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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 309

प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित २७९


ननु सोमपदे नैवं भवेन्मत्वर्थलक्षणा ।
प्रस्तरो यजमानः स्याद्

यदि आगम प्रत्यक्षसे बलवान् है, तो 'सोमेन यजेत' इसमें सोमपदकी मत्वर्थमें लक्षणा नहीं होगी और प्रस्तर यजमान भी होगा।

नन्वागमस्य प्रत्यक्षाद् बलीयस्त्वे 'यजमानः प्रस्तरः' इत्यत्र प्रत्यक्षाविरोधाय यजमानशब्दस्य प्रस्तरे गौणी वृत्तिर्न कल्पनीया । तथा 'सोमेन यजेत' इत्यत्र वैयधिकरण्येनाऽन्वये यागे इष्टसाधनत्वम्, सोमलतायां

अब शङ्का होती है कि यदि आगमको प्रत्यक्षसे बलवान् माना जाय, तो 'यजमानः प्रस्तरः' (कुशमुष्टि यजमान है) इस श्रुतिमें प्रत्यक्षके साथ विरोधके परिहारके लिए यजमानशब्दकी कुशमुष्टिमें गौणी वृत्ति नहीं माननी चाहिए, [तात्पर्यार्थ यह है कि चूंकि कुशमुष्टि यजमान (याग करनेवाला) नहीं हो सकती है, अतः 'यजमानः प्रस्तरः' इस श्रुतिसे प्रस्तरको जो यजमान कहा गया है, वह मुख्य नहीं है अर्थात् उक्त श्रुतिका तात्पर्य प्रस्तरको यजमान कहने में नहीं है, किन्तु केवल लाक्षणिक है, यह सिद्धान्त किया गया है, परन्तु अब इस सिद्धान्तकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि प्रत्यक्षसे आगम बलवान् ही ठहरा, अतः गौण कल्पना निरर्थक है, ] वैसे 'सोमेन यजेत' * (सोमवल्लीवाले यागसे अभीष्ट प्राप्त करे) इस श्रुतिमें कहा गया है—वैयधिकरण्यसे सोम और यागका अन्वय हो, तो यागमें इष्टसाधनत्व और सोमलतामें याग-


* 'सोमेन यजेत' (सोमयागसे इष्टका सम्पादन करे) इस श्रुतिमें शङ्का हुई कि सोम-शब्दका अन्वय धात्वर्थ यागमें सामानाधिकरण्यसे करना या वैयधिकरण्यसे ? सामानाधिकरण्य-शब्दका अर्थ है—एकार्थकत्व अर्थात् अभेद, वैयधिकरण्यका अर्थ होगा भिन्नार्थकत्व। और जहाँ जहाँ सामानाधिकरण्यसे अन्वय होता है, वहाँ वहाँ अभेद ही देखा जाता है, जैसे 'सोऽयं देवदत्तः' (वही देवदत्त है) इसलिए यदि सामानाधिकरण्यसे अन्वय करें, तो 'सोमेन यजेत' इसका अर्थ होगा सोमरूप यागसे इष्टका सम्पादन करे, परन्तु यह नहीं हो सकता है, क्योंकि द्रव्यदेवतात्मक याग सोम नहीं हो सकता है, इसमें केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है। यदि वैयधिकरण्यसे अन्वय मानेंगे, तो यह अर्थ होगा—याग इष्टका साधन है और सोम-यागका साधन है, इस परिस्थितिमें एक बार श्रुतविधिप्रत्ययकी दो व्यापारोंमें लक्षणा माननी होगी, इसलिए उस व्यापारसे घटित वाक्यका भी द्विविध व्यापार होगा, अतः वाक्य-भेद प्रसक्त होगा, यह भाव है, इनमें सामानाधिकरण्यसे अन्वयका प्रत्यक्षविरोधसे परित्याग किया जाता है, परन्तु प्रत्यक्षसे श्रुति के बलवती होनेसे सामानाधिकरण्यसे अन्वय हो सकता है, तो क्यों उसका परित्याग किया जाता है, यह पूर्वपक्षका भाव है।

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