिभास भी ( सन् घटः, इस ज्ञानके समान ) अधिष्ठानगत नैल्यको ही विषय करेगा, वस्तुतः नैल्यका अवगाहन नहीं करेगा, [अतः ब्रह्म भी रूपवान् होगा,] तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि श्रुतिने सद्रूप ब्रह्मवस्तुमें जगत्के प्रति जो उपादान कारणता कही है, वह विरोध न होनेके कारण सभीको सम्मत है, इसलिए अधिष्ठानकी सत्ताको लेकर ही 'सन् घटः' इत्यादि प्रत्यक्षकी उपपत्ति हो सकती है, तो घटादिमें सत्ताकी कल्पना करना केवल गौरवमात्र है । और जगत्के अधिष्ठानभूत ब्रह्ममें रूप न होनेके कारण नीलिमाकी कल्पना घटमें ही करनी चाहिए, यह वैषम्य है ।


भ्रमात्मक भेदज्ञानके विषय घट आदि भी भ्रान्तिसिद्ध होंगे, इसलिए प्रत्यक्ष अधिष्ठानभूत सद्वस्तुके ग्रहणमें ही प्रमाण है, यह भाव है ।

* न्याय सुधाकारका कहना है कि घट आदिमें चक्षु आदिसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानकी विषयता है, इसलिए उन्हें अनुभवके अनुसार चाक्षुष मानना पड़ता है, तथापि प्रपञ्चमें मिथ्यात्वका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिके साथ उसका विरोध नहीं है, क्योंकि घट आदिमें जिस सत्ताका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, वह अतिरिक्त अर्थात् अधिष्ठानसत्तासे अलग सत्ता नहीं है, जैसे स्फटिकमें स्वतः रक्तिमा न होनेपर भी जपाकुसुमगत रक्तिमाका ग्रहण होता है, वैसे ही घटमें स्वतःसत्ता न होनेपर भी ब्रह्मसत्ताका ही घटादिमें प्रतिभास होता है, यह भाव है ।

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