सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 310, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ें| २८० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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यागसाधनत्वं च बोधनीयमिति व्यापारभेदेन वाक्यभेदापत्तेः । सामाना- धिकरण्येनाऽन्वये वक्तव्ये प्रत्यक्षाविरोधाय 'सोमवता यागेन' इति मत्वर्थ- लक्षणा न कल्पनीया । उभयत्राऽपि सत्यपि प्रत्यक्षविरोधे तदनादृत्याऽऽ- गमेन बलीयसा प्रस्तरे यजमानाभेदस्य, यागे सोमाभेदस्य च सिद्धि- सम्भवादिति चेत्,
अत्राऽऽहुर्भामतीकृतः ॥ ८ ॥
मानान्तराद्बलवती श्रुतिस्तात्पर्यगोचरे ।
अन्यत्र त्वविरुद्धार्थे देवताविग्रहादिके ॥ ९ ॥
इस आक्षेपके समाधानमें भामतीकार कहते हैं कि तात्पर्यविषयपदार्थमें अन्य प्रमाणोंसे श्रुति बलवती है और अन्यत्र देवताशरीर आदि अविरुद्ध अर्थमें श्रुतिप्रमाण है ॥ ८ ॥ ९ ॥
अत्रोक्तं भामतीनिबन्धे—तात्पर्यवती श्रुतिः प्रत्यक्षात् बलवती
साधनत्वकी कल्पना करनी होगी, अतः व्यापारके भेदसे वाक्यभेद प्रसक्त होगा, यदि सामानाधिकरण्यसे अन्वय किया जायगा, तो प्रत्यक्षसे विरोध होगा, अतः मत्वर्थमें लक्षणा करनी होगी, परन्तु अब प्रत्यक्षके साथ अविरोधके लिए मत्वर्थमें लक्षणा करनेकी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि दोनों स्थलोंमें प्रत्यक्ष विरोध होनेपर भी उसकी परवा न कर बलवान् आगमप्रमाणसे प्रस्तरमें यज- मानका अभेद और यागमें सोमका अभेद सिद्ध हो सकता है ।
परन्तु यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि इस विषयमें भामतीकारने कहा है कि तात्पर्यसे युक्त श्रुति ही प्रत्यक्षसे बलवती होती है, श्रुतिमात्र ( सब श्रुति ) बलवती * नहीं होती है । मन्त्रोंका और अर्थवादवाक्योंका स्तुतिके
* जब तात्पर्यवाली श्रुति ही प्रमाण है, तो 'सोमेन यजेत' इत्यादि श्रुतियोंका सोम और याग आदिके सम्बन्धमें तात्पर्य न होनेसे श्रुतिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष ही बलवान् होगा, इसलिए प्रत्यक्षके साथ विरोधके परिहारके लिए सोमशब्दकी मत्वर्थमें लक्षणा करनी चाहिए, वैसे ही 'यजमानः प्रस्तरः' यह श्रुति भी, स्वार्थमें तात्पर्य न होनेसे, गौणार्थक ही माननी चाहिए, प्रपञ्चमें मिथ्यात्वप्रतिपादक श्रुतियोंका स्वार्थके प्रतिपादनमें ही तात्पर्य होनेसे प्रत्यक्षकी अपेक्षा श्रुति ही बलवती होती है, अतः उन श्रुतियोंसे प्रत्यक्षका बाध होना अनिष्टकारक है, यह समाधानका भाव है ।