भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 308
२७८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

'अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम् ।
आद्यं त्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम् ॥१॥'

इति वृद्धोक्तप्रकारेणाऽऽगमेन व्यवस्थाप्यतामिति तुल्यम् । न चैवमुपजीव्यविरोधः । आगमप्रमाणेन वर्णपदवाक्यादिस्वरूपांशप्रत्यक्षमुपजीव्याऽनुपजीव्यतत्सत्यत्वांशोपमर्दनादित्याहुः ॥


* 'अस्ति भाति प्रियं०' (घट है, घट प्रकाशित होता है, घट प्रिय है, ये तीन अंश ब्रह्मरूप हैं और घट यह नाम अंश और घटादिका कम्बुग्रीवादिमत्त्व आदिरूप अंश ये दोनों जगत्रूप हैं) इस प्रकारके वृद्धोक्त आगमसे—व्यवस्था करनी चाहिए । यदि कहो कि; आगमसे प्रत्यक्षका बाध होगा, तो उपजीव्यके साथ विरोध होगा ? तो यह शङ्का भी युक्त नहीं है, क्योंकि वर्ण, पद, वाक्य आदि स्वरूपांशके प्रत्यक्षको उपजीव्य करके आगम-प्रमाण अनुपजीव्य प्रत्यक्षगत सत्यत्वांशका उपमर्दन कर सकता है† ॥ १ ॥


* ब्रह्ममें अध्यस्त होनेके कारण घटमें अस्तित्त्वका, चैतन्यका और आनन्दका अव भास होता है—घट है, घट भासता है, और घट प्रिय है, इसलिए घटमें भासनेवाले ये तीन अंश ब्रह्मके ही हैं, घटके नहीं हैं घटादि नाम और उनका स्वरूप ब्रह्मरूप नहीं है, क्योंकि ब्रह्म नाम और रूपसे विनिर्मुक्त है । इसलिए जगत्में भासनेवालोंमें से प्रथम तीन रूप ब्रह्मके और इतर दो रूप जगत्के हैं, सभी जगत्के पदार्थोंमें पांच अंश अवश्य भासते हैं, यह निर्विवाद है, क्योंकि शत्रु आदिका दुःख सबको प्रिय भासता है । अतः जगत्के पञ्चांशमें कोई विरोध नहीं है, यह भाव है ।

† शङ्काका तात्पर्य यह था कि प्रत्यक्षशब्दका उपजीव्य है अर्थात् प्रत्यक्षके विना शब्द स्वार्थका बोध कर ही नहीं सकता है, अतः शब्दप्रमाण अपने अर्थके बोधनमें प्रत्यक्षकी अपेक्षा करेगा, अतः उपजीव्य है, यदि शब्दप्रमाण अपने उपजीव्यका विरोध करेगा, तो स्वार्थका बोध ही नहीं करेगा, इसलिए आगमका प्रत्यक्षसे बाध करना असङ्गत है ? इस शङ्का-पर उत्तर है कि अवश्य प्रत्यक्षशब्दका उपजीव्य है, परन्तु वह कौनसा प्रत्यक्ष है ? वर्ण, पद और वाक्यात्मक शब्दका श्रोत्रसे होनेवाला प्रत्यक्ष, क्योंकि शब्दज्ञानके विना शाब्दबोध नहीं हो सकता है । इस परिस्थितिमें यदि श्रुति सम्पूर्ण प्रत्यक्षका बाध करेगी, तो उपजीव्य प्रत्यक्षका भी विरोध प्रसक्त होगा, परन्तु श्रोत्र इन्द्रियसे उत्पन्न होनेवाला शब्द प्रत्यक्ष, जो शब्दात्मक ही है, उसका सत्त्व भी ग्रहण करता है, और श्रुतिसे प्रत्यक्षके सत्त्वांशका बाध होता है, परन्तु यह शब्दका उपजीव्य नहीं है, क्योंकि कल्पित शब्दसे भी शाब्दबोध हो सकता है, तो उसकी सत्ता मानना निरर्थक है, और शब्दस्वरूपांशके प्रत्यक्षरूप उपजीव्यका बाध नहीं करता है, अतः उपजीव्यके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है ।